बात की बात, Bat ke bat,

31 may 2014

इनके खिलाफ हर उसको वोट देना चाहिए, जिसने महिला से जन्म लिया हो


संपादकीय
31 मई 2014
पाकिस्तान के साथ जब कभी किसी मुद्दे पर भारत की तुलना की जाए, तो भारत में बहुत से लोगों को लगता है कि पाकिस्तान अधिक पिछड़ा हुआ, अधिक दकियानूसी, अधिक हिंसक, और अधिक कट्टरपंथी देश है। हो सकता है कि आंकड़े इस बात को सही साबित भी करें, लेकिन एक दूसरी बात यह है कि हिंदुस्तान में भी लोगों की सोच उसी तरह की है, वैसी ही, और उतनी ही हिंसक है, फर्क महज यह है कि हिंदुस्तान में कानून का राज पाकिस्तान के मुकाबले कुछ बेहतर है, इसलिए लोग अपने मन की पूरी हिंसा का इस्तेमाल नहीं कर पाते। 
चार दिन पहले ही पाकिस्तान के लाहौर में हाईकोर्ट खुलने का इंतजार करते हुए उसके बाहर खड़ी एक गर्भवती युवती को उसके घरवालों ने ईंट-पत्थर से मार-मारकर मार डाला। घरवालों ने उसकी शादी एक रिश्तेदार से तय की थी, और उसने उनकी मर्जी के खिलाफ जाकर बाहर शादी की थी। घरवालों ने इसे इज्जत की बात मानकर उसे मार डाला। अब सरहद के दूसरी तरफ, हिंदुस्तान में, एक दूसरे मजहब के हिंदू लोग हरियाणा और उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्सों में हर कुछ हफ्तों में ऐसी वारदात करते दिखते हैं। लेकिन आज इन मामलों पर लिखने की वजह थोड़ी सी अलग, और खासी एक सी है। उत्तरप्रदेश में जिस तरह दो नाबालिग दलित बहनों के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ, और उसके बाद बलात्कारियों ने उनकी हत्या करके लाशों पर पेड़ पर टांग दिया, उस पर संयुक्त राष्ट्र संघ से भी फिक्र जाहिर की गई है। हम पाकिस्तान और भारत दोनों जगहों पर लोगों की हिंसक सोच पर लिखना चाहते हैं कि उत्तरप्रदेश के इस बलात्कार में तीन भाई शामिल थे, और भाईयों को एक साथ बलात्कार करने से एक-दूसरे से कोई हिचक भी नहीं थी। इन बलात्कारियों में पुलिस भी थी, और अपने पुलिस होने की वजह से ही ऐसे जुर्म से उनको हिचक नहीं थी। सब कुछ हो जाने के बाद बलात्कारियों की ओर से मारी गई लड़कियों की मां पर मुंह बंद रखने के लिए हिंसक हमला किया गया, और पुलिस ने बचाने की कोई कोशिश नहीं की। आज जब यह पूरा मामला पूरी दुनिया को हिला रहा है, तो उत्तरप्रदेश के विदेश-शिक्षित, नौजवान, कथित समाजवादी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी हिंसक बेशर्मी के साथ एक महिला पत्रकार से कहते हैं कि वह तो अब तक सुरक्षित है, उसे तो खतरा नहीं हुआ है। 
समाजवाद के नाम पर एक कुनबे का यह राज अब अलोकतांत्रिक होने के साथ-साथ, सामंती होने के साथ-साथ, बेशर्म होने के साथ-साथ, एक मुजरिम-दर्जे का निर्वाचित राज हो गया है, और इसका कोई तुरत-इलाज भारतीय लोकतंत्र में नहीं है। प्राकृतिक न्याय तो आज यही सुझाता है कि उत्तरप्रदेश सरकार के बाप मुलायम सिंह यादव जब बलात्कारियों के साथ नरमी दिखाते हुए सार्वजनिक बयान देते हैं कि लड़कों से गलतियां हो जाती है, और जब उनके बेटे के राज में ऐसी वारदातें बढ़ती चलती हैं, पुलिस उनमें शामिल रहती हैं, तो ऐसी सरकार खत्म हो जाना चाहिए। लेकिन लोकतंत्र प्राकृतिक न्याय के मुकाबले अधिक लचीला है, और अधिक रियायत देता है। बाप-बेटे की नालायक सरकार हिंसा को बढ़ावा दे रही है, और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर, साम्प्रदायिकता-विरोध के नाम पर, समाजवाद के नाम पर, मुलायम सिंह यादव जिस तरह की अराजकता को बढ़ावा दे रहे हैं, उत्तरप्रदेश को जितना बर्बाद कर चुके हैं, लोकतांत्रिक मूल्यों के मुंह पर जिस तरह रात-दिन थूक रहे हैं, उससे यह बात जाहिर है कि उनको सत्ता पर बने रहने का कोई हक नहीं है। लेकिन लोकतंत्र के भीतर जिस तरह एक मुजरिम भी अकसर पूरी जिंदगी कानूनी छेदों में से कूद-फांदकर सजा से बचे रहता है, उसी तरह यह बाप-बेटे भी सत्ता पर बचे हुए हैं। इनकी बातें और सरकार चलाने का इनका तौर-तरीका जितनी हैवानियत का है, इनके खिलाफ अगले किसी भी चुनाव में हर उस वोटर को वोट देना चाहिए जिसने किसी महिला से जन्म लिया हो।

अपनी जीवनी के खिलाफ मोदी की सोच एकदम सही

30 मई 2014
संपादकीय
भाजपा की सरकारों वाले दो राज्यों में तय किया था कि नरेन्द्र मोदी की जीवनी के पाठ स्कूली किताबों में शामिल किए जाएं, इस सोच को नरेन्द्र मोदी ने सार्वजनिक रूप से खारिज कर दिया, और कहा कि उनका यह स्पष्ट मानना है कि जिंदा लोगों की जीवनी स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत में बहुत से महान लोगों का संपन्न इतिहास है, स्कूली बच्चों को उनके बारे में पढ़ाया जाना चाहिए। 
मोदी लीक से हटकर काम कर रहे हैं, और उन्हें मिला विशाल चुनावी बहुमत उनको ऐसे फैसले लेने का हक भी दे रहा है। हिन्दुस्तान का आजादी के बाद का इतिहास स्कूली किताबों के राजनीतिक इस्तेमाल से लदा हुआ है। न सिर्फ किताबें, बल्कि सार्वजनिक जगहों, और सरकारी योजनाओं को लेकर लंबे अरसे से यह शिकायत चली आ रही थी कि नेहरू-गांधी परिवार के गिने-चुने तीन-चार लोगों के नाम पर देश-प्रदेश में सब कुछ रख दिया गया है। ऐसे में नरेन्द्र मोदी की सरकार का एक रूख बिना औपचारिक घोषणा के खबरों में है कि यह सरकार मौजूदा योजनाओं के नाम बदलने नहीं जा रही। नरेन्द्र मोदी अगर सचमुच ऐसा करते हैं, तो इन दो बातों को मिलाकर देखने की जरूरत है। अपने खुद के महिमामंडन से बचकर वे अगर पिछली सरकार की योजनाओं के नाम बदलने के अधिकार से भी बचते हैं, तो वे अपने लिए एक तंगदिली, और विरोधियों के लिए एक दरियादिली दर्ज करेंगे, और इससे उनका ही कद और ऊंचा आंका जाएगा। 
लोगों को अपने खुद के, अपने कुनबे के, अपने रिश्तेदारों के सम्मान को बढ़ाने की कोशिशों को छोडऩा चाहिए। अपने ही लोगों के उठाए झंडों से कोई इतिहास में दर्ज नहीं हो सकते। फिर भारत जैसे लोकतंत्र में जो लोग राजनीति में हैं, या सरकारी नौकरियों में हंै, कारोबार में हैं, या सार्वजनिक जीवन में हैं, उनको सरकार की तरफ से दिए जानेे वाले सम्मान में भी हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए। बहुत से लोगों के गलत काम महीनों और बरसों बाद सामने आते हैं, और फिर उनको सजा होती है। ऐसी सजा के पहले ही अगर लोगों को राजकीय सम्मान दिए जाते हैं, तो बाद में उनके खतरे में पडऩे का खतरा भी रहता है, और ऐसे सम्मानों का सम्मान भी घटता है। 
नरेन्द्र मोदी ने जिंदा लोगों की जीवनी के बारे में जो कहा है, वह एकदम सही है। सत्ता पर बैठे लोगों की वाहवाही के लिए बहुत से लोग ऐसे स्कूली पाठ लेकर सामने आ सकते हैं। लेकिन ऐसे में उन लोगों को कुछ त्याग करना चाहिए, जो कि देश-प्रदेश की ऊंची कुर्सियों पर हैं। सम्मान उस वक्त जाकर जायज साबित होता है, जब उनकी जीवनियां पढ़ाई जाएं, जो कि आज किसी का भला या बुरा नहीं कर सकते। 

मोदी को किफायत और सादगी बढ़ानी चाहिए

29 मई 2014
संपादकीय

नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सरकारी नियम-कायदों से परे दो बातें जो अपने साथी मंत्रियों को कही हैं, वे लोकतंत्र में जरूरी थीं, और उनके लिए देश-प्रदेश के सरकारों में खासी हिकारत रहती है। उन्होंने मंत्रियों से कहा कि वे अपने निजी स्टाफ में न तो रिश्तेदारों को रखें, और न ही गैरसरकारी कर्मचारियों को। इसके साथ-साथ उन्होंने दफ्तर और बंगलों पर फिजूलखर्ची न करने को भी कहा है। नरेन्द्र मोदी गुजरात छोड़कर दिल्ली आते वक्त अपने निजी पैसों में से 21 लाख रूपए छोटे कर्मचारियों के बच्चों की पढ़ाई के लिए देकर आए थे, और वे एक सादगी की जिंदगी के लिए जाने जाते हैं, इसलिए उनको ऐसी मसीहाई नसीहत देने का हक भी है। इसके साथ-साथ उन्होंने आज मंत्रिमंडल में दस सूत्रों का एक एजेंडा भी सामने रखा है, नई सरकार की अगले पांच बरस के लिए सामने रखी गई ऐसी सोच पर सोचने की जरूरत भी है। लेकिन ये बातें सरकारी कामकाज से जुड़ी हुई हैं, इसलिए आज यहां पर हम कुछ निजी बातों पर ही चर्चा सीमित रखना चाहते हैं, कि मोदी सरकार को अपना चाल-चलन कैसा रखना चाहिए।
दरअसल यूपीए सरकार की ऐतिहासिक हार को देखते हुए हमने इसी जगह उन तमाम बातों को लिखा था जिनकी वजह से यूपीए और कांग्रेस की हार इतनी बड़ी हुई थी। जब सत्ता यह सोच लेती है कि वह जनता के साथ, जनता के सामने, जनता के पैसों से, जैसा चाहे वैसा सुलूक कर ले, और जनता उस पर कुछ भी नहीं कर सकती, तो वैसी सरकार के दिन गिने-चुने बचते हैं। भारतीय जनता पार्टी अपने आरएसएस के दिनों से सादगी पर चलने की बात करती थी, लेकिन हाल के दशकों में बार-बार सत्ता पर आने के बाद इस पार्टी की सरकारों से भी सादगी चली गई थी। लालबत्ती, एयर कंडीशनर, और फिजूलखर्ची, दौलत का दिखावा, इन तमाम बातों में भाजपा के लोग कांग्रेस के लोगों से कहीं भी पीछे नहीं रह गए थे, नहीं रह गए हैं। इस बार के आम चुनावों के नतीजों से सबक लेकर भाजपा को अपनी पार्टी के भीतर सार्वजनिक संस्कृति की रीति-नीति को दुबारा तय करना चाहिए, और इसमें हम गांधीवादी सादगी, और किफायत की सिफारिश करते हैं।
आज यह जाहिर है कि नरेन्द्र मोदी न सिर्फ भाजपा-एनडीए के मुखिया हैं, देश के सबसे ताकतवर व्यक्ति हैं, बल्कि भाजपा संगठन के भीतर भी उनकी बात का सबसे अधिक वजन है, और उसका इस्तेमाल करके वे अपनी पार्टी की लकीर, कांग्रेस जैसी पार्टियों के मुकाबले अधिक बड़ी कर सकते हैं, और ऐसी नई संस्कृति पांच बरस बाद के चुनाव में, या फिर आने वाले महीनों-बरसों में होने वाले किसी भी राज्य के चुनाव में, स्थानीय संस्थाओं के चुनाव में, उनकी पार्टी के काम आ सकती है। सरकार में किफायत की सोच को लाना इसलिए भी जरूरी है कि जनता बहुत गरीबी में बहुत मुश्किल से जी रही है, और जब वह सत्ता की फिजूलखर्ची को देखती है, तो कांग्रेस या भाजपा पर से ही नहीं, पूरे के पूरे लोकतंत्र से ही उसका भरोसा उठ जाता है, राजनीति के लिए उसके मन में नफरत हो जाती है।
किफायत को लेकर हम मोदी सरकार को, और भाजपा-कांग्रेस या किसी भी पार्टी की दूसरी सरकार को एक छोटी सी सलाह दे सकते हैं। जिस देश में हर दिन दस-बारह घंटे की बिजली कटौती बहुत से राज्यों में आम बात हो, वहां पर गरीब बच्चों के सौ-सौ घरों जितनी बिजली जब एक-एक सरकारी कमरा एयर कंडीशनर में खर्च करता है, तो वह लोकतंत्र नहीं रह जाता। इस माहौल को अगर नरेन्द्र मोदी बदल सकते हैं, तो यह एक बड़ी कामयाबी होगी। सत्ता के लोग मोटे-मोटे कोट और जैकेट पहनकर जब कमरों को भारी ठंडा करते हुए काम करते हैं, तो सामान्य वैज्ञानिक समझबूझ यह कहती है कि उनको कपड़े साधारण पहनने चाहिए, ताकि कमरों को उतना ठंडा रखने की जरूरत न हो। इसी के साथ-साथ कमरों के आकार को सीमित करना चाहिए, ताकि बिजली बचे। और बात महज बिजली बचाने की नहीं है, किफायत एक सोच होती है, और जब वह बिजली बचाने की तरफ मुड़ेगी, तो उस राह पर और दूसरे किस्म की फिजूलखर्चियों में भी कटौती करती चलेगी। नरेन्द्र मोदी को जनता के पैसों की ऐसी बर्बादी खत्म करके जनता का दिल जीतने का एक बड़ा मौका और मिल सकता है। जो अच्छा काम करे उसे अगर ऐसी शोहरत मिलती है, तो उसमें क्या बुराई है?

