अंतरिक्ष पर भारत की फतह, देश की धरती पर शिकस्त...

30 जून 14
संपादकीय
भारत ने अपने शानदार और गौरवशाली अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत आज फिर एक रॉकेट से कई देशों के उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे हैं। ये देश दुनिया के सबसे विकसित देश हैं, और उनमें से कोई भी तकनीकी क्षमता में, वैज्ञानिक विकास में भारत से पीछे नहीं है। इस पर भी अगर वे भारत के रॉकेट से अंतरिक्ष में अपने उपग्रह भेज रहे हैं, और ऐसा करते हुए भारत की अंतरिक्ष संस्था इसरो को कुछ समय हो भी चुका है, तो यह भारत के लिए गर्व की बात तो है ही, इससे यह सोचने की एक मजबूरी भी सामने आती है कि अंतरिक्ष तक पहुंचा हुआ हिन्दुस्तान आज पखानों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है, नालियों और गटरों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है? यह हिन्दुस्तान क्या अंतरिक्ष में पहुंचकर वहां से इस देश में हर प्रदेश में बिखरी हुई तरह-तरह की सरकारी खामियों और कमियों को क्यों नहीं देख पा रहा है? 
बोलचाल की भाषा में किसी आसान काम के बारे में कहा जाता है कि उसे करने के लिए परमाणु बम बनाने के फार्मूले की जरूरत नहीं है। भारत में भी सरकारी काम में सुधार के लिए, शहरों और गांवों की रोज की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए किसी कठिन और जटिल फार्मूले की जरूरत नहीं है, इस देश के भीतर विज्ञान से लेकर तकनीक तक, और मैनेजमेंट से लेकर मार्केटिंग तक इतने किस्म की कामयाब मिसालें हैं, कि उनकी नकल करके भी यह देश आगे बढ़ सकता है। गुजरात में अमूल नाम का देश का एक सबसे कामयाब प्रोजेक्ट चल रहा है, जो दशकों से इसी भ्रष्ट देश के भीतर भी पूरी कामयाबी से अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड कायम कर रहा है। इस सफलता से सीख कर देश के भीतर सौ दूसरी जगहों पर अमूल की डेयरी, और दूध उत्पादक लोग क्यों तैयार नहीं किए जा सकते? गुजरात में जिस जगह पर यह है, वहां जैसी हवा-पानी और बाकी सहूलियतें देश में जगह-जगह हो सकती हैं, लेकिन एक के बाद दूसरा अमूल इस देश में नहीं हो सका। इस देश में दिल्ली की एक मेट्रो के बाद कई दूसरे शहरों में मेट्रो बन रही है, और चल रही है। इस सामूहिक यातायात सुविधा ने महानगरों को एक नई जिंदगी दी है। और एक के बाद दूसरा शहर मेट्रो की तरफ बढ़ रहा है। लेकिन अमूल डेयरी जैसे सफल प्रयोग बाकी देश में कहीं नहीं दुहराए जा सके। 
अंतरिक्ष के मोर्चे पर भारत की कामयाबी को देखकर यह भी लगता है कि लोगों की जिंदगी में कई तरह की सुविधाओं को लेकर, सरकार के कामकाज को लेकर उत्कृष्टता के इसरो जैसे पैमाने क्यों नहीं गढ़े जा सकते? आज अगर दुनिया के दर्जनों देश अपने महंगे उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए भारत के कामयाब रॉकेटों पर भरोसा करते हैं, तो यह तकनीकी उत्कृष्टता इसी देश की जिंदगी की छोटी-छोटी बातों को क्यों नहीं लाई जा सकती? जब इसी देश के नौजवान दुनिया के सबसे अच्छे विश्वविद्यालयों तक पहुंचकर, वहां रिकॉर्ड कायम करते हैं, और दुनिया की सबसे बड़ी-बड़ी कंपनियों के मुखिया भी बनाए जाते हैं, तो फिर वह उत्कृष्टता भारत में क्यों नहीं लाई जा सकती? अभी चार दिन पहले ही राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भोपाल में एक भाषण में इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि भारत के विश्वविद्यालयों का स्तर अंतरराष्ट्रीय पैमानों पर कहीं नहीं टिकता। और भारत के ही छात्र-छात्रा दूसरे देशों में जाकर किसी भी दूसरे देश के नौजवानों के मुकाबले आसानी से खड़े रहते हैं। इस हकीकत के पीछे हमको भारतीय शिक्षा व्यवस्था में उत्कृष्टता की कमी साफ-साफ जिम्मेदार दिखती है। 
आज जब यह देश इसरो की कामयाबी पर खुशी मना रहा है, तो करीब-करीब हर नागरिक की जिंदगी में कोई न कोई खामी या कमी उसकी जिंदगी से खुशियां छीन भी रही हैं। लोगों को सरकारी दफ्तरों से लेकर सार्वजनिक जगहों तक, कारोबार से लेकर सामाजिक व्यवहार तक उत्कृष्टता की कमी झेलनी पड़ती है, और अंतरिक्ष में सफलता के बाद जब इस धरती पर असफलता कदम-कदम पर दर्ज होती है, तो वह और अधिक चुभती है। भारत को अपने हर पहलू में बेहतर पैमाने लागू करने, और उन पर ऊपर जाने की कोशिश करनी चाहिए।

बरसों के पे्रम और देह-संबंधों के बाद अचानक बलात्कार!

29 जून 2014
संपादकीय
कल रात एक टीवी सीरियल जोधा-अकबर में एक साजिश के तहत एक धूर्त महिला एक भले बुजुर्ग पर बलात्कार की कोशिश का आरोप लगाती है, और तकरीबन सभी लोग उस पर भरोसा भी करते हैं, जबकि आरोप पूरी तरह झूठा रहता है। कल ही सुबह यह खबर आई थी कि सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल खड़ा किया है कि असफल पे्रम संबंधों के तुरंत बाद अगर उन्हें लेकर बलात्कार की कोई रिपोर्ट लिखाई जाती है, तो उनको कितना भरोसेमंद माना जाए। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया कि क्या दो बालिगों के बीच सहमति से चल रहा प्रेम संबंध टूटने के बाद दुष्कर्म का मामला बनता है? इसी तरह का मामला पिछले साल दिल्ली हाईकोर्ट में आया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि दुष्कर्म के केस को महिलाएं हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही हैं। पुरुष को बदनाम करने के अलावा उसे शादी के लिए मजबूर करने के लिए ऐसा किया जा रहा है। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने कोई आदेश नहीं दिया पर हाल में इस तरह से तेजी से बढ़े मामलों पर चिंता जरूर जताई। अदालत ने कहा कि प्रेम संबंधों के टूटने के बाद पुरुष पर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने का आरोप लगा देती हैं। दिल्ली की एक खबर है कि वहां अब पुलिस बलात्कार की ऐसी रिपोर्ट तो लिख लेगी जो कि साथ रहने के बाद कोई एक महिला अपने कल तक के साथी के खिलाफ लिखाने आएगी, लेकिन ऐसी शिकायतों पर साथी आदमी की गिरफ्तारी तुरंत नहीं की जाएगी, और पुलिस के बड़े अफसर से इजाजत लेकर ही ऐसी गिरफ्तारी होगी। अब तक वहां रिपोर्ट होते ही आरोपी को गिरफ्तार कर लिया जाता है। 
इन दोनों-तीनों बातों की चर्चा करने से महिलाओं के हक के लिए लडऩे वाले कई लोग हम पर नाराज होंगे कि हम भी आदमियों की ज्यादती, जुल्म और जुर्म की शिकार औरतों की बात पर शक खड़ा कर रहे हैं, और ऐसे शक को बढ़ावा दे रहे हैं। हमारी ऐसी कोई नीयत नहीं है, लेकिन कानून के तहत महिला की शिकायत को, उसके बयान को काफी वजन मिला हुआ है, और अगर महिलाओं के हक के मामले में कोई कमी है, तो वह कानून पर अमल की कमी है, न कि कानून में कड़ाई की। ऐसे में इंसाफ का तकाजा यही है कि लोगों को सुनवाई का, जांच में अपनी बात को कहने का एक हक मिलना चाहिए, और पहली शिकायत की बुनियाद पर गिरफ्तारी के पहले यह भी सोचने की जरूरत है कि बरसों लंबे पे्रम-संबंधों और साथ रहने की समझ-बूझ पर अगर ऐसा कानूनी खतरा टंगा रहेगा, तो उससे इंसानी रिश्तों पर पडऩे वाला बुरा असर क्या अधिक नुकसानदेह नहीं होगा? 
हम यहां पर महिलाओं की शिकायत पर अब तक आम बनी हुई पुलिस कार्रवाई के सिर्फ एक छोटे पहलू पर बात करना चाहते हैं। जब शिकायत किसी आदमी के साथ लंबे पे्रम-संबंधों, लंबे लिव-इन रिलेशनशिप के बाद सामने आती हो, तो उसे इतने लंबे रिश्तों की पृष्ठभूमि में भी देखना चाहिए। आज न सिर्फ पश्चिमी देशों में, बल्कि दुनिया के अधिकतर देशों में वयस्क जोड़ों के बीच पे्रम-संबंधों के दौरान आपसी सहमति से सेक्स एक आम बात है। ऐसे में अगर महीनों या बरसों के बाद रिश्ते खराब होते हैं, शादी का वायदा पूरा नहीं हो पाता है, नौकरी दिलाने का वायदा पूरा नहीं हो पाता है, तो कल तक का सहमति का सेक्स आज का बलात्कार एकदम से ही मान लेना हो सकता है कि इंसाफ के खिलाफ जाए। बलात्कार के मामलों में महिलाओं के बयान को आदमी के बयान से अधिक वजन देना तो ठीक है, लेकिन इंसाफ के तराजू में कम से कम दो पलड़े होना भी जरूरी है, और आदमी की सफाई के वजन को चाहे कम भी आंका जाए, लेकिन उसे सुनना, और हालातों को देखना, यह भी जरूरी है।
हमारी बात कुछ लोगों को मर्दानगी वाले जुल्म और जुर्म का साथ देने वाली लग सकती है, लेकिन हम उस इंसाफ को बचाने के लिए इस गुंजाइश पर चर्चा कर रहे हैं, जिस इंसाफ की नीयत औरत को कुछ अधिक हद तक रियायत देने की है। उस नीयत की हिमायत करते हुए भी हम बयान से परे के बाकी हालात को भी एक नजर देखने की सलाह देने की हिमाकत कर रहे हैं। ऐसा न होने पर जितने भी मामलों में झूठी रिपोर्ट होती है, अदालत में झूठी साबित होती है, उतनी ही हद तक सचमुच जुर्म की शिकार महिलाओं की विश्वसनीयता भी घटेगी। इसलिए इंसाफ का तकाजा आदमी और औरत की बातों को सिर्फ बयान से कुछ अधिक दूर तक देखने का है। कानून अंधा कानून बनकर किसी को राह नहीं दिखा सकता। इसलिए बरस-दर-बरस चले आ रहे पे्रम और देह-संबंधों के बाद अचानक बलात्कार की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट के माथे पर जो बल पड़े हैं, उन्हें देखते हुए इस बारे में चर्चा होनी चाहिए। 

बात की बात, Bat ke bat,

28 june 2014

घटिया बीज से होता नुकसान सिर्फ बीज की लागत का नहीं

28 जून 2014
संपादकीय
हिन्दुस्तान में मानसून कमजोर दिख रहा है इसलिए पूरे देश में जगह-जगह फिक्र खड़ी हो रही है। अभी जब हम यह लिख रहे हैं, तब छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह जिलों के साथ खेती-किसानी पर बात कर रहे हैं कि कैसे इस हालत से निपटा जा सकता है। बारिश तो हाथ में नहीं है, लेकिन बीज, खाद और खेती की दवा सही समय पर और सही किस्म की लोगों को मिल जाए इतना तो जरूरी है। और इस वीडियो कांफ्रेंस के दौरान ही यह बात सामने आई कि कई बीज कंपनियों ने घटिया बीज सप्लाई किए और उसकी वजह से फसल तबाह हुई। इन कंपनियों को काली सूची में डालने का आदेश दिया गया, लेकिन पिछले बरसों में इस भ्रष्टाचार के चलते जो फसल तबाह हुई है, उसकी कोई भरपाई मुमकिन नहीं है। पिछले पांच बरसों में जगह-जगह यह बात सामने आई थी कि कृषि विभाग ने, और बीज निगम ने जो बीज दिए थे, वे घटिया थे। इसके अलावा इस विभाग में भ्रष्टाचार की बहुत सी खबरें सामने आई थीं। दूसरे विभागों से अलग कृषि विभाग में बीज, खाद, और दवा के घटिया होने का नुकसान महीनों बाद जाकर गरीब किसान को पता लगता है। इसलिए यह धोखाधड़ी सिर्फ बीज की लागत के नुकसान की नहीं रहती, यह धोखाधड़ी उससे कई गुना अधिक, किसान की जिंदगी के पूरे एक बरस की रहती है। 
छत्तीसगढ़ में राज्य सरकार ने कुछ विभागों के कामकाज पर कसावट से वहां सुधार लाया है। ऐसे में दूसरे विभागों में सुधार क्यों नहीं हो सकता, यह हैरानी की बात है। फिर बहुत से विभागों से जुड़े हुए ऐसे निगम और मंडल हैं, जहां पर सरकार नेताओं को मनोनीत करती है, और फिर मानो उन नेताओं के खर्च निकालने के लिए, या फिर उनके चुनाव के लिए, इन निगम मंडलों में भारी गड़बड़ी चलती है। ऐसा अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से लगातार देखने में आया है, और जो निगम मंडल अपनी स्वायत्तता से बेहतर काम कर सकते हैं, वे भ्रष्टाचार से घिरे, राजनीतिक पुनर्वास केन्द्र, या शिविर बनकर रह जाते हैं। खेती-किसानी से जुड़े हुए निगम मंडलों का हाल ऐसा ही रहा, और वे राजनीतिक खर्च का सामान बनता रह गया। 
छत्तीसगढ़ में एक तरफ तो धान की खरीदी, और रियायती अनाज को पहुंचाने के मामले में राज्य सरकार की कामयाबी को देखकर पड़ोस के ओडिशा से सरकारी लोगों के यहां आने की खबर आज ही आई है। लेकिन बाकी कई मामलों में छत्तीसगढ़ को अपनी ही कुछ कामयाब मिसालों से सीखने की जरूरत है। मुख्यमंत्री ने जनता की शिकायतों के तेजी से असरदार निपटारे में कड़ाई बरतना शुरू किया है, लेकिन इसका असर कितना होता है यह आने वाले दिन बताएंगे, और उसकी एक मिसाल खेतों में बीज की कामयाबी भी हो सकती है, जिसके बिना किसान कर्ज से लद सकते हैं। 

हर्षवर्धन भारतीय संस्कृति का एक काल्पनिक रोड-रोलर चला रहे हैं...

