जिंदगी के नतीजे सिर्फ कैलकुलेटर पर निकालना मुमकिन नहीं

31 अगस्त 2014
संपादकीय

पिछले दिनों यह खबर आई कि केरल में शराबबंदी धीरे-धीरे लागू होने वाली है, क्योंकि वहां पर प्रति व्यक्ति शराब की खपत खासी अधिक है। इसी तरह देश के दूसरे राज्यों में प्रति व्यक्ति शराब या सिगरेट की माहवारी खपत के आंकड़े आते हैं। आज के अंगे्रजी अखबार द हिंदू में नशे के आंकड़ों के विश्लेषण पर एक रिपोर्ट छपी है कि किस तरह ये आंकड़े एक गलत तस्वीर भी पेश करते हैं। और यह बात सिर्फ नशे के आंकड़ों को लेकर नहीं है, दुनिया भर में कहीं भी किसी भी मामले से जुड़े आंकड़े इस तरह पेश किया जा सकते हैं कि उनसे गलत तस्वीर सामने आए। इसीलिए एक विख्यात पश्चिमी राजनेता के नाम के साथ यह लाईन जुड़ी चली आ रही है कि दुनिया में तीन तरह के झूठ होते हैं, झूठ, सफेद झूठ, और आंकड़े।
आंकड़ों को देखें तो आबादी और खपत से औसत प्रति व्यक्ति खपत को निकाला जाता है। लेकिन यह बात अनदेखी रह जाती है कि किसी इलाके के लोगों में नशा न करने वाले लोग कितने हैं? और ऐसे लोगों की वजह से नशा करने वाले लोगों की औसत खपत गिरकर कम दिख सकती है। मिसाल के तौर पर उत्तर-पूर्वी राज्य मिजोरम को लें, जहां पर कि तकरीबन सौ फीसदी आबादी मांसाहारी है। अब इसके साथ-साथ गुजरात जैसे राज्य को लें, जहां पर कि शाकाहारी लोगों की आबादी खासी अधिक है। अब इन दोनों राज्यों में प्रति व्यक्ति मांसाहार का अंदाज निकाला जाए, तो वह खासी गलत तस्वीर बताएगा। हो सकता है कि गुजरात के मांसाहारी लोग भी मिजोरम के मांसाहारी लोगों जितना ही मांस हर बरस खाते हों, लेकिन गुजरात के शाकाहारी लोगों की वजह से वह आंकड़ा कुछ की कुछ तस्वीर बताएगा।
अब जैसे छत्तीसगढ़ के आदिवासी बस्तर को देखें, तो वहां पर राष्ट्रीय खनिज विकास निगम की खदानों से हजारों करोड़ रुपये साल का लोहा निकलता है। अब उस जिले में यह कमाई दर्ज होने की वजह से उस जिले के गरीब और फटेहाल आदिवासी की प्रति व्यक्ति आय अगर पूरे प्रदेश में सबसे अधिक दिखाई देती है, और उसकी वजह से गरीबों के लिए बनाई गई सरकार की योजनाएं वहां लागू नहीं होती हैं, तो यह आंकड़ों के झांसे में आना होगा, और बेइंसाफी करना होगा।
गणित के आंकड़ों को लेकर कई तरह के ऐसे लतीफे चलते हैं कि एक कपड़ा अगर एक घंटे में सूखता है, तो चार कपड़े कितनी देर में सूखेंगे? और जिंदगी में भी कई लोग आंकड़ों को अंतिम सत्य मान लेते हैं जो कि नासमझ आंकड़ों पर अंधविश्वास होता है, और इससे बचने की कोशिश करनी चाहिए। पिछले बरसों में भारत में लगातार गरीबी के आंकड़ों पर बहस चल रही है। रोज छब्बीस रुपये खर्च करने वाले हिंदुस्तानी को गरीबी की रेखा के ऊपर मानने के योजना आयोग के आंकड़ों को इंसानियत से परे का बताया जा रहा है। यह बात सही है कि जब इतने बड़े देश में किसी बड़ी आर्थिक नीति और योजना को बनाना है तो आंकड़ों के बिना तो काम नहीं चल सकता, लेकिन आंकड़ों के बीच की हकीकत को अनदेखा करके सिर्फ अंकों को अंतिम सत्य मानने की चूक नहीं करनी चाहिए। यह भी हो सकता है कि हिंदुस्तान में शराब न पीने वाले लोग बहुत हों, और उनकी शून्य खपत के चलते, बाकी लोगों के बीच शराब की औसत खपत घटकर दिखती हो। गुजरात में पूरी शराबबंदी है, इसलिए वहां सिर्फ डॉक्टरी पर्चे पर कुछ लोगों को शराब मिलती है, और वहां इसकी औसत खपत के आंकड़े बिल्कुल जमीन पर हैं। लेकिन दूसरी तरफ गुजरात से ही लगा हुआ दमन और दीव है, और दादरा-नगर हवेली है। इन दोनों केंद्र प्रशासित राज्यों का आकार एक-एक शहर जितना है, और इनमें शराब की औसत खपत हिंदुस्तानी के किसी भी दूसरे राज्य के मुकाबले कई गुना अधिक है। जाहिर है कि यहां पहुंचकर पीनेवाले गुजरातियों, या यहां से खरीदकर गुजरात शराब ले जाने वाले लोगों के आंकड़े इन्हीं दो शहरों में जुड़ जाते हैं। दूसरी तरफ पूरे गुजरात में तस्करी की अवैध शराब की घर पहुंच सेवा है, लेकिन चूंकि सरकारी रिकॉर्ड में वह दर्ज नहीं है, इसलिए उसके आंकड़े खपत में नहीं जुड़ते।
औसत शब्द दिखने में ही औसत जैसा साधारण लगता है, लेकिन वह कई मामलों में एक बड़े नाटकीय मुखौटे जैसा रहता है। इसलिए कोई नतीजा निकालने के पहले गिनती, अंक, संख्या, और जोड़-घटाने पर से अंधविश्वास को अलग रखकर समझ का इस्तेमाल भी करना चाहिए। जिंदगी के नतीजे सिर्फ कैलकुलेटर पर नहीं निकाले जा सकते, उनके लिए अंकों के साथ-साथ अक्षरों वाले की-बोर्ड भी लगते हैं।

बात की बात

बात की बात

31 August, 2014

गणेशोत्सव के उदार सांस्कृतिक पहलू से सीखने की जरूरत...

30 अगस्त 2014
संपादकीय

कल से शुरू हुए गणेशोत्सव की धूम हिन्दुस्तान के खासे बड़े हिस्से में है। यह त्यौहार हिन्दू धर्म का कम, और समाज का अधिक है। इसका धार्मिक पहलू छोटा है, और सांस्कृतिक पहलू अधिक बड़ा। बच्चों ने स्कूल के दिनों से ही यह पढ़ा है कि किस तरह महाराष्ट्र के महान स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेजों के खिलाफ सामाजिक चेतना के लिए लोगों को एकजुट करने को यह त्यौहार शुरू किया, और जैसा कि उन दिनों आजादी की लड़ाई में था, धर्म का महत्व नहीं था, और सभी धर्मों के क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी जान दे रहे थे, जेल जा रहे थे, फांसी चढ़ रहे थे।
हिन्दू धर्म के एक प्रमुख देवता से जुड़े होने के बावजूद गणेशोत्सव का चरित्र धार्मिक कट्टरता से बिल्कुल परे है, और सही मायनों में यह एक सांस्कृतिक आयोजन है। तिलक के समय की सोच अब तक जारी है, और इस देश में न तो इस मूर्तिपूजा से मुस्लिम परहेज करते, और न ही गणेश के आयोजनों में गैरहिन्दुओं को आया देखकर किसी कट्टर हिन्दू के माथे पर परेशानी झलकती। जहां तक धर्म का ऐसा सांस्कृतिक स्वरूप है, तब तक धर्म का एक सांस्कृतिक और सामाजिक योगदान हो सकता है, होता है। लेकिन जब धर्म का रूप कट्टरता से लद जाता है, ढंक जाता है, जब उससे समाज के बाकी धर्मों के लोगों को अलग कर दिया जाता है, तब वह धर्म सामाजिक उपयोग का कम रह जाता है, और एक तबके के भीतर भी वह कट्टरता बढ़ाता है। गणेशोत्सव की एक खूबसूरती यह लगती है कि न सिर्फ गणेश पंडाल की साज-सज्जा में हर किस्म की आजादी ली जाती है, बल्कि खुद गणेश की प्रतिमा को इतने किस्म से हंसी-मजाक, और समकालीन राजनीति, सामाजिक मुद्दों से जोड़कर बनाया जाता है। गणेश के रूप-रंग, हुलिए, पोशाक, इनमें से किसी भी बात को लेकर कट्टरता सामने नहीं आती, न तो कोई वेद और शास्त्र गिनाने बैठता, और न ही यह दिक्कत होती कि गणेश क्रिकेट क्यों खेल रहे हैं, या वे अंतरिक्ष यात्री क्यों बन गए हैं।
हिन्दू धर्म के इस प्रमुख देवता की स्तुति यहां लिखने का मकसद नहीं है। आज गणेशोत्सव की जो शक्ल है, उसमें गणेश का कोई योगदान नहीं है, इसमें हिन्दुस्तान की उदार सामाजिक सोच है, जो कि इस हिन्दू त्यौहार में सबको शामिल करती है, जिस उदार सोच के चलते सभी समाजों के लोग इसमें शामिल होते हैं। हिन्दू धर्म सहित सभी धर्म के लोगों के लिए इस त्यौहार को लेकर यह सोचने की जरूरत है कि क्या अलग-अलग धर्मों के त्यौहारों को सिर्फ उन धर्मों के मानने वाले लोगों तक सीमित रखना ठीक है? या फिर धर्मों के सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं को बढ़ावा देकर उन धर्मों के प्रति भी बाकी लोगों की समझ बढ़ाना बेहतर है? धर्मोँ की बुनियादी सोच चाहे जो हो, उनको मानने वाले लोग जब बाकी धर्मों के लोगों से सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध बढ़ाते हैं, तो खुद अपने धर्म के रीति-रिवाजों को लेकर उनके भीतर एक आत्ममंथन शुरू होता है। लोग एक-दूसरे से तुलना करते हैं, और समझदार लोग हर जगह से अच्छी बातों को अपनाना भी शुरू करते हैं। धर्मों की अपनी बुनियादी मान्यताएं कायम रह सकती हैं, लेकिन उस बड़े ढांचे के भीतर देश और काल के हिसाब से तौर-तरीकों में जो बदलाव आना चाहिए, वह बदलाव धर्मों के बीच अनुभवों और विचारों की आवाजाही के बिना नहीं आ पाता। अधिकतर धर्म अपने ही भीतर अगर रहते हैं, तो उनमें घूम-फिरकर कट्टरता बढ़ती है। और जब दूसरे समाजों के साथ उठना-बैठना बढ़ता है तो लोगों में प्रगतिशीलता आती है।
गणेशोत्सव का यह मौका हम हिन्दू धर्म के बारे में लिखने के लिए इस्तेमाल नहीं कर रहे, हम भारत की सांस्कृतिक विविधता के चलते एक धर्म के आयोजन को सर्वधर्मी बनाने की इस गौरवशाली संस्कृति की चर्चा करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। लोगों को अपने धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर कुछ दरियादिल होना पड़ेगा, तंगनजरिया छोडऩा पड़ेगा, अपने दरवाजे लोगों के आने के लिए खोलने पड़ेंगे, और अपनी खिड़कियां खोलकर बाकी दुनिया को देखना भी पड़ेगा। ऐसा करने वाले लोग ही आगे बढ़ पाएंगे, वरना आसमान छूती इमारतों के बजाय धर्म लोगों को गुफा के भीतर ही कैद किए चलेगा। आज हिन्दुस्तान और बाकी दुनिया में जगह-जगह धर्म बहुत कुछ बुरा भी कर रहा है, ऐसे में धर्म का जो सांस्कृतिक पहलू गणेशोत्सव में सामने आता है, उससे सीखने की जरूरत है।
—————