कम पढ़े-लिखे, और अधिक पढ़े-लिखे का इतिहास कांग्रेस याद रखे

28 मई 2014
संपादकीय
मोदी सरकार में मानव संसाधन मंत्री बनाई गई स्मृति जुबीन ईरानी को लेकर कांग्रेस ने हमला बोला है कि वे बारहवीं पास हैं, और देश की उच्च शिक्षा अब उनके मातहत रहेगी। लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की इस ओछी बात का विरोध कांग्रेस के ही एक दूसरे प्रवक्ता रहे मनीष तिवारी ने किया है, और मोदी सरकार से कल ही खासे नाखुश हुए कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी कांग्रेस की आलोचना के खिलाफ लिखते हुए पूछा है कि क्या विमानन मंत्री बनने के लिए पायलट होना जरूरी होता है? 
दरअसल कांग्रेस अपनी बददिमागी, और बदजुबानी की वजह से चुनाव में इतनी बुरी तरह, और पूरी तरह, शिकस्त पाने के बाद भी अपना दिमाग सुधार नहीं पा रही है। किसी मंत्रालय को चलाने के लिए उस मंत्री की पढ़ाई-लिखाई को अगर एक शर्त बना लिया जाए, तो कांग्रेस के पिछले बहुत से मंत्री और प्रधानमंत्री ऐसे रहे हैं, जिनकी पढ़ाई-लिखाई उनको किसी मंत्रालय के लायक नहीं बनाती थी। लेकिन देश ने कभी ऐसे ऊटपटांग सवाल खड़े नहीं किए थे। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रहते हुए अपने पास प्रतीकात्मक रूप से जो गिने-चुने मंत्रालय रखती थीं, उनमें परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे विभाग रहते थे। इंदिरा गांधी की पढ़ाई-लिखाई का और उनकी वैज्ञानिक समझ का ऐसे तकनीकी मामलों से क्या लेना-देना था? हमने इंटरनेट पर इंदिरा, राजीव, और कांग्रेस के कुछ दूसरे नेताओं की पढ़ाई-लिखाई की काबीलियत को तलाशा, तो लगा कि अभिषेक मनु सिंघवी को ओछी बात कहने के पहले कांग्रेस नेताओं की डिग्रियों को तौल लेना था। हम स्मृति ईरानी को यह मंत्रालय देने की वकालत नहीं कर रहे, लेकिन इतना जरूर समझ रहे हैं कि जिस तरह बहुत पढ़े-लिखे और विद्वान समझे जाने वाले, सबसे अधिक अनुभवी लोगों में से एक, अर्जुन सिंह ने इस मंत्रालय का मंत्री रहते हुए जैसी नौबत झेली थी, वैसी नौबत स्मृति ईरानी के साथ न आए वह जरूरी होगा। हमारे पाठकों को याद होगा कि अर्जुन सिंह के वक्त इस अखबार में एक रिपोर्ट छपी थी कि किस तरह उनकी बेटी ने इस मंत्रालय में जाकर बिस्किट निर्माताओं की तरफदारी की थी, और स्कूलों में दोपहर की भोजन की जगह बिस्किट करवाने की कोशिश की थी। पांच बरस में पैंसठ हजार करोड़ से अधिक का वह कारोबार निजी उद्योगों को दिलवाने की ऐसी कोशिश किसी अनपढ़ या कमपढ़ ने नहीं की थी। 
कांग्रेस के कुछ नेताओं की पढ़ाई-लिखाई देखें, तो विकीपीडिया के मुताबिक इंदिरा गांधी की स्कूल की पढ़ाई भी अधिकतर घर पर हुई थी, और बाद में वे कुछ समय के लिए विश्व भारती विश्वविद्यालय, शांति निकेतन में पढ़ीं। लेकिन अपनी बीमार मां का साथ देने के लिए उन्होंने एक बरस बाद ही विश्व भारती छोड़ दिया और मां के इलाज के लिए योरप गईं। वहां रहते हुए उन्होंने ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई जारी रखने की कोशिश की, और कुछ अरसा वे बैंडमिंटन स्कूल और सॉमरविले कॉलेज में पढ़ीं। इस दौरान वे खुद भी बीमार रहीं, एक पर्चे में उनके नंबर कम रहे और विश्व युद्ध के उस दौर में 1941 में वे ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई अधूरी छोड़कर हिंदुस्तान लौट आईं। बाद में विश्वविद्यालय ने उन्हें एक मानद उपाधि दी।
राजीव गांधी देहरादून की सबसे महंगी दो स्कूलों में पढ़े। वेलहम ब्यॉज स्कूल और दून स्कूल। इसके बाद वे ब्रिटेन में कैम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में इंजीनियरिंग पढऩे गए, वहां वे 1962 से 1965 तक रहे, लेकिन उन्होंने डिग्री पूरी नहीं की। वर्ष 1966 में वे इंपीरियल कॉलेज, लंदन में पढऩे गए, लेकिन एक बरस बाद वहां से भी बिना डिग्री छोड़कर आ गए।
छत्तीसगढ़ में कांगे्रस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष, और बकौल राहुल गांधी, भावी मुख्यमंत्री नंद कुमार पटेल पहले मप्र और छत्तीसगढ़ के मंत्री रह चुके थे। और अगर प्रदेश में कांगे्रस की सरकार आई होती, और उसके पहले नक्सल हमले में वे गुजर नहीं गए होते, तो वे राज्य के मुख्यमंत्री हो सकते थे। उनकी पढ़ाई सिर्फ स्कूल तक की थी, और स्मृति ईरानी की 12वीं से भी कम तक की थी। 
दूसरी तरफ टेलीकॉम घोटाले के लिए लंबे समय तक जेल में बंद, और आज भी अदालती कटघरे में खड़े हुए यूपीए के मंत्री रहे ए राजा का परिचय पढ़ें, तो वे साइंस गे्रजुएट हैं, और कानून में भी उन्होंने गे्रजुएशन के बाद पोस्टगे्रजुएट डिग्री हासिल की है। राजा की पार्टी की ही यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहीं कनिमोझी एक कॉवेंट स्कूल में पढ़ीं, और फिर अर्थशास्त्र में पोस्ट गे्रजुएशन किया। वे पत्रकार और कविताकार भी रहीं, लेकिन फिलहाल वे भ्रष्टाचार के मुकदमों में जेल, अदालत और जमानत के बीच कहीं पर हैं।
राष्ट्रमंडल खेलों के घोटालों में लंबे समय तक जेल में रहे सुरेश कलमाड़ी पूना के सेंट विसेंट हाईस्कूल में पढ़े और फिर पुणे के विख्यात फग्र्युसन कॉलेज में पढ़े। बाद में वे राष्ट्रीय प्रतिरक्षा अकादमी में पढ़े, और फिर एयरफोर्स फ्लाइंग कॉलेज, जोधपुर और इलाहाबाद में पढ़कर भारतीय वायुसेना में पायलट रहे। इसके बाद वे राष्ट्रीय प्रतिरक्षा अकादमी में दो साल पढ़ाते भी रहे, और 1965, और 1971 के युद्ध के बाद उन्हें आठ मैडल भी मिले थे।
हिंदुस्तान के संसदीय इतिहास में जिस पहले सांसद को सुप्रीम कोर्ट ने कुसूरवार पाकर संसद की सदस्यता से हटा दिया, वे रशीद मसूद देश की आजादी के दिन 15 अगस्त 1947 को पैदा हुए थे। और इन दिनों वे चार बरस की कैद काट रहे हैं क्योंकि उन्होंने कांगे्रस सांसद रहते हुए एमबीबीएस सीटों के आबंटन में घोटाला किया। और सीबीआई अदालत की सुनाई गई कैद के बाद उनकी संसद सदस्यता खत्म हुई। गांधी टोपी और खादी भी उनको इस जुर्म से नहीं रोक पाईं, और न ही बीएससी और एलएलएम की पढ़ाई ने उनको ऐसे घोटाले से रोका वे वीपी सिंह की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रह चुके थे, और लगातार लोकसभा, राज्यसभा में रहते आए थे।
इसलिए कांग्रेस कम से कम अब सुधर जाए, और अपनी ओछी जुबान को लेकर अभिषेक मनु सिंघवी जैसे लोग या तो अदालत जाएं और अपने पेशे का काम करें, या अपने घर बैठें। आज देश में कांग्रेस की बकवास को सुनने का जनता का कोई इरादा नहीं है, और अब इस पार्टी को विनम्रता के साथ चुप बैठकर मोदी सरकार को काम करने का मौका देना चाहिए, और इस सरकार से गलतियों और गलत कामों की उम्मीद करना चाहिए। उम्मीद पर दुनिया जिंदा रहती है, कांग्रेस भी कुछ बरस यही काम करे। 

नेहरू को इससे और बड़ी श्रद्धांजलि मुमकिन नहीं...

27 मई 2014
संपादकीय
अपने कामकाज के पहले दिन नरेन्द्र मोदी ने पहली ट्वीट जवाहर लाल नेहरू श्रद्धांजलि देने के लिए की। आज नेहरू की पुण्यतिथि है, और कोई और मौका होता तो प्रधानमंत्री से उम्मीद की जाती कि वे दिल्ली में नेहरू की समाधि से दिन की शुरुआत करें, लेकिन मोदी ने कल की सुबह तो बापू के राजघाट से शुरू की थी, आज की सुबह उन्होंने सीधे दफ्तर जाकर काम संभालकर शुरू की। कुछ लोगों को यह बात खटक सकती है कि उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू को श्रद्धांजलि देने जाना जरूरी नहीं समझा। लेकिन पिछले बहुत से कांग्रेसी, और शायद गैरकांग्रेसी प्रधानमंत्री भी नेहरू को श्रद्धांजलि देने जाते रहे होंगे, और कांग्रेस ने तो मानो नेहरू की सोच, उनकी परंपराओं, उनकी स्मृतियों, इन सबका पिंडदान ही करके छुटकारा पा लिया था। इसलिए ऐसी संतानों से बेहतर हम उनको मानते हैं जो नेहरू की तरह काम पर अधिक यकीन रखते हैं, पाखंड पर कम। 
आज नेहरू की समाधि पर जाने के बजाय उसी वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सार्क देशों के आए हुए राष्ट्रप्रमुखों या शासनप्रमुखों से बातचीत की तैयारी में लगे थे। हफ्ते भर पहले यह किसने सोचा था कि मोदी अपने कामकाज का पहला दिन पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के साथ बातचीत करके शुरू करेंगे? लेकिन एक नई सोच के साथ उन्होंने यह पहल की, और सरहद की सबसे बड़ी दिक्कत को सुलझाने की एक ऐसी कोशिश शुरू की, जो कि शायद नेहरू अपने वक्त करते, और उन्होंने बहुत से मौकों पर ऐसी बहुत सी अंतरराष्ट्रीय पहल की भी थीं। मोदी की इस एक पहल को लेकर उनकी नेहरू की अंतरराष्ट्रीय नीति से कोई तुलना करना गलत होगा, लेकिन भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में इतना विशाल बहुमत लेकर आया हुआ प्रधानमंत्री पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों के मामले में जो पहला कदम उठाता है, उसे कम से कम एक पहले कदम की तरह परखने की जरूरत तो है ही। 
हम परंपरागत श्रद्धांजलि को निहायत गैरजरूरी मानते हैं, और इस अखबार में भी हम श्रद्धांजलि लेखन को जगह नहीं देते हैं। खुद नेहरू बातों की जगह काम पर अधिक भरोसा रखते थे, और रीति-रिवाजों के बोझ से उन्होंने अपने आपको अलग रखा हुआ था। वे कड़ी मेहनत करने में भरोसा रखते थे, और मोदी सरकार के लोग, मोदी सरकार से लोग, कड़ी मेहनत की उम्मीद ही कर रहे हैं। बातों की लफ्फाजी के बजाय, फूलों के बजाय यह बेहतर है कि गांधी और नेहरू की सोच के कुछ टुकड़े ही सही, नरेन्द्र मोदी अपनी सरकार और देश को चलाते हुए इस्तेमाल करें। पाकिस्तान के साथ बातचीत की जो पहल आज इस वक्त दिल्ली में हो रही है, उससे दोनों देशों की तस्वीर बदल जाने की एक संभावना तो पैदा होती ही है। नरेन्द्र मोदी के बारे में हमने यहां लिखा भी है कि ऐतिहासिक चुनावी कामयाबी के बाद, उनके पास आगे इससे बड़ी कामयाबी साबित करना खासा मुश्किल काम होगा। लेकिन पाकिस्तान के साथ रिश्तों में तनाव अगर कम होता है, अगर सरहद पर आपसी खतरों को घटाकर फौजी खर्च को घटाया जा सकता है, अगर आपसी कारोबार से दोनों देशों का भला हो सकता है, तो यह नरेन्द्र मोदी के नाम इस चुनावी जीत से भी बड़ी जीत दर्ज होगी, और साथ-साथ पाकिस्तान के लीडर के नाम भी। 
विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय नीति को अगर देखें, तो न चाहते हुए भी भारत की सरहद-पार की फिक्रों का एक गैरजरूरी बड़ा हिस्सा पाकिस्तान की सरहद पर खर्च होता है। इस अकेले देश के साथ भारत के रिश्तों की कामयाबी या नाकामयाबी से ही उसकी विदेश नीति को आंका जाता है। इसलिए सबसे मुश्किल मोर्चे को अपने काम को सबसे पहले दिन छूने का जो हौसला नरेन्द्र मोदी ने दिखाया है, उसकी तारीफ उमर अब्दुल्ला जैसे नेता भी कर रहे हैं, और कांग्रेस के भीतर अब भी समझदारी की इक्का-दुक्का बातें करने वाले लोग भी मोदी की इस पहल की तारीफ कर चुके हैं। यह बहुत ही शर्मिंदगी की बात है कि नेहरू की कांग्रेस पार्टी ने मोदी की इस पाक-पहल के खिलाफ बड़ी बकवास की है। 
आज के दिन कांग्रेस के बहुत से लोग दिल्ली में शांतिवन जाकर नेहरू को श्रद्धांजलि देकर आए होंगे, लेकिन बिना वहां गए मोदी ने सार्क देशों के साथ बातचीत करके आज का जो दिन गुजारना शुरू किया है, उससे बड़ी श्रद्धांजलि नेहरू को और कुछ नहीं दी जा सकती थी। ऐसे में मोदी की पोस्ट की गई ट्वीटांजलि हम काफी मानते हैं। 