27 जून 2014
संपादकीय

भारत के नए स्वास्थ्य मंत्री, भाजपा के डॉ. हर्षवर्धन ने कुछ दिनों के भीतर दूसरी बार विवाद छेड़ा है, जब उन्होंने अपने ब्लॉग पर नई शिक्षा नीति की अपनी सोच बताते हुए उसमें से स्कूलों से 'तथाकथितÓ यौन-शिक्षा को हटाने की वकालत की है। अभी दो-चार दिन ही हुए हैं जब उन्होंने कंडोम के खिलाफ यह तर्क दिया था कि इसकी वजह से लोग लापरवाह सेक्स-संबंध बनाते हैं और इसके बजाय भारतीय संस्कृति के मुताबिक संबंधों में ईमानदारी अधिक कारगर होगी। 
हिंदुस्तान जैसे विशाल, और सेक्स-बीमारियों का खतरा झेलने वाले देश में ऐसी बात सिवाय एक शुद्धतावादी, अव्यवहारिक, दकियानूसी, अवैज्ञानिक बात है, और इससे सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए लोगों को बचना चाहिए। खासकर देश का स्वास्थ्य मंत्री अगर लोगों के स्वास्थ्य के बजाय देश की एक ऐसी पुरानी और काल्पनिक संस्कृति की फिक्र करने में लग जाता है, जो कि कभी रही ही नहीं, तो वह पूरे देश की सेहत के लिए बहुत खतरनाक है। हिंदुस्तान बहुत सी पत्नियों और बहुत सी पे्रमिकाओं की परंपरा वाला देश रहा है। यहां पर नगरवधुओं के नाम से वेश्याओं का पेशा सैकड़ों या हजारों बरस से चलते आ रहा है, और जब तक धरती रहेगी, तब तक चलता रहेगा। आज अगर लोगों से यह उम्मीद की जाए कि वे अपने जीवनसाथी से सेक्स, या किसी बाहरी साथी से सेक्स करते हुए कंडोम के बजाय ऐसी सुझाई गई काल्पनिक संस्कृति का इस्तेमाल करें, तो यह देश को एक भयानक खतरे की तरफ धकेलने का काम है, और डॉक्टरी पेशे से आए हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को एक झूठी और काल्पनिक संस्कृति के प्रचार से बचना चाहिए, और अपनी वैज्ञानिक जिम्मेदारी को पूरा करना चाहिए।
सामाजिक हकीकत, और जीवन मूल्यों को लेकर लोगों की सोच के बीच बहुत सी जगहों पर, बहुत से वक्त पर बड़ा सा फासला हो सकता है। और लोगों को याद होगा कि किस तरह कुछ बरस पहले तक ईसाईयों का सबसे बड़ा धर्मस्थान, वैटिकन, अपने धर्मगुरू पोप की सोच की शक्ल में कंडोम के इस्तेमाल का विरोधी था क्योंकि इससे जन्म की संभावना खत्म होती थी। लेकिन जब चर्च ने देखा कि अफ्रीका के देशों में सेक्स से फैलने वाली बीमारियों से अनगिनत मौतें हो रही हैं, और पूरी की पूरी आबादी के खत्म हो जाने का खतरा रहेगा, तो उसने कंडोम के बारे में अपनी नीति बदली। भारत जैसे देश में पिछले कई बरसों से सरकार ने भी कंडोम को लेकर समाज की अतिसंवेदनशीलता को कम करने का काम किया, इसकी तरफ जागरूकता बढ़ाई, और लोगों को बीमारी और अनचाहे गर्भ से बचने की राह सुझाई। विज्ञान के इस सामाजिक योगदान को पूरी तरह खारिज करते हुए, इन तमाम खतरों को सिर्फ एक सांस्कृतिक-सोच से निपटाने की डॉ. हर्षवर्धन की सोच बहुत ही अवैज्ञानिक है, और खतरनाक है। केंद्र सरकार को विज्ञान और समाज का काम एक प्रगतिशील, आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से ही करना चाहिए, देश में भारतीय संस्कृति के एक काल्पनिक इतिहास को रोड-रोलर की तरह इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 

देश की महंगाई और खुद की तंगहाली का फर्क भी समझें...

26 जून 2014
संपादकीय

महंगाई एक बार फिर खबरों में है। जिन लोगों को यह उम्मीद थी कि मोदी के आने के बाद सिर्फ अच्छे दिन ही आएंगे, उनको यह याद रखना चाहिए था कि चुनाव के वायदे रातों-रात हकीकत में तब्दील नहीं होते। दूसरी बात यह कि चाहे यूपीए की सरकार रही हो, या एनडीए की मौजूदा सरकार, महंगाई को किसी छड़ी को घुमाकर गायब नहीं किया जा सकता। तीसरी बात यह कि लोगों की जिंदगी में आज महंगाई से जो फर्क पड़ रहा है, उसे कुछ अलग-अलग पैमानों पर देखने की जरूरत भी है। खासकर इसलिए कि कई बार जहां पर लोगों को पैसों की तंगी रहती है, उस पूरी तंगी को भी महंगाई से जोड़ दिया जाता है। और न सिर्फ एक गलत तस्वीर बनती है, बल्कि एक गलतफहमी भी हो जाती है कि महंगाई की मार लोगों पर बहुत अधिक है, और उसके लिए सरकार जिम्मेदार है। 
अब हम यहां पर यूपीए या एनडीए में फर्क किए बिना ऐसी कुछ बातों को छूना चाहते हैं, जो कि लोगों को महंगाई बढऩे का अहसास कराती है। पेट्रोलियम पदार्थों का दाम बढऩा तो सीधे-सीधे महंगाई बढऩा है, और रेल टिकट-मालभाड़ा बढऩा भी महंगाई बढऩा है, लेकिन लोगों को अगर घर चलाना मुश्किल पड़ रहा है, तो उसके पीछे ऐसी महंगाई भी कुछ या अधिक हद तक जिम्मेदार तो रहती ही है, उसके पीछे लोगों की बढ़ती हुई जरूरतें भी जिम्मेदार रहती हैं। लोग अब अपने घर पर, बिजली पर, टीवी या केबल पर, मोबाइल फोन पर, दुपहियों पर, इलाज और पढ़ाई पर इस तरह का नया खर्च करने लगे हैं, जैसा खर्च एक पीढ़ी पहले शायद उनका परिवार नहीं करता था। ऐसे मामलों में कमाई तो एक सीमा तक बढ़ी है, लेकिन लोगों का जीवन स्तर उससे अधिक ऊपर जाने की चाह के साथ कई नए किस्म के खर्च जोड़ चुका है, जिससे कि तंगहाली रहती है, और वह सारी की सारी तंगहाली महंगाई नहीं रहती।
देश की अर्थव्यवस्था के सीमित साधनों को देखते हुए यह तय करना भी जरूरी रहता है कि किस तबके को कितनी रियायत देना जरूरी है, और वह रियायत किस तरह मुमकिन है। लोगों को याद होगा कि यूपीए सरकार सोनिया गांधी की अगुवाई में, या छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार गरीबों को सीधे रियायत देने की कई किस्म की योजनाओं के लिए जानी जाती हैं, और उनको लेकर इन सरकारों पर, या ऐसी और सरकारों पर यह तोहमत भी लगती रही है कि जरूरत से ज्यादा रियायत पाकर गरीब जाहिल होते चले जा रहे हैं। हम सबसे गरीब तबके की रियायतों को लेकर ऐसी तोहमत से सहमत नहीं हैं। लेकिन कुछ ऐसी रियायतें हो सकती हैं, जिनको बड़े लोगों से छीना जाना चाहिए, जैसे कि बड़ी निजी गाडिय़ों पर से डीजल की रियायत। 
महंगाई के कुछ पहलू केन्द्र और राज्य सरकारों के काबू से परे के भी हो सकते हैं, जैसे कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम का दाम बढऩा, या कि देश में आलू-प्याज की फसल कम होना, या कि मानसून कम होने से अनाज कम होना। लेकिन इससे परे के बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें राज्य सरकारों की हिस्सेदारी कुछ सामानों की महंगाई को कम करने में हो सकती है, और कई ऐसे मामले हैं जिनमें केन्द्र सरकार से आती हुई रियायत राज्यों में लुटती चली जाती है, और राज्य उसे रोक नहीं पाते, या केन्द्रीय रियायत होने की वजह से रोकने की फिक्र ही नहीं करते। इसमें  मिट्टीतेल, और रसोई गैस की रियायत शामिल है, जिनमें बड़े पैमाने पर जुर्म छत्तीसगढ़ में ही पकड़ाते आया है, यहां पर सैकड़ों करोड़ की गैस-रियायत चोरी होती है, लेकिन राज्य सरकार उसे पहाड़ तक हो जाने के पहले पकड़ नहीं पाती, और उसके बाद पुलिस और अदालती कार्रवाई के अलावा कुछ नहीं बचता। हमारा मानना है कि केन्द्र सरकार की रियायत हो या राज्य की, उसकी चोरी को डकैती मानकर उस पर समय रहते कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसे डकैतों को सजा मिल जाने से भी सरकार की जेब से निकल गई रियायत तो खत्म नहीं होती। आज अगर गैस या मिट्टी तेल की रियायत का बड़ा हिस्सा चोरी में जाता है, तो कुल मिलाकर इन चीजों के दाम तो आखिर में बढ़ेंगे ही। 
जहां तक केन्द्र और राज्य सरकारों के अधिकारों और जिम्मेदारी के तहत जमाखोरी और महंगाई को रोकना मुमकिन है, वहां पर इन दोनों को जमकर काम करना चाहिए, ताकि गरीबों को राहत मिल सके। दूसरी तरफ गरीबों और दूसरे तबकों को इस बात के फर्क को समझने की जरूरत है कि अपनी तंगहाली और देश की महंगाई, ये दो अलग-अलग चीजें हैं, और लोगों को अपने स्तर पर भी एक किफायत बरतने की जरूरत है। निजी गरीबी का कोई इलाज किसी देश-प्रदेश की सरकार नहीं कर सकतीं।

देश की आधी ट्रेनें तो नक्सल इलाकों से होकर ही गुजरती हैं...

25 जून 2014
संपादकीय
बिहार में राजधानी एक्सपे्रस कल रात पटरी से उतरी, और कई डिब्बों के पलट जाने के बाद भी, नई डिजाइन के अधिक सुरक्षित डिब्बों की वजह से जिंदगियां अधिक बच पाईं। फिर भी चार लोग मारे गए, और कई घायल हो गए। अभी यह साफ नहीं है कि वहां पर नक्सलियों, या माओवादी, जो भी कहें, उन्होंने उस इलाके में बंद रखा था, और यह दुर्घटना उनकी आतंकी कार्रवाई का नतीजा है या फिर एक आम रेल दुर्घटना है। लेकिन पहला शक नक्सलियों पर जा रहा है, और इस हादसे या हमले से चार बरस पहले के एक नक्सल हमले की याद ताजा होती है जिसमें हावड़ा से छत्तीसगढ़ होकर मुंबई जाने वाली ज्ञानेश्वरी एक्सपे्रस की पटरियों को नक्सलियों ने उड़ाया था, और उसमें करीब पैंसठ मुसाफिर मारे गए थे। 
भारतीय रेल दुनिया की सबसे बड़ी रेल सेवा है, और एशिया का सबसे बड़ा उद्योग भी है। इस पर करोड़ों लोग रोज चलते हैं, और रेलवे का पूरा ढांचा किसी इमारत के बाहर, खुले में बिछा हुआ है। ऐसे में अगर कोई नुकसान पहुंचाना चाहे, तो वह बहुत आसान हो सकता है। और रेलगाड़ी पलटने से होने वाली मौतें बहुत अधिक भी हो सकती हैं। ऐसे में यह एक बहुत बड़ी फिक्र की बात है कि बिना किसी हथियारबंद मोर्चे के, बिना किसी उकसावे या भड़कावे के, बिना किसी मजबूरी के, और आत्मरक्षा की किसी नौबत के बिना अगर आतंकी समूह इस तरह का हमला करते हैं, तो ऐसे दर्जन भर समूह पूरे देश में तबाही फैला सकते हैं। हिंदुस्तान में नक्सलियों की तरह के कई और समूह हैं, और क्षेत्रीयता, जाति, धर्म, और कुछ मामलों में सिर्फ विदेशी आकाओं के कहे हुए आतंकी हमले करते हैं। ऐसे में पूरे देश की रेल लाईनों की हिफाजत मुमकिन नहीं हो सकती, और मुसाफिरों की हिफाजत के लिए  देश में अमन-चैन का माहौल जरूरी है। और बात सिर्फ रेलगाड़ी के मुसाफिरों की नहीं है, हिंदुस्तान में शहरी भीड़ के बीच भी बहुत सी जगहों पर हमले हुए हैं, और आतंकी चाहें तो और अधिक बर्बादी भी कर सकते हैं।
लेकिन सरकारें, केंद्र और राज्यों की सरकारें, अपनी जिम्मेदारी से छुटकारा नहीं पा सकतीं, और दुनिया के किसी भी देश में हर आतंकी संगठन की मर्जी को मानना मुमकिन भी नहीं होता। इसलिए बातचीत से रास्ता निकलना एक तरीका है, और आतंकियों पर कार्रवाई उसके साथ-साथ ही चलनी चाहिए। टे्रन या सड़क के रास्ते सफर करते लोग, शहरों में रोजमर्रा की जिंदगी जीते लोग, इन सब पर अगर आतंकी हमले कभी-कभी और कहीं-कहीं भी होते हैं, तो उससे भी सरकार और लोकतंत्र पर से लोगों का भरोसा उठता है। और ऐसे अविश्वास के माहौल में देश की जनता आशंकाओं में जीती है। ऐसी नौबत में सरकार को भी अपना काम करना ही चाहिए, आतंकी संगठनों के जो गैरहिंसक दोस्त हैं, उन सबको भी हथियारबंद आतंकियों को समझाना चाहिए कि किसी हथियारबंद मोर्चे के बिना आम लोगों पर होने वाले ऐसे हमलों से आतंकियों के मुद्दे भी बदनाम होते हैं, जो कि कभी-कभी अपने-आपमें सही भी होते हैं। हिंदुस्तान में अगर नक्सल असर वाले इलाकों को देखें, तो शायद आधी रेलगाडिय़ां इन इलाकों से होकर गुजरती हैं। ऐसे हमले अगर होते हैं, और उनके बढऩे का खतरा भी है, तो फिर ऐसे आतंकी संगठनों पर सरकार अगर जरूरत से अधिक कड़ी कार्रवाई करेगी तो भी जनता उसे अधिक कड़ी नहीं मानेगी। जो हम लिख रहे हैं वह इस खतरे का किसी तरह का इलाज नहीं है, लेकिन यह खतरा और अधिक बड़ा हो सकता है, यह मानकर इसका इलाज ढूंढना जरूरी है।