बात की बात


30 August, 2014

जनता की जिंदगी आसान बनाने मोदी के कुछ गैरसामंती नुस्खे

29 अगस्त 2014
संपादकीय

महज एक राज्य के मुख्यमंत्री का काम करने वाले नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर लोगों को यह अंदाज नहीं था कि पूरे देश को चलाने का काम वे ठीक से कर पाएंगे या नहीं, और बाकी दुनिया के साथ हिंदुस्तान के रिश्तों को वे कहां ले जा पाएंगे। लेकिन जिन लोगों को मोदी से उनकी राजनीतिक पैदाइश के समय से नफरत है, वैसे लोगों को छोड़ दें, तो मोदी के कई छोटे-छोटे फैसले जनता की जिंदगी को आसान बनाने वाले हैं। अभी उनको अपने-आपको कामयाब या नाकामयाब साबित करने में खासा वक्त लगने वाला है, और उनके अभी सौ दिन भी पूरे नहीं हुए हैं, और पन्द्रह सौ से अधिक दिन बचे हुए भी हैं। ऐसे में अगर उन्होंने एक छोटा सा फैसला पूरे देश को लागू करने को कहा कि सरकारी कामकाज में कदम-कदम पर, बात-बात पर लोगों से, गरीबों और बेरोजगारों से, छात्र-छात्राओं और अनपढ़ लोगों से हलफनामा लेना बंद किया जाए, और लोग अपने दस्तावेजों को खुद ही सत्यापित कर सकें, तो यह छोटा सा दिखने वाला, लेकिन जिंदगी को बड़ा आसान करने वाला बड़ा फैसला है। जो लोग सरकारी दफ्तरों, स्कूल-कॉलेजों, और अदालतों में धक्के खाते हैं, उन्हीं को मालूम है कि एक-एक हलफनामे के लिए कितनी जहमत उठानी पड़ती है, कितना खर्च करना पड़ता है। अब मोदी के बारे में यह खबर है कि वे ऐसी तैयारी कर रहे हैं कि देश के हर नागरिक के कागजात, दस्तावेज, इंटरनेट पर उन्हें मुफ्त में सरकार की तरफ से दी जाने वाली एक डिजिटल तिजोरी में रखे रहेंगे, और सरकार के किसी भी अमले को जब जरूरत रहेगी, तो वे वहां से कागजात लेकर देख सकेंगे। आज हिंदुस्तान में सरकारी और अदालती ढर्रा इस तरह का है कि मानो जनता को तकलीफ देकर कर्मचारी-अधिकारी मजा पाते हैं। मनोविज्ञान में जिस मानसिक रोग को परपीड़क होना कहते हैं, वैसी बात सरकारी दफ्तरों में आम दिखती है। ऐसे में मोदी अगर लोगों की जिंदगी को सचमुच ही सरकारी बंधनों से आजाद कर सकते हैं, तो यह सबसे कमजोर तबके के लिए एक बहुत बड़ी आजादी होगी।
और नरेन्द्र मोदी ऐसा करके कोई करिश्मा नहीं कर रहे हैं, कोई जादू नहीं कर रहे हैं। दरअसल पचास बरस इस देश पर राज करने वाली कांगे्रस की सोच राजसी हो गई थी, और उसकी सरकारों, उसके नेताओं, उसके सलाहकारों में लोगों की जिंदगी को आसान करने के खिलाफ एक सामंती सोच जमी हुई थी। आसानी से चारों तरफ बिखरी हुई और मौजूद टेक्नालॉजी का इस्तेमाल जिंदगी को आसान करने के लिए हमेशा ही किया जा सकता था, लेकिन अपने-आपको पैदाइशी शासक मानने वाले कांगे्रस के लोगों ने कभी ऐसा सोचने की जरूरत ही नहीं समझी। और कांगे्रस-यूपीए, या दूसरी पार्टियों की राज्यों की सरकारों के सामने दुनिया से सीखने का मौका हमेशा ही था। अमरीकी सरकार के हर फार्म पर उसे भरने में लगने वाले अनुमानित समय को भी लिखा जाता है, और सरकार लगातार यह कोशिश करती है कि लोगों से गैरजरूरी जानकारी न मांगी जाए, गैरजरूरी कागजात न मांगे जाएं। मोदी ने कोई नया आविष्कार नहीं किया है, उन्होंने महज एक सामान्य समझबूझ को लागू किया है, लेकिन वे जिस गरीबी से उठकर आए हैं, शायद वह तजुर्बा उनको सामंती तौर-तरीकों को खत्म करने की तरफ बढ़ा रहा है। और आज ऐसा नहीं है कि सिर्फ मोदी ही देश में ऐसा कर सकते हैं, कदम-कदम पर राज्य सरकारें, और स्थानीय संस्थाएं भी ऐसा कर सकती हैं, उनको करना भी चाहिए। देश में बदलाव की एक हवा चल रही है, और सामंती तौर-तरीकों के खिलाफ जनता का बर्दाश्त खत्म हो रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला मोदी के लिए चुनौती...

28 अगस्त 2014
संपादकीय

कल सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार में दागियों को मंत्री बनाने के खिलाफ दायर की गई एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए जो बातें कहीं हैं, वे उस याचिका को मान लेने से भी ऊपर हैं। यह साफ है कि अदालत के हाथ कानून से बंधे रहते हैं, और उसके फैसले संविधान को पलटने वाले नहीं हो सकते। कभी-कभी सुप्रीम कोर्ट कुछ कानूनों को असंवैधानिक मानते हुए उनको खारिज भी करता है, लेकिन दागियों को मंत्री बनाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट को सरकार के अधिकार क्षेत्र में ऐसी दखल की गुंजाइश नहीं दिखी, और उसने अपनी राय के साथ गेंद प्रधानमंत्री के पाले में डाल दी।
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम हमेशा से यह बात लिखते आ रहे हैं कि जब कोई नेता अदालती कटघरे में खड़ा किया जाता है, उसके खिलाफ मुकदमा शुरू होता है, तो उसकी पार्टी को राजनीतिक या सरकारी ओहदों के लिए, किसी चुनाव की उम्मीदवारी के लिए उसके दूसरे विकल्प ढूंढ लेने चाहिए। ऐसा हमने कई बार लिखा, क्योंकि भारतीय राजनीति में यह आम चलन हो गया है कि दागी नेता पहले तो देश की आखिरी अदालत में आखिरी लड़ाई तक अपने सामने मौजूद कानूनी विकल्प की डोर थामे रहते हैं। दूसरी तरफ अदालतों में लगातार शिकस्त मिलने के बाद भी ऐसे नेता अपने आपको जनता की अदालत में बेकसूर साबित करने का दावा करते रहते हैं। इस तरह भारतीय लोकतंत्र ऐसे नेताओं का भरापूरा परिवार है जो कानून की अदालत और जनता की अदालत के बीच दौड़ लगाते हुए दोनों सिरों को धोखा देने की कोशिश करते हैं, और इन दोनों के बीच आने वाली जनता को भी धोखा देने में लगे रहते हैं।
यहां पर हम एक बार फिर पार्टी के ओहदों और सरकार की कुर्सियों के बीच एक बारीक फर्क करना चाहेंगे कि पार्टी तो एक घरेलू मामला मानी जा सकती है, लेकिन सरकार की कुर्सी तो एक संवैधानिक शपथ से बंधी हुई बात होती है, और वहां बैठे हुए लोग लोकतंत्र की रक्षा की जो शपथ लेते हैं, उनके खुद के कटघरे में रहने से वह शपथ बेमायने हो जाती हैं। कल सुप्रीम कोर्ट ने काफी खुलासे से अपनी बात कही है और संविधान की सोच बताई है। प्रधानमंत्री पर मंत्रियों को छांटने की संवैधानिक जिम्मेदारी आती है, और एक ऐसी पार्टी का प्रधानमंत्री अगर दागियों से परहेज नहीं करता है, जिस पार्टी को एक ऐतिहासिक बहुमत मिला है, और जो कद्दावर नेताओं से भरी-पूरी है, तो यह अफसोस की बात है। हम तो लगातार यह लिखते आए हैं कि पार्टी के पदों, चुनाव की उम्मीदवारियों के लिए भी अगर दागियों को छांटा जाता है, तो उसका एक मतलब यह निकलता है कि उस पार्टी में अब कोई गैरदागी काबिल नेता बचे ही नहीं हैं।
भारतीय लोकतंत्र में धीरे-धीरे संविधान की भावना का सम्मान खत्म हो चुका है। अब संविधान के शब्द ही किसी के हाथ-पैर बांध दें, तो बांध दें, वरना भावना की कोई जगह अब नहीं रह गई है। लोकतंत्र में संविधान महज शब्दों का ढेर नहीं होता, लोकतंत्र में संविधान के लिए हमेशा से यह कहा गया है कि उसमें शब्द भी होते हैं, और उसकी भावना भी होती है। आज की मोदी सरकार, या इसके पहले भी कोई दूसरी केन्द्र सरकार, या अलग-अलग प्रदेशों में कानून से लुका-छिपी खेलती हुई अलग-अलग पार्टियों की राज्य सरकारें, ये सब संविधान को शब्दों का ढेर मानकर चलती हैं, और अदालत से रियायत पाने में उसी अंदाज में मेहनत करती हैं, जिस अंदाज में कोई पेशेवर मुजरिम बचते चलता है। भारत जैसे विशाल और गौरवशाली लोकतंत्र में राजनीतिक ताकतों और सरकारों का अंदाज पेशेवर मुजरिमों से अलग रहना चाहिए, उनसे ऊपर रहना चाहिए। दागी लोगों से भरी हुई सरकारें चलाने वाली पार्टियों का आज यह नैतिक हक नहीं है कि वे मोदी को दागियों को निकालने को कहें, लेकिन अगर नरेन्द्र मोदी एक नए किस्म की राजनीति करना चाहते हैं, वे लोकतंत्र में अपना एक अलग नाम दर्ज करवाना चाहते हैं, तो उनको कल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सोचना चाहिए, और राह निकालनी चाहिए कि किस तरह भारतीय लोकतंत्र के तहत सरकारें दागियों से आजाद हो सकती हैं। दागियों को सलाम करने वाली सरकारी सलामी गारद वाला लोकतंत्र कभी गौरवशाली नहीं हो सकता। हम लोकतंत्र में एक-दूसरे के देखा-देखी ओछेपन को बढ़ाने के खिलाफ हैं, और हर किसी से उम्मीद करते हैं कि वे बेहतर परंपराएं कायम करने में हिस्सा बंटाएं। भारतीय लोकतंत्र में अदालत की संवैधानिक सीमाएं तो हो सकती हैं, जैसी कि कल सुप्रीम कोर्ट के फैसले में सामने आई हैं, लेकिन सरकार चला रहे नेताओं की नैतिकता की कोई सीमा नहीं होती, और प्रधानमंत्री खुद नए और बेहतर पैमाने खड़े कर सकते हैं।
 