मोदी के मायने

26 मई 2014
विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में आज भारत की एक नई सरकार देश की पिछली किसी भी सरकार के मुकाबले कई मायनों में अलग होगी। जाहिर है कि पिछली करीब पौन सदी में बनी सरकारों के मुखिया उम्र में नरेन्द्र मोदी से बड़े तो रहे ही होंगे, लेकिन मोदी ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जो कि आजाद भारत में पैदा हुए हैं। और अपने ठीक पहले के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मुकाबले वे खासी कमउम्र के भी हैं। प्रधानमंत्री के दफ्तर में एक पूरी पीढ़ी का फासला आज शाम स्थापित होने जा रहा है। 
नरेन्द्र मोदी देश के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो कि गैरकांग्रेसी हैं, और एक अकेली गैरकांग्रेसी पार्टी के दम पर भी जिनको बहुमत हासिल है। हालांकि यह एक अलग बात है कि मोदी की पार्टी का गठबंधन खासा बड़ा है, और आधा दर्जन से अधिक राज्यों में फैला हुआ भी है। जनसंघ के जमाने से अब तक भाजपा बहुत से मुद्दों पर अपनी बेबसी इस बात को लेकर बताती थी कि वह गठबंधन की सरकार में है, और अपनी पार्टी की घोषित नीतियों पर वह अकेले काम नहीं कर सकती। आज दिल्ली में सरकार एनडीए की जरूर बन रही है, लेकिन नरेन्द्र मोदी उसके एक ऐसे मुखिया हैं जो कि पार्टी की हर घोषित नीति को लेकर खासे आक्रामक समर्थक रहे हैं, और आज सरकार के भीतर वे अपनी पार्टी के बहुमत के मुखिया हैं, और हिन्दुस्तान में प्रधानमंत्री बनने वालों में सबसे अधिक तपकर इस ओहदे तक पहुंचने वाले नेता हैं। इसलिए आज जनसंघ-भाजपा के पसंदीदा और घोषित मुद्दों पर काम करने की सबसे बड़ी उम्मीद नरेन्द्र मोदी से की जा रही है। 
नरेन्द्र मोदी हिन्दुस्तान के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जो कि एक क्षेत्रीय भाषा गुजराती और फिर हिन्दी से उठकर, बिना अंग्रेजी के बढ़कर यहां तक पहुंचे हैं। उनके पहले चरण सिंह, चन्द्रशेखर और देवेगौड़ा जैसे लोग क्षेत्रीय बोली और भाषा से उठे हुए जरूर थे, लेकिन वे पूरे कार्यकाल के लिए, बहुमत से चुने गए प्रधानमंत्री न होकर वे कार्यकाल के आखिर में कुछ वक्त के लिए आए थे, उनके साथ कोई जनसमर्थन नहीं था, और वे सत्ता की उलट-पलट का नतीजा थे। इसलिए अब तक पूरे वक्त के प्रधानमंत्री इंडिया के प्रधानमंत्री रहते आए थे, यह पहली बार हो रहा है कि कार्यकाल की शुरुआत से ही कोई पहली बार भारत का प्रधानमंत्री बन रहा है। ऐसा हम इसलिए भी लिख रहे हैं कि अपने पहले के कई प्रधानमंत्रियों से अलग, नरेन्द्र मोदी अंग्रेज और अंग्रेजी की गुलामी से आजाद हैं, और वे ठेठ देहाती और देसी हिन्दुस्तानी तौर-तरीकों वाले हैं। 
नरेन्द्र मोदी पिछले कई प्रधानमंत्रियों से अलग, केन्द्र सरकार के किसी भी अनुभव के बिना सीधे प्रधानमंत्री बन रहे हैं, तजुर्बे की कमी भी उनके साथ है, और इसके साथ-साथ वे तजुर्बों के बोझ से आजाद रहकर एक नई सोच की संभावना रखते हैं। दूसरी तरफ पिछले कई प्रधानमंत्रियों से अलग, नरेन्द्र मोदी एक राज्य की बड़ी कामयाब अर्थव्यवस्था चलाने का तजुर्बा और साख लेकर आए हैं। उनकी साख एक बेहतर सरकार को चलाने की है, और अब यह साख दांव पर है। केन्द्र सरकार का कोई सीधा काबू राज्य सरकारों पर वैसा नहीं रहता जैसा कि गुजरात के मुख्यमंत्री का गुजरात पर रहता है, इसलिए केन्द्र सरकार के कामकाज की कामयाबी, किसी एक राज्य की कामयाबी के पैमाने पर नापना गलत होगा, लेकिन मोदी जैसी उम्मीदें जगाकर आए हैं, उनको गुजरात के पैमाने पर नापा ही जाएगा। इस नाते नरेन्द्र मोदी आज शायद देश के इतिहास में सबसे अधिक उम्मीदें जगाकर आने वाले प्रधानमंत्री भी हैं, और इस नाते वे सबसे अधिक कड़ी चुनौती के सामने भी खड़े हैं। 
नरेन्द्र मोदी पिछले बारह बरसों से गुजरात दंगों की तोहमत झेलते आए हैं, इन्हीं तोहमतों के चलते वे बार-बार गुजरात में चुनाव जीतकर अपने आपको साबित कर चुके हैं, देश की कोई अदालत अब तक नरेन्द्र मोदी को कटघरे में भी नहीं ला पाई है, और इस चुनाव में उनको मिले ऐतिहासिक और अभूतपूर्व बहुमत के बाद अब गुजरात दंगों की बात शायद अलग रख दी जाएगी। लेकिन नरेन्द्र मोदी हिन्दुस्तान के इतिहास के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिनके धार्मिक रूझान को लेकर, जिनकी अल्पसंख्यक नीतियों को लेकर, देश और दुनिया सबसे अधिक चौकन्नी नजरें लगाए हुए हैं। अपने इतिहास से जुड़ी तोहमतों के साथ-साथ नरेन्द्र मोदी इन पांच बरसों में अपने रूझान से कैसा नया इतिहास गढ़ सकते हैं, इसको लेकर लोगों में बहुत उत्सुकता है, अटकलों से हवा भारी है। 
नरेन्द्र मोदी की शक्ल में हिन्दुस्तान को पहली बार एक ऐसा प्रधानमंत्री मिला है जिसे देश और दुनिया की कारोबारी दुनिया सबसे अधिक पसंद कर रही है। अब ऐसे में कुछ हजार बड़े कारोबारियों, और देश की आधी से अधिक गरीब आबादी के बीच वे खुशियों को किस तरह बांट सकते हैं, ऐसी चुनौती हिन्दुस्तान के इतिहास में आज सबसे ऊंचे कद की है। नरेन्द्र मोदी हिन्दुस्तान की राजनीति में वंशवाद, परिवारवाद, कुनबापरस्ती, जैसी निजी दिक्कतों से परे हैं। वे पूरी तरह पार्टी, सरकार, और शायद अपनी निजी आस्था के केन्द्र आरएसएस के लिए समर्पित हैं, और सार्वजनिक जीवन से परिवार को परे रखने की इतनी बड़ी, अपने किस्म की अकेली और अनोखी मिसाल प्रधानमंत्री की कुर्सी तक शायद पहली बार पहुंची है। गैरशादीशुदा अटल बिहारी वाजपेयी भी प्रधानमंत्री रहते हुए अपने दत्तक परिवार से परे नहीं थे, और यह बात छुपी हुई नहीं है कि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करवाए गए उनके दत्तक दामाद का नाम कई किस्म के सौदों के लिए चर्चा में आता था। अभी चार दिन पहले तक ही सोनिया गांधी के परिवार, और उनके दामाद को लेकर अप्रिय चर्चाएं चलती आई हैं, जो कि आज मोदी की आंधी में खबरों से परे हो गई हैं। ऐसे माहौल में अपने भाई-बहनों और मां, पत्नी, इन सबसे लगभग पूरी जिंदगी अलग और अकेले रहते आए नरेन्द्र मोदी एक बिल्कुल ही अलग किस्म के हैं, और बहुत सी अलग-अलग मिसालें लेकर आए हैं। 
नरेन्द्र मोदी के साथ एक दिक्कत यह भी है कि वे एक ऐसे गठबंधन और एक ऐसी पार्टी के प्रधानमंत्री बनकर आ रहे हैं, जिनका भ्रष्टाचार से कोई बड़ा परहेज नहीं रहा है। ऐसे में वे सरकार में अपने साथियों, और राज्यों में एनडीए की सरकारों के भ्रष्टाचार पर कितना काबू कर सकते हैं, यह देखने की बात है। देश में एक वक्त वीपी सिंह की सरकार को लोगों ने ईमानदारी की उम्मीद के साथ देखा था, और वीपी सिंह कारोबार की दुनिया के चहेते नहीं थे। आज मोदी बाजार की कारोबारी उम्मीदों, सरकार के साथियों की निजी उम्मीदों, और जनता-मीडिया के ईमानदारी के पैमानों, इन सब पर एक साथ कैसे खरे उतरते हैं, यह देखने की बात है। फिलहाल उनके साथ यह एक सहूलियत है कि वे इस देश में बिना किसी शहादत या हादसे के माहौल में, अकेले अपने दम पर, अभूतपूर्व बहुमत के साथ, इस कुर्सी तक पहुंचे हैं, और खुद उनकी पार्टी के भीतर उनसे अधिक बहस करने की गुंजाइश आज किसी की नहीं दिखती है। 
पिछले कई प्रधानमंत्री से अलग, नरेन्द्र मोदी अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मोर्चे पर किसी भी सरकारी तजुर्बे के बिना वे प्रधानमंत्री बन रहे हैं, और वे भारत के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं जो दुनिया के बहुत से देशों, बहुत से समुदायों के बहिष्कार को झेलते हुए आए हैं, और आज उनकी चुनावी फतह की वजह से, उनके प्रधानमंत्री बनने की वजह से उन तमाम देशों के उनके बारे में अपनी रीति-नीति को बदलना पड़ रहा है।   ऐसे नातजुर्बेकार नरेन्द्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण में सार्क देशों के प्रमुखों को बुलाकर परंपरागत कूटनीति से परे एक हथौड़ा से चला दिया है। खासकर भारत-पाक सरहद पर बिसात बिछने के पहले ही मोदी ने पहली जीत हासिल कर ली है, जिसकी वाहवाही दुनिया में सब जगह हो रही है। ऐसी पहल कोई नातजुर्बेकार ही कर सकता था, तजुर्बों के वजन से लदा हुआ तंगनजरिए वाला नेता नहीं। 
मोदी से जुड़ी ऐसी बातों पर चर्चा आने वाले दिनों में और आगे बढ़ेंगी, जारी रहेंगी, क्योंकि उन सबको एक साथ सोच और लिख पाना मुमकिन नहीं है। लेकिन वे दर्जन भर पहलुओं से देखने पर प्रधानमंत्री की कुर्सी के इतिहास से बिल्कुल अलग दिख रहे हैं। यह वर्तमान तो बिल्कुल अलग है ही, भविष्य कैसा होगा, यह मोदी को खुद ही साबित करना होगा। 

चापलूसी के चलते सोनिया को, जनता के गुस्से की खबर नहीं, आलोचना पर गौर की जरूरत

25 मई 2014
संपादकीय
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा है कि पार्टी लोकसभा चुनाव में लोगों के गुस्से को भांपने में असफल रही और अब उसे गहराई से इसके कारणों को समझकर सुधारात्मक उपाय करने होंगे। फिर से कांग्रेस संसदीय दल का अध्यक्ष चुने जाने के बाद पार्टी के नवनिर्वाचित लोकसभा सदस्यों और राज्यसभा सदस्यों की बैठक को संबोधित करते हुए सोनिया ने कहा- इस चुनाव में कई राज्यों में हम एक भी सीट नहीं जीत पाए। इस अभूतपूर्व आघात से हम सभी को व्यक्तिगत तौर पर तथा सामूहिक रूप से उचित सबक लेना होगा। 
सोनिया गांधी ने आज लगभग सार्वजनिक रूप से इस बात को माना है, जिसे कि देश पिछले कुछ बरसों से अच्छी तरह जान रहा था, और उस पूरे दौर में कांग्रेस के पास अपने इस बदहाल को कुछ हद तक बचाने के लिए थोड़ी सी गुंजाइश थी, लेकिन वह ऐसा करते दिखी नहीं। आज जब एक कहावत के मुताबिक चिडिय़ा खेत चुग गई हैं, तब कांग्रेस माथे पर हाथ धरे बैठी है। खैर, हम इसे कांग्रेस की जिंदगी का अंत नहीं मानते। राजनीतिक दलों की जिंदगी में ऐसे मौके आते हैं, और उनसे उबरने के इतिहास भी हैं। भारत के राज्यों में भी हैं, भारत में राष्ट्रीय स्तर पर भी हैं। और पड़ोस के देशों में भी हैं, जहां जेल और देश निकाले के बाद भी लोग लौटकर आते हैं, और अपने को शरीफ साबित करते हुए दुबारा चुने जाते हैं। इसलिए ऐसी कोई वजह नहीं है कि कांग्रेस अपने आपको खत्म मानकर बैठ जाए। लेकिन कांग्रेस अपने आपको एक बुरी मोदी सरकार का पांच साल बाद का जनता की मजबूर पसंद मानकर न बैठे, हो सकता है कि पांच बरस बाद मोदी सरकार बुरी न हों, और जनता के सामने कांग्रेस सुधरी हुई एक बेहतर पार्टी न हो। 
सोनिया गांधी और कांग्रेस बहुत बड़ा मुद्दा नहीं हैं, उनके बिना भी आज भारत की सरकार और संसद बखूबी काम कर सकते हैं, लेकिन कांग्रेस की मिसाल को लेकर हम जो लिख रहे हैं, उस पर ध्यान देने से दूसरी पार्टियों और दूसरे नेताओं का भी भला हो सकता है। भारत जैसी राजनीति में देश और प्रदेशों में समय-समय पर बेहतर विकल्प लोगों के सामने आते हैं, और बुरी मिसालें जनता खारिज कर देती है। इसलिए जो पार्टियां या सरकारें, नेता या निर्वाचित जनप्रतिनिधि, अपने आपके काम पर फिदा होकर खुशफहमी में जीते हैं, उनको पीछे छोडऩे वाले बेहतर लोग कब आकर जनता के दिल-दिमाग पर काबिज हो जाते हैं, इसका पता ही नहीं चलता। फिर हिन्दुस्तानी चुनाव एक और बात की मिसाल हैं, यहां पर बहुत से अच्छे नेता अपने कुकर्मो से नहीं हारते, बल्कि वे अपनी पार्टी के बड़े नेताओं के कुकर्मो का भुगतान करते हुए हार जाते हैं। ऐसी नौबत में कई बार ऐसे बड़े नेताओं की अपनी जीत को दिखाया जाता है कि वे तो खुद जीत गए हैं, और हारने वाले छोटे नेता अपनी वजह से हारे होंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं है। छत्तीसगढ़ से लेकर बाकी देश तक ऐसी बहुत सी मिसालें हैं जिनमें सोनिया-राहुल से लेकर मुलायम तक, बहुत से बड़े नेता खुद तो जीत गए, लेकिन उनसे नाराजगी की वजह से उनकी बाकी पार्टी हार गई। 
ऐसी बुरी तरह शिकस्त वाली पार्टियों को जनता से जुडऩे की बहुत आसान तरकीब इस्तेमाल करना चाहिए। देश के मीडिया में जो अखबार गंभीरता और ईमानदारी से लिखते हैं, उनमें छपी आलोचना को देखने के बजाय जब कोई पार्टी अपने बड़े नेताओं की चापलूसी में लगी रहती है, तो सच पढऩे के बजाय झूठ लिखने का काम करते-करते ऐसी पार्टी जनता से कट जाती है। और कांग्रेस के साथ ठीक यही हुआ है। हम सिर्फ अपनी बात नहीं करते, देश में हमारे जैसे दर्जनों से अधिक अखबार रहे होंगे जिन्होंने पिछले बरसों में बार-बार हर पार्टी और बहुत से नेताओं के गलत कामों पर खुलकर लिखा, अगर कांग्रेस में जनता की नब्ज पर हाथ धरने के लिए अखबारी पन्नों पर हाथ धरने की आसान तरकीब इस्तेमाल हुई होती, तो ईमानदार आलोचकों की बातों से ही सोनिया गांधी को जनता की नाराजगी, उसकी हिकारत, और उसकी नफरत, इन सबका अंदाज लग गया होता। लेकिन कांग्रेस पार्टी जमीन से इसलिए कट गई है, कि उसके लगभग सभी नेता और बहुत से कार्यकर्ता अब जमीन से खासी ऊंची महंगी गाडिय़ों में चलने लगे हैं, और उनकी राजनीति जनता केन्द्रित न होकर नेता केन्द्रित रह गई है। इसके अलावा इस पार्टी ने अपने आत्मघाती नेताओं पर किसी भी तरह की कार्रवाई करना जरूरी नहीं समझा, और देश में जगह-जगह इस घर को आग लग गई, घर के चिराग से। 
कांग्रेस को जिंदा रखने के लिए, और इसे खड़ा करने के लिए अब भी सोनिया गांधी को अपनी पार्टी के भीतर एक ऐसा ढांचा खड़ा करना चाहिए जो कि गंभीर और ईमानदार आलोचकों की कही और लिखी हुई बातों पर आत्ममंथन करे। चापलूसी की हुआ-हुआ के बीच किसी का भला नहीं होता। 