वर्दीधारी कातिलों को सजा से सबक लेने की जरूरत

24 जून 2014
संपादकीय
उत्तराखंड में एक फर्जी मुठभेड़ में बेकसूर को मार डालने के जुर्म में  अभी कुछ हफ्ते पहले वहां के डेढ़ दर्जन से अधिक पुलिसवालों को उम्रकैद सुनाई गई है। और आज पटना में कई पुलिसवालों को उम्रकैद दी गई है, एक को फांसी भी सुनाई गई है जिन्होंने शहर के भीतर तीन छात्रों को डकैत बताते हुए फर्जी मुठभेड़ में मार डाला था। देश भर में बहुत से राज्यों में मुठभेड़ हत्याएं होती हैं, और नक्सल प्रभावित बस्तर जैसे कई इलाकों में बरसों से ऐसी शिकायतों पर अदालती सुनवाई चल रही है। ऐसे कोई मामले निचली अदालत में भी दस-दस बरस से अधिक तक चलते दिखते हैं, और सजा पाए हुए लोग ऊपर की अदालतों में जाकर रिहाई या रियायत पाने के लिए आजाद भी रहते हैं। ऐसे में देश में वर्दीधारी पुलिस या सुरक्षा बल की हिंसा फिक्र की हद तक बढ़ी हुई हैं। ऊपर जिन दो मामलों का हमने जिक्र किया है वे तो बिना किसी तनाव और खतरे वाले आम इलाकों के थे। उत्तराखंड और पटना में तो बस्तर या कश्मीर, उत्तरपूर्वी राज्य या गढ़चिरौली जैसा तनाव भी नहीं रहता जहां पर कि सुरक्षा बलों को रात-दिन बमों के धमाकों के खतरे तले सिर पर टंगी हुई मौत के साथ जीना पड़ता है। इसलिए जहां पर पुलिस जान पर खतरे के बिना काम करती है, वहां पर उसकी हिंसा अधिक फिक्र की बात है। 
मानवाधिकार संगठनों, और मानवाधिकार आयोगों की बात सुनें, तो मुठभेड़ हत्याओं से नीचे के दर्जे की हिंसा पूरे हिंदुस्तान में थानों में खूब बिखरी हुई है। अब तक तो उत्तरप्रदेश के थाने बलात्कार के लिए कुख्यात बने हुए हैं ही, अभी दो दिन पहले छत्तीसगढ़ के एक थाने पर भी एक महिला ने यौन-शोषण के आरोपियों के साथ उसे जबर्दस्ती भेज देने, और उसके ही परिवार के लोगों को बंद कर देने का आरोप लगाया है। यह तो जांच से सामने आएगा कि हकीकत क्या है, लेकिन जहां पर मुठभेड़ हत्याएं नहीं होती हैं, उन इलाकों में भी पुलिस की मनमानी और गुंडागर्दी कम नहीं रहती है। एक बड़ी दिक्कत यह रहती है कि मानवाधिकार आयोग जैसी संवैधानिक संस्था को तेजी से जितनी असरदार कार्रवाई ऐसे मामलों में करनी चाहिए, वैसी कोई बात इसलिए सामने नहीं आ पाती क्योंकि इन आयोगों में मनोनीत करने वाली पार्टी की सरकार ही पुलिस ज्यादती में बदनाम हो जाएगी। इसलिए पुलिस भी बेफिक्र होकर कभी सत्ता की मर्जी से, तो कभी अपनी मर्जी से मनमानी करती हैं, और राज्य के संवैधानिक आयोग अपने एयरकंडीशंड कमरों या कारों में आंखें बंद किए बैठे रहते हैं।
पुलिस ज्यादती के सबसे अधिक शिकार, सबसे गरीब तबके, सबसे कमजोर जातियां, अल्पसंख्यक, और बेजुबान तबके होते हैं। देश में आज गैरसरकारी संगठनों के खिलाफ एक भारी अविश्वास का माहौल खड़ा किया गया है, जिसका कुछ हिस्सा सच भी हो सकता है, लेकिन ऐसे संगठनों और सामाजिक आंदोलन की जुबान अगर बंद करवाई जाएगी तो उससे पूरे देश में सरकारी ज्यादती और जुल्म बढऩे लगेंगे। आज जरूरत इस बात की है कि 21वीं सदी की सभ्यता और दुनिया को समझते हुए भारत की सरकार और खासकर राज्यों की सरकारें अपनी जिम्मेदारी समझें, और पुलिस को यह समझाईश दें कि आजकल का जमाना वीडियो सुबूतों का है, और वर्दी का जुर्म किसी तरह बच नहीं पाएगा। खुद वर्दीधारियों को अपने पर खतरे को समझना चाहिए, और अपने मिजाज, अपनी मनमानी पर काबू रखना चाहिए।

गरीबों के हक लूटने, बेचने वाले लोगों को सजा मिलना जरूरी

संपादकीय
23 जून 14
मध्यप्रदेश में सरकारी नौकरियों में मंत्री के स्तर पर, और शायद मुख्यमंत्री और उनके परिवार के स्तर पर भी जो धांधली हुई है, उससे भाजपा के साफ-सुथरे कामकाज का नारा गंदा हुआ है। मंत्री तो हाईकोर्ट की निगरानी में चल रही विशेष जांच के दौरान गिरफ्तार करके जेल भेजे जा चुके हैं, और सैकड़ों दूसरे लोग गिरफ्तारी के अलग-अलग दौर में हैं। कांग्रेस के आरोप हैं कि मुख्यमंत्री का घर-दफ्तर, उनका निजी स्टॉफ और परिवार सैकड़ों नियुक्तियों की धांधली के पीछे है। हम अभी जांच के बीच अपना कोई नतीजा निकालना नहीं चाहते, लेकिन यह बात जगजाहिर है कि सरकारी नियुक्तियों में एक-एक के लिए दसियों लाख का लेन-देन होता है, और विपक्ष का यह आरोप बहुत ही सनसनीखेज भी है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ससुराल के शहर गोंदिया के कोई डेढ़ दर्जन लोग आरटीओ में नियुक्त किए गए हैं।
अधिक मांग वाले कॉलेजों के दाखिले में मध्यप्रदेश में भारी धांधली पहले ही सामने आ चुकी है और मेडिकल कॉलेज की भर्ती पुलिस की जांच और अदालत तक है, और उसमें भी बड़ी संख्या में लोग जेल पहुंच चुके हैं। करोड़ों-अरबों के ऐसे दाखिले-नियुक्ति के घोटाले से जनता का भरोसा लोकतंत्र पर से पूरी तरह खत्म हो जाता है। एक तो यह कि जो काबिल लोग हैं, वे न पढ़ाई का मौका पाते, और न नौकरी। जो रिश्वत देने के लायक हैं, या जिनकी राजनीतिक पहुंच है, वैसे ही लोग अगर सरकारी कुर्सियों पर काबिज होते हैं, वैसे ही लोग अगर मेडिकल कॉलेज पहुंचते हैं, तो देश और प्रदेश का भविष्य साफ दिखता है। ऐसे लोग अपने पूंजीनिवेश की वसूली के लिए आगे जाकर कैसा काम करेंगे यह जाहिर है। दूसरी तरफ गरीब और बेबस छात्र-छात्राएं, या बेरोजगार जब कॉलेज में सीट या सरकारी नौकरी की कुर्सी नहीं पाते, और वे जब इन जगहों को बिकते और नीलाम होते देखते हैं, तो उन्हें सरकार से उसी तरह की नफरत होती है, जैसी नफरत के चलते पूरे देश में लोगों ने यूपीए और कांग्रेस का सफाया कर दिया। मध्यप्रदेश में जिस तरह भाजपा का एक मंत्री इस सिलसिले में गिरफ्तार हुआ है, और बड़े-बड़े भाजपा-संबंधी जांच और शक के घेरे में हैं, उसका भुगतान मध्यप्रदेश में भाजपा को आज नहीं तो कल करना पड़ेगा।
न सिर्फ मध्यप्रदेश और न सिर्फ भाजपा की सरकार वाला राज्य, जहां कहीं भी सीटों और कुर्सियों की ऐसी बिक्री और नीलामी होगी, वहां-वहां सरकारें जाएंगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के अच्छे दिन आने का नारा लगा-लगाकर सत्ता पर आए हैं, और भाजपा पूरी जिंदगी से शुचिता और सुशासन का नारा लगाते आई है। अब मध्यप्रदेश में भ्रष्ट लोगों के अगर अच्छे दिन आए हैं, और सरकार का ऐसा हाल दिखाई पड़ रहा है, तो यह आने वाले बरसों के लिए भाजपा के लिए खतरे की घंटी से कम कुछ नहीं है। और बाकी प्रदेशों में भी चाहे जिस पार्टी की सरकार हो, अगर गरीबों के हक के साथ, काबिल लोगों के हक के साथ ऐसी बेइंसाफी होगी, तो वह आगे-पीछे पकड़ में भी आएगी, और ऐसा करने वाली सरकार सत्ता से भी जाएगी। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और इसके पीछे जिम्मेदार जो लोग भी हैं, जिस प्रदेश में भी हैं, जिस सरकार और पार्टी में हैं, उन सबको जेल जाना चाहिए। हम अभी कांग्रेस के आरोप या भाजपा की सफाई पर नहीं जा रहे, लेकिन हम यह मानते हैं कि मध्यप्रदेश का हाईकोर्ट जब अपनी निगरानी पुलिस के एक विशेष जांच दल से जांच करवा रहा है, तो वहां पर गरीबों के लूटे हुए हक के लुटेरों को सजा जरूर मिलेगी,  और बाकी प्रदेशों के लोगों को उससे एक नसीहत मिलेगी। 

आजकल: कोई दिलासा नहीं, और पहाड़ सी जिंदगी

23 जून 2014

सुनील कुमार

पिछले कुछ बरसों में हर हफ्ते का यह कॉलम हर तिमाही का भी नहीं हो पाया, और हर छमाही का भी नहीं। मन कई तरह के अलग-अलग कामों में भटकने लगता है, और लिखना छूट जाता है, और कभी पिक्सटून बनाने लगता है, तो कभी कुछ और काम करने लगता है। फिर पिछले कुछ बरसों में फेसबुक और ट्विटर पर अपने विचार लिखना अखबार में हर हफ्ते कॉलम लिखने के बजाय आसान इसलिए होता है कि कुछ दर्जन अक्षरों से कहीं भी बैठे हुए, किसी भी वक्त यह काम किया जा सकता है। एक बार फिर यह कोशिश शुरू कर रहा हूं कि किसी तरह हर हफ्ते यह कॉलम लिख सकूं। एकदम आखिरी दिन, सोमवार की दोपहर ही इसे लिखने की जिद महीनों तक इसे दूर खिसका देती है, लेकिन आखिरी पलों के पहले लिखने की आदत आ नहीं पाई। एक बार और हाथ आजमाकर देख रहा हूं।
कुछ सवाल अकसर परेशान करते हैं। चौराहों पर टै्रफिक की लालबत्ती पर भीख मांगते बच्चों, बूढ़ों, विकलांगों, या बीमारों को कुछ दिया जाए, या नहीं? यह फिक्र की जाए कि चौराहों पर पूरे वक्त डीजल के धुएं के बीच मांगते हुए लोगों की सेहत वहां बिगड़ती अधिक है, या वहां उनका पेट भरता है? छोटे बच्चों को, अपने खुद के दुधमुंहे बच्चों को, या भाड़े पर लाए गए किराए के बच्चों को गोद में ली हुई महिलाएं जब गाडिय़ों के बीच दौड़ती हैं, तो उन्हें कुछ सिक्के देना बेहतर है, या कि वहां न देकर उन्हें किसी और जगह की तरफ जाने को कहना ठीक है ताकि छोटे बच्चे गाडिय़ों के धुएं से बच सकें?
फिर कई बार यह भी लगता है कि क्या यह फिक्र सचमुच उन लोगों की सेहत की है, या कि उनकी गरीबी और बेहाली कुछ अधिक परेशान करती है, अपनी एसी गाड़ी के भीतर से उन्हें तपती धूप में देखते हुए?
यह भी लगता है कि चौराहों पर पहला हक किनका होना चाहिए, उनका जो सड़कों का टैक्स देते हैं, या उनका जो कि सड़कों पर पेट भरने का रास्ता ढूंढते हैं? इसी तरह रेलवे प्लेटफॉर्म से लेकर बस अड्डे तक, और बगीचों तक यह लगता है कि वहां भूखे और गंदे दिखते बेघर और गरीब लोगों का जिंदा रहने का हक अधिक जरूरी है, या कि एक साफ-सुथरा नजारा? और फिर बेघर और बेसहारा लोग चौराहों से, फुटपाथों से, स्टेशन और बगीचों से हटा दिए जाएं, तो वे रहेंगे कहां? खाएंगे कहां? और कमाएंगे कहां?
ऐसे में लगता है कि बीमार और विचलित लोगों से लेकर बूढ़ों और बेसहारा बच्चों तक के लिए सड़क और स्टेशन से बेहतर कोई इंतजाम समाज और सरकार को करना चाहिए, ताकि वे लोग कम से कम सबसे कम जरूरतों वाले इंसान की तरह तो जी सकें। उनको कहीं नहलाया जा सके, कहीं पर वे सो सकें, खाना खा सकें, और मरने तक बिना जुर्म किए रह सकें। यह जिम्मेदारी आखिर होनी किसकी चाहिए? सरकार की, जिसकी कि हर बात के लिए जिम्मेदारी होती ही है, या कि समाज की, जो कि कई मामलों में खुद होकर कुछ जिम्मेदारियां उठाता भी है।
ऐसे बहुत से सवाल तब परेशान करते हैं जब कोई बीमार, जख्मी, या टूटा हुआ हाथ कार के शीशे को खटखटाता है, और कुछ मांगता है। ऐसे सवाल तब भी परेशान करते हैं जब स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर कुछ खाने-पीने की सोचें और उसी वक्त भूखे पेटों पर टिके हुए कुछ सवालिया चेहरे आकर सामने खड़े हो जाएं। लेकिन आगे-पीछे ये सवाल हवा में घुल भी जाते हैं, जब ऐसे लोग नजरों से दूर हो जाते हैं।
सरकार के कुछ लोगों का यह भी कहना रहता है कि बेसहारा लोगों को जब ले जाकर उनके लिए बनाए गए किसी आश्रम में रखा जाता है, तो वे वहां के नियम-कायदों के तहत अधिक वक्त तक रहना नहीं चाहते और वे बाहर निकलकर अपनी मर्जी की जिंदगी जीना चाहते हैं, अधिक कमाना चाहते हैं, या भूखे पेट भी अपने सिर पर अपना खुद का आसमान चाहते हैं।
हिंदुस्तान में ही नहीं, दुनिया के सबसे विकसित देशों में से एक अमरीका में फुटपाथों पर बिखरे हुए इस तरह के लोग वहां की जिंदगी के आराम के सामने सवाल की तरह खड़े हो जाते हैं। कभी किसी बगीचे पर ऐसे लोगों की भीड़ पहुंचकर पूरे के पूरे बगीचे पर कब्जा कर लेती है और यह साबित करती है कि बगीचा घरबार वाले लोगों के मुकाबले बेघर लोगों के लिए अधिक जरूरी है, और उनका पहला हक जिंदा रहने के लिए बगीचे पर कब्जा करना है, बजाय लोगों के टहलने और घूमने के।
इसी तर्क के आधार पर हिंदुस्तान में भी रेलवे स्टेशनों पर पहला हक उनका माना जा सकता है, जिनके पास जिंदा रहने को और कोई जगह नहीं है, और स्टेशन जिन्हें पानी, पखाना, रौशनी, छत, और पक्की फर्श देता है।
हिंदुस्तान एक तरफ तो शहरी ढांचों को अधिक से अधिक संपन्न बनाते हुए अपने-आपको अब विकसित देश गिनता है, लेकिन दूसरी तरफ शहरी समाज में ही जो सबसे कमजोर लोग हैं, ऐसे शायद आबादी के एक फीसदी से भी कम लोगों के लिए सामाजिक या सरकारी पहल दिखाई नहीं पड़ती। ऐसे लोग किसी एक टोली की शक्ल में वोटों का ग_ा नहीं रहते, इसलिए उनकी कोई गिनती नहीं रहती। वे इतने बिखरे रहते हैं, इतने बेघर रहते हैं कि उनके पास कोई शिनाख्त भी नहीं होती। किसी भी शहर में अगर ऐसे बेघर लोग एक साथ रहते, तो शायद एक वार्ड बन जाते, और उनके वोटों की कीमत एकदम से लोगों को दिखने लगती।
बात छोटी है, बहुत मामूली भी है, बदमजा भी है, लेकिन ऐसी जिंदगियां चाहे जितनी भी हों, उनके नजरिए से देखें तो पहाड़ सी लंबी जिंदगी अगर बिना छत बिना किसी सहारे के काटना हो, तो उनकी जगह अपने को रखकर सोचें कि हम कितने दिन ऐसे काट सकेंगे? दुनिया में अलग-अलग कई लोगों ने यह कोशिश की है कि एक हफ्ते, एक महीने, या एक बरस अपने देश के सबसे गरीब की तरह गुजारकर देखें कि वे जिंदगी कैसे काट सकते हैं। लेकिन ऐसे प्रयोगों में भी दरअसल लोगों के सामने एक यह दिलासा तो रहता ही है कि आने वाले उतने दिनों के बाद वे फिर अपनी जिंदगी में लौटने वाले हैं। जो असली बेसहारा होते हैं, उनके पास ऐसा कोई दिलासा नहीं होता, और कई बार पहाड़ सी लंबी जिंदगी होती है, और होता है खाई की तरह गहरा भूखा पेट, बदन की चमड़ी पर बिखरी कोई बीमारी, और उसके खासे भीतर छलनी फेंफड़े। इनमें से बहुत से लोगों के तन-मन, अलग-अलग दर्जों तक विचलित रहते हैं, और किसी मानसिक चिकित्सा से ठीक होने की कोई संभावना तक टटोलने की गुंजाइश भी पहाड़ सी लंबी इन जिंदगियों में नहीं होतीं। ऐसे सबसे कमजोर तबकों को कारों की अगल-बगल की खिड़कियों से अनदेखा करके देश सामने की खिड़की से देखते हुए किस तरफ आगे बढ़ सकता है?