सुलझाने के मुकाबले टालना भी कभी-कभी बेहतर होता है

27 अगस्त 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट से एक बड़ी दिलचस्प खबर आई है कि सवा सौ साल से अधिक वक्त से शिया, सुन्नी समुदायों के बीच चले आ रहे जमीन के एक झगड़े पर सुप्रीम कोर्ट 31 बरस पहले अपने ही दिए हुए एक फैसले पर अमल अगले और दस बरस तक नहीं चाहता। इन आंकड़ों को देखें, तो लगता है कि एक विश्व रिकॉर्ड बन रहा है कि कोई मामला कितने बरस चल सकता है, और उस पर आया हुआ फैसला कितने बरस तक बिना अमल के रह सकता है। दस बरस के बाद अगर सुप्रीम कोर्ट और दस बरस इस अमल को टालेगा, तो आधी सदी पूरी हो जाएगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसके पीछे की अपनी नीयत को साफ कर दिया है कि इस फैसले पर अमल के बिना ये दोनों समुदाय अगर अमन से रह रहे हैं, तो उस अमन को खतरे में क्यों डाला जाए? 
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तो एक कब्रगाह की जमीन को लेकर है, लेकिन लोगों को याद होगा कि आजादी की सालगिरह पर लालकिले से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कही एक बात कुछ इसी किस्म की थी। उन्होंने कहा था कि दस बरस के लिए इस देश के लोगों को साम्प्रदायिक मुद्दों को स्थगित कर देना चाहिए। कुछ उसी किस्म से जिस तरह की दो देशों के बीच, या दो फौजों के बीच युद्धविराम होता है, जैसा कि अभी इजराईल और फिलीस्तीन के बीच हुआ है। मोदी की कही वह बात उनकी कही बहुत सी दूसरी बातों के बीच खो गई, लेकिन हम उस बात के पीछे के तर्क को लेकर यहां कुछ बात करना चाहते हैं कि किस तरह बहुत से सुलगते हुए, ज्वालामुखी की तरह फूटे हुए, आग उगलते हुए मुद्दों को स्थगित रखकर टाला जा सकता है, नुकसान को और अधिक होने से रोका जा सकता है। 
पुराने लोगों को याद होगा कि भारत में उत्तर-पूर्व के राज्यों के कई विवाद ऐसे थे, जिनको इंदिरा गांधी ने सुलझाना ठीक नहीं समझा, और वे विवाद स्थगित रखे गए, कम से कम उनका इलाज स्थगित रखा गया। जैसे इस देश में अयोध्या में मंदिर और मस्जिद के झगड़े को एक तरह से स्थगित रखा गया है, कभी सरकार के स्तर पर, और कभी अदालत के स्तर पर, इसे लेकर रफ्तार से किसी फैसले या उस पर किसी अमल को टाला गया है। लोगों को यह लग सकता है कि यह हिन्दुस्तानी सरकार में हौसले की कमी का सुबूत है, या यह भी लग सकता है कि यहां कि अदालतें इस तरह कछुए की रफ्तार से चलती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि बहुत से मामलों में जब इलाज बीमारी के मुकाबले अधिक खतरनाक होने वाला दिखता है, तो उस इलाज से बचा जाता है। मेडिकल जुबान में ऐसी नौबत के लिए कहा जाता है कि नो सर्जरी, इज अ बेटर सर्जरी। मतलब यह कि मरीज का हाल ऐसा है कि सर्जरी न करना ही सबसे अच्छी सर्जरी होगी। 
मोदी की कही बात में साम्प्रदायिकता के साथ-साथ जाति की बात भी शामिल थी। उन्होंने कहा कि धर्म और जाति के विवाद दस बरस के लिए स्थगित करके देश को आगे बढ़ाने का ध्यान देना चाहिए। यह तर्क मोटे तौर पर सही है, और दुनिया के समझदार देशों के समझदार नेता कई नाजुक मामलों में ऐसा करने के लिए इतिहास में दर्ज भी हैं। हर वक्त हर बात का निपटारा, उसका चुकारा, जरूरी नहीं है कि सही हो। कई मामलों में खतरे को टालना भी बेहतर होता है, जिस तरह की किसी कैंसर को सर्जरी से छेडऩे पर अगर उसके फैल जाने का खतरा दिखता है, तो उसे नहीं छेड़ा जाता। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लेकर हम आज इतनी बातें लिख रहे हैं, वैसी एक व्यवहारिक समझदारी लोगों को अपनी रोज की जिंदगी में, घर के भीतर, समाज में, या किसी संस्था और संगठन में दिखाने की जरूरत रहती है। हर वक्त दो-दो हाथ कर लेने का रूख ठीक नहीं रहता। यहां इतना लिखने के बाद हम उम्मीद करते हैं कि लोग अपने आसपास बखेड़ों के ऐसे मुद्दों के बारे में सोचेंगे, जिनको टालना, उनको सुलझाने के मुकाबले बेहतर होगा। 

शहादत की इज्जत नहीं, दुनिया जीतने का घमंड

26 अगस्त 2014
संपादकीय
पिछले बरसों में कई ऐसे मौके आए जब किसी शहीद के परिवार ने यह मांग की कि जब तक प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री, कोई केन्द्रीय मंत्री या थल सेनाध्यक्ष, जब तक उनके घर नहीं पहुंचेंगे तब तक वे शहीद का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। यह बात बड़ी खबर बनती है और सरकार इसमें एकदम खलनायक सी बन जाती हैं। ऐसे में परिवार को मदद मिलने की गुंजाइश भी बढ़ जाती है, और कई मामलों में यह सामने आया है कि शहादत के बरसों बाद तक शहीद की बीवी-बच्चों, या मां-बाप को सही मुआवजा नहीं मिल पाता। अपने परिवार के बहादुर सदस्य और कमाऊ संतान को खोने वाले लोग तकलीफ के ऐसे दौर में भावनात्मक रूप से विचलित भी रहते हैं, और इस दहशत में भी रहते हैं कि यह मौका निकल जाने के बाद परिवार को उसके कानूनी हक मिल पाएंगे, या शहीद की अगली पीढ़ी भी सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते बूढ़ी होगी। 
हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में यह नौबत बहुत ही शर्मनाक है कि मोर्चों पर जो लोग जान देते हैं, उनकी दिलवाई गई हिफाजत तले महफूज बैठे हुए लोग अपनी कुर्सियां तोड़ते हैं, और शहादत के बाद परिवार के हक के साथ वैसा ही सुलूक करते हैं,जैसा कि किसी भी आम सरकारी फाईल के साथ करते हैं। यह देश कहने के लिए अपनी संस्कृति पर एक बेबुनियाद घमंड करता है, यह देश राष्ट्रवाद के उन्मादी नारे लगाते हुए पूरी दुनिया पर जीत हासिल करने, और दुश्मन को चीर देने की बात करता है। लेकिन यह देश किसी बहादुर के साथ, किसी शहीद के साथ, किसी खिलाड़ी-चैम्पियन के साथ जो सुलूक करता है, उससे भयानक खबरें उपजती हैं। दुनिया को जीतने का दावा करने वाले देश को पहले अपने आपकी हिंसा, बेईमानी, भ्रष्टाचार को जीतना होगा, और जब शहीदों के परिवारों को यह देश उनके हक का सम्मान और जमीन-पेंशन दे पाएगा, तभी उसको अपने आपको बचाने का भरोसा करना चाहिए। 
दरअसल भारतीय लोकतंत्र में सरकार का रूख इस कदर बेरहम रहता है, कि अभी कुछ समय पहले ही छत्तीसगढ़ में एक सरकारी दफ्तर में एक कर्मचारी को रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया। वह अपने ही विभाग के रिटायर हुए सहकर्मी की पेंशन के मामले में रिश्वत लिए बिना काम नहीं कर रहा था। यह बात भी जाहिर है कि ऐसे रिश्वतखोर कर्मचारियों को यह भी मालूम रहता है कि आने वाले दिनों में वे भी रिटायर होंगे, और उस दिन हो सकता है कि उनको भी अपने पेंशन के लिए धक्के खाने पड़ें। अब इस सिलसिले को तोडऩे के बजाय, वे भ्रष्टाचार के ऐसे ढांचे को मजबूत करने में लगे रहते हैं। हम आम भ्रष्टाचार की बात नहीं कर रहे, लेकिन जहां पर दिल को हिला देने वाले मामले रहते हैं, कामयाब खिलाडिय़ों के लिए सम्मान के मामले रहते हैं, शहीदों को हक देने के मामले रहते हैं, कुर्बानी देने वाले पुलिस वालों  के परिवार के मामले रहते हैं, वहां भी सरकार से लेकर समाज तक सब बेरहम साबित होते हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए। अगर लोगों के भीतर ऐसे मामलों में भी वह भावना नहीं जागेगी, जिसे कि इंसान इंसानियत कहकर उस पर फख्र करते हैं, तो यह डूब मरने की बात है। 