बिसात बिछने के पहले ही, पहली बाजी मोदी ने जीती और शरीफ शिकस्त से बचे

24 मई 2014
संपादकीय
हिंदुस्तान में जितनी बेसब्री से मोदी के मंत्रियों के नामों का इंतजार हो रहा है, अभी घंटे भर पहले तक उससे अधिक बेसब्री से इस बात की राह देखी जा रही थी कि मोदी के न्यौते पर उनके शपथ ग्रहण में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ आते हैं, या नहीं। और जैसे ही उनका आना तय हो जाने की खबर आई, उन तमाम लोगों ने राहत की सांस ली, जो लोग भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर रिश्ते चाहते हैं, और जो यह मानते हैं कि जंग की तैयारी में इन दोनों देशों के सबसे गरीब लोगों की सेहत पर जंग लगता है। 
इससे हिंदुस्तानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उन कुछ नामी-गिरामी चेहरों का पानी उतर गया होगा, जो सोते-जागते एक जंग की कोशिश करते रहते हैं। दूसरी तरफ हमको यह देखकर सदमा लगा कि किस तरह कांगे्रस पार्टी के एक मुस्लिम प्रवक्ता ने नवाज शरीफ की घोषणा आने के पहले एक समाचार चैनल के पूछने पर कहा कि वे उन तमाम चुनावी भाषणों पर गौर करते हुए आने न आने का फैसला ले रहे होंगे, जिनमें नरेन्द्र मोदी ने उनको और पाकिस्तान को भला-बुरा कहा था। हमारा यह मानना है कि  चुनाव में धूल खाने के बाद कांगे्रस पार्टी नसीहत लेने के बजाय इस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हित के मुद्दे पर भी इतनी तंगदिली दिखा रही है, और इतने तंगनजरिए से बयान दे रही है, कि उसे आज मोदी विरोध करने के लिए राष्ट्रहित का विरोध भी ठीक लग रहा है। कांगे्रस की ऐसी सोच के लिए बहुत सी कहावतें हैं, लेकिन बिल्ली के पंजे की हसरत से छींके नहीं टूटा करते, इसलिए पंजा अभी अपनी ऐसी हसरतों के चलते इतिहास में अपने नाम गैरजिम्मेदारी भी दर्ज कराते चल रहा है।
नरेन्द्र मोदी ने एक बहुत समझदारी का, और कूटनीतिक कामयाबी का फैसला लिया कि उन्होंने सार्क राष्ट्रप्रमुखों को अपने शपथ ग्रहण में बुलाने का एक अभूतपूर्व और मौलिक काम किया। आज न सिर्फ मुस्लिम दुनिया, बल्कि पश्चिम के वे तमाम देश भी मोदी को खुर्दबीनी निगाहों से देख रहे हैं, जिन्होंने आज भी मोदी को एक भारतीय नागरिक के रूप में वीजा नहीं दिया है। हिंद महासागर के इलाके में भारत सबसे बड़ा देश है, और आजादी के पहले तक तो भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश वाले इलाके को मिलाकर एक ही देश था। आज भी पड़ोसियों के साथ भारत की सरहद हजारों मील जमीन की है, और हजारों मील समंदर की है। ऐसे में इस पूरे इलाके के किसी भी देश को अगर तरक्की करनी है, तो उसे पड़ोसियों से रिश्ते सुधारने होंगे, और फौजी खर्च घटाना होगा। यह बात तय है कि फौज की दिलचस्पी अपने पेशे के काम, और अपने हुनर में इतनी रहती है कि अपनी हस्ती को बनाए रखने के लिए फौजी आला अफसर राजनीतिक ताकतों को फौजी खतरे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते रहते हैं, और ऐसे खतरों का फौजी इलाज भी बढ़ा-चढ़ाकर समझाते रहते हैं। ऐसे में मोदी के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक हिस्से के फैलाए जाते युद्धोन्माद में नहीं फंसना बेहतर होगा, और बातचीत से सरहद के तनाव घटाना बेहतर रहेगा।
जहां तक मोदी की बात है, उनके सामने ताजा चुनावी कामयाबी के बाद अपनी राजनीतिक-महानता को और अधिक बढ़ाने के जो रास्ते हैं, उनमें से एक रास्ता देश की सरहदों तक जाने वाला है, और वहां तक फौजी टैंकों को भेजने से न वाहवाही होगी, न देश का भला होगा। वहां तक अमन की बस लेकर जाना ही बेहतर होगा, जैसा कि अटल बिहारी वाजपेयी ले गए थे। किसी एक हाल का जिक्र करना एक खतरनाक काम होता है, क्योंकि उस मिसाल की नाकामयाबी गिनाने वाले बहुत लोग होंगे, लेकिन दुनिया के रिश्ते नाकामयाबियों की बुनियाद पर भी खड़े होते-होते कामयाब होते हैं। 
भारत और पाकिस्तान के बीच के जटिल तनाव, सरहदी इलाकों, और मजहबी मसलों की गुत्थी कम से कम भारत में इतनी अधिक उलझी हुई है कि वहां मोदी की इस ताजा पहल को नाकामयाब साबित करने के लिए सरहद पर एक-दो शहादतें ही काफी होंगी। लेकिन मोदी को ठंडे दिमाग से काम करना होगा, और गर्मजोशी से भरे दिल से भी।  फिलहाल यह एक अच्छी शुरूआत है, यह खुले दिल-दिमाग का सुबूत है, और कांग्रेस जैसी पार्टियों को ऐसे मौकों पर ओछापन दिखाकर यह साबित नहीं करना चाहिए कि वे खारिज कर दिए जाने के ही हकदार थे। 
भारत और पाकिस्तान की सरहद पर सियासती बिसात बिछने के पहले ही पहली बाजी मोदी ने जीती है, और मोदी का न्यौता कुबूल करके नवाज शरीफ अंतरराष्ट्रीय शिकस्त से बच भी गए हैं। इन दोनों मुल्कों में अमनचैन के लिए हमारी शुभकामनाएं।

केजरीवाल की अराजकता उजागर की जानी चाहिए

23 मई 2014
संपादकीय

दो दिनों से फिर हिन्दुस्तानी मीडिया आम आदमी पार्टी के बदहवास नेता अरविंद केजरीवाल की बेसिर-पैर की हरकतें देख रहा है। पहले उन्होंने भाजपा अध्यक्ष रहे नितिन गडकरी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, और जब गडकरी ने इसके खिलाफ अदालत में मानहानि का आपराधिक मुकदमा चलाया, तो जमानत लेने के बजाय अरविंद केजरीवाल अपनी मर्जी से जेल गए, और उनके साथी दिल्ली के फुटपाथों पर फिर प्रदर्शन पर उतर आए। अपने आपको राजनीतिक कार्यकर्ता बताते हुए अदालत में केजरीवाल का तर्क रहा कि वे कहीं भाग नहीं जा रहे, इसलिए उन्हें निजी मुचलके पर छोडऩा चाहिए, और अदालत इस बात से सहमत नहीं थी। तब से अब तक इसे मुद्दा बनाकर आप पार्टी के बाकी नेता और उसके बड़े वकील प्रशांत भूषण मीडिया में छाए हुए हैं। 
भारत में कानून का जो इंतजाम है, उसे बदले बिना अपनी मर्जी से उसके तहत मौजूद रास्तों में से एक छांटकर केजरीवाल जेल गए, और उनकी भीड़ दिल्ली के रास्तों को रोकने में लगी है। पिछले आम चुनाव में सफाया हो जाने के बाद यह केजरीवाल का आखिरी तीन शो वाला दौर दिख रहा है। आने वाले दिनों में कोई जादू हो जाए, और केजरीवाल फिर से मशहूर हो जाएं, कामयाब हो जाएं, तो एक अलग बात है, लेकिन आज तो वे खबरों में बने रहने के लिए किस्म-किस्म की बेवकूफी की बातें कर रहे हैं, और हर किस्म की अराजकता को अपना लोकतांत्रिक अधिकार साबित कर रहे हैं। दिक्कत यह है कि उनके साथ एक वक्त बड़े समझदार रहे विचारक योगेंद्र यादव जैसे लोग हैं, दूसरी तरफ प्रशांत भूषण और शांतिभूषण जैसे संविधान के जानकार वकील हैं, और इन सबसे ऊपर उनके मन में मौजूदा लोकतंत्र के लिए परले दर्जे की हिकारत भरी हुई है। वे देश के बाकी लोगों के लिए एक संविधान चाहते हैं, और अपने लिए एक अलग किस्म का खास दर्जे वाला संविधान चाहते हैं, और इसे वे आम आदमी का हक कहते हैं। 
केजरीवाल के तौर-तरीके शुरू से भारी तानाशाही के रहे, और हमने समय-समय पर इसके बारे में लिखा भी। लेकिन अब वे सार्वजनिक जीवन में एक सिरदर्द बनते जा रहे हैं, और लोकतंत्र में उनको ऐसा करने का उतना ही हक है, जितना कि हक इस देश की जनता को उनके उम्मीदवारों को खारिज करने का था। केजरीवाल इस अंदाज और हड़बड़ी में आंदोलन कर रहे हैं कि मानो वे अपनी जिंदगी की आखिरी खंदक की लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके मुकाबले बहुत ही छोटी सी जमीन से काम शुरू करके ममता बैनर्जी जैसे लोगों ने एक लंबी राजनीतिक जिंदगी साबित की है, और ऐसा भी नहीं कि ममता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों। सच तो यह है कि केजरीवाल जैसी नौटंकी के बिना ममता हकीकत में सादगी से जी लेती है, और अपने आपको आम कहते हुए सादगी का नाटक भी नहीं करतीं। ऐसी और भी मिसालें हैं जिनमें लोगों ने लंबे अरसे तक राजनीतिक संघर्ष किया और जनता के बीच एक विश्वसनीयता जीती। केजरीवाल के साथ दिक्कत यह रही कि अन्ना हजारे के साथ जनआंदोलन शुरू करके उन्होंने विश्वसनीयता पहले पा ली, राजनीति में बाद में पहुंचे। इसके बाद उन्होंने उस पाई हुई विश्वसनीयता को खोने के लिए मानो ओवरटाईम किया। 
अब अरविंद केजरीवाल अपनी अराजक हरकतों के चलते पूरी तरह खारिज कर देने के लायक हैं। उनको आज फायदा इस बात का है कि हिन्दुस्तानी इलेक्ट्रॅानिक मीडिया खबरों के अपने अकाल के चलते किसी भी बेहूदी हरकत को खबर बनाने और दिखाने की हड़बड़ी में रहता है। ऐसे मीडिया और ऐेसे केजरीवाल बारी-बारी से एक-दूसरे की पीठ पर सवार होकर एक-दूसरे का पेट भी भरते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और चुनावों से खारिज होने के बाद अब केजरीवाल को खबरों से भी खारिज किया जाना चाहिए। आज उनका मकसद सिर्फ हंगामा खड़ा करना है, लोकतंत्र उनको इसकी छूट तो देता है, लेकिन मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझना चाहिए, और केजरीवाल की अराजकता उजागर की जानी चाहिए। 

कांग्रेस की आज की जरूरत चीरघर जैसा पोस्टमार्टम

22 मई 2014
संपादकीय
कांग्रेस के एक नौजवान परास्त सांसद, और यूपीए में केन्द्रीय मंत्री रहे मिलिंद देवड़ा ने कहा है कि राहुल गांधी के सलाहकार गलत थे, और उनकी गलत राय के चलते कांग्रेस की यह बदहाली हुई है। मिलिंद ने अकेले राहुल को जिम्मेदार नहीं माना है, लेकिन इतना जरूर कहा कि राहुल के सलाहकारों ने सही सलाह नहीं दी। राहुल को जमीनी हकीकत से दूर रखा गया। राहुल के सलाहकारों के पास राजनीतिक अनुभव की कमी थी। इन लोगों ने नेताओं की बात नहीं सुनी और उन्हें दरकिनार किया गया। मिलिंद देवड़ा के मुताबिक जिन लोगों को चुनावी राजनीति का बिल्कुल अनुभव नहीं था, उन्हीं लोगों को चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी गई जबकि कांग्रेस के अनुभवी नेताओं और सांसदों को रणनीति बनाने और अहम कामों की जिम्मेदारी से दूर रखा गया। इधर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधिक सक्रिय रहने में नाकामी और केंद्रीय कैबिनेट एवं संप्रग के घटक दलों के बीच संवाद के अभाव के कारण लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारा झटका लगा।
यह एक अच्छी बात है कि कांग्रेस पार्टी के भीतर चापलूसी से परे अक्ल की कुछ तर्कसंगत बात शुरू हो रही है, और कुछ एनसीपी जैसे सहयोगी दल से भी नसीहत सामने आ रही है। आज कांग्रेस और यूपीए के नाम पर जो कुछ भी बचा है उसे जरूरत इसी बात की है कि आत्मविश्लेषण का कड़वा घूंट गटकने का हौसला जुटाया जाए। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में जिस तरह सोनिया और राहुल के इस्तीफों को खारिज कर दिया गया, और उन्हें कांग्रेस के अस्तित्व के लिए जरूरी बताया गया, कांग्रेस कार्यसमिति के मनोनीत मुसाहिबों से और कोई उम्मीद की भी नहीं जा सकती थी। लेकिन हमारे यह लिखने का यह मतलब कतई नहीं कि सोनिया गांधी से परे कांग्रेस में आज कोई बेहतर नेता मौजूद है। यह जरूर है कि मौका मिले तो कल या परसों ऐसे नेता तैयार हो सकते हैं, लेकिन वैसा होने पर कांग्रेस पार्टी का एक परिवार के लहू से बंधे रहने का चरित्र खत्म हो जाएगा। आज भी इस पार्टी ने सोनिया गांधी के स्तर पर पहुंचकर कोई मतभेद नहीं रह जाते हैं, और बिना किसी आंतरिक लोकतंत्र चलने की आदी इस पार्टी के लिए आज की नौबत में शायद यही जोड़े रखने वाला एक मजबूत गोंद है।
सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, एनसीपी में पवार, तृणमूल कांग्रेस में ममता, अन्नाद्रमुक में जया, द्रमुक में करूणानिधि, सपा में मुलायम, बसपा में माया, बीजद में नवीन पटनायक, टीडीपी में चंद्राबाबू नायडू, वाईएसआर कांग्रेस में जगनमोहन, नेशनल कांफ्रेंस में अब्दुल्ला, अकाली दल में बादल, शिवसेना में ठाकरे, राजद में लालू, इनसे परे जाने कौन-कौन से नामों वाली पार्टियों के पासवान, अजीत सिंह, चौटाला, ऐसी अनगिनत मिसालें भारतीय चुनावी राजनीति में हैं, जिनमें राजनीतिक दल अपने पर काबिज कुनबे से परे कुछ करने के लायक छोड़े नहीं गए हैं। कब्जा किए हुए कुनबे अपने आपको पार्टी के लिए जरूरी साबित करते हुए चलते हैं, वैसा माहौल बनाए रखते हैं, और पार्टी के बाकी नेताओं को घरेलू नौकरों का दर्जा हासिल रहता है। पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की किताब पर भरोसा करें तो इस विशाल गौरवशाली भारतीय लोकतंत्र का प्रधानमंत्री दस बरस तक ऐसे ही घरेलू नौकर की तरह काम करते रहा।
लेकिन मिलिंद देवड़ा की बात पर लौटें, तो राहुल गांधी के सलाहकारों की टीम अगर नाकामयाब हुई हो, तो उसमें उनका किया हुआ कोई गलत काम जिम्मेदार रहा हो, ऐसा जरूरी नहीं है, लेकिन उनकी की हुई गलतियां जरूर ही जिम्मेदार रही होंगी। और कांग्रेस को इसी जगह से सबक लेने की जरूरत है, और हकीकत को समझकर ही सबक लिया जा सकता है। राहुल गांधी के सलाहकार चुनाव के दौरान उम्मीदवार चुनने, चुनावी मुद्दे तय करने, और भाषण लिखने के लिए तो जिम्मेदार हो सकते हैं, लेकिन क्या यही चुनावी सलाहकार दस बरस तक यूपीए सरकार के मंत्रिमंडल के कामकाज के लिए सलाहकार थे? क्या दस बरसों या पांच बरसों के जुर्म भरे सरकारी कामकाज से हुए नुकसान की भरपाई राहुल गांधी के सलाहकार कर सकते थे? क्या राहुल गांधी को एक ऐसे चुनाव अभियान की कमान दी गई थी जिसमें सत्ता के पिछले पांच बरसों के काम के आधार पर जीतने की कोई भी संभावना थी? क्या पांच बरसों की यूपीए सरकार की कालिख राहुल के सलाहकार मिटा सकते थे? जब कभी किसी लाश का पोस्टमार्टम होता है, तो शरीर के अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग जांचा-परखा जाता है, और फिर उनको मिलाकर एक नतीजा निकाला जाता है। कांग्रेस पार्टी अगर अपनी इस शर्मनाक हार का पोस्टमार्टम करना चाहती है, तो उसे यूपीए सरकार के कामकाज वाले हिस्से को अलग जांचना-परखना पड़ेगा, पार्टी की चुनाव अभियान को अलग चीरफाड़ कर देखना पड़ेगा, और फिर ऐसे बहुत से मुद्दों को मिलाकर एक नतीजा निकालना होगा, कि जिम्मेदार कौन सी बातें थीं।
हमारे हिसाब से राहुल गांधी को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाए जाने के पहले से यूपीए की मुखिया कांग्रेस यह चुनाव हार चुकी थी। आज लतीफों के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार और कमअक्ल ठहराते हुए बहुत से मजाक चल निकले हैं। लोकतंत्र में यह जायज भी है, और ऐसी खिल्ली से गुजरे बिना कोई दिल्ली नहीं पहुंच सकते। लेकिन कांग्रेस को अगर राख और खाक से उठकर फिर खड़े होना है, तो उसे किसी चीरघर में होने वाले पोस्टमार्टम जैसे वैैज्ञानिक तरीकों से अपनी हार की वजहें देखनी होंगी। कांग्रेस कार्यसमिति की दो दिन पहले की बैठक हकीकत से उतनी ही जुड़ी हुई थी जितनी कि किसी श्रद्धांजलि सभा में किसी के बारे में कही गईं महज अच्छी-अच्छी बातें हकीकत से जुड़ी होती हैं। इसलिए अब इस पार्टी को शायद अगले कुछ महीने आत्ममंथन करना चाहिए, और उसके बाद अगले कुछ बरस चुनावों की सोचे बिना जनता से जुडऩे की कोशिश करनी चाहिए। पूरे देश में शर्मनाक हार के बाद कल अपने चुनाव क्षेत्र अमेठी गए हुए राहुल गांधी ने वहां लोगों के बीच यह कहा कि जहां जनता की नहीं सुनी जाएगी, वहां आग लगा देनी है। यह रवैया सबक और नसीहत मिलने, समझदारी का इस्तेमाल करने का नहीं है। अगर अब भी कांग्रेस इसी उम्मीद से अपने अंदाज में चलती रहेगी कि मोदी के गलत कामों से उनकी सरकार गिरेगी, और जनता के सामने कांग्रेस को चुनने के अलावा और कोई विकल्प नहीं रहेगा, तो कांग्रेस को हाशिए पर जमीन का एक छोटा टुकड़ा खरीदकर एक पक्का मकान बना लेना चाहिए।