गंगा को संकुचित-धार्मिक नहीं, वैज्ञानिक नजरिए की जरूरत

संपादकीय
22 जून 2014

दिल्ली की खबर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की गंगा-सफाई की महत्वाकांक्षी सोच के मुताबिक केंद्रीय सिंचाई मंत्री उमा भारती एक बैठक बुलाने जा रही हैं जिसमें नदियों के मामले से जुड़े हुए विभागों और विशेषज्ञों के साथ-साथ 'साधु-संतोंÓ को बुलाने की बात भी उमा भारती ने की है। गंगा की सफाई और उसके किनारे के इलाकों में सुधार के मुद्दे तकनीकी और वैज्ञानिक तो हैं ही, वे गंगा तट की संस्कृति और सभ्यता से भी जुड़े हुए हैं, और जिन लोगों को उमा भारती साधु-संत के दर्ज में रखकर इस गंगा-मंथन में बुलाना चाहती हैं, वे भी गंगा तट के धार्मिक रीति-रिवाजों में दखल रखते हैं, और इसलिए इस विचार-मंथन में उनकी मौजूदगी महज धार्मिक नहीं कही जा सकती। लेकिन उमा भारती का पुराना इतिहास यह बताता है कि मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जिस तरह मुख्यमंत्री के दफ्तर की मेज पर ही एक मंदिर बना डाला था, जिस तरह उन्होंने मुख्यमंत्री निवास पर एक पक्का मंदिर बनवा लिया था, और जिस तरह वे अयोध्या से लेकर अब तक लगातार धर्म को, आस्था को लोकतंत्र और कानून से ऊपर मानती हैं, उससे उनके गंगा-मंथन को लेकर कई तरह की फिक्र खड़ी होती है।
यह बात सही है कि धर्म और सामाजिक रीति-रिवाज पर काबू पाकर, उनमें से नुकसानदेह हिस्सों को सुधारकर अगर पर्यावरण को बचाया जा सकता है, तो उसके लिए धर्म से जुड़े लोगों की मदद लेने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन आज मोदी सरकार के तहत देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी की रिपोर्ट को लेकर जिस तरह देश के सारे सामाजिक, गैरसरकारी संगठनों, और सामाजिक आंदोलनकारियों के विदेशी अनुदान को शक के घेरे में लाकर उनके लिए एक दिक्कत खड़ी की गई है, उसका नुकसान भी कई मोर्चों पर होगा। हमें इसमें कोई शक नहीं है कि हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को, यहां के विकास को जो लोग रोकना चाहते होंगे, वैसे विदेशी कारोबारी, या विदेशी सरकारें-संगठन, हिंदुस्तानी एनजीओ को अनुदान देकर अपना मकसद पूरा करवा सकते होंगे। लेकिन सिर्फ शक के आधार पर अगर ऐसे तमाम आंदोलनों की विश्वसनीयता को खत्म करके, सामाजिक आंदोलन बिना बूट कुचल दिया जाएगा, तो उससे सरकार पर से जवाबदेही की जिम्मेदारी खत्म होगी, और उससे देश का बड़ा नुकसान भी होगा। लोकतंत्र में सामाजिक आंदोलनों का अपना इस्तेमाल रहता है, और वैचारिक विविधता ही किसी भी तरह की लोकतांत्रिक-मंथन के लिए जरूरी भी होती है। ऐसे में आज केंद्र सरकार की पसंद के साधु-संत उमा भारती के गंगा-मंथन की दिशा को मोडऩे के हकदार अगर बनाए जाएंगे, तो उससे एक बहुत ही तकनीकी-वैज्ञानिक मुद्दा पटरी से ही उतर जाएगा। आज गंगा की सफाई, और उसके किनारों का सुधार पर्यावरण, शहरी विकास, और अर्थव्यवस्था, इन प्राथमिकताओं के आधार पर होना चाहिए, और धार्मिक-सामाजिक पहलू इन पर हावी नहीं होने चाहिए।
अभी हम यहां पर सामाजिक संगठनों, आंदोलनों, और कार्यकर्ताओं के खिलाफ देश में खड़े किए जा रहे एक नए शक के मुद्दे पर अपनी पूरी बात नहीं लिख रहे हैं, क्योंकि हम गंगा पर लिखना चाह रहे हैं। गंगा का इतिहास हिंदू धर्म के इतिहास के और बहुत पहले का है। और गंगा के किनारे विकसित सभ्यता, संस्कृति, बसाहट और अर्थव्यवस्था की दिशा को आज एकाएक नहीं मोड़ा जा सकता। और यह अपने-आपमें एक बहुत भयानक चूक होगी, अगर गंगा को हिंदू धर्म और संस्कृति तक सीमित रखकर कोई भी योजना बनाई जाएगी। देश के सबसे महान धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक नेता, जवाहर लाल नेहरू अपने वक्त पर गंगा को लेकर भावनाओं से लबालब हो जाते थे, और गंगा के महत्व पर अगर किसी ने सबसे गहरी सोच के साथ, सबसे वजनदार बातें लिखी हैं, तो वे शायद नेहरू ने ही लिखी हैं। आज मोदी सरकार को भी गंगा को हिंदुत्व से परे इस देश की सभ्यता की सबसे विशाल धारा, और देश की सबसे बड़ी दौलत भी, मानकर चलना होगा, और एक लोकतांत्रिक-आधुनिक सोच के साथ गंगा पर काम करना होगा।

चुनाव के मोदी के अच्छे दिन तो गए, लेकिन जनता के अच्छे दिन अभी आए नहीं

संपादकीय
21 जून 2014
मोदी सरकार का पहला बड़ा कड़वा फैसला कल आया जब रेल के मुसाफिर किराए और माल भाड़े में एक साथ लंबी-चौड़ी बढ़ोत्तरी कर दी गई। पिछले दस बरसों में लोगों को यह याद ही नहीं रह गया था कि रेलभाड़ा बढ़ा करता है, और लोग यह मानकर चल रहे थे कि टिकटें कभी नहीं बढ़ेंगी। लेकिन देश की मौजूदा हालत को देखते हुए जब बजट और हिसाब-किताब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बेहतर वित्त मंत्री अरूण जेटली तक के सामने है, तब अपने ही सारे नारों को भूलकर यह सरकार देश की अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन लाने पर बेबस हो गई है, बजाय आनन-फानन जनता के अच्छे दिन लाने के। यह एक ऐतिहासिक हकीकत है कि नारों का सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं होता है, इसलिए जब नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता को यह भरोसा बंधाया था कि अच्छे दिन आने वाले हैं तो वह बात नारा अधिक, उसका आने वाले दिनों से कोई लेना-देना नहीं था। मोदी की नीयत को अगर ईमानदार भी मानें, तो वह इतनी ही ईमानदार थी कि वे सरकार को मेहनत और काबिलीयत से चलाएंगे, भ्रष्टाचार घटाएंगे और सरकार का अहंकार कम करेंगे। उस मोर्चे पर तो वे कुछ कर रहे हैं, लेकिन लोगों को यह एहसास बिल्कुल नहीं था कि सीएम रहते जो मोदी बजट के ठीक पहले रेलभाड़ा बढ़ाने के खिलाफ पीएम को चि_ी लिखकर विरोध कर रहे थे, वे आज पीएम बनकर ठीक वही काम खुद भी करेंगे। लेकिन हम उनके इस फैसले से सरकार के कामकाज या आने वाले अच्छे और बुरे दिन का बहुत अंदाज नहीं लगा रहे, क्योंकि रेलभाड़े से परे भी अनगिनत चुनौतियां इस सरकार के सामने हैं। प्याज से लेकर ब्याज तक, देश की बहुत सी उम्मीदें हैं, और उनका पूरा होना या नाउम्मीदी में बदलना आने वाले दिन ही बताएंगे। दरअसल नरेन्द्र मोदी को लेकर देश और दुनिया में जो उम्मीदें हैं, उनको पूरा करने के लिए जादू की एक छड़ी से कम कुछ नहीं चलेगा, और इसीलिए बड़े-बूढ़े यह कह गए हैं कि अधिक बड़ी बातें बोलने के पहले उनको तौल लेना चाहिए। आने वाले दिनों में अगर डीजल और पेट्रोल भी महंगा होते हैं, तो जनता की बेचैनी और बुरी तरह बढ़ जाएगी।
मोदी सरकार की कोशिशों को अभी और वक्त मिलना बाकी है, और अगले किसी चुनाव में उनको अपने कामकाज को साबित करने के लिए अभी और मौका मिलेगा। इसलिए आज उनके कल के नारों को लेकर आज लतीफे बन रहे हैं, वे बहुत अधिक मायने नहीं रखते, और उसके बजाय किफायत और कड़ाई की उनकी नीयत अधिक महत्वपूर्ण है। यह सरकार दो बिल्कुल अलग-अलग प्राथमिकताओं के बीच अपने आपको खिंचता हुआ पा रही होगी। जिस कारोबारी दुनिया को मोदी-राज में अपने पूंजीनिवेश से कमाई बढऩे की उम्मीद है, वह भी टकटकी लगाकर बजट की राह देख रही है, और जिस गरीब जनता से ही एनडीए ऐसा ऐतिहासिक बहुमत पा सकी है, उस गरीब जनता को अच्छे दिन आने की बड़ी उम्मीदें हैं। पिछले पूरे दस बरस देश में एनडीए विपक्ष में रहते हुए जनता को लुभाने की जितनी बातें कहते आया था, जितने किस्म के टैक्स बोझ के लिए यूपीए सरकार को कोसते आया था, वे तमाम पुरानी कतरनें आज मोदी सरकार के सामने सवाल बनकर खड़ी हो गई हैं। विपक्ष के अच्छे दिन अब जा चुके हैं और सत्ता के पड़े दिन आ चुके हैं। ऐसे में आज नरेन्द्र मोदी के सामने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक समुदाय, मंदिर और मस्जिद बड़े मुद्दे नहीं रह गए हैं, लोगों की रोजी-रोटी और उनका पेट ही आज सबसे बड़ा मुद्दा है, और इस मोर्चे पर काम, चुनावी सभाओं के मोर्चे के मुकाबले बहुत अधिक कड़ा है। दस बरस के यूपीए सरकार के खराब हाल के चलते चुनाव में मोदी के बहुत अच्छे दिन, वे अब जा चुके हैं। अब कड़वी हकीकत एक कसौटी बनकर उनको कसने जा रही है। आने वाले दिन यही देखना है कि जनता कुछ राहत पाती है, या भूखे पेट, गरीबी में, कुछ कड़वे लतीफे बनाती है। 

इराक में बंधक हिंदुस्तानी मोदी के सामने बड़ी चुनौती

20 जून 14
संपादकीय

मोदी सरकार ने काम संभाला ही था कि इराक में इस्लामी या मुस्लिम आतंकियों के कब्जे में फंसे हुए दर्जनों हिन्दुस्तानियों को छुड़ाने की मुसीबत आ खड़ी हुई। यह मुद्दा अधिक नाजुक इसलिए है कि पड़ोस या आसपास के दूसरे देशों में जब किसी धर्म के नाम पर होते आतंकी हमलों की बात आती है, तो उसका साया हिंदुस्तान पर भी पड़ता है, और यहां भी कुछ तबकों के लोग यह सोचा समझा सवाल उठाते हैं कि सभी आतंकी एक ही मजहब के क्यों होते हैं? लगे हाथों इस चर्चा में यह भी याद करने की जरूरत है कि किस तरह जब एनडीए की पिछली सरकार थी तो अफगानिस्तान के कंधार में आतंकियों ने भारत से अपहरण करके ले जाए गए एक मुसाफिर विमान को बंधक बनाकर रखा था, और हिंदुस्तानी लोगों को जिंदा छोडऩे के एवज में भारत के तब के विदेश मंत्री जसवंत सिंह को भारतीय जेलों में बंद आतंकियों को लेकर कंधार जाना पड़ा था। उस वक्त की तोहमत आज तक एनडीए पर से नहीं हटी है, और अब फिर कुछ दर्जन हिंदुस्तानी इराक में वैसे ही मुस्लिम आतंकियों के कब्जे में हैं। 
अभी हम इस घटना की बारीकियों पर कुछ कहना नहीं चाहते क्योंकि रिहाई के लिए बातचीत अभी चल ही रही है, लेकिन भारत को अपने पड़ोसी देशों के अंदरूनी मामलों से किस तरह का फर्क पड़ता है यह सोचने की जरूरत है। एक तरफ जो म्यांमार है, वहां पर बौद्ध लोगों ने जिस तरह मुस्लिम समुदाय को मारा, उसके जवाब में हिंदुस्तानी की जमीन पर मुस्लिम आतंकियों ने बोधगया पर हमला किया। इस किस्म का खतरा अभी भारत से टला भी नहीं है क्योंकि इन दोनों धर्मों के पर्याप्त लोग हिंदुस्तान में बसे हुए हैं, और दूसरी तरफ श्रीलंका में एक बार फिर बौद्ध और मुस्लिम समुदायों के बीच साम्प्रदायिक दंगे हो रहे हैं। श्रीलंका को लेकर भारत के तमिलनाडु में पहले से तमिल-हितों को लेकर एक तनाव चलते ही रहता है, बांग्लादेश को लेकर असम और पश्चिम बंगाल में समस्या बनी रहती है, वहां से आकर गैरकानूनी रूप से रहने वाले लोगों की। इस बीच में अब अगर इराक में मुस्लिम आतंकियों की पकड़ से हिंदुस्तानी कामगारों के छूटने में देर होती है, तो भारत में कुछ तबके मुस्लिमों को लेकर कुछ सवाल उठा सकते हैं। इस तरह भारत के आसपास के देशों में जो कुछ होता है, या भारत के लोगों के साथ दुनिया में कहीं भी कुछ होता है, तो उसका असर भारत पर पड़ता है।
हाल की ही एक अंतरराष्ट्रीय मिसाल है कि किस तरह अफगानिस्तान में बरसों से बंधक बनाकर रखे गए एक अमरीकी सैनिक को छुड़ाने के लिए अमरीकी सरकार ने अपने देश में कैद कई अफगान-आतंकियों को छोड़ा है। अब ऐसी मिसालों के बीच भारत की सरकार एक अभूतपूर्व तनाव में आ गई है, उसके पास अपने लोगों को छुड़ाने के लिए आतंकियों की कुछ बातें मानने की नौबत भी आ सकती है, और इसमें नाकामयाब होने पर मोदी सरकार आम जनता की नाराजगी की शिकार भी हो सकती है। हम फिक्र के साथ इस नौबत पर नजर रखे हुए हैं, लेकिन सच तो यह है कि हिंद महासागर क्षेत्र के इन तमाम देशों में लोकतांत्रिक, राजनीतिक, धार्मिक, और आर्थिक स्थिरता बढ़े बिना आतंक और हमले घटना नहीं हैं, फिर वे चाहे एक देश के भीतर ही हों, या फिर दूसरे देश पर, या उनके लोगों पर हों। इस इलाके का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते भारत पर जिम्मेदारी भी सबसे बड़ी आती है, और मोदी के सामने यह पहले महीने की सबसे बड़ी चुनौती है।