चुनावी नतीजों के बाद मोदी को कुछ आत्ममंथन की जरूरत

25 अगस्त 2014
संपादकीय

बिहार और कर्नाटक के उपचुनावों में भाजपा को कुछ झटका लगा है, और कुछ और राज्यों से नतीजे अभी आते जा रहे हैं। इन नतीजों को लेकर खासकर बिहार को गौर से देखा जा रहा था, क्योंकि वहां दो दशक बाद भाजपा के खिलाफ लालू-नीतीश-कांगे्रस का एक अलग किस्म का मोर्चा खड़ा हुआ था, और शायद देश में यह पहला मौका है जब केंद्र में भाजपा के स्पष्ट बहुमत के साथ बनी सरकार है, और भाजपा का विरोध करने के नाम पर बिहार के तमाम गैरभाजपा-गैरएनडीए दल एक हुए। एक वक्त था जब कांगे्रस विरोध के नाम पर पार्टियां एक होती थीं, और अब भाजपा विरोध के नाम पर यह असंभव सा लगता बिहारी गठबंधन कामयाब साबित हुआ है।
चुनावी नतीजों को लेकर बहुत सी बारीक बातों का विश्लेषण किया जा सकता है, और शाम तक वह होने भी लगेगा, लेकिन हम बारीक बातों से परे कुछ मुद्दों पर बात करना चाहते हैं, जिन पर भाजपा-एनडीए के सबसे बड़े नेता, कर्ता-धर्ता, और प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी को सोचना चाहिए। इन उपचुनावों के नतीजों से परे भी देखें, तो देश में मोदी सरकार और भाजपा को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर तुरंत कुछ बातें सोचने की जरूरत है। मोदी की दिखाई हुई शुरूआती सद्भावना के बावजूद आज चाहे जिसकी गलती की वजह से हो, सरहद से लेकर राजधानियों तक भारत और पाकिस्तान के बीच एक तनातनी चल रही है, गोलियां चल रही हैं, और बातचीत बंद है। दूसरी तरफ देश के भीतर भी बाजार की कीमतों के मोर्चे पर लोगों को अच्छे दिन आए हुए दिख नहीं रहे हैं। तीसरी अधिक जरूरी बात यह है कि भाजपा और उसके सहयोगी संगठन देश में जगह-जगह, अलग-अलग मोर्चो पर ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं, जिनका सार्वजनिक चर्चा से कोई हल निकलना नहीं है, और जिनसे साम्प्रदायिक तनाव, कट्टरता, और सामाजिक टकराव को खड़े होने और बढऩे का मौका मिल रहा है।
हमको नहीं लगता कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी सरकार के सौ दिन भी पूरे होने के पहले इस तरह के टकराव को बढ़ावा दे रहे होंगे। अभी जो उपचुनाव हुए हैं, उनके नतीजों से अगर भाजपा और उसके सहयोगियों को कोई सबक लेना चाहिए, तो वह गैरजरूरी तनाव से परहेज करने का है। खुद प्रधानमंत्री ने लालकिले से अपने भाषण में दस बरस के लिए साम्प्रदायिक मुद्दों से परहेज करने की अपील की थी। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके साथी उनकी इस अपील को सुनेंगे। जैसे-जैसे मोदी सरकार अपने सौ दिनों की तरफ बढ़ रही है, वैसे-वैसे उसे जनता से मिली रियायत का वक्त खत्म होने जा रहा है। इन सब बातों को देखकर मोदी और उनके साथियों को कुछ विश्लेषण और कुछ आत्ममंथन करना चाहिए।

पे्रम, विवाह, और जुर्म से भारत में उपजतीं सामाजिक जटिलताएं

24 अगस्त 2014
संपादकीय

भारत में अलग-अलग जातियों और धर्मों के बीच होने वाली शादियां देश की एकता को मजबूत करने वाली बन सकती थीं, या बन सकती हैं। लेकिन आज देश के कुछ हिस्सों में माहौल इतना जहरीला हो गया है कि कई जातियों की पंचायतें एक गोत्र के भीतर होने वाली शादियों के खिलाफ मौत के फरमान जारी करती हैं, दूसरी जाति में शादी करने पर कुछ मां-बाप अपने बच्चों को कत्ल कर देते हैं, और दूसरे धर्म में शादी होने पर वह एक बड़ा साम्प्रदायिक मुद्दा भी बन जाने का खतरा रहता है। भारत में राजनीतिक और सामाजिक ताकतें अपने परंपरागत ढांचों को बचाए रखने के लिए यह जरूरी समझती हैं कि कट्टरता कायम रहे, ताकि उनका कारोबार चलता रहे। इसलिए देश में आज हो रहे बलात्कार को लेकर, या दूसरे किस्म के सेक्स-अपराधों को लेकर लगातार धर्म के आधार पर ऐसी घटनाओं को देखकर उस तर्क के साथ ही उनका विश्लेषण होता है, उन पर नतीजे निकाले जाते हैं। 
लेकिन इस चर्चा में इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि दो धर्मों के लोगों के बीच के प्रेम संबंधों में, शादियों में, या सेक्स-अपराध के मामलों में अगर अधिकतर मामले किसी एक धर्म के लड़कों-आदमियों से जुड़े रहते हैं, और ऐसी घटनाएं लगातार होती हैं, तो लोग खबरों के आधार पर और पुलिस-सरकार के आंकड़ों के आधार पर धार्मिक या साम्प्रदायिक विश्लेषण किए बिना नहीं रहेंगे। हम दो धर्मों के लोगों के बीच, या दो जातियों के लोगों के बीच शादियों के हिमायती हैं, लेकिन जब देश का माहौल तनाव से भरा हुआ है, तो ऐसे प्रेम-प्रसंगों या शादियों के बाद अगर किसी जुर्म की नौबत आती है तो उसका असर पूरे समाज की साख पर भी पड़ता है। ऐसा किसी एक जाति के भीतर अधिक कन्याभू्रण हत्या होने से, या दहेज प्रताडऩा होने से भी होता है, लेकिन एक जाति के भीतर, एक धर्म के भीतर होने से उनमें साम्प्रदायिक तनाव की आशंका नहीं रहती। 
आज सबसे पहले लोगों को खुद जुर्म से बचने की जरूरत है ताकि  वे समाज के सामने एक गलत मिसाल न बनें। इसके बाद परिवार को सावधान रहने की जरूरत है कि उसके भीतर का कोई सदस्य किसी किस्म के जुर्म में शामिल न हो। और इसके बाद समाज को भी चौकन्ना रहना चाहिए कि उसके लोग कोई गलत काम न करें, कोई जुर्म न करें। हमारा यह मानना है कि अगर पे्रम और विवाह के बाद कोई बुरी बातें सामने नहीं आती हैं, कोई ज्यादती नहीं होती है, जुर्म नहीं होता है, तो समाज के दकियानूसी लोगों को भी अंतरजातीय और अंतरधर्मीय शादियों के खिलाफ तर्क नहीं मिलेंगे। अच्छी मिसालें दबी जरूर रह जाती हैं, चर्चा में कम आती हैं, खबर कभी भी नहीं बनतीं, लेकिन यह बात तो समाज और दुनिया की हर अच्छी मिसाल के साथ होती है। जब लोग धर्म और जाति के बंधन तोड़कर प्रेम और विवाह करते हैं, तो उनको इस सामाजिक चुनौती का भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी नाकामयाबी उनकी तरह के बाकी हजारों लोगों के खिलाफ तर्क बनाकर इस्तेमाल की जाएगी। आज समाज का कुछ दकियानूसी तबका जाति, धर्म, या रक्त की शुद्धि का तर्क बनाकर देश को अलग-अलग तबकों में बांटे रखना चाहता है। इस तस्वीर को बदलना आसान नहीं है, और जहां-जहां किसी किस्म की हिंसा या ज्यादती एक आधुनिक उदारता की तस्वीर को बिगाडऩे के लिए खड़ी हो जाती हैं, वहां उनको तुरंत सुधारने की जरूरत है। ऐसा न होने पर साम्प्रदायिक ताकतों को तुरंत ही ओवरटाईम करने के लिए रोजगार मिल जाता है। देश में कई संगठन ऐसा करके अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं, और ऐसे नफरत की नौबत न आने देना हर समझदार की जिम्मेदारी है। इसलिए हर किसी को अपने खुद को हिंसा और जुर्म से बचाना चाहिए, और फिर परिवार और समाज को भी ठीक रखना चाहिए।

असहमति के खिलाफ चल पड़ा है हिंदुस्तान

23 अगस्त 2014
संपादकीय

फोटोग्राफी और रंगों की दुनिया में काले और सफेद के बीच हल्के और गाढ़े सलेटी रंग का एक समंदर सा होता है, और यह पता नहीं चलता कि कब बात काले से निकलकर सफेद पर आ गई। ऐसा जिंदगी में भी होना चाहिए कि काले और सफेद दो सिरों के बीच हल्के और गाढ़ेपन की विविधता की खासी चौड़ी जगह होनी चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है। लोग इन दिनों अपना बर्दाश्त जितना खो रहे हैं, उससे कहीं अधिक जाहिर भी कर रहे हैं। फिर चाहे वह पाकिस्तान की सड़कों पर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के खिलाफ प्रदर्शन हो, या दिल्ली में खासे अरसे तक चला केजरीवाल का प्रदर्शन हो, या कल कर्नाटक में विख्यात साहित्यकार और विचारक यू.आर. अनंतमूर्ति के गुजरने पर हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा सड़क पर मनाई गई खुशी हो। लोगों के भीतर परस्पर विरोधी विचारधारा के खिलाफ बर्दाश्त घट रहा है, असहमति या विविधता के लिए सम्मान घट रहा है, और इन सबका हिंसक प्रदर्शन बढ़ते चल रहा है। 
भारत के लोकतंत्र में बात करें, तो जिंदगी के हर दायरे में राजनीति और धार्मिक कट्टरता का इतना बोलबाला हो गया है, कि जिंदगी की बहुत महीन और नाजुक बातें इन नारों और भालों तले कुचल गई हैं। लोग कांगे्रस-समर्थक अगर नहीं हैं, तो वे साम्प्रदायिक हैं, वे अगर भाजपा-समर्थक नहीं हैं, तो वे छद्म धर्मनिरपेक्ष हैं। ऐसे कुछ तबके गढ़ लिए गए हैं, और हर किसी को इन्हीं सांचों में नापा-परखा जा रहा है। विविधता को भारत की सोच से उसी तरह खत्म किया जा रहा है, जिस तरह अमरीका ने बुश के वक्त किया था, जब उसने यह चेतावनी दी थी कि दुनिया के देश या तो इराक पर अमरीकी हमले के साथ हैं, या फिर वे आतंक के हिमायती हैं। इन दोनों के बीच कोई और तबका रहने की गुंजाइश रखी नहीं गई थी। भारत में भी आज माहौल कुछ इसी तरह का है। 
और मोदी सरकार आने के बाद अगर इस सरकार की किसी खूबी या अच्छी बात को लेकर उसकी तारीफ की जाए, तो एक तबका तुरंत यह मान लेता है, और करार देता है कि ऐसी तारीफ करने वाले सत्ता बदलने के साथ धर्मांतरण कर चुके हैं। इसी तरह मोदी सरकार की किसी बात पर, उनके साथियों की किसी बात पर आलोचना की जाए तो बहुत से लोग तुरंत ही ऐसे आलोचकों के खिलाफ गालियां शुरू कर देते हैं, और उन्हें गद्दार, पाकिस्तानी, आतंकी, नक्सली, या इसी तरह के और कुछ तमगे देने लगते हैं। 
भारत में आज समाज के मुखर और सक्रिय तबके को यह हड़बड़ी लगती है कि वह समाज को अपने मुताबिक ढाल ले, अपने सांचों में फिट करके देख ले कि वे राष्ट्रपे्रमी हैं, या देशद्रोही। नतीजा यह हो रहा है कि भारतीय समाज में सोच की विविधता उसी तरह खत्म हो रही है जिस तरह बड़ी कंपनियों के हमलावर कारोबार की वजह से खेती की विविधता खत्म हो रही है, पेड़ों की विविधता खत्म हो रही है, जीव-जंतुओं की विविधता खत्म हो रही है। कुदरत की समझदार सोच को खत्म करके बाजार में खपने लायक पैकिंग में गिने-चुने किस्म की सोच को कारोबारी बाजार में चला रहे हैं। और राजनीति में यही हाल हो रहा है, सामाजिक मोर्चों पर यही हाल हो रहा है। हिंदुस्तान में वैचारिक विविधता और असहमति पर आधारित विचार-मंथन की संभावनाओं को खत्म किया जा रहा है। यह एक समाज के विकसित होने की संभावनाओं को खत्म करने से कम कुछ नहीं है। 