कमजोर विपक्ष, और विपक्ष न होने के खतरे कम नहीं

21 मई 2014
संपादकीय

गुजरात से लेकर दिल्ली तक मोदी सरकार की खबरों से सराबोर देश में आने वाले दिनों के बारे में भाजपा का नारा कई तरह के लतीफों में इस्तेमाल हो रहा है कि अच्छे दिन आने वाले हैं। बहुत से लोग यह मानते हैं कि अच्छे दिन आ चुके हैं। लेकिन ऐसे गर्मजोशी के माहौल में भारतीय लोकतंत्र के लिए फिक्र की भी एक बात है। भाजपा  विरोधी पार्टियों का कई राज्यों में इस कदर सफाया हुआ है, कि वहां से संसद में आवाज उठाने वालों का टोटा पडऩे जा रहा है। अब जैसे छत्तीसगढ़ को ही लें, तो दिल्ली में भाजपा की सरकार, छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार, और इस राज्य से लोकसभा में कांग्रेस का कुल एक सदस्य। और कांग्रेस की कमअक्ली से पिछले दस बरसों में राज्यसभा में जिस तरह के लोग छत्तीसगढ़ से भेजे गए, उनमें से किसी ने वहां कुछ पूछा भी हो, तो उनको खुद को याद नहीं होगा। मोतीलाल वोरा से लेकर मोहसिना किदवई तक, जो कभी खुशी, कभी गम के मौकों पर ही छत्तीसगढ़ आते थे, उन्होंने राज्यसभा में छत्तीसगढ़ की बात शायद ही कभी की हों। अब जिस तरह का बहुमत भाजपा को देश भर में मिला है उसके चलते आने वाले बरसों में राज्यसभा की खाली होने वाली सीटें भाजपा के लोगों से भरती जाएंगी, राज्यों के चुनाव में भी शायद भाजपा का बोलबाला बढ़ेगा, और देश के भीतर विपक्ष की आवाज कई राज्यों से, कई बड़े राज्यों के कई इलाकों से खत्म सी हो जाएगी। 
इस नौबत में भाजपा कुछ नहीं कर सकती, लेकिन गैरभाजपाई राजनीतिक दलों को ऐसी हालत के बारे में सोचना चाहिए कि किस तरह उन्होंने भाजपा विरोधी वोटों को तीन-तीन, चार-चार चुनाव चिन्हों के लिए बांटकर भाजपा की राह में कमल बिछा दिए। आज हालत यह है कि उत्तर भारत के बड़े-बड़े राज्यों से मुस्लिम समुदाय की आवाज उठाने वाले लोकसभा में बचे नहीं हैं। खासकर उत्तरप्रदेश में सरकार की मालिक समाजवादी पार्टी अपने कुनबे की हस्ती बचाते-बचाते बाकी सब कुछ खो चुकी है, और कल तक जिस मुलायम सिंह यादव के लिए प्रधानमंत्री की कुर्सी का दावा किया जा रहा था, आज उस मुलायम के पास एक मुस्लिम लोकसभा सदस्य नहीं बचा है। 
ऐसे में एक तरफ तो देश के बहुत से हिस्सों से विपक्ष और असहमति की, आलोचना और भांडाफोड़ की आवाज खत्म हो जाने का खतरा है, तो दूसरी ओर केन्द्र और भाजपा शासन के प्रदेशों में सत्ता के खिलाफ उठने वाली हकीकत की बात भी उठाने वाले कम बचेंगे। भाजपा और एनडीए के ऐसे ताकतवर संसदीय बाहुबल के मुकाबले विपक्ष को जिस तरह मजबूत, धारदार, और चौकन्ना होना चाहिए, वह संभावना सोनिया और राहुल के नाम के चलते खड़ी होते भी नहीं दिख रही है। यह नौबत लोकतंत्र के लिए बहुत फिक्र की है, कि एक तरफ एक पार्टी ने इतनी अधिक ताकत हासिल कर ली है, और दूसरी तरफ लोकसभा में विपक्ष का दर्जा पाने की हालत भी दस बरसों की सत्तारूढ़ पार्टी के पास नहीं बची है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम पिछले बरसों में लगातार कांग्रेस को इसी नौबत का खतरा बताते हुए आगाह करते थे कि सत्ता में लौटने की बात तो दूर रही, संसद में एक मजबूत विपक्ष  की शक्ल में बच जाने के लिए भी कांग्रेस को मेहनत करनी चाहिए। सच तो यह है कि उस वक्त हमें भी इस बात का अंदाज नहीं था कि कांग्रेस पार्टी लोकसभा में विपक्ष का दर्जा भी नहीं पा सकेगी, और हम आंकड़ों और इस दर्जे की सोचे बिना, एक मजबूत विपक्ष की जरूरत को सोचते हुए वैसी बातें लिखते आ रहे थे। 
वैसे तो आज नरेन्द्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी, और एनडीए को किसी सलाह और नसीहत की जरूरत नहीं है, लेकिन फिर भी लोकतंत्र का तकाजा है कि हम इन्हें याद दिलाएं कि जहां-जहां इनको विपक्ष नसीब नहीं हुआ है, वहां-वहां इनको खुद होकर संगठन और सरकार की ऐसी मशीनरी बनानी चाहिए, जो विपक्ष जैसी चौकन्नी नजरों से सत्ता की गलतियों और गलत कामों पर नजर रख सके, और रस्सी हाथ से अधिक खिसके उसके पहले सरकार और पार्टी को आगाह कर सके। जब विरोधी बहुत कमजोर हो जाएं, तो लोगों को अपने पांव गलत पडऩे के पहले खुद को सावधान करने का इंतजाम कर लेना चाहिए। नरेन्द्र मोदी गुजरात से ऐसी सावधानी बरतने वाले नेता की साख लेकर आए हैं, और उनको बाकी देश में भी अपने लोगों को सही राह पर रखने के लिए तरकीबें निकालनी होंगी। 

चुनावी टकराव के दिन खत्म अब संसदीय उदारता का वक्त

20 मई 2014
संपादकीय

लोकसभा में भाजपा संसदीय दल के नेता चुने जाने के मौके पर नरेन्द्र मोदी ने बड़प्पन की बहुत बातें कहीं। इनमें से एक बात जिस पर आज यहां चर्चा होनी चाहिए कि देश के लोगों ने किसी एक पार्टी या प्रधानमंत्री को वोट नहीं दिया है, उन्होंने देश की सरकार बनाई है। यह मौका न सिर्फ मोदी और भाजपा के लिए, बल्कि देश के लिए भी बहुत ऐतिहासिक मौका है और ऐसे में उनकी कही हुई इस बात को आगे बढ़ाने की जरूरत है। चुनाव निपट गए हैं, और कटुता का दौर खत्म हो गया है। अब जीते हुए सत्ता पक्ष और हारे हुए विपक्ष, इन दोनों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी हमलावर और हल्की राजनीति से परे निभानी चाहिए। देश ने भाजपा को दिए हुए अभूतपूर्व और ऐतिहासिक बहुमत के साथ दो बातें बड़ी साफ-साफ कही हैं। एक तो यह कि वह भाजपा को पांच बरस के लिए देश चलाने दे रहा है, और दूसरी बात यह कि वह कांग्रेस-दूसरी पार्टियों के घमंड के खिलाफ नाराजगी दिखा रहा है। अब अगर सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस-दूसरी पार्टियों में से भाजपा घमंड दिखाने लगेगी, और विपक्ष सरकार चलाने नहीं देगा, तो यह जनता के फैसले के खिलाफ जाएगा। यह बात जितनी भाजपा को समझनी है, उतनी ही विपक्षी पार्टियों को भी समझनी है। इस बार के चुनावी फैसलों ने यह साबित किया है कि किस तरह धीरे-धीरे करके जनमत तैयार होता है और किस तरह वह पांच बरस में एक बार हिसाब चुकता कर सकता है, करता है। इसलिए आने वाले पांच बरस हर किसी को जिम्मेदारी के साथ पूरे करने चाहिए, और पिछले दिनों हमने यहां पर बार-बार यह बात लिखी है कि न सिर्फ देश के राजनीतिक दलों को, और नेताओं को, सबक लेना चाहिए, बल्कि इस बार के चुनावी नतीजों का सबक जिंदगी के बाकी दायरों में भी हर किसी को लेना चाहिए। 
आज एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी के सामने कई किस्म की चुनौतियां खड़ी हुई हैं। देश के कई राज्यों में भाजपा और एनडीए की कोई हस्ती नहीं है। कई राज्यों में सरकारें एनडीए-विरोधी पार्टियों की हैं। और इसके साथ-साथ देश की राजनीति का इतिहास बताता है कि राख में मिल चुकी, खाक हो चुकी पार्टियां भी पांच बरस पूरे होने के पहले कई बार उठकर खड़ी हो जाती हैं। इसलिए आज भाजपा संसदीय दल की बैठक में नरेन्द्र मोदी ने जिस विनम्रता से बड़प्पन की बातें कही हैं, उन बातों पर आने वाले दिनों में अमल भी दिखना चाहिए, वरना वो बातें सिर्फ एक खास मौके के भाषण का इतिहास बनकर रह जाएंगी, और वजन खो बैठेंगी। 
भारत के लोकतंत्र, यहां की गरीब जनता, और यहां की विकास की संभावनाओं, इन सबके हित में यही है कि चुनावी राजनीति चुनाव के साथ खत्म हो, और अब संसदीय राजनीति एक परिपक्व केन्द्र-राज्य संबंधों के साथ देश को बेहतर बनाने का काम करे। नरेन्द्र मोदी ने पिछले दिनों अपने बहुत से भाषणों और साक्षात्कारों में यह बात कही है कि वे प्रधानमंत्री की हैसियत से बदला निकालने के बजाय देश के विकास के काम में लगेंगे। आज नरेन्द्र मोदी को खुद अपनी बातों को सबसे अधिक गंभीरता से लेने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि देश की जनता ने तो आजाद भारत के इतिहास में सबसे अधिक गंभीरता से एक अनोखे चुनाव में मोदी को मानो सीधे ही प्रधानमंत्री चुन लिया है, जनता तो देश के सामने खड़ी चुनौती पर खरी उतरी है, लेकिन अब मोदी के खरे उतरने की बारी है। दरअसल प्रधानमंत्री बन जाने के बाद मोदी के पास हासिल करने के और अधिक कुछ भी नहीं रहेगा, सिवाय इसके कि वे एक ऐतिहासिक प्रधानमंत्री बन सकें, और अपनी चुनावी साख से अधिक बढ़कर काम करने वाले एक प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल को दर्ज कर सकें। और यह दर्ज करना महज आर्थिक पैमानों पर काफी नहीं होगा, इसके लिए सामाजिक और मानवीय पैमानों पर कामयाब होने की जरूरत भी होगी, और राजनीतिक दरियादिली और विनम्रता की जरूरत भी होगी। आज उन्होंने शब्दों में तो सभी के लिए विनम्रता दिखाई है, और आने वाले दिन उनके इन्हीं शब्दों को पकड़कर उनसे सवाल भी करेंगे। 
लेकिन मोदी से परे देश की बाकी राजनीतिक ताकतों को भी अपने सिद्धांतों से कोई समझौता किए बिना संसद के भीतर और बाहर कितनी परिपक्वता और उदारता दिखानी होगी जो कि देश के भले के लिए जरूरी है। अब भी अगर चुनावी टकराव वाले तेवर कायम रहेंगे, तो ऐसे लोग चाहे सत्ता में हों, या विपक्ष में, वे अपनी जमीन खोएंगे। 

श्मशान में परस्पर असहमत लोगों को भी बातचीत का मौका मिलता है...

19 मई 2014
संपादकीय
कांग्रेस पार्टी की बैठक आज दोपहर बाद होने जा रही है, और इस्तीफों की चर्चा से परे यह चर्चा भी अभी चल रही है कि कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य मनोनीत करने के बजाय चुनाव से जीतकर आने चाहिए। दूसरी तरफ बिहार में जदयू के भीतर खींचतान और आत्ममंथन दोनों जारी है। समाजवादी पार्टी का सिर्फ एक कुनबा ही चुनाव जीत पाया है, और आज उसके भी उम्मीदवारों की एक बैठक है। राजद में लालू यादव की बीवी और बेटी दोनों चुनाव हार चुके हैं और उसमें भी आत्ममंथन की जरूरत तो है, लेकिन उसके विधायक आज पार्टी छोड़ रहे हैं, और तकरीबन डूब चुके इस जहाज के कप्तान के पांव अभी भी जमीन पर पड़ नहीं रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी का इस चुनाव में सफाया हो गया है, लेकिन इस पार्टी में आत्ममंथन का मतलब अकेली मायावती की आत्मा के भीतर मंथन होता है, इसलिए अभी यह खबर नहीं है कि वैसा कुछ चल रहा है या नहीं। कश्मीर में तीसरी पीढ़ी की सत्ता की राजनीति जारी है, और इसमें मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सीट से भी उनके पिता फारूख अब्दुल्ला हार चुके हैं, लेकिन यहां कम से कम उमर अब्दुल्ला ने आत्ममंथन की बात ट्वीट की है, यह एक और बात है कि कश्मीर में पहली बार बज रहे भाजपा के नगाड़ों के शोर में वे कितना सोच पाएंगे। 
भारतीय जनता पार्टी ने इस चुनाव में देश की अधिकतर पार्टियों का जो हाल किया है, उसके चलते इन सबको बहुत सोचने-विचारने की जरूरत है। और सबसे अधिक जरूरत कांग्रेस पार्टी को है, जिसमें सब कुछ चले गया दिख रहा है। हम इसी हफ्ते एक से ज्यादा बार कांग्रेस की आज की जरूरतों के बारे में लिख चुके हैं, लेकिन आज बाकी पार्टियों को मिलाकर इस मुद्दे पर फिर कुछ चर्चा की गुंजाइश है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कुर्सी छोड़कर राज्य में गैरभाजपा गठबंधन की एक संभावना खड़ी की है, इस पर लालू यादव और कांग्रेस पार्टी के साथ शरद यादव क्या तालमेल बिठा सकते हैं, यह देखने की बात है। लेकिन इससे परे विपक्ष में बैठकर बहुत सी पार्टियों को यह सोचना होगा कि देश में बुरी तरह से बंटे गैर-भाजपाई वोट क्या गैरभाजपा दलों को जिंदा रहने देंगे? भाजपा ने संसद के भीतर 1984 की अपनी दो सीटों से बढ़ाकर आज अपने आपको स्पष्ट बहुमत तक पहुंचाया है और एक-एक करके कई राज्यों पर उसका जो कब्जा हुआ है, और जिस तरह से उन राज्यों में उसका वह कब्जा बरकरार है, वह देखने लायक है। उसकी बढ़ती हुई ताकत को अनदेखा करके इस चुनाव में बंगाल में ममता और तमिलनाडू में जया तो बच गए हैं, लेकिन बाकी हिन्दुस्तान भाजपा के असर में आया हुआ दिख रहा है। ये दो राज्य भी कब तक भाजपा के असर से बचे रहेंगे, इसका अंदाज लगाना मुश्किल है। ऐसे में कांग्रेस जैसे अपने आपको राष्ट्रीय दल कहने वाले को, और बहुत से क्षेत्रीय दलों को  न सिर्फ अपने अस्तित्व के बारे में सोचना होगा, बल्कि उन्हें भारतीय लोकतंत्र गैरभाजपाई राजनीति के बारे में भी सोचना होगा। 
आज यह बात साफ है कि अगर गैरभाजपाई, भाजपा-विरोधी दल एक-दूसरे से बिना किसी तालमेल के इसी तरह अपनी-अपनी बददिमागी में अपनी खो चुकी जागीर की हकीकत को अनदेखा करते हुए महज बयानबाजी करते रहेंगे, तो कल उनके बयान भी छपना बंद हो जाएंगे। दरअसल इस लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी और भाजपा की साफ-साफ दिख रही ताकत, और मोदी की लहर को बयानों से खारिज करते हुए गैरभाजपाई लोगों ने वोटों की गिनती के दिन अपना सब कुछ खो दिया। ऐसी नौबत में इन तमाम पार्टियों और नेताओं को बैठकर उसी तरह बात करने की जरूरत है जिस तरह अंतिम संस्कार के दौरान श्मशान में परस्पर असहमत लोगों को भी बात करने का मौका मिलता है। आज देश के सामने ऐसी नौबत है कि जैसे गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में भाजपा की राज्य सरकारें तीन-तीन बार चुनकर आ गई हैं, और लोकसभा चुनावों में भी इन राज्यों में भाजपा की ही लहर रही है, ऐसी नौबत अगर देश में मोदी सरकार की भी रहेगी, तो भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष कहां बचेगा? इसलिए सत्ता में आने के लिए न सही, विपक्ष में जिंदा रहने के लिए भी गैरभाजपाई दलों को चुनावी राजनीति से परे भी आपसी बातचीत, तालमेल, और विपक्ष की भूमिका में सहमति की जरूरत है। स्पष्ट बहुमत के साथ आई हुई एक स्थायी, और मजबूत सरकार एक नामौजूद विपक्ष की नौबत में लोकतंत्र को मजबूत नहीं कर सकती, इसलिए विपक्ष को अपना जिम्मा पूरा करना चाहिए। 

अब यह देखने का मौका कि कांग्रेस अपना क्या करती है?