मनोनयन का कार्यकाल सरकार के साथ ही खत्म होना चाहिए

19 जून 2014
संपादकीय
मोदी सरकार ने कई राज्यपालों से इस्तीफा मांगा, उनमें से कुछ ने दिया, कुछ ने मना कर दिया, और कुछ के बारे में अभी अटकलें जारी हैं। जिन लोगों के बारे में ऐसी खबरें नहीं आई थीं कि उनसे इस्तीफा मांगा गया है, उनमें से एक, छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त ने खुद होकर कल रात इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही अब नए राज्यपाल तैनात होने का सिलसिला शुरू होगा, और इन लोगों को मोदी सरकार का पूरा कार्यकाल मिलेगा। 
यह विवाद और बहस हमेशा ही शुरू होते हैं, जब कोई सरकार आती है, और वह पुरानी सरकार के मनोनीत लोगों से इस्तीफे मांगती है। ऐसा सिर्फ राजभवनों के मामले में नहीं होता, बहुत से ऐसे संवैधानिक आयोग होते हैं, दूसरे सरकारी ओहदे होते हैं, जिन पर सरकारें अपनी मर्जी से लोगों को बिठाती हैं। हमारा सोचना है कि किसी भी सरकार को अपनी मर्जी से किए जाने वाले ऐसे मनोनयन सिर्फ अपने कार्यकाल तक ही करने का हक रहना चाहिए। मनोनीत संवैधानिक पदों का कार्यकाल पूरे पांच बरस का रखने की कोई जरूरत नहीं होती, ऐसी कुर्सियों पर लोग आते-जाते रह सकते हैं। क्योंकि कई दूसरी वजहों से मनोनीत लोग इस्तीफा देते हैं, या काम के लायक न रह जाने पर उनकी जगह दूसरों को लाया जाता है। देश में कोई भी कुर्सी ऐसी नहीं होती जिस पर लोगों के विकल्प न हों। भारत के राष्ट्रपति चूंकि चुनाव की एक प्रक्रिया से जीतकर आते हैं, इसलिए उनका तो अपना कार्यकाल पूरा करना ठीक है, लेकिन राज्यपाल, मानवाधिकार आयोग, और इस तरह के सैकड़ों और मनोनयन कोई भी केंद्र सरकार करती है, और इन सभी को सत्ता बदलने के साथ अपने इस्तीफे दे देने चाहिए। 
लोकतंत्र में जहां किसी सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार को अपनी मर्जी से लोगों को मनोनीत करने का हक होता है, वैसे में विपरीत विचारों वाली पिछली पार्टी या गठबंधन की सरकार के मनोनीत लोगों को इस तकाजे को खुद होकर भी समझना चाहिए। हम इस बात के हिमायती बिल्कुल नहीं हैं कि सत्ता बदलने के साथ सभी संवैधानिक पदों पर नई सत्ता की विचारधारा के साथ प्रतिबद्ध लोग ही आएं, लेकिन जब ऐसे लोगों का मनोनयन वैचारिक प्रतिबद्धता, या राजनीतिक दल की सदस्यता के आधार पर ही होता है, तो ऐसे लोगों को नई सरकार के तहत नये लोगों के लिए जगह खाली करनी चाहिए। राजनीति से परे के, सरकारी सेवाओं के, या फौज के जो लोग राज्यपाल बनाए जाते हैं, उनके मामले थोड़े से अलग हो सकते हैं, लेकिन उनका मनोनयन भी किसी गैरराजनीतिक, तटस्थ चयन प्रक्रिया के तहत हुआ होता, तो उनका कुर्सियों पर बना रहना जायज होता। लेकिन भारत में ऐसी नियुक्तियों के लिए किसी तरह की चयन प्रक्रिया नहीं है, और हमको पिछले बरसों में महिला आयोग के सदस्यों के बारे में, देश के कुछ राज्यपालों के बारे में यह लिखना पड़ा कि वे अपने पिछले राजनीतिक दल के साथ प्रतिबद्धता दिखाते हुए अपने ओहदे की इज्जत घटा रहे हैं। 
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त यहां आने के बाद से अब तक बड़ी जिम्मेदारी से, और बिना पक्षपात काम कर रहे थे। कुछ महीने पहले कांगे्रस के ही लोगों ने यूपीए सरकार के रहते हुए शेखर दत्त के खिलाफ केंद्र सरकार से शिकायतें की थीं, क्योंकि उनको लग रहा था कि शेखर दत्त राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ कांगे्रस की मर्जी की कार्रवाई नहीं कर रहे हैं। उनकी ऐसी साख और निष्पक्षता के बावजूद उन्होंने आज अगर सलाह मिलने पर, या अपनी मर्जी से इस्तीफा दिया है तो हम अपनी व्यापक सोच के मुताबिक इस इस्तीफे को सही मानते हैं। उनके जाने से इस राज्य का एक नुकसान तो होगा, लेकिन सैद्धांतिक रूप से सही परंपराएं कायम करने के लिए लोकतंत्र को ऐसे कई नुकसान झेलने भी पड़ते हैं। मानवाधिकार आयोग सहित दूसरे मनोनीत ओहदों से यूपीए के मनोनीत लोगों को इस्तीफे देने चाहिए। हम भारतीय लोकतंत्र में ऐसी स्थाई व्यवस्था चाहते हैं जिसके तहत इस तरह के तमाम मनोनीत लोगों का कार्यकाल मनोनयन करने वाली सरकार के कार्यकाल के साथ ही खत्म हो जाना चाहिए। 

Bat ke bat, बात की बात,

18 june 2014

चारों तरफ की तबाही के पीछे सिर्फ अमरीका है...

18 जून 2014
संपादकीय
भारत के पड़ोस के पाकिस्तान, और उसके बगल के इराक, अफगानिस्तान जैसे मुस्लिम देशों में इस्लामी आतंक आसमान पर पहुंचा हुआ है। मजहब के नाम पर वहां के आतंकी दस्ते खुद भी जान दे रहे हैं, और फौज से लेकर पुलिस तक, पोलियो ड्रॉप्स देने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों से लेकर आतंकविरोधी आम नागरिकों तक, सब पर बुरी तरह हमले हो रहे हैं, सैकड़ों लोग आए दिन मारे जा रहे हैं, और हमारे जैसे अखबारनवीसों के लिए कई बार यह दिक्कत आ खड़ी होती है कि किस खबर के साथ तबाही की कौन सी तस्वीर ताजा है, और कौन सी तस्वीर दो-तीन दिन पहले की बासी तस्वीर है। ऐसे में खबर और तस्वीर को मिलाकर छापने में चूक होने का खतरा भी रहता है। मौत का यह मंजर भयानक है, और अधिक भयानक यह इसलिए है कि इसके पीछे जो लोग हैं वो मजहब का नाम लेकर, खुदा के नाम पर यह सब कर रहे हैं। इन पर पाकिस्तान में पिछले दो-तीन दिनों में फौजी कार्रवाई शुरू हुई है, लेकिन इसमें इतने बरस देर हो चुकी है, कि हालात बहुत बुरी तरह बेकाबू हैं। दूसरी तरफ इराक में अमरीका फिर फौजी कार्रवाई की सोच रहा है, क्योंकि वहां पर आतंकी दस्ते राजधानी के करीब तक पहुंच रहे हैं, सैकड़ों लोगों को उन्होंने एक साथ बांधकर गोलियों से भून डाला है, और स्थानीय सरकार के काबू में कुछ भी नहीं रह गया है। 
लेकिन हाल के दो-चार बरसों के पहले के इतिहास को थोड़ा सा जानने-समझने वाले लोगों को अच्छी तरह याद है कि किस तरह पाकिस्तान, अफगानिस्तान में, और बाकी अरब देशों में भी जगह-जगह अमरीका ने खुलकर कट्टरपंथियों का, हिंसक आतंकियों का साथ दिया, और वह खुद दुनिया में उनका खासा बड़ा शिकार भी हो गया। कट्टरपंथ को बढ़ावा देते-देते अमरीका ने पूरी दुनिया में सामाजिक सुधार की संभावनाओं को कत्ल भी कर दिया और ईरान से लेकर अफगानिस्तान तक, और टर्की तक बहुत से देश इसके गवाह हैं जहां पर चौथाई या आधी सदी पहले समाज बहुत उदार था, और आज वहां पर कट्टरपंथ ने समाज की सोच को पत्थरयुग में भेजने का काम किया है। 
अमरीका ने एक तरफ तो सोवियत वामपंथ को खदेडऩे के लिए, दूसरी तरफ तेल के कुंओं वाले देशों पर कब्जा करने के लिए, और तीसरी तरफ चीन-भारत के करीब अपने फौजी अड्डे बढ़ाने के लिए इन तमाम देशों ने खुफिया दखल दी, फौजी दखल दी, और बागियों को बढ़ावा दिया। नतीजा यह है कि यह पूरा इलाका अमरीकी साजिश से उबर ही नहीं पाया, और यहां की सरकारें अमरीकी मदद की मोहताज होती चली गईं, और दूसरी तरफ अमरीकी हमलों के सामने उनके पास मुंह खोलने की ताकत भी नहीं बची। अमरीका ने पिछले दस बरसों में दस लाख से अधिक लोगों को अपनी बमबारी और फौजी कार्रवाई से पाकिस्तान, इराक, अफगानिस्तान में मार डाला है, और दूसरी तरफ फिलीस्तीनियों पर जुल्म जारी रखने के लिए अमरीका हर दिन लाखों अमरीकी डॉलर इजराईल को दे रहा है। 
दुनिया का सबसे ताकतवर माफिया बना हुआ है अमरीका जिस मजहबी साजिश को आगे बढ़ाना चाहता था, वह उसमें कामयाब हुआ है, और अमरीकी सरकार के साथ मिलकर दुनिया के हथियारों के सौदागर अपनी ग्राहकी इन देशों में बढ़ा रहे हैं, सरकारें उनसे सीधे खरीद रही है, और हथियारबंद बागी अमरीकी सरकार के पैसों से हथियार पा रहे हैं। सीरिया और इजिप्ट तक यह तबाही फैल चुकी है, और दूसरी तरफ देखें तो अफ्रीका में नाइजीरिया में इस्लाम के नाम पर बोकोहराम जैसे भयानक धर्मान्ध हथियारबंद मुजरिम बच्चियों को अगुवा करके उनसे बलात्कार कर रहे हैं, और अमरीका वहां पर फौजी दखल देने के लिए जमीन तैयार करने में लगा हुआ है। आज पूरी दुनिया का माहौल बहुत साफ-साफ इस तरह का दिखता है कि बाकी देश कब तक या तो अमरीकी गिरोह में शामिल होने से बचते हैं, या उसकी बमबारी से बचते हैं, या उसके बढ़ाए हुए बागियों के खड़े किए हुए गृहयुद्ध से बचते हैं। अमरीका से बचना अब बाकी दुनिया के लिए मुमकिन नहीं दिख रहा है, और लोगों के सामने यह विकल्प बहुत साफ है कि या तो ब्रिटेन और योरप के दूसरे देशों की तरह उसके गिरोह में शामिल हों, या फिर उसके बम झेलने के लिए तैयार रहें। लोकतंत्र के नाम पर जो अमरीकी पाखंड चलता है, उसमें अमरीका दुनिया का अकेला तानाशाह बनकर रहना चाहता है, और उसे वह लोकतंत्र और मानवाधिकार साबित करता है। इसके साथ-साथ अमरीका ने जिस तरह इस्लाम को बुरा दिखाने, और हिंसक साबित करके बदनाम करने की साजिश की है, वह भी बहुत जाहिर है, और इससे बचने का दुनिया के पास कोई रास्ता भी नहीं दिख रहा है। 

Bat ke bat, बात की बात,

17 june 2104

Bat ke bat, बात की बात,

16 june 2014


जापानियों से अपनी तुलना करें तो हिंदुस्तानी गटर में डूब मरें

17 जून 14
संपादकीय
ब्राजील में चल रहे विश्वकप फुटबॉल की एक तस्वीर है जिसमें मैच हार जाने के बाद जापान के दर्शकों को स्टेडियम के अपने पूरे हिस्से से कचरा उठाते देखा जा सकता है। इस खबर के साथ यह जानकारी भी है कि जापान में मैचों के बाद यह आम सांस्कृतिक परंपरा है। दूसरी तरफ मुंबई की एक खबर है कि सड़क पर कार से कूड़ा फेंकने वाले बददिमाग रईसों को जाकर उनकी गलती बताने वाले को उन लोगों ने किस बुरी तरह पीटा है। हमने अभी लगातार तस्वीरें छापी हैं कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के रेलवे स्टेशन पर किस तरह की गंदगी रहती है कि लोग नल से पानी न भर सकें, और मजबूरी में बोतलें खरीदें। महीनों से हर अखबार में इस राजधानी की खबरें छप रही हैं कि किस तरह पूरा शहर घूरा बना हुआ है, और म्युनिसिपल सफाई नहीं करवा पा रही है।
अब जापानियों की मिसाल को लें, तो क्या सचमुच हर कचरे को साफ करने के लिए म्युनिसिपल की जरूरत पडऩी चाहिए? लोग आसपास का कचरा उठाकर कूड़ेदान में फेंकें, वैसी जापानियत की उम्मीद हम अपनी जिंदगी में हिंदुस्तान जैसे गंदे देश में नहीं करते, लेकिन कम से कम अपने खुद के कूड़े को कूड़ेदार या घूरे में फेंकना भी जिन लोगों से नहीं होता, उन लोगों को यह अंदाज ही नहीं है कि नालियों और गटर में उतरकर इंसानों को किस तरह कचरा निकालना पड़ता है। हमारा यह पुख्ता अंदाज है कि कूड़ा पैदा करने वाले रईसों को अगर एक बार ऐसे गटर में उतरना पड़े, तो उससे बचने के लिए वे अपनी दौलत का एक खासा बड़ा हिस्सा देने को तैयार हो जाएंगे। जो लोग दूसरे इंसानों को गटर में उतारने के लिए इस तरह से कूड़ा फेंकते हैं, नालियों को जाम कर देते हैं, वे इंसान किसी सभ्य समाज में रहने के लायक नहीं हैं, दिक्कत यह है कि पैसे वालों को हिंदुस्तानी जुबान में बड़ा आदमी या अच्छा आदमी कहा जाता है। जबकि पैसों का इन दोनों ही खूबियों से कोई लेना-देना नहीं होता, और हमारा अंदाज तो यह है कि पैसा अधिकतर लोगों को उनकी जिम्मेदारी से दूर कर देता है, और उन्हें दूसरों के हक छीन लेने की खुशफहमी दे देता है। कारों से जो लोग सड़कों पर अपना कचरा फेंकते हैं, वे बड़ी कारों के बावजूद बड़े लोग नहीं होते, वे बहुत ही छोटी समझ वाले घटिया लोग होते हैं। 
हिंदुस्तान में लोगों को सामाजिक जिम्मेदारी सिखाने की बहुत जरूरत है। हर किसी को अपने हक का बहुत ख्याल है, और दूसरों की जिम्मेदारी का भी उतना ही। लेकिन हिंदुस्तानियों से अगर पूछा जाए कि दूसरों के हक, और अपनी खुद की जिम्मेदारी के बारे में उनकी क्या सोच है, तो इस बारे में उनको मानो सिखाया ही नहीं जाता है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। कुछ लोग अपनी आपराधिक लापरवाही और बेफिक्री के चलते दूसरे लोगों को गटर में उतरने पर मजबूर करें, तो ऐसे लोगों के खिलाफ बड़े जुर्माने और सजा का इंतजाम होना चाहिए। कोई भी समाज इतनी गंदगी के साथ नहीं जी सकता, और हिंदुस्तान में अधिक कचरा पैदा करने वाला संपन्न तबका शहरी ढांचे के भीतर गंदगी पैदा करने का जिम्मेदारी सबसे अधिक रहता है। इस बारे में सरकार और समाज दोनों को सोचना चाहिए। 

हेलमेट सिरों से फटने और कटने की आजादी तो छीनता है, लेकिन...