इस पार्टी में महज नाम में ही समाजवाद है, और कहीं नहीं

22 अगस्त 14
संपादकीय

समाजवादी सोच की सरकार चलाने का दावा करने वाले तानाशाह, कुनबापरस्त, अलोकतांत्रिक मुलायम-कुनबे के राज से आखिरी अच्छी खबर कब आई थी, यह याद नहीं पड़ता है। अब वहां इस सरकार के बड़बोले और विवादास्पद मंत्री आजम खान के बारे में खबर आई है कि उनके घर के लिए प्रदेश के बाहर से आ रही भैंसों को प्रदेश की सीमा पर पुलिस ने अपनी हिफाजत में लिया, और भैंसों की गाड़ी को सायरन और लालबत्ती के साथ लाकर रास्ते में उनके ठहरने-खाने-पीने का इंतजाम किया, उनको मच्छरों से बचाने का इंतजाम किया। 
यह सिलसिला आजादी की आधी-पौन सदी के बीच का है, और भयानक है। वैसे तो उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी में समाजवाद महज उसके नाम में है, और उसके काम का कोई भी हिस्सा इस सोच को छूता भी नहीं है, बल्कि हकीकत यह है कि यह पार्टी उस सोच के ठीक खिलाफ चलती है। लेकिन अगर नाम पर न जाएं, तो वामपंथियों और शायद ममता बैनर्जी जैसी एकाध और पार्टी को छोड़ दें, तो सादगी तो मानो कोई अलोकतांत्रिक बात है, और उसे भारतीय लोकतंत्र से देश निकाला दे दिया गया है। निर्वाचित लोगों से लेकर दूसरे किसी भी तरह की सत्ता पर काबिज लोगों का सामंती रूख देखते ही बनता है, या कहने का दूसरा तरीका हो सकता है कि देखते नहीं बनता है। लोग सत्ता का बेजा इस्तेमाल इस तरह करते हैं, मानो वे सत्ता पर ही पैदा हुए थे, और सत्ता पर ही खत्म होंगे, अगली पीढिय़ों के लिए सत्ता की विरासत छोड़कर। 
गांधी की कांग्रेस से लेकर आरएसएस की भाजपा तक, इन दोनों के लोगों के तौर-तरीकों में जब जनता के पैसों की फिजूलखर्ची की सोच एक सरीखी हो गई, तो पंजाब में अकाली बाप-बेटे के लिए करोड़ों की कारें भी जायज हो जाती हैं, मायावती का सैकड़ों करोड़ का बंगला भी जायज हो जाता है, जयललिता के करोड़ों के गहने भी जायज हो जाते हैं, जगनमोहन की सैकड़ों करोड़ की दौलत भी जायज हो जाती है, और दिल्ली-गुडग़ांव इलाके में चौटालाओं की अरबों की दौलत भी जायज हो जाती है। काली कमाई से परे, जनता की नजरों के सामने, जनता के पैसों से जिस तरह के ऐशोआराम और अय्याशी की संस्कृति भारत में आम हो गई है, उसके चलते शहरों में भी अमन-पसंद लोगों के मन में कई बार नक्सलियों जैसी हिंसक बातें उठ खड़ी होती हैं, लेकिन फिर आम लोगों के हक इस लोकतंत्र में कुछ भी नहीं होने की वजह से लोग अपने मन की ऐसी हिंसक बातों को मार-मारकर बिठा देते हैं। 
अब अगर इसका कोई इलाज सोचें, तो अदालती रास्ता दिखता है, लेकिन भारत में अदालतें खुद लालबत्ती और सायरनों के साथ चलते हुए, अपने खुद के लिए सहूलियतें जुटाते हुए, दूसरों की तरफ संविधान की उंगली उठाने का हक कुछ हद तक तो खो ही चुकी हैं। ऐसे में आखिर क्या इलाज निकल सकता है? कैसे जनता के हक की सरकारी सुविधाएं, उसके खून-पसीने के हक वाले पैसे का बेदर्दी से सरकारी, संवैधानिक, संसदीय, और अदालती बेजा इस्तेमाल कम किया जा सकता है? घूम-फिरकर एक बार फिर अदालती रास्ता दिखता है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में शायद कोई ऐसे जज कभी मिल जाएं जो कि सत्ता के बेजा इस्तेमाल के खिलाफ कुछ कड़े आदेश देकर कुछ मजबूत परंपराएं कायम करें, और नेताओं से, सत्ता के दूसरे भागीदारों से वसूली करके बाकी लोगों के लिए एक नसीहत भी पेश करें। आज सूचना के अधिकार से लेकर मीडिया के चौकन्नेपन तक ने मिलकर ऐसे बहुत से बेजा इस्तेमाल उजागर किए हैं, और जनता के पैसों की ऐसी फिजूलखर्ची, बर्बादी के खिलाफ जनता को आपस में बात भी करनी चाहिए। 

पीएम-सीएम की सभाओं में दलीय राजनीति गलत परंपरा

21 अगस्त 2014
संपादकीय
हरियाणा में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के मंच पर रहते हुए, एक सरकारी समारोह के दौरान वहां मौजूद लोगों की तरफ से जब कांग्रेसी मुख्यमंत्री के खिलाफ नारेबाजी हुई, तो केन्द्र और राज्य के संबंधों में एक नए किस्म का तनाव खड़ा हो गया। ऐसा माना गया कि प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषण में इशारों में कुछ बातें कांग्रेसी मुख्यमंत्री या सरकार की असुविधा की कही थीं, और जनता ने भी कांग्रेसी सीएम के खिलाफ नारे लगाए। यही बात आज सुबह झारखंड में दोहराई गई जहां फिर एक सरकारी समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन मंच पर थे, और वहां हेमंत सोरेन के खिलाफ नारेबाजी हुई। झारखंड मुक्ति मोर्चे के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी की तरफ से इस नारेबाजी के बाद वह चि_ी सार्वजनिक की गई है जो कि कल हरियाणा की कड़वी घटना के बाद मोर्चे ने प्रधानमंत्री को भेजी थी। दूसरी तरफ आज इस वक्त नागपुर में प्रधानमंत्री का एक और सरकारी कार्यक्रम चल रहा है, लेकिन महाराष्ट्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने पहले ही यह सार्वजनिक घोषणा कर दी थी कि प्रधानमंत्री के हाल के कार्यक्रमों का हाल देखते हुए वे उनके कार्यक्रम से दूर रहेंगे। 
हम इसे केन्द्र और राज्य के संबंधों के बीच एक निहायत गैरजरूरी, और अप्रिय स्थिति मानते हैं। यह नौबत ठीक नहीं है कि सरकारी कार्यक्रमों में किसी भी एक नेता के खिलाफ, या पार्टी के खिलाफ राजनीतिक नारेबाजी हो, या प्रदर्शन हो। भारत जैसे संघीय ढांचे में केन्द्र और राज्य को सरकार के रूप में भी मिलकर बहुत से ऐसे काम करने पड़ते हैं, करने चाहिए, जो कि राजनीति से परे रहते आए हैं और रहने भी चाहिए। आज अगर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के सामने बैठी भीड़ राजनीतिक प्रदर्शन करने लगे, तो किसी राज्य में मुख्यमंत्री के खिलाफ नारेबाजी हो जाएगी, और किसी राज्य में प्रधानमंत्री के खिलाफ। दरअसल सरकार और राजनीति को अलग-अलग रखने की जरूरत है। जो सरकारी कार्यक्रम होते हैं, उनमें भारत के लोकतंत्र को, केन्द्र और राज्य के साझा संबंधों को मजबूती के साथ सामने रखने का एक मौका रहता है, और ऐसी जरूरत भी रहती है। राजनीति करने के लिए अलग से राजनीतिक मंचों की कोई कमी नहीं रहती। 
हम इस बात के भी खिलाफ हैं कि केन्द्र या राज्य के मंत्री जब सरकारी हैसियत से, सरकारी मंच पर कोई प्रेस कांफ्रेंस लेते हैं, और वे खुद होकर या सवालों के जवाबों में जब वे राजनीतिक बात करने लगते हैं, तो हमारे हिसाब से वह सरकारी मंच का बेजा इस्तेमाल होता है। और यह कोई नई बात नहीं है, पिछली यूपीए सरकार के मंत्री तकरीबन रोज ही ऐसा काम करते थे, और उस वक्त भी हमने यह लिखा था कि राजनीतिक बातों को करने के लिए या तो पार्टी के प्रवक्ता होने चाहिए, या फिर मंत्री को भी अगर ऐसे बयान देने जरूरी लगते हैं, तो उनको गैरसरकारी मौकों पर ही ऐसा करना चाहिए। भारत में आने वाले न जाने कितने बरसों तक केन्द्र और राज्य में अलग-अलग, परस्पर विरोधी पार्टियों की सरकारें आती-जाती रहेंगी। ऐसे में प्रधानमंत्री के किसी राज्य में जाने पर, उन मंचों या समारोहों का राजनीतिक नारेबाजी या प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल एक गलत सिलसिला है, और इसके पीछे जिस नेता के हिमायती उत्साह दिखाते हैं, उसी नेता को या पार्टी को कड़ाई से इस बात को रोकना चाहिए। 
भारत में केन्द्र और राज्य के संबंध वैसे भी अधिकारों के बंटवारों को लेकर, बजट को लेकर, और बहुत सी दूसरी बातों को लेकर तनावों से घिरे चलते रहते हैं। ऐसे में अगर टकराव की नौबत बढ़ती है, तो उससे सीधे-सीधे तो राज्य का नुकसान होते दिखेगा, लेकिन कुल मिलाकर देश का नुकसान होगा, और इसके लिए केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री को ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा। प्रधानमंत्री को इस मामले में सीधे पहल करनी चाहिए, और यह बात औपचारिक रूप से सभी तबकों को बता देनी चाहिए कि लोकतंत्र के तहत संघीय ढांचा किसी भी दलीय राजनीति से अधिक महत्वपूर्ण है और उसका वैसा ही सम्मान किया जाना चाहिए। 