18 मई 2014
संपादकीय
बिहार के घोर मोदी विरोधी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी जदयू की शर्मनाक हार के बाद कल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, और आज वहां पर एक और भाजपा विरोधी, राजद के लालू यादव के साथ मिलकर एक नई सरकार बनाने की कोशिश नीतीश कुमार की पार्टी के नेता शरद यादव कर रहे हैं। बिहार में चाहे जो हो, नीतीश कुमार ने इस्तीफा देकर एक रूख सामने रखा है, और इसे दूसरी पार्टियों में कौन-कौन, कहां-कहां मानते हैं, यह देखने की बात है। आज सबसे बड़ा सवाल देश में सबसे बुरी शिकस्त के बाद चौराहे पर खड़ी हुई कांग्रेस पार्टी के सामने है, वह जाए तो कहां जाए, किसकी उंगली थामकर जाए, उस पार्टी में इस हार की जिम्मेदारी कौन ले, और कौन इस पार्टी को राख से उठाकर खड़ा करने की ताकत रखते हैं? ऐसे बहुत से सवाल आज कांग्रेस के सामने हैं, और देश में आज सबसे बड़ा सवाल यही है। यह न सिर्फ राजनीति में सबसे बड़ा सवाल है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल है कि कांग्रेस पार्टी अब क्या करती है? 
दरअसल कांग्रेस ने अपना सारा दांव राहुल गांधी पर लगा दिया था, जो कि कुनबे के कांग्रेसी चापलूसों से परे किसी को भी संभावनाओं वाले नहीं दिख रहे थे। इसमें उनकी कोई खामी नहीं है, उनकी लीडरशिप की खूबियों में कमी थी, है, और शायद आने वाले निकट भविष्य में भी रहेगी। कांग्रेस के भीतर सोनिया परिवार के सम्मान, और उसके पिछले करिश्मे के चलते हुए इस पार्टी में राहुल गांधी को भविष्य की अपनी अकेली उम्मीद बनाकर यह चुनाव लड़ा था। लेकिन ऐसा करते हुए इस पार्टी ने राहुल के साथ एक बड़ी बेइंसाफी यह की थी, कि बिना तजुर्बे, बिना समझ, बिना काबिलीयत एक ऐसे नौजवान को एक भ्रष्ट और बदनाम हो चुकी सरकार को वापिस जिताने का जिम्मा दे दिया गया था, जिसकी ताकत को इसके पहले कभी परखा नहीं गया था। एक हिसाब से देखें तो कांग्रेस के नेताओं के लिए इससे अच्छी और कोई तरकीब नहीं हो सकती थी कि हारने की गारंटी वाले इस चुनाव का ठीकरा फोडऩे के लिए राहुल गांधी का सिर छांटकर रखा जाए, ताकि तोहमत और किसी पर न लगे। हम इसे राहुल गांधी के साथ उन्हीं की पार्टी की की गई बेइंसाफी इसलिए मानते हैं क्योंकि इस शिकस्त के साथ राहुल गांधी की संभावनाओं को पूरी तरह कुचलकर रख दिया गया है। 
ऐसे में आज सोनिया और राहुल, और चुनावी मौसम की कांग्रेसी नेता प्रियंका गांधी को क्या करना चाहिए? यहां दो बातों को समझना जरूरी है, आज इस परिवार के राजनीतिक हित, और कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक हित अलग-अलग हैं। अगर इस पार्टी को दुबारा खड़ा करना है, तो इसे सोनिया-राहुल से परे सोचने की हिम्मत भी करनी होगी। और अगर यह इस परिवार के करिश्मे पर ही पूरा दांव लगाना जारी रखती है, तो इसके उबरने की संभावनाएं आशंकाओं से परे नहीं रहेंगी। जैसे किसी कारोबार में होता है कि मालिक वहां सबसे काबिल मैनेजर नहीं होता, और समझदारी इसमें होती है कि एक काबिल मैनेजर को रखकर मालिक घर बैठे दुकान चलाए, कुछ उसी तरह कांग्रेस पार्टी में एक नए मैनेजर की जरूरत है, और उसमें ऐसे मैनेजर हो सकते हैं जो कि मालिक के प्रति वफादार भी हों। ऐसा न करके पार्टी पर अपने कब्जे को घर के भीतर से बरकरार और जारी रखकर सोनिया-राहुल कोई अच्छी मिसाल पेश नहीं करेंगे, और न ही पार्टी को उबरने का एक मौका देंगे। जहां तक कांग्रेस पर इस परिवार के कब्जे का सवाल है, तो वह पार्टी के खड़े हो जाने के बाद भी कायम रह सकता है, और अगर पार्टी खड़ी नहीं हो पाती है, तो फिर उस पर कब्जा भी किस काम का? 
इस परिवार की बात से परे की बात करें, तो कांग्रेस पार्टी को बहुत से सबक लेने की जरूरत है, इसमें सबसे बड़ा यह है कि उसे देश की जनता की यह मजबूरी मानकर नहीं चलना चाहिए कि जनता कांग्रेस को नहीं चुनेगी तो कहां जाएगी। ऐसे ही घमंड के चलते इस पार्टी के नेता लूटपाट में भी लगे रहे, लुटी हुई जनता को कूद-कूदकर लात भी मारते रहे। ऐसी दर्जनों बातें हमने पिछले बरसों में इसी जगह लिखी हैं, और कल भी उन बातों को दुहराया है, कांग्रेस को अपने आपको जिंदा रखने के लिए ऐसी तमाम बातों पर सोचना चाहिए। हमें किसी एक कुनबे की कोई फिक्र नहीं है, लेकिन हमको लोकतंत्र में एक मजबूत विपक्ष की फिक्र जरूर है, और यह एक शर्मनाक नौबत है कि नेहरू-गांधी की पार्टी को, दस बरस देश पर राज करने वाली पार्टी को आज लोकसभा के भीतर विपक्ष का दर्जा भी हासिल नहीं है। इस पार्टी को अपने सबसे नीचे के कार्यकर्ताओं से लेकर अपने हाईकमान तक के तौर-तरीकों को सुधारने की जरूरत है, और उसके पास अगले पांच-दस बरस का वक्त भी इसके लिए है। आने वाले दिन राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए दिलचस्प होंगे कि इतना नीचे गिरने के बाद अब कांग्रेस खड़े होने के लिए क्या करती है। 

सत्ता-परिवर्तन के बजाय सोच-परिवर्तन का मौका

17 मई 2014
विशेष संपादकीय

सुनील कुमार
भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की मिलीजुली शानदार जीत, और कांगे्रस की शर्मनाक शिकस्त, इनसे एक मिलाजुला सबक, और मिलीजुली नसीहत सबको लेनी चाहिए। आने वाले दिन यह लिखने के लिए रहेंगे कि मोदी को प्रधानमंत्री की हैसियत से क्या-क्या करना चाहिए, और क्या-क्या नहीं, लेकिन आज हम चुनावी नतीजों की बात करना चाहते हैं कि उससे हमको क्या-क्या सीखने का मौका मिलता है। आजाद हिंदुस्तान में ये नतीजे अपने किस्म के बिल्कुल ही अलग और अनोखे हैं, और इसलिए सीखने के इस मौके को गंवाना नहीं चाहिए।
2002 के गुजरात दंगों के बाद से वहां के मुख्यमंत्री की हैसियत से नरेंद्र मोदी जिस तरह उस राज्य को आगे किसी हिंसा से दूर रखा, और लगातार चुनाव जीते, वह बात  यह बताती है कि किस तरह हिंदुस्तान की सबसे बड़ी बदनामी से उबरकर दस-बारह बरसों के भीतर देश के एक हीरो की तरह की शोहरत कोई कैसे पा सकता है। इस पूरे दौर में मोदी न सिर्फ अदालती-सुनवाई का खतरा झेलते हुए खड़े रहे, बल्कि वे मीडिया-सुनवाई का सामना भी करते रहे। और जब इस लोकतंत्र की सारी संवैधानिक संस्थाएं मिलकर भी मोदी को गुनहगार नहीं ठहरा पाईं, किसी कटघरे तक नहीं ले पाईं, तो फिर लोकतंत्र में ऐसी अभूतपूर्व, ऐतिहासिक, और जबरदस्त जीत को नकारना अलोकतंात्रिक होगा। लोकतंत्र में कार्रवाई की संभावनाएं आज भी मोदी के खिलाफ खुली हुई हैं, और इसके साथ-साथ लोकतंत्र आरोपों से घिरे लोगों को आगे बढऩे का भी उतना ही मौका देता है। मोदी ने लोकतंत्र के भीतर ही, अपने पर फेंके गए पत्थरों से सीढिय़ां बनाकर यह ऊंचाई हासिल की है। और मोदी की यह कामयाबी लोगों को विपरीत परिस्थितियों में भी उबरने और आगे बढऩे की एक मिसाल देती है।
इसके साथ-साथ दूसरी मिसाल निकलती है यूपीए और कांगे्रस पार्टी की सरकार के लोगों के बर्ताव से, और खासकर कांगे्रस पार्टी के नेताओं के अहंकार से। पिछले दस बरसों की यूपीए सरकार के दौरान खासकर पिछले पांच बरस ऐसे रहे जिन्होंने यह मिसाल सामने रखी कि एक गठबंधन कैसे-कैसे नहीं चलाना चाहिए, एक सरकार कैसे-कैसे नहीं चलानी चाहिए, एक नेता को कैसा-कैसा बर्ताव नहीं करना चाहिए। कांगे्रस पार्टी के नेता, और प्रवक्ता तक, मुंह खोलते थे, और जनता के बीच हिकारत पैदा करते थे। हम इस भारी-भरकम शब्द को पिछले दो-तीन बरसों में कांगे्रस के संदर्भ में सैकड़ों बार लिख चुके हैं, और अपने अहंकार में डूबी हुई यह पार्टी यह देख भी नहीं पाई कि उससे नफरत करती हुई देश की जनता के सामने मोदी एक मजबूत विकल्प की तरह सामने आकर ऊंचे होते चले गए, और कांगे्रस हाशिए पर जाती रही। हमको जरा भी उम्मीद नहीं है कि हमारे यह लिखने से कांगे्रस पार्टी या उसके नेता किसी तरह का आत्ममंथन और आत्मचिंतन करेंगे, और अपने में सुधार करेंगे, लेकिन यह बात हम बाकी लोगों के लिए एक सबक की तरह लिख रहे हैं कि अपनी जिंदगी के किसी भी दायरे में लोगों को ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिए जैसा कि कांगे्रस ने पिछले बरसों में लगातार किया है।
बर्ताव से परे कामकाज को लेकर एक बड़ा सबक यूपीए सरकार से निकलता है कि अपने मातहत होते जुर्म को अनदेखा करके रहने वाले किस तरह उस जुर्म के हिस्सेदार रहते हैं। आज मनमोहन सिंह जेल में नहीं हैं, लेकिन वे अगर जेल में होते तो शायद बाहर रहने के मुकाबले अधिक हमदर्दी के हकदार होते। हमने दर्जनों बार इसी जगह यह लिखा है कि किस तरह मनमोहन सिंह एक गिरोह के मुखिया बनकर रह गए थे, जिसका अपने गिरोह पर कोई काबू नहीं था। हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री की कुर्सी ऐसे बेबस और कमजोर लोगों के लिए नहीं हो सकती जिनके मातहत लोग लूट और डकैती करते रहें, और वे खुद निकम्मे बैठे रहें। ऐसा बेजुबान गवाह बने रहने का काम तो गब्बर सिंह ने भी न किया होता, उसका भी अपनी गिरोह पर बेहतर काबू रहता। जो लोग अपनी जिम्मेदारी को अनदेखा करते हैं, वे लोग मनमोहन सिंह की तरह इतिहास में कालिख के हकदार रहते हैं। जिस प्रधानमंत्री को अपने ओहदे और लोकतंत्र की इतनी भी फिक्र न हो कि उसके विधेयक को एक नौजवान सार्वजनिक रूप से फाड़कर फेंक दे, और उसके बाद भी यह बूढ़ा सयाना कुर्सी से चिपका रहे। मनमोहन सिंह ने देश और दुनिया के सामने यह मिसाल पेश की है कि एक प्रधानमंत्री को, एक नेता को, किस तरह बेशर्म और गैरजिम्मेदार नहीं होना चाहिए।
इन चुनावी नतीजों से यह भी सीखने मिलता है कि किसी मुकाबले में दूसरों की गलतियों, उनके गलत कामों के मुकाबले अपनी लकीर को बड़ा करते चलने का क्या फायदा होता है, किस हद तक उसका फायदा हो सकता है। नरेंद्र मोदी ने पिछले बरसों में लगातार अपनी साख और अपने काम को बेहतर बनाने की कोशिश की, और उन्हें कांगे्रस-यूपीए की साख को मिटाना भी नहीं पड़ा। कांगे्रस और उसके साथी अपनी संभावनाओं को उसी तरह मिटाते चले गए जिस तरह आंगन में डली हुई किसी रांगोली को कोई बच्चा मिटाते जाता है, या कोई मतमस्त घर लौटते हुए उस रांगोली को कुचलते हुए लौटता है। राजनीति से परे भी जिंदगी के बाकी दायरों में समझदार लोगों को क्या-क्या करना चाहिए, और क्या-क्या नहीं करना चाहिए ये दोनों ही सबक इन चुनावी नतीजों से निकलते हैं।
एक भ्रष्ट सरकार के बदनाम, बदमिजाज, और बदजुबान मंत्रियों का क्या हाल होता है, यह इस बार सामने आया है। इसलिए लोगों को अपने ओहदे और कुर्सियों को खानदानी विरासत मानकर नहीं चलना चाहिए, और सत्ता की ताकत को अपने सिर नहीं चढऩे देना चाहिए। आज यहां पर नरेंद्र मोदी की कही हुई एक छोटी सी बात के बड़े सबक को देखना चाहिए। उन्होंने अपने-आपको चौकीदार या नौकर कहते हुए सेवा का मौका मांगा है। भारत की सत्ता की राजनीति में लोग सत्ता का हक चाहते हैं, इन्हीं शब्दों को कहते हैं, और इसी सोच के साथ काम करते हैं। मोदी के जो शब्द हैं, वे अगर सचमुच उनकी सोच बने, और अगर सत्ता के हक वाली बात सेवा की जिम्मेदारी वाली बात में वे बदल सकें, तो न सिर्फ भाजपा और मोदी सरकार, बल्कि देश की पूरी राजनीतिक सोच भी बदल सकती है, देश का पूरा लोकतंत्र बदल सकता है। सत्ता के हक वाली सोच लोकतंत्र को राजतंत्र बना देती है, और उसे सेवा की जिम्मेदारी में बदलना जरूरी है। अब चूंकि भाजपा-एनडीए अगले पांच बरस इसी सत्ता या सेवा के मौके के हकदार हैं, इसलिए सबसे पहले उनको भी इस सबक की जरूरत है। मोदी ने जो बात कही है, उस कथनी को करनी में बदलकर ही वे कामयाब हो सकते हैं, वरना इस देश ने पांच-पांच बरस में बहुत बार सत्ता बदलते देखा है। पिछले पांच बरसों में सोनिया-राहुल सहित कांगे्रस-यूपीए के अनगिनत कुनबे जिस तरह के बदनाम कारोबार की खबरों से घिरे रहे, उससे देश में यह तस्वीर बनी कि सेवा के मौके को यूपीए सरकार के लोगों ने मेवा का मौका बना लिया था। और देश की गरीब जनता के साथ मेवा चबाते लोगों का ऐसा बर्ताव हिंसा से कम कुछ नहीं था। और इस बार के नतीजे उस हिंसा का जवाब भी हैं। इसलिए लोग ऐसी हिंसा करने से बचने की नसीहत भी आज ले सकते हैं। सार्वजनिक जीवन में निजी कुनबों की दखल, और उनकी लूटपाट के दिन अब लद गए दिखते हैं, इसे लोग राजनीति से परे के बाकी दायरों में भी समझ लें।
2014 के चुनावी नतीजों से लोगों के सीखने को बहुत कुछ मिल रहा है, और इसे सिर्फ एक सत्ता-परिवर्तन मानकर चलने के बजाय, हर किसी को इसे सोच-परिवर्तन का एक मौका बनाना चाहिए।