16 जून 2014
संपादकीय

छत्तीसगढ़ बनने के बाद हेलमेट लागू करने का हौसला जुटाने में यहां की सरकार को पूरे चौदह बरस लग गए। जब जोगी सरकार ने लागू करने की कोशिश की तो उस समय विपक्ष की गैरजिम्मेदारी निभा रही भारतीय जनता पार्टी को यह लगा था कि हेलमेट सिरों की फटने और कटने की आजादी को छीन रहा है। तुरंत सड़कों पर विरोध हुआ, मानो कि कांगे्रस सरकार होती कौन है लोगों के सिर फुड़वाने का हक छीनने वाली। फिर रमन सरकार आई, कुछ अधिक जिम्मेदारी से कांगे्रस के प्रदेश अध्यक्ष और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष, दोनों से हेलमेट लागू करने के लिए सहमति लेकर, उनसे अपील जारी करवाकर भाजपा सरकार ने हेलमेट लागू करने की कोशिश की, तो पूरे प्रदेश में सबसे अधिक राजधानी रायपुर की कांगे्रस पार्टी को इससे चोट पहुंची, और इसके शहर अध्यक्ष गाली-गलौच पर उतर आए। उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेताओं सहित सरकार के खिलाफ नारा बनाया कि हेलमेट के दलालों को, जूता मारो सालों को। 
यह कांगे्रस का अंदरूनी मामला था कि प्रदेश अध्यक्ष चरण दास महंत और नेता प्रतिपक्ष रवीन्द्र चौबे के खिलाफ उन्हीं की पार्टी के पदाधिकारी ऐसा नारा सार्वजनिक रूप से लगा रहे थे, लेकिन ऐसी गंदी और घटिया राजनीति से सबसे बड़ा नुकसान जनता का हुआ, जो कि गैरजिम्मेदार नेताओं के झांसे में आकर यह मान बैठी कि हेलमेट का नियम सरकार और पुलिस का है। पहले भाजपा के नेताओं ने, और फिर कांगे्रस के नेताओं ने विपक्ष की गैरजिम्मेदारी निभाते हुए जनता को ऐसे झांसे में रखा कि उनका सिर भी मानो सरकार की संपत्ति है, और उसके फूटने से उनका भला क्या नुकसान होगा। 
लोगों को बेवकूफ बनाकर अपनी राजनीति चलाने वाले घटिया दिमाग के छोटे-छोटे नेताओं के असर में एक समय अजीत जोगी ने हेलमेट लागू नहीं किया, और एक समय रमन सिंह ने। नतीजा यह हुआ कि यह राज्य बनने के बाद हजारों लोग सड़कों पर सिर्फ सिर फटने से मारे गए, जो कि हेलमेट रहने से बच सकते थे। हम यह देखकर हैरान होते हैं कि पूरे पांच बरस के लिए प्रदेश को चलाने की जिम्मेदारी और अधिकार जिस निर्वाचित सरकार को मिलते हैं, वह सरकार जरा से सड़कछाप नारों से सहमकर किस तरह मौत को खुली छूट दे देती है। इसी देश में बहुत से प्रदेशों में बहुत से शहरों में बरसों से हेलमेट इस तरह चल रहे हैं, कि वे लोगों को बोझ नहीं लगते, हिफाजत लगते हैं। राजस्थान के जयपुर जैसे शहर में बरसों से दुपहियों के पीछे बैठने वाली घाघरा और चुनरी-घूंघट वाली महिलाएं भी हेलमेट लगाकर बैठती हैं। 
हेलमेट से हादसों की नौबत में न सिर्फ सिर सलामत रहते हैं, बल्कि सड़कों पर लोगों को जिम्मेदारी का अहसास भी होता है, दुपहिया चलाते मोबाइल फोन पर बातचीत भी कम होती है, सामने चलती गाडिय़ों से थूकने वाले लोगों से बचाव भी होता है, धूल-धूप-धुएं से भी बचाव होता है, और तेज हवा से होने वाला नुकसान भी घटता है। सड़कों पर जिम्मेदारी दिखाने और अपने को बचाने के लिए यह अखबार बरसों से लगातार जनजागरण के लिए इश्तहार छापते आया है, और हमारी साप्ताहिक पत्रिका 'इतवारी अखबारÓ में भी हम इसके विज्ञापन बनाकर छापते हैं। लोगों को उल्लू बनाकर राजनीति चलाने का जुर्म अब खत्म होना चाहिए, दूसरी तरफ अपनी कानूनी जिम्मेदारी से कन्नी काटने की राज्य सरकार की लंबी कोशिश भी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के तीसरे कार्यकाल में जाकर तो बंद होनी चाहिए, और जनता को हिफाजत सिखाने के लिए बार-बार केंद्र सरकार ने, और सुप्रीम कोर्ट ने हेलमेट की जो सख्ती बताई है, कानून बनाया है, जुर्माना रखा है, उसे कड़ाई से लागू न करना हमारे हिसाब से बहुत बड़ी गैरजिम्मेदारी है, और राज्य सरकार को इसे खत्म करना चाहिए। 

बात इंसानियत, और कुछ हिंसानियत की भी

15 जून 2014
संपादकीय

हिंदुस्तानी मीडिया हिंसा की खबरों से भरा हुआ है। कई लोग लिखते हैं कि अखबार के पन्ने से रोटी लपेटना भी मुमकिन नहीं है, क्योंकि उस पर इतना लहू बिखरा हुआ है। रात-दिन बलात्कार की खबरें भले लोगों का हौसला पस्त करती रहती हैं, और मां-बाप, खासकर लड़कियों के मां-बाप यह नहीं सोच पाते कि बच्चियों को आगे बढऩे के लिए, पढऩे के लिए, खेलने-कूदने के लिए कितनी दूर तक कैसे बढ़ावा दिया जाए, और कहां पर सावधानी के नाते उनको रोक लेना ठीक होगा? 
इसके अलावा बहुत से ऐसे सेक्स-हिंसा के जुर्म सामने आते हैं जिनमें यह समझ नहीं आता कि तीन बरस की बच्ची से, या पैंसठ बरस की बूढ़ी महिला से, किसी मानसिक विचलित लड़की से, या किसी विकलांग से बलात्कार करने वालों को अपनी खुद की हरकत के बारे में कुछ भी हिचक होती है, या नहीं? ऐसे में इंसान के मिजाज को समझने की जरूरत है, जिससे कि इंसानियत नाम का एक शब्द गढ़ा गया है। अब अगर लोग इंसान को ऐसे मिजाज वाला मानकर चलते हैं कि वह इंसानियत से भरा हुआ होगा, तो उनको नाउम्मीद हाथ लगना तय है। इंसान दरअसल उन तमाम किताबी और कागजी खूबियों से परे होते हैं जो कि मानवीयता या इंसानियत के नाम पर दर्ज हैं। 
लोगों के भीतर झांककर देखने की कोई मशीन बने, तो हमारा अंदाज है कि वह ऐसे लोगों के बीच भी हैवानियत कही जाने वाली खामियां दिखाएगी, जो कि अब तक किसी जुर्म से दूर रहते हैं, और जो दिखने में भले दिखते हैं। कई बार हमको लगता है कि बुजुर्गों की कही हुई यह बात अधिक सही है कि इंसान गलतियों का पुतला है। हमको यह भी लगता है कि लोगों का एक बड़ा हिस्सा इसलिए भला बने रहता है कि वह अपने-आपको बुरा बनने से रोकने की लड़ाई में अपने बुनियादी मिजाज से जीत जाता है। इंसान के भीतर का मिजाज और सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य, इन दोनों के बीच हमारे हिसाब से एक तगड़ा मुकाबला चलते रहता है, और जब तक सामाजिकता का तकाजा जीतता है, तब तक अधिकतर लोग जुर्म या हिंसा से बचे रहते हैं। और जब यह तकाजा हार जाता है, तो लोग खुद पर से बेकाबू होकर जुर्म कर बैठते हैं, या जुर्म करते हैं। कुछ लोगों को हमारी यह बात अटपटी और गलत या खराब लग सकती है कि हम अब तक बेकसूर बने हुए लोगों के भीतर भी हिंसा और जुर्म का एक खतरा देखते हैं, और यह सुझा रहे हैं कि लोग बेबसी में भी शरीफ बने रहते हैं। लेकिन हम अपनी बात को समझाने के लिए इसे कुछ अधिक नाटकीयता के साथ कहें, तो हकीकत कुछ ऐसी लगती है कि अधिकतर इंसानों के भीतर वे तमाम खामियां कम या अधिक मजबूती के साथ भरी रहती हैं, जिन पर से जरा सा सामाजिक और निजी दबाव हटा, और जुर्म हुआ। जुर्म इसलिए कम हैं, कि अधिकतर इंसानों का अपने-आप पर काबू चल रहा है। इसलिए हम यह बिल्कुल नहीं मानते कि इंसान इंसानियत से भरे हुए हैं, और हैवानियत जिसे कहा जाता है, वह उन्हीं इंसानों के भीतर है, जिनके सिर पर सींग होते हैं। 
लोगों को भला इंसान बने रहने के लिए खासी कड़ी लड़ाई लडऩी पड़ती है। कभी सेक्स के सुख की चाह, तो कभी काली क माई से मिलने वाले ऐशोआराम, कभी दूसरों पर धाक जमाने की हसरत, तो कभी अपने धर्म या अपनी जाति की ताकत दिखाने की बेसब्री, ऐसी कई वजहें होती हैं जो लोगों को गलत या बुरा करने के लिए उकसाती हैं। अब किसका अपने पर कितना काबू हो सकता है, किसे कितने मौके मिल सकते हैं, इस पर आगे की बात टिकी रहती है। इसलिए इंसानों को कुछ काल्पनिक खूबियों को इंसानियत कहना बंद भी करना चाहिए, और इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि हर इंसान के भीतर वे तमाम खामियां होने का पूरा खतरा है जिनको लेकर हैवान की एक काल्पनिक तस्वीर बनाई गई है। 

भ्रष्ट और जालसाज सांसदों को कड़ी सजा से कम कुछ नहीं

14 जून 2014
संपादकीय
राज्यसभा के आधा दर्जन सदस्यों पर कल सीबीआई ने छापा मारा है और इन पर यह आरोप है कि इन्होंने जालसाजी-धोखाधड़ी से गलत यात्रा-भत्ते निकाले। इनमें तीन मौजूदा सदस्य हैं, और तीन भूतपूर्व। और ये सभी के सभी अलग-अलग आधा दर्जन पार्टियों के हैं। यह अधिक तकलीफ की बात इसलिए है कि राज्यसभा को लोकतंत्र में लोकसभा से ऊपर, उच्च सदन का दर्जा मिला हुआ है, और इस मनोनीत सदन में देश के समाज के बेहतर लोग आएंगे, ऐसा माना जाता है। 
सांसदों के बीच जुर्म कोई अनहोनी बात नहीं है, और इसके पहले भी कई पार्टियों के सांसद सदन में मतदान करने के लिए रिश्वत लेते पाए गए हैं, और सदन के भीतर सवाल पूछने के लिए रिश्वत लेते हुए, महीना बांध देने की मांग करते हुए कैमरों पर पकड़ाए सांसदों की बर्खास्तगी भी हुई है। भारतीय लोकतंत्र में संसद के विशेषाधिकारों का पाखंड इतना भयानक है कि जैसी रिश्वतखोरी या जालसाजी-धोखाधड़ी पर देश के सबसे छोटे कर्मचारी भी दस-बीस बरस तक मुकदमा झेलकर, उसके बाद कुछ महीने या बरसों की सजा पाते हैं, उससे हजार गुना बड़ी रिश्वतखोरी-धोखाधड़ी करने के बाद इस देश के सांसद गरीब जनता के खून-पसीने से संसद की आलीशान कैंटीन में मिट्टी के मोल  छप्पन भोग पाते हैं। ऐसी विशेषाधिकार वाले सांसद जब मुफ्त में मिलने वाले हवाई सफर की टिकटों में जालसाजी करके लाखों की कमाई और ऊपर से कर लेना चाहते हैं, तो इस चाहत को क्या कहा जाए? इस पर क्या सजा दी जाए? 
देश की सबसे बड़ी पंचायत, भारतीय संसद, और उसमें भी मनोनीत उच्च सदन, राज्यसभा को देश के सामने एक आदर्श पेश करना चाहिए, और इस सदन के लोग देश के सामने साजिश के नए-नए मौलिक तरीके पेश कर रहे हैं। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम बार-बार यह बात लिखते हैं कि ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोगों को किसी सोचे-समझे जुर्म के लिए आम मुजरिम के मुकाबले अधिक सजा इसलिए मिलनी चाहिए क्योंकि ऊंचे ओहदों की वजह से ऐसे लोगों के खिलाफ किसी तरह की रिपोर्ट, जांच और कार्रवाई आसान नहीं रहती। इनके खिलाफ न गवाह जुट पाते और न सुबूत, और न ही इनके भाड़े के महंगे वकीलों का मुकाबला अदालत में आसान होता है। 
आज इस देश में भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ जनता के मन में नफरत का जो सैलाब उमड़ा हुआ है, उसी सैलाब पर सवार होकर नरेन्द्र मोदी आसमान तक पहुंचे हैं। उन्होंने अपने सांसदों को, या शायद सभी सांसदों को यह सलाह दी है कि वे अदालत में उनके खिलाफ चल रहे मुकदमों को सालभर में निपटाने के लिए अदालत में अर्जी दें। उन्होंने अपनी पार्टी के सांसदों को यह भी कहा है कि वे अपने बंगलों के हिस्से किराए पर न दें, रिश्तेदारों को निजी स्टाफ में न रखें। कुल मिलाकर सांसदों को अब यह समझ लेने की जरूरत है कि उनके साथ किसी की कोई हमदर्दी नहीं रह गई है, खासकर तब, जब उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों। जिस तरह की जालसाजी इन सांसदों ने हवाईसफर की फर्जी टिकटें बनवाकर कमाई करने के लिए की हैं, उन पर कड़ी सजा दी जानी चाहिए। इस काम में अगर संसद के कोई विशेषाधिकार बचाव के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश होती है, तो पूरी संसद के खिलाफ जनभावनाएं खड़ी होंगी। सीबीआई को एक मिसाल के तौर पर इन आधा दर्जन सांसदों को सजा दिलवानी चाहिए, ताकि लोग जालसाजी का हौसला आसानी से न कर सकें।