भारतीय लोकतंत्र में आया ओवरटाईम मेहनत का दौर

20 अगस्त 2014
संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बनाए जाने पर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जो तर्क उठाए जाते रहे, उन तर्कों के अलावा, और उनसे बढ़कर भी कुछ तर्क अमित शाह को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के खिलाफ उठे। वे अदालतों में गंभीर मामलों में उलझे हुए हैं, और जमानत पर छूटे हुए हैं। लेकिन सफलता के साथ बहस नहीं होती, और कामयाब के साथ कुश्ती नहीं होती। इसलिए भाजपा को ऐतिहासिक कामयाबी दिलाने वाले नरेन्द्र मोदी ने जब अपने दाएं हाथ की ताजपोशी की, तो भाजपा के भीतर अमित शाह के मुकाबले किसी नाम की चर्चा भी नहीं हुई। हम आज के बाद के बरसों की बात करें, और पीछे की बात अदालतों पर छोड़ दें, तो अमित शाह के साथ न सिर्फ भाजपा में बल्कि देश के राजनीतिक दलों में लीडरशिप का एक नया दौर शुरू हुआ है, जो कि बिल्कुल अलग अंदाज का है। 
आज हम इस नए दौर पर ही चर्चा करना चाहते हैं, जो कि पत्नी, और अपनी मां के परिवार से ही अलग अकेले रहने वाले नरेन्द्र मोदी की राजनीति से शुरू हुआ है, और परिवारवाद से परे रहने वाले अमित शाह तक आगे बढ़ा है। मोदी प्रधानमंत्री और शाह सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष। इन दोनों का कुनबापरस्ती से परे का जीवन, और हर दिन ओवरटाईम करने के अंदाज में काम करने का रोजमर्रा का ढर्रा, भारतीय राजनीति में एक बिल्कुल ही अनोखी और अलग बात है। कुछ वामपंथी राज्यों में कभी-कभी ऐसा देखने में आया था, लेकिन उनसे परे किसी बड़ी पार्टी में कभी ऐसा नहीं हुआ था कि परिवार से अलग-थलग और इतनी अधिक मेहनत करने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष आए हों, और जिनकी इतनी महत्वाकांक्षा हो, जो इतने सक्रिय हों, और जिनके साथ इतना मजबूत प्रधानमंत्री हो। 
आज देश की बाकी पार्टियों को एक नजर देखें, तो कांग्रेस एक कुनबे तक सीमित, उसी कुनबे पर आश्रित, पिछले बरसों में हर किस्म के गलत काम कर चुकी, और आज भी चौराहे पर खड़ी पार्टी की तरह रह गई है, जिसे देश ने पूरी तरह और बुरी तरह खारिज भी कर दिया है। हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले दो-तीन बरसों से लगातार हम कांग्रेस को आगाह करते आ रहे थे कि वह इस देश में विपक्ष भी नहीं बचेगी, उस वक्त हमको खुद यह अहसास नहीं था कि हमारी बात लोकसभा के भीतर विपक्ष के दर्जे के मामले में शब्दश: सही साबित होगी। हम तो कांग्रेस के देश में विपक्ष न रह जाने की बात कर रहे थे, लेकिन उस पार्टी में वैसी बातों को सुनने की गरज किसी को नहीं थी। इससे परे आधा दर्जन बड़ी पार्टियों को देखें, तो अन्नाद्रमुक  अपनी कुलदेवी जयललिता के चरणों तले जीती और पलती हुई पार्टी है। उत्तर भारत में सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा वाली समाजवादी पार्टी अपने कुनबे के बोझ से दबकर लुग्दी सी बन गई है, और यही हाल एक दूसरे कुनबे लालू का हुआ, यही हाल दक्षिण भारत में करूणानिधि की द्रमुक का हुआ। पंजाब में एक और कुनबे के घर से चलती पार्टी अकाली दल को पिछले चुनाव में नुकसान सामने आया, और आगे आ भी सकता है। पूरा हरियाणा कुनबों से पटा है, वहां की पार्टियों को अलग-अलग गिनना मुश्किल है। उत्तर भारत की ही एक और बड़ी संभावनाओं वाली बड़ी पार्टी, बसपा का हाल जयललिता की अन्नाद्रमुक जैसा है, और वह अपनी मालकिन मायावती की मनमानी के बोझ तले पिस रही है। उधर वामपंथ के एक बड़े गढ़ रहे बंगाल में वामपंथी अंदाज के ठीक खिलाफ एक तानाशाह ममता बैनर्जी की पार्टी है, जिसमें उनके अलावा किसी दूसरे का नाम भी किसी को नहीं मालूम है। ऐसी और भी बहुत सी मिसालें हैं, जिनमें महाराष्ट्र की शिवसेना है, कश्मीर की दोनों बड़ी पार्टियां हैं, आन्ध्र और तेलंगाना में मनमानी उजागर कर रहीं, वहां की क्षेत्रीय पार्टियां हैं। 
कुल मिलाकर हम भारत की एक ऐसी राजनीतिक तस्वीर देखते हैं, जिनमें राजनीतिक दल अपने-अपने कुनबों तले कराह रहे हैं, जिनमें लोग राजनीतिक ताकत को दुह रहे हैं, और अनुपातहीन संपत्तियों के मामलों में अदालतों में खड़े हैं, सैकड़ों और हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार में फंसे हुए हैं। ऐसे में मोदी और अमित शाह, परिवार और कुनबापरस्ती के खिलाफ, पूरे वक्त काम करने वाले ऐसे नेता बनकर सामने आए हैं, जिनके बारे में कोई मंत्री यह कह रहा है कि महीने भर में उसका तीन किलो वजन गिर गया, क्योंकि प्रधानमंत्री चैन से बैठने नहीं देते। और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि मोदी न खुद सोते हैं, और दूसरों को सोने देते हैं। एक देश के प्रधानमंत्री की शक्ल में हमने एक मजदूर की तरह काम करते मनमोहन सिंह को भी देखा था, लेकिन ऐसी मजदूरी किस काम की थी कि अपने आसपास की, अपने मातहतों की, लूटपाट और डकैती की तरफ से मुखिया ने आंखें बंद कर रखी हों। ऐसे में खुद मेहनत करने, दूसरों से मेहनत करवाने, और कुनबापरस्ती को परे रखने की दो-तीन बुनियादी शर्तों वाले इन दो नेताओं के काम से इनके सहयोगी दलों में भी एक बेचैनी हो रही है, अपनी खुद की पार्टी के बहुत से नेताओं के लिए भी ये ऊंचे पैमाने बड़ा ऊंचा दबाव बनकर आए हैं। हम इन दोनों की नीतियों और सिद्धांतों की अभी बात नहीं कर रहे, क्योंकि उनके लिए वे विधायिका से लेकर न्यायपालिका तक जवाबदेह रहते आए हैं और जवाबदेह रहते रहेंगे, लेकिन राजनीति और सरकार की चोटी पर जिस तरह की मेहनत और काम की एक नई संस्कृति दिखाई पड़ रही है, वह अगर सही दिशा में जाती है, तो पार्टी और सरकार इन दोनों की उत्पादकता बहुत अधिक बढऩे की एक संभावना है, जो कि बाकियों के सामने भी हमेशा ही थी, लेकिन वे लोग कुनबों में मस्त थे, कुनबों में मस्त हैं, और आखिर में शायद उनके पास सिर्फ कुनबे ही बचेंगे। भारतीय लोकतंत्र में राजनीति और सरकार को हरामखोरी की जगह माना जाता था, अब वहां पर ओवरटाईम मेहनत का नया दौर देखने लायक है।

महिलाओं पर जुल्म के मामलों में भारत और पड़ोस के देश

19 अगस्त 2014
संपादकीय

इराक में कट्टरपंथी मुस्लिम आतंकी संगठन आईएसआईएस वहां की सरकार को बेदखल करने के लिए एक फौज की तरह लड़ाई भी लड़ रहा है, और दूसरे धर्मों के लोगों को थोक में मार भी रहा है। आए दिन खबर आती है कि कितने सौ लोगों को उसने मार दिया है। लेकिन उस बीच एक खबर तस्वीरों के साथ यह भी आती है कि इराक की कुर्द महिलाएं इन हथियारबंद लड़ाकू बागियों के खिलाफ किस तरह फौजी मोर्चा सम्हालकर बड़े-बड़े हथियार चला रही हैं। ये महिलाएं इराक की फौज का हिस्सा हैं, और अपने समुदाय को खत्म होने से बचाने के लिए भयानक लड़ाई के मोर्चे पर जुटी हुई हैं। इन तस्वीरों को देखें तो याद पड़ता है कि भारत की फौज में भी महिलाओं को मोर्चों पर तैनात नहीं किया जाता। दूसरी तरफ पाकिस्तान की कुछ तस्वीरें लगातार आती हैं जिनमें वहां की महिलाएं वायुसेना के बम गिराने वाले फाईटर विमानों को उड़ाते दिखती हैं। भारत में महिलाओं को लड़ाकू विमान उड़ाने के काम पर नहीं रखा जाता। 
इस बात की तुलना हम इसलिए कर रहे हैं कि जो इस्लामी या मुस्लिम देश महिलाओं को बराबरी का दर्जा न देने के लिए जाने जाते हैं, वहां पर भी महिलाएं ऐसे खतरों के बीच, कट्टरपंथी आतंकियों के बीच, इस्लामी कानूनों के बीच भी फौज के मोर्चों पर काम कर रही हैं। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में जहां कहने को लोकतंत्र महिलाओं को बराबरी के दर्जे से अधिक ऊंचा दर्जा देता है, जहां महिलाओं के हक के लिए अधिक कानून बनाए गए हैं, वहां पर महिलाओं से बलात्कार की खबरें रोजाना इतनी अधिक आती हैं, कि मानो उनमें से कुछ को नमूने के तौर पर खबरों में जगह मिलती है। आमतौर पर भारत की महिलाओं को बहुत से मुस्लिम देशों की महिलाओं के मुकाबले मौके अधिक मिलते हैं, बराबरी अधिक मिलती है, लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों इस देश में बलात्कार और महिलाओं पर जुल्म इस कदर होते हैं कि वे न किसी मुस्लिम देश में सुनाई पड़ते, और न ही किसी इस्लामी व्यवस्था में। 
आज भारत में हिन्दू संस्कृति और भारतीय संस्कृति को लेकर एक अलग बहस छिड़ी हुई है। हम उसी सिलसिले में भारत में महिलाओं की हालत पर यह बात छेडऩा चाह रहे हैं, कि देवी पूजा वाली हिन्दू संस्कृति से लबालब इस देश में महिलाओं के खिलाफ इतने जुर्म क्यों होते हैं, जितने कि किसी मुस्लिम देश या समाज में नहीं होते? और फिर जिस तरह की कन्या भ्रूण हत्या, दहेज हत्या, बलात्कार, ये सब इस हिन्दू बहुल भारत में होते हैं, वैसे तो किसी मुस्लिम देश में नहीं होते। वहां पर महिलाओं से गैरबराबरी के दूसरे मामले जरूर हैं, लेकिन अजन्मी बच्चियों को मारने से लेकर दहेज हत्या तक, और इस हद तक बलात्कार तो उन देशों में कहीं सामने नहीं आते। 
भारत को अपने उदार कानून के साथ-साथ इस जमीनी हकीकत को देखना चाहिए, और पड़ोस के कई मुस्लिम देशों के गैरबराबरी के कानून के साथ वहां की महिलाओं की एक दूसरी किस्म की हकीकत को भी देखना चाहिए। और फिर यह सोचने की जरूरत है कि हिन्दुओं की अधिक आबादी वाले इस देश में, हिन्दू समाज में ही अधिकतर कन्या भ्रूण हत्या से लेकर दहेज हत्या तक के मामले क्यों होते हैं? और बलात्कार के मामले में भी हिन्दू संस्कृति मानने वाले लोग अगर दूसरी संस्कृतियों के लोगों से आगे नहीं हैं, तो शायद पीछे भी नहीं हैं। ऐसे में यह सोचना चाहिए कि यह संस्कृति अपने लोगों को बेहतर इंसान क्यों नहीं बना पा रही है? 