अंदाज से बेहतर बहुमत से देश में आया मोदीराज

16 मई 2014
संपादकीय

लोकसभा के चुनाव जैसी कि एक्जिट पोल की उम्मीद थी, वैसे ही रहे, भाजपा-एनडीए के पक्ष में उससे भी अधिक बेहतर रहे, और इस पल एनडीए की सीटें सवा तीन सौ से आगे बढ़ चुकी हैं। देश ने जितने जोर-शोर से नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए वोट दिया है, शायद उससे कहीं अधिक जोर-शोर से कांग्रेस और यूपीए को हराने के लिए वोट दिया है। भाजपा के लिए यह उसके अस्तित्व का सबसे ऐतिहासिक मौका है कि वह आज गठबंधन के साथियों के बिना भी अपने खुद के बूते पर देश की सरकार बनाने की हालत में है। और इस जीत का सेहरा पार्टी के सिर पर तो है ही, उससे अधिक अकेले नरेन्द्र मोदी के सिर पर है, जिन्होंने हिन्दुस्तान के चुनावी इतिहास में अभूतपूर्व मेहनत करते हुए, अकेले अपनी साख को दांव पर लगाते हुए यह चुनाव लड़ा था। 
हमने पिछले महीनों में बार-बार यह लिखा था कि कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार, कांग्रेस पार्टी, और कांग्रेस के नेताओं ने हाल के बरसों में भ्रष्टाचार और चोरी-बेईमानी के अलावा जिस परले दर्जे की बददिमागी, बेदिमागी, और बदजुबानी दिखाई थी, वह महंगाई की मार से घायल देश की जनता के जख्मों पर तेजाबी पेशाब करने जैसा था। ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरता था जब कांग्रेस के लोग अपने किसी न किसी बयान से जनता के लिए हिकारत जाहिर न करते हों। दरअसल मोदी की जीत को कम न आंकते हुए भी हम यह लिखना चाहेंगे कि कांग्रेस ने अपनी हार की गारंटी करने के लिए खासा ओवरटाईम किया था, और एक ठेका-मजदूर जिस तरह कमरतोड़ रफ्तार से मेहनत करता है, कांग्रेस के नेताओं ने अपनी पार्टी की कब्र खोदने में कुछ उसी दर्जे की मेहनत की थी। देश के समझदार लोग यह सोच रहे थे कि ऐसी कांग्रेस पार्टी का एक बार खारिज होना जरूरी है, और उसके बाद फिर वह चाहे तो राख से अपने आपको दुबारा गढ़कर खड़ी हो जाए। आज हालत कुछ वैसी ही है। 
हम एक्जिट पोल के तकरीबन एक जैसे नतीजों को न भी मानते, तो भी यह बात हमेें दीवारों पर लिखी हुई दिख रही थी कि देश में आमतौर पर लोग यूपीए-कांग्रेस से नफरत कर रहे हैं, और नरेन्द्र मोदी में लोगों को एक मजबूत और स्थायी, काबिल और साफ-सुथरी सरकार की संभावना दिख रही थी। आज के नतीजे जनता की इसी नाउम्मीद, और इसी उम्मीद का नतीजा हैं। ये नतीजे एक खतरनाक नौबत लेकर भी आए हैं कि भारतीय लोकसभा में अब एक मजबूत विपक्ष भी नहीं रह गया है, और यह कमजोर हाल लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। 
पिछले पांच-दस बरसों में देश की जनता ने जितनी बदहाली झेली है, महंगाई की मार उस पर जितनी पड़ी है, और केंद्र के भ्रष्टाचार को देखते हुए भी चुप रहना, बर्दाश्त करना उसकी जिस तरह की बेबसी हो गई थी, उसका यही नतीजा निकलना भी था। कुछ महीने पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में चार बड़े राज्यों में जिस तरह की शिकस्त कांगे्रस की हुई थी, वह आज के नतीजों का एक संकेत था। दूसरी बात जिसे कम नहीं आंकना चाहिए, यह चुनाव मोदी और राहुल गांधी के व्यक्तित्वों के बीच सीधे टकराव का चुनाव भी था। और यह बात कांगे्रस के खिलाफ इसलिए गई कि राहुल गांधी मोदी के पासंग भी नहीं ठहरते थे। न सत्ता का उनका अनुभव था, न उनकी बातें असरदार थीं, और न उनके पास अपनी बातों के लिए अपनी सरकार का कोई वजनदार मुद्दा ही था। इसलिए लोगों को मोदी और गोदी में से जब एक चुनने की बात आई, तो उन्होंने देखा-परखा और खरा, आर्थिक मोर्चे पर कामयाब, सरकार को ईमानदारी से चलाने वाला मुख्यमंत्री चुना, और यूपीए के कुकर्मों का टोकरा ढोते हुए चुनाव की नदी को पार करने का कद राहुल गांधी का था भी नहीं।
सुबह नौ बजे के पहले एनडीए ने यूपीए को सौ से अधिक सीटों से पीछे छोड़ दिया था। यूपीए कुल पचास सीटों पर आगे थी, और एनडीए डेढ़ सौ सीटों पर। टीवी पर हर दस-पन्द्रह सेकंड में एक-एक सीट का रूझान बढ़ते चल रहा था, और पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों के मुकाबले यूपीए को जितनी सीटों का नुकसान हो रहा था, एनडीए को तकरीबन उतनी ही सीटों का फायदा हो रहा था। इसके बाद अगले पौन घंटे में, एनडीए के रूझान के आंकड़े बहुमत के लिए जरूरी 272 से काफी अधिक पार कर चुके थे, और पौने दस बजे यह आंकड़ा 290 हो चुका था। इसके बाद जिस तरह भाजपा कमल छाप पर संसद के भीतर बहुमत पा चुकी थी, वह देखने लायक था। और देश भर में कांगे्रस-यूपीए के दिग्गज जिस अंदाज में चुनाव हारे हैं, उनको लेकर इस पार्टी को आत्ममंथन करने बैठ जाना चाहिए। 
जहां तक छत्तीसगढ़ का सवाल है तो यहां के चुनावी नतीजे किसी भी नाटकीय से परे रहे। भाजपा के पास 11 में से 10 सीटें थीं, और अब करीब उतनी ही, एक कम, नौ सीटें रहते दिख रही हैं। कांग्रेस में फर्क यह पड़ा है कि उसके केन्द्रीय मंत्री रहे चरणदास महंत अपनी ही पार्टी के खुले वार को झेलते हुए चुनाव जीतते नहीं दिख रहे, और दूसरी तरफ अजीत जोगी को महासमुंद में भाजपा हरा नहीं पाई। लेकिन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में जिन पांच लोकसभा सीटों में बढ़त दिख रही थी, वह बढ़त हवा हो गई, और सत्ता के तीसरे कार्यकाल में भी, अपने सांसदों के खिलाफ जनता की नाराजगी के चलते हुए भी डॉ. रमन सिंह पिछली गिनती लगभग कायम रखने में कामयाब रहे। 

बात की बात, Bat ke bat

15 may 2014

15 may 2014

जिम्मेदार विपक्ष को सरकार को ऐसी सहूलियत नहीं देनी चाहिए

15 मई 2014
संपादकीय

कल इसी वक्त अगले पांच बरस के लिए देश की अगली सरकार के आसार साफ हो जाएंगे। हो सकता है कि नतीजे एकतरफा हों, और इसी वक्त कल तस्वीर साफ हो जाए, या हो सकता है कि कुछ घंटे और लगें। एक नौबत ऐसी भी हो सकती है कि जोड़तोड़ में कुछ दिन लग जाएं। लेकिन हम उस अटकल में लगे बिना आज यह सोच रहे हैं कि आज देश की जनता का मन क्या सोच रहा है? 
पिछले दस बरसों की यूपीए-कांगे्रस सरकार के आखिरी के पांच बरस लोगों ने बड़ी तकलीफ से निकाले हैं। और उन तकलीफों के लिए जिम्मेदार मुद्दों को लेकर संसद में भाजपा की अगुवाई वाले विपक्ष में जितना हंगामा किया, उसकी वजह से संसद घिसट-घिसटकर चलती रही, और संसद से देश की जो उम्मीदें थीं वे पूरी नहीं हो पाईं, कानून बनने से रह गए, और लोकसभा ने अपने काम से अधिक वक्त बिना काम किए हुए गुजारा। सरकार तो बहुत स्थिर रही, और पूरे दस बरस सरकार बखूबी जारी रही, लेकिन वह सरकार देश को चला रही थी, या खुद चल भर रही थी, यह देश के लोगों ने खूब देखा हुआ है। इसलिए आज अगर लोगों की उम्मीद यह है कि एक मजबूत सरकार आए, और पांच बरस पूरे वक्त अच्छा काम करे, तो यह उम्मीद महज सरकार से पूरी नहीं हो सकती। इसके लिए विपक्ष की जरूरत भी होती है, जो कि संसद चलने दे, और सरकार की गलतियों पर उसके हाथ भी पकड़े। लेकिन पिछले बरसों में भारतीय संसद में विपक्ष ने वक्त की बर्बादी की जो मिसाल कायम की है, वह मिसाल कुछ दिन बाद कांगे्रस के काम आएगी, और कई किस्म के जरूरी या गैरजरूरी मुद्दों पर संसद का वक्त खत्म करना जायज करार दिया जाएगा।
हम लगातार यह बात लिखते हैं कि संसद का वक्त देश की जनता के खून-पसीने से दिया हुआ होता है, और उसे बर्बाद करने का मतलब न सिर्फ जनता के पैसों की बर्बादी है, बल्कि जनता की तकलीफों को उठाने के मौकों को नकारना भी है। ऐसे में एक बार फिर हम नई लोकसभा को लेकर यह बात कहना चाहेंगे कि भारतीय संसदीय व्यवस्था में एक जिम्मेदार रूख की जरूरत है, और गलत मिसालों को लेकर फिर दुबारा गलत काम करने के बजाय नई और अच्छी मिसालें कायम करना जरूरी है। 
ब्रिटिश संसद की कार्रवाई को अगर टीवी पर देखें, तो यह समझ आता है कि किस तरह वहां जरूरी मुद्दों पर बहस चलते हुए पूरी तैयारी के साथ सांसद एक-एक पल का इस्तेमाल करते हैं, और अपने पक्ष की ताकत को साबित करने के लिए तथ्यों और तर्कों का सहारा लेते हैं, न कि गले की ऊंची आवाज और कागज फाडऩे, माईक तोडऩे वाले हाथ-पैर का। भारतीय संसद में बहुत से ऐसे अच्छे सांसद हमेशा रहते आए हैं जो कि गंभीरता से अपनी बात कहें, तो उसे सुनकर देश की जनता का एक बहुत अच्छा राजनीतिक शिक्षण होता है। और जनता के ऐसे शिक्षण के यह जरूरी है कि संसद में हंगामा खत्म हो, वहां पर सांसद गंभीरता से काम करें, और विपक्ष भी हंगामे के बजाय मुद्दों को उठाने में भरोसा रखे। हंगामा करने के लिए तो सड़क और फुटपाथ भी बहुत है। और आजकल तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मेहरबानी से हर शाम दर्जन भर समाचार चैनलों के स्टूडियो में भी हंगामा करने का मौका बढ़ गया है। ऐसे में संसद को एक बहुत गंभीर बहस के लिए, तर्क-वितर्क के लिए, और संसदीय कामकाज के लिए ही इस्तेमाल करना चाहिए। आज ऐसा न होने पर एक सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि बड़े-बड़े ऐसे कानून बन रहे हैं, या ऐसे बड़े-बड़े संशोधन हो रहे हैं, जिन पर पर्याप्त चर्चा भी नहीं हो पाती। पूरा का पूरा संसद सत्र हंगामे में निकल जाने के बाद आखिर के कुछ दिनों में घंटे-घंटे में एक-एक कानून बन जाता है, और जो जनता इस संसद के हाथीपांव जैसे स्तंभों को अपने सीने पर ढोती है, उसकी फिक्र ऐसे कानून में रह नहीं जाती।
इसलिए अगली सरकार चाहे किसी की भी बने, अगली संसद एक बेहतर संसद बननी चाहिए, क्योंकि अगर संसद अपना नहीं करती, तो वह सरकार के लिए एक बड़ी सहूलियत की बात हो जाती है। और जिम्मेदार विपक्ष को किसी सरकार को ऐसी सहूलियत नहीं देनी चाहिए।