भिलाई औद्योगिक हादसे से सबक-सुधार की जरूरत

13 जून 2014
संपादकीय

एशिया के सबसे बड़े फौलाद कारखाने भिलाई इस्पात संयंत्र में कल शाम हुए एक औद्योगिक हादसे में आधा दर्जन से अधिक लोग अब तक गुजर चुके हैं, और दर्जनों लोग अस्पताल में हैं। एक गैस के रिस जाने से यह हादसा हुआ है, और जांच से पता लगेगा कि यह पूरी तरह एक तकनीकी दुर्घटना थी, या इसके पीछे कोई इंसानी लापरवाही जिम्मेदार थी। इस बारे में हम अभी अपना कोई निष्कर्ष निकालना नहीं चाहते, क्योंकि न तो वह मुमकिन है, और न ही हमारे पास ऐसी तकनीकी काबिलीयत है। लेकिन कल शाम से जो खबरें अब तक आ रही हैं वे बताती हैं कि भिलाई इस्पात संयंत्र का मैनेजमेंट ऐसे किसी हादसे की नौबत पर बचाव के लिए ठीक से तैयार नहीं था। उसके पास ऐसे मौके के लिए गैस-मास्क नहीं थे, जरूरत के लायक एंबुलेंस नहीं थीं, और भी कुछ कमियां जांच में सामने आ सकती हैं। हम इसी पहलू पर आगे लिखना चाहते हैं। 
दरअसल पूरा छत्तीसगढ़ भिलाई इस्पात संयंत्र की तरफ एक आदर्श की तरह देखता है। नेहरू के वक्त के इस औद्योगिक तीर्थ से छत्तीसगढ़ की शक्ल जितनी बनी और बदली है, उतनी किसी भी दूसरे किसी एक संस्थान से नहीं। इसलिए इस ऐतिहासिक और बेमिसाल योगदान की वजह से यह राज्य और इसके लोग हर मौके-बेमौके बीएसपी की तरफ देखते हैं। छत्तीसगढ़ के लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि पिछली करीब आधी सदी में जब-जब लोगों को किसी गंभीर इलाज की जरूरत पड़ी, तो बीएसपी का अस्पताल ही इस विशाल छत्तीसगढ़ के पास था, और राज्य बनने के बाद ही इस अस्पताल से परे सरकारी और निजी अस्पताल विकसित हो पाए। इसलिए बीएसपी की सामाजिक जिम्मेदारी कम नहीं रही। दूसरी तरफ हम कल के औद्योगिक हादसे को अनुपात से बढ़ाकर भी देखना नहीं चाहते। जिस कारखाने में दसियों हजार लोग काम करते हैं, और हर बरस लाखों टन फौलाद जहां बनता है, वहां पर औद्योगिक दुर्घटना कभी भी न हो, ऐसा सिर्फ एक काल्पनिक आदर्श में हो सकता है। इसलिए इस हादसे की वजह से बीएसपी को एक पूरी तरह लापरवाह मान लेना भी ठीक नहीं है। औद्योगिक सुरक्षा जब लागू होती है, तो वह खबर नहीं बनती। और जब वह नाकामयाब होती है, तभी वह खबर बनती है। इसलिए बीएसपी के औद्योगिक आकार को देखते हुए ही वहां की दुर्घटना के आकार को तौलना चाहिए। 
लेकिन यह लिखते हुए भी हम बीएसपी को यह याद दिलाना चाहते हैं कि हर इंसानी जिंदगी पर से खतरा टालने के लिए जो-जो किया जाना चाहिए था, उसमें जो कमी रही हो, उससे तुरंत सीख लेने की जरूरत है। दूसरी तरफ न सिर्फ छत्तीसगढ़ के लिए, बल्कि पूरे हिंदुस्तान के लिए बीएसपी को औद्योगिक सुरक्षा और बचाव की एक मिसाल पेश करनी चाहिए। इसलिए कल के हादसे के बाद जो-जो कमियां और खामियां सामने आई हों, उन पर तुरंत ही कार्रवाई करने की जरूरत है। लेकिन इस मौके पर केंद्र और राज्य सरकारों के औद्योगिक सुरक्षा से जुड़े हुए विभागों के सामने यह एक चुनौती भी सामने आई है कि बाकी छत्तीसगढ़, और बाकी देश में औद्योगिक सुरक्षा को ठोक-बजा लिया जाए। ऐसे ही मौकों पर बाकी जगहों के इंतजाम परख लेने चाहिए, और किसी हादसे के बाद ऐसी नसीहत खुद होकर लेनी चाहिए। भिलाई छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा औद्योगिक केंद्र है, और इस मौके पर हम किसी भी तरह की राजनीतिक-राजनीति या मजदूर-राजनीति के बजाय सबक और सुधार पर जोर देंगे।

नेता-अफसरों के हिंसक बयानों के खिलाफ, सभी जुबानदार तबकों के उठकर खड़े होने की जरूरत

12 जून 2014
संपादकीय
उत्तरप्रदेश मेें पुलिस विभाग के मुखिया ने बलात्कार पीडि़तों के खिलाफ अपने झूठे और आक्रामक बयान जारी रखे हैं। दो-चार दिन पहले उन्होंने मानो समाजवादी पार्टी की सरकार को बचाने के लिए, बहुत से बलात्कारियों के खिलाफ चल रहे सामाजिक तनाव के बीच यह बयान दिया था कि मारकर टांग दी गई लड़कियों में से एक के साथ बलात्कार नहीं हुआ था, और वह शायद घर के भीतर की कोई साजिश थी। इतने पर भी मानो उनका जी नहीं भरा तो उन्होंने कल फिर बयान दिया कि बलात्कार आम बात है, और ऐसे जुर्म होते रहते हैं। 
हम पहले भी अलग-अलग राज्यों के नेताओं और अफसरों की किस्म-किस्म की बकवास के खिलाफ यह लिखते आए हैं कि राष्ट्रीय और प्रादेशिक मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, बाल आयोग, और हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर इन बयानों पर गौर करना चाहिए, और ऐसी बकवास करने वाले लोगों को नोटिस जारी करना चाहिए। भारत में सामाजिक स्थितियां महिलाओं के बहुत खिलाफ है, उनको बराबरी के हक मिलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे में जब सत्ता हांक रहे लोग संवेदनाशून्य ही नहीं, बल्कि बहुत ही हिंसक बयान महिलाओं के खिलाफ देते हैं, तो इन लोगों पर कार्रवाई की जरूरत है, और उसके न होने पर उनके मातहत काम करने वाले लोग बलात्कार को एक मामूली जुर्म मानकर ही लापरवाह बने रहेंगे। महिला आयोगों और मानवाधिकार आयोगों की सहूलियत और वेतन-भत्ते वाली कुर्सियों पर जिन लोगों को सत्ता मनोनीत करती है, उनको भी अपनी जिम्मेदारी पूरी न करते हुए शर्म क्यों नहीं आती? और जब मनोनीत करने वाली ताकतें ही राज्यों की सरकार चलाती हैं, वे ही हिंसक बयान देती हैं, वे ही मुजरिमों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बचाने में लग जाती हैं, तो फिर उनकी मर्जी से कुर्सियों पर बिठाए गए पुतले चुप्पी साध लेते हैं, तो यह तकलीफदेह तो है, लेकिन हैरान करने वाली बात नहीं है। 
देश में लगातार राज्य और केन्द्र के नेता और अफसर बलात्कार की शिकार लड़कियों और महिलाओं के साथ किसी हमदर्दी के बिना बयान देते आ रहे हैं, और पूरी दुनिया में इससे हिन्दुस्तान को शर्मिंदगी झेलनी पड़ रही है। यह तो ठीक है कि भारतीय समाज अपने आप में महिलाओं के साथ हिंसा करने वाले, उनको पैरों की जूतियां समझने वाले मर्दों के दबदबे वाला समाज है, लेकिन अगर सदियों पुरानी वाली यही सोच जारी रखनी है तो संविधान का ढकोसला क्यों करना चाहिए? ऐसा पाखंड क्यों करना चाहिए जिसके तहत सरकार लोगों को कुर्सियों पर बिठाए और फिर ऐसे लोग अपना जिम्मा पूरा करने के बजाय मुजरिमों के हिमायतियों जैसे काम करें? यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। आज हिन्दुस्तान में मीडिया अगर मुद्दों को इतनी आक्रामकता के साथ नहीं उठाता, तो बलात्कार खबरों और बहस में आ ही नहीं पाता। मीडिया के दबाव के चलते नेता और अफसर फिजूल की बातें कहने के बाद कभी-कभी शर्मिंदगी जाहिर भी करते हैं, और कभी-कभी वे मुलायम और अखिलेश बने भी रहते हैं। 
आज देश में सभी जुबानदार तबकों को और अधिक आक्रामकता के साथ हिंसक बयानों के खिलाफ उठकर खड़े होना पड़ेगा। और ऐसा करना हर उस इंसान की जिम्मेदारी है जिसकी मां एक औरत थी। 

फौजी वर्दी के अगले ही दिन चुनावी खादी के नुकसान

11 जून 2014
संपादकीय

भारत में थलसेना के भीतरी मामलों को लेकर पिछले एक-दो बरस से यूपीए सरकार के तहत कई तरह की बखेड़े की खबरें आ रही थीं। पिछले थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह अपनी जन्मतिथि के झगड़े से लेकर कुछ और मामलों तक केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट से लगातार टकराव मोल लेते आ रहे थे, और कभी वे अन्ना हजारे के साथ, तो कभी बाबा रामदेव के साथ होते हुए सड़क-फुटपाथ से भाजपा मुख्यालय पहुंचे, उम्मीदवार बने, चुनाव जीता, और अब मंत्री बन गए। कल तक वे सुप्रीम कोर्ट में फटकार झेलते हुए खड़े थे, अपने मातहत आला फौजी अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए खड़े थे, और अब वे सरकार का हिस्सा हैं। वर्दी से खादी तक पहुंचने में उन्होंने इतना कम वक्त लगाया कि सुबह वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सलामी दे रहे थे, और मानो शाम को यूपीए सरकार के खिलाफ राजनीतिक मंच से भाषण दे रहे थे। आज जब मोदी सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे में जनरल वी.के. सिंह के फौजी फैसले को गलत ठहराते हुए उनके खिलाफ सरकारी रूख दिखाया गया है, तो अब सरकार इस परेशानी में पड़ गई है कि सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे को बचाए, या अपने मंत्री के कल के सबसे चर्चित फैसले को? 
हम इस मामले की बारीकियों में गए बिना इसके दूसरे एक पहलू पर लिखना चाहते हैं। वर्दी से खादी तक का सफर जिस लोकतंत्र में इतनी रफ्तार से होगा, वहां पर रक्षामंत्री अरूण जेटली की इस गुजारिश की बहुत अहमियत नहीं रह जाती कि आज के थलसेनाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर राजनीति न की जाए। फौज की नौकरी के अगले ही दिन अगर राजनीति इस लोकतंत्र में मंजूरी पाती रहेगी, तो उससे ऐसी बहुत सी दिक्कतें आएंगी। हम लंबे समय से यह लिखते आ रहे हैं कि ऊंची सरकारी नौकरी, ऊंची अदालती कुर्सी, ऊंची फौजी-पुलिस वर्दी के अगले ही दिन अगर राजनीति में जाने की छूट रहेगी, तो उससे न सिर्फ कुर्सी पर रहते हुए बड़े ओहदेदारों के फैसले उनकी भावी राजनीति की तरफ झुके रहेंगे, बल्कि सरकारी राज भी राजनीतिक लाउडस्पीकरों पर गूंजते रहेंगे। हमारे हिसाब से सरकारी और संवैधानिक कुर्सियों और चुनाव की उम्मीदवारी के बीच कुछ बरसों का फासला तो होना ही चाहिए। पिछले बरसों में बहुत सी पार्टियों ने बहुत से सरकारी-अदालती आला-अफसरों को राजनीति में बढ़ावा दिया है, और इसके बहुत खतरनाक नतीजे सामने आएंगे। 
आज मोदी सरकार के सामने जो एक राजनीतिक दुविधा आकर खड़ी हुई है, वैसी नौबत इस लोकतंत्र में कई मौकों पर आएगी, अगर राजनीति को सरकारी मामलों से अलग नहीं रखा जाएगा। और यह बात सिर्फ लोकतांत्रिक चुनावी राजनीति पर ही लागू नहीं होती, भारत सरकार के किसी सार्वजनिक उपक्रम से निकलकर जब लोग रातों-रात किसी निजी कारखाने में नौकरी करने लगते हैं, तो यह शक जायज रहता है कि उसी किस्म के धंधे वाले निजी कारखाने का फायदा पहले से तो नहीं किया जा रहा था? प्राकृतिक न्याय यह सुझाता है कि हितों के टकराव की नौबत नहीं आने देनी चाहिए। और अखबारनवीसी करते-करते अगले दिन चुनाव लडऩा भी इसी दर्जे का मामला है, और लोगों को चाहिए कि पेशा बदलने के पहले यह सोच लें कि पिछले पेशे के आखिरी बरस उनके पास ऐसी गुंजाइश तो नहीं थी कि वे अगले पेशे में अपनी जगह बना सकें। 
जनरल वी.के. सिंह जैसे बड़बोले फौजी अफसर हिन्दुस्तान में शायद ही कोई और हुए हों। उन्होंने जिस तरह अदालत से लेकर सरकार तक, और अपने मातहत अफसरों तक के लिए हर किसी के लिए जिस तरह की हिकारत दिखाई है, वह रूख एक रिटायर्ड फौजी के लिए भी अच्छा नहीं था, और आज सरकार के मंत्री के रूप में भी अच्छा नहीं है। यह मामला सिर्फ मोदी सरकार का नहीं है, इस बारे में तमाम पार्टियों को सोचना चाहिए, और देश को ऐसी नीति की जरूरत है कि जनता के पैसों की नौकरी के अगले ही दिन चुनाव लडऩे पर रोक लगे। 

Bat ke bat, बात की बात,

10 june2014

मीडिया में हजारों करोड़ का पूंजीनिवेश, और मानहानि के हजारों करोड़ के नोटिस

10 जून 2014
संपादकीय
हिंदुस्तान के मीडिया में इन दिनों बड़ी दिलचस्प बातें हो रही हैं। मुकेश अंबानी ने कुछ टीवी चैनलों वाले एक मीडिया समूह में चार हजार करोड़ रुपये का पूंजीनिवेश किया है, और इसे लेकर अखबारनवीसों में यह हड़कंप मचा हुआ है कि इतनी बड़ी पूंजी का कारोबार हो जाने के बाद अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का क्या होगा? कौन-कौन से सितारों-पत्रकार टीवी चैनल या अखबार छोड़कर जाएंगे, और मीडिया किस तरह अपने खरबपति मालिकों के कारोबारी-हितों को बढ़ाने के लिए पसीना बहाने लगेगा? इसके साथ-साथ एक दूसरा मामला पिछले करीब एक बरस से खबरों में बना हुआ था कि किस तरह एक टीवी समाचार चैनल के साथ कांगे्रस के तबके सांसद और आज के खरबपति उद्योगपति नवीन जिंदल का सौ करोड़ से अधिक का मानहानि का एक मामला चल रहा था, और ब्लैकमेलिंग के आरोप का एक आपराधिक मामला अलग से चल ही रहा है। आज की ताजा खबर यह है कि देश की सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी इंफोसिस ने देश के तीन बड़े अंगे्रजी अखबारों पर दो-दो हजार करोड़ रुपये का मुकदमा किया है कि इन अखबारों ने इस कंपनी की छवि बिगाडऩे का काम किया है।
अब इसके साथ-साथ हम लगे हाथों एक और मामले को जोडऩा चाहते हैं कि किस तरह भाजपा के अध्यक्ष रहे नितिन गडकरी ने अपनी मानहानि को लेकर कांगे्रस के प्रवक्ता और केंद्रीय मंत्री मनीष तिवारी से अदालत में माफी मंगवाकर ही दम लिया, और किस तरह उन्होंने आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल को जेल भिजवाकर दम लिया। आज इन तमाम खबरों के बीच मानहानि की बातों को लेकर तो कम, लेकिन साम्प्रदायिक नफरत फैलाने के आरोपों को लेकर सोशल मीडिया भी खबरों में है कि किस तरह इंटरनेट पर नफरत फैलाई जा रही है, जो कि हिंसा में तब्दील हो रही है। 
इन सारी बातों को देखें तो लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से लेकर मीडिया के कारोबार तक, और परंपरागत मीडिया से लेकर नए-नए सोशल मीडिया की नई संभावनाओं तक बहुत से मुद्दों और उनके पहलुओं पर अभिव्यक्ति की आजादी पर बात करने वाले लोगों के बीच चर्चा की जरूरत है जो कि बरसों से ठंडी पड़ी हुई है। दरअसल हिंदुस्तान में श्रमजीवी पत्रकार आंदोलन के साथ ही ऐसी चर्चा जुड़ी हुई थी, और जैसे-जैसे यह आंदोलन ठंडा पड़ा, अखबारनवीसी पर टीवी चैनल भारी पड़ते चले गए, जैसे-जैसे मीडिया का कारोबार बड़ी पूंजी पर टिकते चले गया, वैसे-वैसे किसी भी तरह की आजादी की बात हाशिए पर जाती चली गई। नतीजा यह है कि आज टीवी चैनलों के भीतर टीआरपी के पैमाने पर दर्शक संख्या की उत्कृष्टता और कामयाबी मापने में इस्तेमाल हो रही है। अखबारों के बीच प्रसार संख्या ही अखबारनवीसी की कामयाबी गिन ली जा रही है। ऐसे में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का दंभ भरने वाला मीडिया कारोबार, देश का एक कारोबार होकर रह गया है, और उसे लोकतंत्र के किसी भी स्तंभ पर दावा करने का हक नहीं रह गया है। ऐसे में मीडिया में आजादी का जो शून्य खड़ा हुआ है, उसे भरने के लिए सोशल मीडिया ने एक तूफान की तरह दाखिला लिया, और अभिव्यक्ति की असंगठित स्वतंत्रता के नए पैमाने गढऩा शुरू किया। लेकिन इसके साथ-साथ एक दूसरा खतरा जुड़ा रहा, जिस पर भी लगे हाथों बात होनी चाहिए। इंटरनेट अपनी तकनीकी संभावनाओं और अपने मिजाज की वजह से बुरी तरह अराजक रहता है, और ऐसे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जो जिम्मेदारी जुड़ी रहनी चाहिए, वह बिल्कुल भी नहीं रह पाती। इसलिए परंपरागत अखबारी मीडिया के साथ पत्रकारिता की जो जिम्मेदारी रहते आई थी, वह इंटरनेट पर लापता है। ऐसे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की साख भी गड़बड़ाती है, और जब इंटरनेट पर लिखी गई बातों के खिलाफ पुलिस और अदालत की कार्रवाई हो रही है, तो उसे पहली नजर में ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला मान लिया जा रहा है। यह नई-नई डिजिटल स्वतंत्रता उसे इस्तेमाल करने वाले लोगों के बीच किसी जिम्मेदारी को लेकर नहीं आई है, और उसे कानून के दायरे को समझने में कुछ वक्त भी लगेगा।
हम टुकड़ा-टुकड़ा इन बातों को एक साथ इसलिए लिख रहे हैं कि ये एक-दूसरे जुड़ी हुई बातें हैं और इन तमाम पहलुओं पर एकमुश्त ही चर्चा हो सकती है। आज पत्रकारों के मंच ऐसी चर्चा करने के लिए बाकी नहीं रह गए हैं, इसलिए उनसे परे के ऐसे लोगों को ही इस पर बात शुरू करनी चाहिए, जिनके लिए विचारों की आजादी मायने रखती है। आज मीडिया और सोशल मीडिया, इन दोनों के बीच कंटीले तारों की कोई बाड़ नहीं है, इन दोनों के बीच एक सलेटी फासला बिखरा हुआ है, और कोई सरहद नहीं है। इसलिए बातचीत में बहुत से सामाजिक समूह हिस्सेदार रहेंगे। हजारों करोड़ के पूंजीनिवेश से लेकर हजारों करोड़ के नोटिसों तक की वजह से आज मीडिया पर एक लंबी-चौड़ी बातचीत जरूरी है।