यही है सही

18 अगस्त 2014
पिछले दो दिनों में दो बड़ी अदालतों के फैसले कुछ राहत वाले रहे। मद्रास हाईकोर्ट ने एक फिल्म पर रोक लगाने से इंकार कर दिया, और सुप्रीम कोर्ट ने एक दूसरी फिल्म के मामले में यही रूख दिखाते हुए कहा कि अगर फिल्म पसंद नहीं है तो देखने न जाएं। 
पिछले कई बरसों से लगातार फिल्म और कला को लेकर अधिकतर पार्टियों की सरकारें, और अदालतें भी इतना दकियानूसी नजरिया दिखा रही थीं कि विचारों की आजादी, कलात्मक अभिव्यक्ति का अधिकार, और यहां तक कि ऐतिहासिक सच को लिखना भी नामुमकिन हो चला था। किसी धर्म, जाति, समुदाय, व्यक्ति के बारे में लिखना, उसकी तस्वीर बनाना, उस पर फिल्म बनाना या नाटक करना एक खतरनाक काम हो गया था, और हो गया है। इन दो अदालतों के इन ताजा फैसलों से तस्वीर बहुत बदलने वाली तो नहीं है, क्योंकि आज भी दीनानाथ बत्रा जैसे हिंदू संस्कृतिवादी आंदोलनकारी अदालती कार्रवाई की धमकी देकर प्रकाशकों से इतिहास की किताबों को लुग्दी में बदलवा रहे हैं। और जब किसी के कानूनी नोटिस कोई प्रकाशक खुद ही डर-सहमकर पूरी की पूरी किताब ही खत्म कर दे, तो फिर उसमें तो अदालत खुद होकर दखल दे भी नहीं सकती। 
लेकिन पिछली कई फिल्मों पर तरह-तरह की अदालती रोक के लंबे सिलसिले के बाद अब यह राहत की एक बात है कि एक हाईकोर्ट ने अपने-आपको सुपर सेंसर बोर्ड बनाने से इंकार कर दिया, और दूसरी अदालत ने, सुप्रीम कोर्ट ने यह समझदारी का रूख दिखाया है कि जिन्हें फिल्म पसंद न हो, वे न देखें। 
हिंदुस्तान में यह भी समझने की जरूरत है कि पूरे देश के लिए एक सेंसर बोर्ड बना है, और देश के कुछ इलाकों के लिए फिल्मवालों का काम आसान करने को उसकी क्षेत्रीय शाखा भी बनी हुई है। ऐसे में उसमें अलग-अलग बहुत से जानकार लोगों के फिल्म देख लेने के बाद, उस पर सोच-विचार कर लेने, जरूरी लगते फेरबदल करवा लेने के बाद देश के किसी एक जिले की कोई एक छोटी सी अदालत भी जब बिना फिल्म देखे फिल्म से जुड़े लोगों को नोटिस भेजकर हाजिर होने को कहने लगती है, तो लगता है कि राष्ट्रीय स्तर पर बने हुए सेंसर बोर्ड का मतलब क्या है? 
लेकिन बात सिर्फ फिल्मों और सेंसर बोर्ड की नहीं है, आज जिंदगी के हर दायरे में, इंटरनेट पर पोस्ट की गई किसी बात या तस्वीर को लेकर, किसी भाषण के हिस्से को लेकर, किताब या लेख को लेकर, एक छोटी सी ट्वीट को लेकर जिस तरह से लोग कानून का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं, वह सिलसिला थमना चाहिए। इसी गोल धरती के दूसरे तरफ पश्चिम के कई देश ऐसे हैं जहां पर इनमें से एक भी केस अदालत में खड़ा नहीं हो सकता, क्योंकि वहां एक विकसिल सभ्यता अभिव्यक्ति की ऐसी आजादी की हिमायती है, जिसमें किसी धर्म के खिलाफ कहना और करना भी कानूनी है। हम आजादी के उस ऊंचे पैमाने की कल्पना भारत में अगले सौ-पचास बरस भी नहीं करते जिसमें कि एक धर्म का पादरी दूसरे धर्म की किताब को सार्वजनिक रूप से जलाता है, और यह पूरी तरह कानूनी भी रहता है। एक देश के काटूनिस्ट दूसरे देश में अधिक प्रचलित एक धर्म पर कार्टून बनाते हैं, और उनको इसकी इजाजत रहती है। हम अभी ऐसे किसी हक की वकालत नहीं कर रहे, लेकिन जिंदगी की आम बातों पर भी जब कानून का नाम लिखी लाठी लेकर पाखंडी कट्टरपंथी टूट पड़ते हों, तो वैसे देश में ये दो अदालती फैसले राहत वाले हैं। कुछ ही दिन पहले एक और फैसला आया था जिसमें किसी भी धर्मस्थल पर बिना इजाजत लगे हुए लाऊडस्पीकर हटाने का हुक्म दिया गया था। 
भारत में आज अपनी भावनाओं को ठेस पहुंचने की शिकायत करते हुए कोई भी पुलिस थाने या अदालत जाकर एक केस दर्ज करने की अपील कर सकते हैं। धर्म या जाति, इतिहास या आध्यात्म, किसी भी बात को लेकर किसी की भावनाएं आहत हो सकती हैं, लेकिन ऐसी शिकायतों पर जुर्म कायम करने का सिलसिला बहुत ही अलोकतांत्रिक और गैरजरूरी है। एक थाना जब अश्लीलता का मामला दर्ज करने लगता है, तो यह लगता है कि धर्म और इतिहास के मामलों में जो देश नग्न साधू-संन्यासियों से लेकर खजुराहो के मंदिरों तक की संपन्नता वाला है, जहां पर सैकड़ों बरस पहले कामशास्त्र जैसी किताब लिखी गई थी, वहां पर आज बात-बात पर अश्लीलता के मामले होने लगे हैं। 
दरअसल एक थाने में बैठकर यह मुमकिन भी नहीं रहता कि नग्नता और अश्लीलता के बीच फर्क किया जाए। और देश का कानून हर थानेदार को इसकी इजाजत देता है कि वह ऐसा केस दर्ज करे, और सामाजिक दबाव थानेदार को इस बात की जिम्मेदारी देता है कि वह केस जरूर दर्ज करे। ऐसे सुप्रीम कोर्ट का एक फिल्म के बारे में दिया गया ऐसा फैसला नीचे तक असर डालेगा, ऐसी हमें उम्मीद है।
कला से लेकर इतिहास तक, तथ्यों की सच्चाई और विचारों की आजादी के विरोध का सिलसिला दरअसल पाखंड की मजबूत चट्टान पर टिका हुआ है। जो लोग ऐसा विरोध करते हैं, उनके पास, उनके संगठन के पास अपनी हस्ती को जाहिर करने, साबित करने, और जिंदा रखने के लिए यही तरकीब होती है कि वे संस्कृति के चौकीदार और ठेकेदार बनकर खबरों में बने रहें। और जब देश में कानून को लागू करने वाले नेता और अफसर कायर और दब्बू रहते हैं, तो वे ऐसे ठेकेदारों की हिंसा, और कानून के बेजा इस्तेमाल के खिलाफ कुछ करते भी नहीं। ऐसे में सरकार के हिस्से का जिम्मा भी घूम-फिरकर अदालत पर आ जाता है, और अदालत ने अभी यह सही रूख दिखाया है। यही है सही।

जजों की नियुक्ति में अधिक पारदर्शिता हो

18 अगस्त 2014
संपादकीय
भारत की बड़ी अदालतों में जजों की नियुक्ति को लेकर लंबे समय से यह मतभेद चले आ रहा है कि उनमें सरकार का दखल कितना रहे। जब-जब न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात कोई जज उठाता है तो बाकी जज उसे चुप करने लगते हैं कि अगर बात बढ़ेगी तो कार्यपालिका में बैठे नेता और अफसर जजों की नियुक्ति में अपनी दखल बढ़ाने की तरकीब निकालने लगेंगे। लेकिन एक-एक करके बहुत से राजनीतिक दलों ने जब यह पाया कि देश की बड़ी अदालतें अपने आपको जजों की नियुक्ति से लेकर अदालतों की अवमानना के मामलों तक, और जजों की बर्खास्तगी तक कुछ इस तरह की ढाल से घेरकर चलती हैं, कि उनके गलत होने पर भी कोई उनका कुछ न बिगाड़ सके। अदालतें अपनी अवमानना के कानून को नर्म करने के खिलाफ अड़ी रहती हैं, और किसी भ्रष्ट जज को हटाने में सरकार और संसद का पसीना निकल जाता है। 
भारत के अदालतों से हमारी उम्मीदें बहुत बड़ी हैं, लेकिन ऐसी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए लोकतंत्र में लोगों को अपने कामकाज को पारदर्शी भी रखना होता है। बहुत से मामलों में हम अदालतों की तारीफ करते हैं, और यह भी लिखते हैं कि लोकतंत्र के बाकी दो स्तंभ, कार्यपालिका, और विधायिका, जब नाकामयाब हो जाते हैं, तब अदालतें उनके दायरों में दखल देने की कीमत पर भी लोकतंत्र के साथ इंसाफ करती हैं। लेकिन बड़े जजों के ओहदे के लिए वकीलों या निचली अदालतों से लोगों को छांटने के मामले में बहुत सा हिस्सा बिल्कुल भी पारदर्शी नहीं हैं, और सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट अपने आपको लोकतंत्र के भीतर एक टापू की तरह अछूता रखकर चलते हैं। यह बात ठीक नहीं है। आज जजों की नियुक्ति के लिए जो नया कानून बनने जा रहा है, उसकी बारीकियों में गए बिना, हम पारदर्शिता की जरूरत को जरूरी समझते हैं। 
भारत को अमरीका में जजों की तैनाती की प्रक्रिया से सीखने की जरूरत है। वहां के सुप्रीम कोर्ट में किसी को जज बनाने के पहले संसद की कमेटी उस व्यक्ति से कई-कई दिन तक सवाल-जवाब की सुनवाई चलाती है, उसके राजनीतिक रूझान से लेकर, सामाजिक मुद्दों पर उसके विचार देखती है, और उसके बाद जाकर संसदीय समिति की तसल्ली होने पर कोई जज बन पाता है। भारत में कानून का सिलसिला कुछ अलग है, लेकिन यहां भी हम सुप्रीम कोर्ट के एकाधिकार को हटाने के हिमायती हैं, और इसके लिए जो नया कानून आ रहा है, उस पर एक आम सहमति बनाकर जजों की नियुक्ति को अधिक पारदर्शी बनाना चाहिए।