हादसों के बाद मुआवजों के बजाय बचाव की सोचें

14 मई 2014
संपादकीय
देश में अलग-अलग जगहों पर हुए सड़क हादसों, दूसरे किस्म के हादसों पर केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा तरह-तरह के मुआवजे की घोषणा होती है। कहीं बीमारी में या दंगे में मरने वाले लोगों के लिए, तो कहीं खदान हादसे में, तो कहीं नक्सल हिंसा में मारे जाने वाले लोगों की खबरें आने पर शायद उन खबरों के समाचार-महत्व के हिसाब से, या फिर उनसे कितने वोट प्रभावित हो सकते हैं, इस हिसाब से सरकारें मुआवजा देती हैं। किसी बड़े नेता के इलाके में ऐसा होने पर ऐसा मुआवजा बढ़ जाता है, और अगर कोई मौत खबरों में नहीं आई, तो कफन-दफन में ही घर के बर्तन बिक जाते हैं। नेताओं से विवेक का ऐसा अधिकार ले लेना चाहिए, और पूरे देश में मुआवजे की नौबत की किस्में तय कर लेनी चाहिए, और उन्हीं के हिसाब से मरने वालों के परिवारों को मदद दी जानी चाहिए। इसका दूसरा तरीका यह हो सकता है कि ऐसी तमाम नौबतों के लिए सरकार किसी बीमा योजना का सहारा ले, और सरकार के पास से मुआवजा देने, या न देने का हक भी खत्म हो जाए, और अलग-अलग किस्म की मौतों पर बीमे के पैमाने तय हो जाएं। 
लेकिन इस छोटे से एक पहलू पर आज की बात को हम और आगे बढ़ाने के बजाय यह चर्चा करना चाहते हैं कि ऐसी मौतों के पीछे की जो वजहें रहती हैं, उनमें गए बिना, उन नौबतों का विश्लेषण किए बिना, आगे के बचाव की तरकीबें निकाले बिना सिर्फ मुआवजा बांट देना बहुत ही नाकाफी है। हम अपने आसपास ही देखते हैं तो सड़कों पर इस छोटे से छत्तीसगढ़ में ही रोजाना दर्जनभर मौतें दिख रही हैं। अब किस तरह की स्थितियों में किनकी गलतियों से ऐसे सड़क हादसे होते हैं, इसका कोई विश्लेषण सरकार नहीं कर रही है। सरकार सिर्फ मुआवजा बांटकर अपना जिम्मा पूरा समझ रही है, और अगर मौतों की गिनती अधिक होती है तो राज्यपाल और मुख्यमंत्री की तरफ से शोक संदेश भी आ जाते हैं। लेकिन इससे आगे के हादसों के खतरे कम नहीं होते। हमारा मानना है कि राज्य में लगातार विश्लेषण का एक ऐसा इंतजाम रखना चाहिए जिससे कि यह समझ आए कि किस तरह की वजहों से हादसे अधिक होते हैं, किन जगहों पर अधिक होते हैं, किस वक्त पर अधिक होते हैं, किस तरह की गाडिय़ों से अधिक होते हैं, और ऐसे विश्लेषण के बाद ही बचाव के रास्ते निकल सकते हैं। 
लगे हाथों हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि सड़कें बेहतर होने के बाद, गाडिय़ां बड़ी-बड़ी और तेज रफ्तार आ जाने के बाद, सड़कों पर ट्रैफिक बढ़ जाने के बाद अब हादसों का खतरा तो बढऩा ही था। लेकिन ऐसे में सरकार के जो विभाग सड़कों पर ट्रैफिक के लिए जिम्मेदार हैं, वैसे परिवहन विभाग, और यातायात पुलिस का काम सुधारने की जरूरत है। आज इन दोनों विभागों में भ्रष्टाचार का बोलबाला रहता है, और वैसे में किसी तरह के बचाव की बात नहीं की जा सकती। जो बात हम सुझा रहे हैं, वह मौतों पर मुआवजे के मुकाबले बहुत कम खर्चीली रहेगी, हादसों में घायल लोगों के सरकारी इलाज के मुकाबले भी बहुत कम खर्चीली रहेगी, और यही एक तरीका है कि लोग मरने से बचेंगे, या मरणासन्न जिंदगी जीने से बचेंगे। सरकार को सड़क दुर्घटनाओं के विश्लेषण, और उसके आधार पर बचाव की योजनाओं पर ध्यान देना चाहिए। 

मोदी के आने से देश में आशंकाएं और उम्मीदें...

13 मई 2014
संपादकीय
कल शाम से हिंदुस्तान के तमाम टीवी समाचार चैनलों पर चुनाव विश्लेषण आ रहा है कि किस तरह मतदान खत्म होने के बाद वोटरों का रूझान एनडीए और भाजपा की तरफ दिख रहा है। ये अंदाज हैरान करने वाले नहीं हैं, और कई हफ्तों से ऐसे ही नतीजों की उम्मीद की जा रही थी, इसलिए अधिकतर एक्जिट पोल एक से दिख रहे हैं, और पिछले दो चुनावों की तरह अगर एक्जिट पोल पूरी तरह, और बुरी तरह गलत साबित नहीं होते हैं, तो नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में अगली सरकार बनने के आसार हैं। 
आज लिखने को कुछ और नहीं है, इसलिए हम इसी मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं कि मोदी के जो विरोधी हैं, उनको एकदम से हताश और निराश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भारत के लोकतंत्र ने ऐसे कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनावों में किसने सोचा था कि नेहरू का कुनबा निपट जाएगा, और कुछ बरस पहले जो इंदिरा गांधी दुर्गा का अवतार दिख रही थीं, वे भी घर बैठने को मजबूर हो जाएंगी। फिर 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद किसने यह सोचा था कि देश के वैसे कांगे्रस विरोधी माहौल में बनी हुई पहली कांगे्रस विरोधी सरकार कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाएगी, और ढाई बरस में ही चल बसेगी। इसके बाद यह किसने सोचा था कि राजीव गांधी पर बोफोर्स की तोहमत के साथ देश में भारी माहौल बनाकर ईमानदारी के प्रतीक बनकर आए वीपी सिंह भी वक्त के पहले सत्ता खो बैठेंगे। और यह किसने सोचा था कि देवेगौड़ा और गुजराल जैसे लोग इस विशाल लोकतंत्र के प्रधानमंत्री बनेंगे और यह भी किसने सोचा था कि जो चंद्रशेखर इंदिरा को गिराने में एक मुखिया के, वे चंद्रशेखर एक दिन कांगे्रस की मदद से प्रधानमंत्री बन जाएंगे। लगे हाथों यह कहना भी अप्रासंगिक नहीं होगा कि 2004 में जब भाजपा का भारत शाईन कर रहा था, तब इंडिया शाईनिंग के इश्तहारों को खारिज करते हुए, देश ने यूपीए को चुना था, और सारे चुनावी सर्वे, एक्जिट पोल, गलत साबित हुए थे। ऐसा ही हाल 2009 के एक्जिट पोल का था, इसलिए देश की जनता को कल शाम से चल रहे टीवी प्रसारणों को लेकर हड़बड़ाने की जरूरत नहीं है। 
अगर मोदी हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री बनते हैं, तो वह इस देश में न तो लोकतंत्र का अंत रहेगा, न ही यह पूरा देश साम्प्रदायिक हो जाएगा। सत्ता की अपनी मजबूरियां होती हैं, और किसने यह सोचा था कि यूपीए-1 वामपंथी समर्थन की वजह से आर्थिक उदारीकरण पर सहम जाने को बेबस होगा। हो सकता है कि एनडीए और बाहरी समर्थन के चलते नरेन्द्र मोदी इन पांच बरसों में न तो राम मंदिर बनवा पाएं, और न ही धारा 370 खत्म कर पाएं, या कॉमन सिविल कोड लागू न कर पाएं। सत्ता चलाने की अपनी बेबसी होती है, और भाजपा के कुछ नेता पाकिस्तान के खिलाफ चाहे जितना कहते हों, इतिहास गवाह है कि भाजपा वाली अटल सरकार के चलते पाकिस्तान ने भारत पर चढ़ाई की, कारगिल में युद्ध छेड़ा, न कि भारत की भाजपा अगुवाई वाली सरकार ने पाकिस्तान पर हमला किया। इसलिए यह मानकर चलना चाहिए कि सत्ता के अपने दबाव होते हैं, और नरेन्द्र मोदी का आना, न तो हमेशा के लिए होने जा रहा है, और न ही वे अपनी मर्जी का हर काम कर सकेंगे।
इसलिए देश के जो लोग मोदी के आने के आसार से डरे-सहमे, या हड़बड़ाए हुए हैं, उनको चैन से बैठना चाहिए, और आने वाले महीनों को देखना चाहिए कि मोदी सरकार अगर आती है, तो वह किस राह पर जाती है। अगर यह सरकार लोगों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरेगी, तो जनता इसे खारिज करने का हक भी अपने हाथ रखती है। हमने जो ताजा इतिहास गिनाया है, उसमें कई सरकारों ने धमाके के साथ आने के बाद भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया था। इसलिए लोगों को वैचारिक रूप से असहमत होते हुए भी बहुत अधिक डरने की जरूरत नहीं है, और साथ-साथ मोदी के समर्थकों को भी बाकी लोगों के बीच ऐसा एक विश्वास खड़ा करने की जरूरत है। उनको यह याद रखना चाहिए कि मोदी के तमाम करिश्मे और यूपीए के तमाम कुकर्मों के बावजूद संसद के भीतर भाजपा-एनडीए का ऐसा कोई  बहुमत नहीं रहने जा रहा, जैसा कि राजीव गांधी ने देखा था, और उसके बाद अपनी सरकार अगले चुनाव में खो दी थी। इसलिए लोगों को न तो हीन भावना का शिकार होना चाहिए, न ही बददिमाग होना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र उतार-चढ़ाव का इतिहास रहा है, और भविष्य इससे बहुत अधिक अलग साबित होगा, ऐसी कोई गारंटी तो है नहीं।

Bat ki Bat


13 May, 2014



जनता के साथ फायनेंस कंपनियों की जालसाजी, और सोती सरकारें

12 मई 2014
संपादकीय
एक तरफ तो पश्चिम बंगाल की खबरें हैं कि वहां सारदा चिटफंड घोटाले की सीबीआई जांच के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ममता बैनर्जी ने कटाक्ष करते हुए कहा है कि अब लोगों का डूबा हुआ पैसा सीबीआई ही वापस करेगी, और दूसरी तरफ एक दूसरी फायनेंस कंपनी सहारा के बारे में सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने अदालत के बाहर कहा है कि इस जटिल मामले पर सुनवाई करने के दौरान जजों की दो सदस्यीय पीठ पर दबाव, तनाव और भार अकल्पनीय है। इन दो बातों को अगर देखें, और उसमें यह जोड़ लें कि किस तरह बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांगे्रस के नेताओं से इस सारदा कंपनी का लेना-देना रहा है, जिसने कि जनता के हजारों करोड़ डुबा दिए हैं, और किस तरह इस कंपनी ने ममता बैनर्जी की पेंटिंग्स को करोड़ों में खरीदा है, तो यह समझ आता है कि जालसाजी करने वाली कंपनियों की पहुंच कहां तक है, और किस तरह देश की सबसे बड़ी अदालत ऐसी कंपनियों के सामने बेबस बैठ जाती हैं। 
छत्तीसगढ़ के बारे में बात करें, तो यहां भी हर बरस दो-चार कंपनियां दसियों हजार लोगों के सैकड़ों करोड़ लेकर भागते दिखती हैं, और उनमें पैसा लगाने वाले नासमझ, या बेवकूफ, जो भी कहें, लोग उनको ढूंढते रह जाते हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम ऐसे आर्थिक अपराधों पर लिखते हुए कई बार यह सलाह दे चुके हैं कि केंद्र और राज्य सरकारों की अनगिनत खुफिया और सतर्कता एजेंसियां हैं, और उनकी नजरों में पूंजीनिवेश को लेकर होने वाले ऐसे घोटाले बुलबुले के फूटने के पहले आ जाते हैं, या आ जाने चाहिए। और ऐसी कंपनियों पर समय रहते कार्रवाई होनी चाहिए, आज सरकार की हालत खेतों में खड़े किए गए पुतले की तरह रह गई है, जो कि खेत के चरे जाने के दौरान चुपचाप खड़े रह जाता है। बहुत छोटी-छोटी कमाई वाले लोग अपनी पूंजी का बड़े-बड़े मुनाफे के झांसे में आकर जालसाज कंपनियों में पैसा लगाते हैं, और सरकारें उनके पैसे को डूबते हुए देखती रहती हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। देश में आर्थिक अपराधों पर नजर रखने के लिए केंद्र सरकार की कई एजेंसियां हैं, उनको अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। और राज्य की पुलिस भी चाहे तो जमीन पर यह जालसाजी शुरू होते ही रोक सकती है, या कम से कम केंद्र की एजेंसियों को खबर कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के जज ने सहारा के मामले में जजों पर पडऩे वाले जिस तरह के दबाव का जिक्र खुद होकर किया है, वह बहुत ही फिक्र की बात है। इस देश में अगर लाखों करोड़ रखने वाले, और दीवालिया होते दिख रहे कारोबारी भी अगर सुप्रीम कोर्ट में इस किस्म का, इस दर्जे का दबाव पैदा कर सकते हैं, तो इस लोकतंत्र में न तो गरीब की जगह है, न ही अमीर के लिए किसी सजा की कोई गुंजाइश है। आर्थिक अपराधों को राजनीति और नेताओं का जिस तरह का साथ मिल रहा है, वह बात अपने-आपमें भयानक है। 
एक बार फिर हम छत्तीसगढ़ के स्तर पर यह कहना चाहेंगे कि जब कभी ऐसी मार्केटिंग कंपनियां जालसाजी दिखती अपनी योजनाओं के लिए पैसा इक_ा करना शुरू करती हैं, तभी राज्य सरकार को उन पर नजर रखनी चाहिए, और उनको ठोंक-बजाकर देख लेना चाहिए कि गरीबों का पैसा खतरे में तो नहीं जा रहा है।

चुनाव का इतना लंबा दौर लोकशिक्षण का अच्छा मौका

11 मई 2014
संपादकीय

भारतके आम चुनाव अब आखिरी दौर में हैं। कल इस वक्त तक मतदान के आखिरी दिन वाले वोट आधे से अधिक डल चुके होंगे, और उसके बाद पार्टियां और नेता अगले कुछ दिन चैन से पांव पसारकर गुजारेंगे, या बेचैनी से। अब चूंकि प्रचार का यह दौर खत्म हो गया है, और नतीजे तकरीबन तय हो चुके हैं, इसलिए नतीजों की अटकलबाजी के बजाय कुछ मुद्दों पर बात करना बेहतर है। 
बहुत से लोगों को यह लगता है कि गुजरात दंगों के दाग वाले मोदी की अगुवाई में चुनाव लडऩे पर भारत का लोकतंत्र खतरे में है। भारतीय लोकतंत्र बहुत लचीला है, और बहुत उदार भी। इस दरियादिली के चलते भारत के संविधान में यह छूट दी गई है कि जब तक अदालतों से कोई कुसूरवार साबित न हो जाएं, तब तक उनको चुनाव लडऩे से नहीं रोका जा सकता। मोदी तो अभी तक किसी अदालती कटघरे में लाए भी नहीं गए हैं, लेकिन दूसरे लोग ऐसे हैं जो कि 1984 के दंगों के मामले झेलते हुए भी न सिर्फ कांग्रेस के उम्मीदवार रहे, बल्कि चुनाव जीतकर सांसद भी रहे। हम एक जुर्म को गिनाकर दूसरे जुर्म को कम आंकना नहीं चाहते, लेकिन लोकतंत्र कानूनों से कम, और परंपराओं से अधिक चलता है, इसलिए इसे अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। 
एक दूसरी बात इससे जुड़ी हुई और जरूरी यह है जो मोदी ने दो-चार दिन पहले के अपने इंटरव्यू में कही। उन्होंने कहा कि चुनाव लोक शिक्षण का मौका भी होता है, और नेताओं के भाषण जनता के सामने मुद्दे रखते हैं। हम उनकी इस बात से सहमत हैं, और जनता के राजनीतिक शिक्षण की वकालत हम हमेशा करते आए हैं। अगर चुनाव न होते तो मोदी से जुड़े होते निजी और कारोबारी, सांप्रदायिक और जाति के मामले कैसे सामने आते, और लोगों को कैसे इन मुद्दों पर सोचने का मौका मिलता। भारत के आम चुनाव, और खासकर ऐसे चुनाव जो कि महीनों तक चले, उन्होंने लोगों को बहुत सोचने-समझने का मौका दिया। और नेताओं को कहने का मौका भी इतना ही मिला। अखबारों, और बाकी मीडिया को अपने रूझान के मुताबिक लोगों को राजनीति बताने और समझाने का पूरा मौका मिला। ऐसे में तमाम किस्म के झांसे और झूठ का भांडाफोड़ करने का मौका भी सबके पास था। खुद हमने ही इंटरनेट पर तैरने वाले कई किस्म के झूठ, कई किस्म की जालसाजी उजागर की, और उससे उनके पीछे की बदनीयत उजागर भी हुई। 
चुनाव को लोक शिक्षण का मौका बनाना एक अधिक लोकतांत्रिक तरीका है, और भारत में चाहे मीडिया पर बिक जाने के आरोप लगते हों, या नेताओं पर वोट खरीदने के आरोप लगते हों, लोगों के बीच अपने विचार पहुंचाने की आजादी न सिर्फ बड़ी पार्टियों को थी, बल्कि सबसे गरीब पार्टियों को भी थी। और बात सिर्फ राजनीतिक मुद्दों की नहीं है, सामाजिक और आर्थिक मुद्दे भी खुलकर चर्चा में रहे, और लोगों को उन पर सोचने-समझने का मौका भी मिला। ऐसे में हम इन चुनावों को जागरूकता का एक मौका भी पाते हैं और वोटों की खरीद-बिक्री के बीच भी हम यह पाते हैं कि जनता का कुछ हिस्सा तो परिपक्व होता ही होगा।