राशन कार्डों की जांच होने तक गरीबों का राशन रूकना गलत

9 जून 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कलेक्ट्रेट से आए दिन हमारे सामने ऐसी तस्वीरें आती हैं जिनमें राशन कार्ड लिए हुए सैकड़ों गरीब इस तपती धूप में वहां पहुंचे रहते हैं, क्योंकि उनके राशन कार्ड का सत्यापन हुए बिना उस पर उन्हें राशन नहीं मिल रहा। छत्तीसगढ़ में डॉ. रमन सिंह के तीन-तीन बार चुनाव जीतने के पीछे सबसे हाथ उनकी रियायती अनाज की योजना का माना जाता है, और साथ-साथ यह भी कि छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत सबसे कम चोरी, और सबसे अधिक कामयाबी भी बरसों से दर्ज होते आई है। ऐसे में आज अगर राशन कार्ड की जांच के दौरान अगर बड़ी संख्या में लोगों को महीनों से राशन नहीं मिल रहा है, तो ऐसे में गरीबों का हाल खराब होना तय है।
यह एक अलग बात है कि इस राज्य में लाखों लोग रियायत के हकदार न रहते हुए भी रियायती अनाज पा रहे थे, और उसका बोझ सरकार पर बरसों से पड़ रहा था। पहले तो गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों की शिनाख्त के पैमाने एक से अधिक चल रहे थे, और छत्तीसगढ़ सरकार का यह फैसला सही था कि इन पैमानों में से किसी पर भी जो गरीब साबित होता है, उसे रियायती अनाज मिलना चाहिए। हम आज भी यही सोच रखते हैं कि सरकार अगर शिनाख्त करने में कमजोर है, अगर राशन कार्ड की जांच होने में किसी वजह से देर हो रही है, तो ऐसी नौबत में गरीबों का राशन जारी रहना चाहिए, और जब तक सरकार के पास ठोस वजह न आ जाए, तब तक गरीब का राशन बंद नहीं होना चाहिए। सरकार की नाकामयाबी, उसकी सीमित क्षमता, उसके चुनाव जैसे कई तरह के अतिरिक्त बोझ, इन सबके चलते हुए भी इस मामले में संदेह का लाभ गरीब को उसी तरह मिलना चाहिए जिस तरह भारतीय न्यायपालिका में सुबूत न मिलने पर संदेह का लाभ आरोपी को मिलता है। यह तय करना और साबित करना सरकारी जांच का काम है, कि कौन-कौन से अपात्र लोग राशन पा रहे हैं। और फिर अगर उनमें गैरगरीब तबके के लोग जालसाजी से रियायती राशन कार्ड बनवाकर राशन पा रहे हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई का हक और जिम्मा भी सरकार का है। लेकिन जब तक सरकार ऐसी कार्रवाई नहीं कर पाती, तब तक राशन बंद होने के बजाय जारी रहना चाहिए।
सरकार की योजनाओं में से जो भी योजनाएं गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों के लिए हैं, जो योजनाएं बीमार, बूढ़े, अकेली रह गई महिलाओं, विकलांगों के लिए हैं, उन सबमें सरकार देर का नुकसान सरकार खुद झेले। ऐसे तबकों की ऐसी हालत नहीं होती कि वे सरकार की देर का नुकसान झेल सकें। छत्तीसगढ़ में राशन इस सरकार की लगातार कामयाबी का एक बड़ा मुद्दा रहा है। कई मंत्री और कई सचिव इस विभाग में आकर चले गए, लेकिन मुख्यमंत्री ने अपनी निजी दिलचस्पी से और अपनी निगरानी में रियायती राशन को सफल बनाकर रखा। आज इस मोर्चे पर गरीबों को अगर ऐसी दिक्कत हो रही है, तो उनका अनुपात गरीब आबादी के भीतर कितना भी हो, उनकी जांच में समय कितना भी लगे, यह नुकसान सरकार को ही झेलना चाहिए। आज बहुत बूढ़े-बूढ़े लोग जिस तरह लाठियां टेकते हुए झुलसाती हुई गर्मी में दिन भर सरकारी दफ्तरों में डेरा डाले हुए हैं, वे तस्वीरें छत्तीसगढ़ सरकार के जनकल्याण के दावों, और उसके पिछले रिकॉर्ड के साथ मेल नहीं खातीं। राज्य सरकार को अपने सर्वोच्च स्तर पर बिना देर किए यह आदेश करना चाहिए कि राशन कार्ड की जांच चलने तक किसी भी गरीब का राशन न रूके।

यह गाना याद रखें कि ये तो पब्लिक है, ये सब जानती है...

8 जून 2014
संपादकीय

कांगे्रस पार्टी के पास चूंकि अभी खासा वक्त खाली है, इसलिए उसके नेता तरह-तरह के नए कामों में अपने को व्यस्त रख रहे हैं। दिग्विजय सिंह ट्वीट करते हैं कि आने वाले महीनों में किस-किस खेल के कौन-कौन से अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट होने जा रहे हैं, और खेल प्रेमियों के लिए अच्छे दिन आने वाले हैं। गिने-चुने जीतने वाले कांगे्रस सांसदों में से एक, शशि थरूर, कांगे्रस प्रवक्त की हैसियत से सार्वजनिक बयान देते हुए नरेन्द्र मोदी की कुछ बातों के लिए तारीफ करते हैं, और उनकी इस तारीफ को सुनकर, लोकसभा चुनाव में चौथे नंबर पर आकर जमानत तक जब्त करा बैठे एक दूसरे बड़बोले कांगे्रस सांसद मणिशंकर अय्यर ने शशि थरूर को करीब-करीब भाजपा में जा चुका बताया है, और कहा है कि संसद में कांगे्रस का एक सदस्य कम गिना जाना चाहिए। इस तेजाबी जुबान, और शशि थरूर की शिष्टाचार वाली जुबान के बीच के फर्क को समझने की जरूरत है।
नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक जो रूख दिखा रहे हैं, जो बयान दे रहे हैं, जो फैसले ले रहे हैं, और काम का जो तौर-तरीका कायम कर रहे हैं, उसके बीच अब तक उन्होंने ऐसी कोई भी चूक नहीं की है कि उनकी आलोचना करने के लिए जिनकी हसरत अभी निकल नहीं पा रही है, उनको कोई मौका मिले। हम शशि थरूर की इस बात से सहमत हैं कि विरोधी की अच्छी बातों की तारीफ करके, और गैरजरूरी या बेबुनियाद आलोचना न करके, हर किसी को अपनी खुद की विश्वसनीयता बनाए रखना चाहिए, ताकि जिस दिन आलोचना का मौका आए, उस दिन आलोचक की विश्वसनीयता बची रहे। यह एक बहुत साधारण समझबुझ की, और सही बात, यह एक और बात है कि एक कुनबे की चापलूसी ही जिस पार्टी में सबसे बड़ी काबिलीयत है, उस पार्टी के भीतर न्यायसंगत और तर्कसंगत बातों की अधिक कद्र हो भी नहीं सकती। 
राजनीति में आकर लोग इतने बेदिमाग और इतने बददिमाग कैसे हो जाते हैं, कैसे वे इतने तंगदिल और तंगनजर हो जाते हैं, यह देखना हैरान करता है। नरेन्द्र मोदी ने चुनावी नतीजे आने के बाद से अब तक जो रूख दिखाया है, वह ऊपर के इन चारों विशेषणों के ठीक खिलाफ है। उन्होंने लोगों को दफ्तर साफ-सुथरा रखने कहा, काम में खूब मेहनत करने को कहा, लोगों को अपने पैर छूने की मनाही की, रिश्तेदारों को स्टाफ में रखने को मना किया, पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधारने की कोशिश की, अपने मंत्रियों और सांसदों को फालतू के बयान न देने को कहा। ऐसी और भी कुछ बातें उन्होंने लंबे समय बाद कायम कीं, जिनको भारतीय राजनीतिक जीवन में लोगों ने, पार्टियों ने, कूड़ेदान में फेंक दिया था। उन्होंने अफसरों से हौसले और ईमानदारी से काम करने को कहा, और खुद मेहनत की एक मिसाल वे कायम कर रहे हैं। उनका कोई भी बयान, या कोई भी फैसला साम्प्रदायिक नहीं दिख रहा, और कांगे्रस के राज वाले पुणे में जाहिर तौर पर जो साम्प्रदायिक हत्या हुई है, उसे राज्य सरकार ने तो आम कत्ल दर्ज किया है, दूसरी तरफ मोदी सरकार ने दिल्ली से पूछा है कि इसे साम्प्रदायिक हिंसा क्यों दर्ज नहीं किया गया? अब पलभर को यह सोचें कि महाराष्ट्र सरकार वाला फैसला मोदी का किया हुआ रहता, तो देश भर के मोदी-विरोधी उन पर चढ़ बैठे रहते कि साम्प्रदायिक हिंसा को उन्होंने साम्प्रदायिक दर्ज नहीं होने दिया।
आज मोदी के विरोधी और आलोचकों को अपनी खुद की विश्वसनीयता बचाए रखनी चाहिए। हम इस बात को इस अखबार में दर्जनों बार पहले भी लिख चुके हैं कि किसी के समर्थन या विरोध में झंडा उठाकर चलने वालों की अपनी खुद की साख अगर नहीं बची रहेगी, तो उनके झंडों का कोई असर भी नहीं होगा। कांगे्रस को हर दिन मोदी के खिलाफ कुछ बोलने की हड़बड़ी छोडऩी होगी, क्योंकि देश की जनता कांगे्रस के कुछ कहे बिना भी अपने आंख-कान का इस्तेमाल जानती है, और करती भी है। इसलिए मोदी-विरोधियों को उनकी प्रधानमंत्री की हैसियत से पहली गलती की राह देखनी चाहिए, तब तक के लिए यह गाना याद रखना चाहिए कि ये तो पब्लिक है, ये सब जानती है...

Bat ke bat, बात की बात

7 june 2014

Bat ke bat, बात की बात

5 june 2014


लोकसभा में नया विपक्षी मोर्चा बनता है, तो बेहतर होगा...

7 जून 2014
संपादकीय
दिल्ली से बड़ी दिलचस्प खबर है कि लोकसभा में कांगे्रस सांसदों के अकाल के चलते हुए एनडीए और यूपीए के बाहर की पार्टियां मिलकर विपक्ष का एक मोर्चा बनाने की सोच रही हैं। अब चुनाव निपट चुके हैं, और एनडीए की सरकार के सामने खड़े होने के लिए अगर यूपीए से परे का एक मोर्चा बनता है तो यह भारतीय संसदीय राजनीति में एक नए किस्म की बात होगी। चुनाव के पहले तो ऐसे मोर्चे बनते आए हैं, बनते रहते हैं, और बनते रहेंगे, लेकिन प्रमुख विपक्षी दल विहीन लोकसभा में बाकी पार्टियां मिलकर एनडीए और यूपीए से परे एक मोर्चा बना लें, यह बिल्कुल ही अलग तस्वीर होगी। 
लेकिन ऐसा मोर्चा बेहतर और जरूरी इसलिए है कि कांगे्रस सुधरते दिख नहीं रही है, और उसके बिना यूपीए की कोई जिंदगी भी मुमकिन नहीं है। आज अगर यूपीए के कुछ साथी कांगे्रस से परे जाने की सोचें भी, तो ऐसे शरद पवारों की जरूरत आज भारतीय संसद में किसको है? आज तो जयललिता जैसे भारी-भरकम संसदीय दल वाले लोग राज्यसभा में एनडीए को जरूरी बहुमत तक पहुंचाने के लिए साथ खड़े दिख रहे हैं, और पवार के साथी, देश के और बहुत से दिग्गज, किंगमेकर न बन पाने के लिए मलाल करते बैठे हैं। ऐसे में लोकसभा में एक मजबूत विपक्ष के लिए अगर कांगे्रस-भाजपा के साथियों से परे की पार्टियां एक मोर्चा बनाती हैं, तो वह मोर्चा भारतीय संसदीय लोकतंत्र के लिए कई वजहों से अच्छा होगा। दरअसल पिछले दस बरस के यूपीए राज, और दस बरस के एनडीए-विपक्ष के चलते इन दोनों खेमों के बीच इतनी बुरी कटुता हो चुकी है, कि लोकसभा में, या राज्यसभा में भी, इनके बीच किसी स्वस्थ बहस की गुंजाइश कम ही दिखती है। और इनके बीच टकराव के लिए पिछले दस बरस का इतिहास मौजूद है। इसलिए आज संसद के भीतर अगर इन दो खेमों से परे का एक मोर्चा रहेगा तो वह यूपीए-कांगे्रस के मुकाबले जुबान खोलने और हमले करने का अधिक हक रखेगा, उसके हमले भरोसेमंद भी होंगे, और उसकी बातों को खारिज करना मोदी सरकार के लिए आसान भी नहीं होगा। 
भारत जैसे लोकतंत्र में चुनावी और संसदीय राजनीति में यह बारीक फर्क करके देखना जरूरी है कि चुनाव के पहले अगर कोई मोर्चा नहीं भी बन पाता है, क्योंकि ऐसे मोर्चे के संभावित भागीदार एक साथ चुनाव लडऩे की हालत में नहीं रहते, तो भी चुनाव के बाद संसद के भीतर ऐसा मोर्चा बनना चाहिए जो कि सत्ता के खिलाफ मजबूती से विश्वसनीय आवाज उठा सके। ऐसा न होने पर कमजोर और बेसाख विपक्ष सरकार को मनमानी का एक मौका और हक दे देता है।