संपन्न तबके की खपत से पैदा मौसम की मार विपन्न लोगों पर

17 अगस्त 2014
संपादकीय

हिंदुस्तान सहित पूरी दुनिया में बाढ़ सहित मौसम की दूसरी किस्म की मार बढ़ती चल रही है। दुनिया का मौसम का मिजाज इतना बदल रहा है कि वह हर किस्म के रिकॉर्ड तोड़ रहा है। बहुत कम वक्त में बहुत अधिक बारिश, कहीं पर बहुत अधिक बर्फ, कहीं पर बहुत गर्म लू, और इन सबसे अनगिनत बेदखली, मौतें, और नुकसान। लेकिन सभी जगहों पर मौसम की मार को लेकर फिक्र नुकसान होने के साथ-साथ मदद-राहत, और भरपाई तक दिखती है। मौसम इतना उखड़ा हुआ क्यों है, इस बारे में बात कुछ सम्मेलनों में आई-गई हो जाती है। 
इंसानों ने पिछली एक सदी में सामानों की अपनी खपत इतनी बढ़ा दी है, हर किस्म की जगह पर हर किस्म की बसाहट इतनी बेदिमागी से की है, कि मौसम की मार से बचना आसान भी नहीं है। समंदरों के किनारे से पेड़ों को काटकर ऐसा हाल बना दिया गया है कि अब जब तूफान आता है, तो उसके थपेड़े रोकने को कोई पेड़ नहीं होते, और पानी के करीब तक बस गई आबादी को तूफान सीधे मटियामेट कर देते हैं। पहाड़ों पर पेड़ इस रफ्तार से कट रहे हैं कि जमीन को थामने के लिए जड़ें कम होती जा रही हैं, बारिश की मार से मिट्टी को बचाने के लिए पत्तों और तनों का छाता खत्म हो गया है, आसपास खदानों की वजह से कहीं जमीन में दरारें पड़ रही हैं, तो कहीं पहाड़ों पर बढ़ती हुई भीड़ की वजह से वहां का कमजोर ढांचा चौपट हुए जा रहा है। 
लेकिन इंसान हैं कि सामानों की खपत बढ़ती ही चली जा रही है। सबसे ताकतवर और सबसे रईस तबका खपत सबसे अधिक करता है, और उससे पर्यावरण पर होने वाला बुरा असर सबसे गरीब पर सबसे अधिक पड़ता है। सबसे गरीब ही नदियों के सबसे किनारे बसने को मजबूर होता है, समंदर के किनारे मछुआरों की बस्तियां ही सबसे अधिक होती हैं, पेड़ों के बिना नंगे रह गए कांक्रीट के शहरी ढांचों के एयरकंडीशनरों से बढ़ती झुलसाने वाली गर्मी में मजदूर बिना छांह रह जाते हैं। जिन देशों में ठंड का कहर बर्फ की बढ़ती ऊंचाई के साथ बढ़ते चल रहा है, वहां पर सबसे बुरा हाल बेघर लोगों का होता है, या ऐसे लोगों का होता है जिनके पास घरों को गर्म रखने, खुद को गर्म रखने के इंतजाम नहीं हैं। 
कुल मिलाकर एक ही बात दिखती है कि संपन्न तबके की लाई गई बर्बादी की सबसे बुरी मार सबसे विपन्न तबके पर पड़ रही है। ऐसे में कारोबारियों के बाजार को बढ़ाते चलने वाली पूंजीवादी सरकारों से यह उम्मीद बेकार है कि वे खपत कम करवाने की कोशिश करेंगी। यहां पर हम इस झूठ को भी खारिज करना चाहेंगे कि यह धरती बढ़ती हुई आबादी का बोझ नहीं ढो पा रही है। दरअसल आबादी का एक बहुत छोटा हिस्सा ही सबसे अधिक खपत वाला है, और आबादी का निचला आधा गरीब हिस्सा तो धरती पर मानो कोई बोझ बढ़ाता ही नहीं। ऐसे में मौसम की बढ़ती मार को कम करने के रास्ते इतनी दूर से घूमकर आते हैं कि सरकारों के लिए उनका नक्शा बनाने भी आसान नहीं है। और आज तो दुनिया के कारोबार के बोलबाले के चलते पर्यावरण की बात भी करना अपने-आपको नक्सली करार देने जैसा है। 

लालकिले से आम लगती बातों की इस देश में खास अहमियत

16 अगस्त 2014
संपादकीय
लालकिले से अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बहुत अनौपचारिक अंदाज में अपनी सोच रखी, और लोगों को यह याद नहीं पड़ता कि क्या इसके पहले किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने बिना लिखे हुए भाषण से देश और दुनिया के सामने अपनी बात रखी थी। उन्होंने इस मौके की परंपरा से हटकर बहुत सी ऐसी बातें कहीं जो कि आम बातें मानी जाती हैं, या कम से कम कांग्रेस ने जिन बातों को फुटपाथी या सड़कछाप करार दिया है। लेकिन हम मोदी के अंदाज और उनकी बातों, दोनों से पूरी तरह सहमत हैं। इस मौके पर देश की अंतरिक्ष की उपलब्धि को गिनाना, फौजी ताकत को गिनाना, पड़ोसी देशों को चेतावनी देना, जैसे काम बहुत से प्रधानमंत्री करते आए हैं। नरेन्द्र मोदी के साथ यह सहूलियत है कि उनके सिर पर परंपराओं का टोकरा लगा हुआ नहीं है, और वे अपने अंदाज से काम कर सकते हैं, क्योंकि इस बार की केन्द्र सरकार तक उनकी पार्टी, उनके ही कंधों पर सवार होकर पहुंची है। इसलिए मोदी ने आजादी की इस सालगिरह पर अपनी सोच और अपने अंदाज की आजादी का फायदा भी उठाया, और हमारा यह अंदाज है कि उन्होंने सुनने वालों का दिल भी जीत लिया होगा। 
उनकी कुछ बातों का जिक्र करना हम यहां जरूरी समझते हैं। इस लोकतंत्र में आजादी की आधी और पौन सदी के बीच के इस दौर में जब सत्ता की सोच राजतंत्र की तरह काम करती है, तब मोदी का इस बात से भाषण शुरू करना कि वे प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, प्रधान सेवक के रूप में उपस्थित हैं, एक असर डालने वाली बात रही। हमारे पाठकों को याद भी होगा कि हम बरसों से यह बात लिखते आ रहे हैं कि सरकारी ओहदों के नाम जिलाध्यक्ष या जिलाधीश की जगह जिला जनसेवक होने चाहिए, ताकि नाम के मुताबिक सोच भी ढल सके। मोदी ने इस बात पर जोर दिया है, तो यह उम्मीद की जा सकती है कि उनकी सरकार, उनके सांसद, और उनकी पार्टी की राज्य सरकारें इस सोच पर गौर तो करेंगी। उन्होंने सरकार के लोगों से जितनी मेहनत करने की उम्मीद की है, वह वे पिछले महीनों में साबित भी करते आ रहे हैं, और इस बात को आजादी की सालगिरह पर महत्व देना भी हमारे हिसाब से ठीक है। वरना आज देश अंग्रेजों की गुलामी से तो आजाद हो गया है, लेकिन हिन्दुस्तानी सरकारों की गुलामी से जनता अब तक आजाद नहीं हो पाई है। मोदी अगर जनता के इस कमजोर तबके को सरकारी जुल्म से आजादी दिला सकते हैं, तो वह स्वतंत्रता की सालगिरह के अगले मौके पर एक बड़ी बात होगी।
मोदी ने देश की महिलाओं और लड़कियों को इस भाषण में सबसे अधिक महत्व देते हुए कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ आवाज उठाने से लेकर, स्कूलों में छात्राओं के लिए पखाने बनाने तक, और घरेलू महिलाओं के खुले में शौच पर जाने की शर्मिंदगी के खिलाफ जितना जोर देकर अपने भाषण का जितना बड़ा हिस्सा इस मुद्दे को दिया है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। इसके साथ-साथ उन्होंने बलात्कार का जिक्र करते हुए जिस तरह देश के लोगों को अपनी लड़कियों को सावधान करने के साथ-साथ अपने लड़कों को नसीहत देने की जो बात कही, वह भी हम एक साधारण लगने वाली लेकिन देश की एक सबसे महत्वपूर्ण बात मानते हैं, और इस मौके पर महिलाओं से जुड़ी इन बातों को इतने विस्तार से कहना, देश के लिए मायने रखने वाली बात है।  उन्होंने बेटियों को बूढ़े मां-बाप के लिए भी बेटों से अधिक मददगार करार दिया है, और यह भी एक बहुत जरूरी सोच है जिस पर समाज को लाने की जरूरत है।

उन्होंने माओवादी हथियारबंद आतंकियों से भी टकराव के बजाय, उनको नेपाल के माओवादियों से नसीहत लेने को कहा, और लोकतंत्र के रास्ते पर वापिस आने की अपील की। उनकी यह सोच उन्हीं की सरकार के कुछ दूसरे मंत्रियों की महज टकराव की सोच से अलग है, और हम इस फर्क को अच्छा मानते हैं। इसके अलावा नरेन्द्र मोदी ने गांधी का जिक्र करते हुए लोगों के बीच सफाई की जो बात कही, और उस पर जितना अधिक जोर दिया, उस पर जितने मिनट कहा, हम उसे भी महत्वपूर्ण मानते हैं, और भारत की पहचान देश के भीतर से लेकर देश के बाहर तक एक बहुत ही गंदे देश की है, और उसे बदलने पर जोर देने के लिए यह मौका बहुत सही था, और उन्होंने सड़कछाप कही जा रही इस बात को कहने का हौसला दिखाया, उसके लिए हम उनकी तारीफ करेंगे। 
देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार, और लोगों के मेहनत से काम करने, हुनरमंद होने के बारे में उन्होंने बहुत सी बातें कही हैं, जो हमारे हिसाब से बहुत से दूसरे मौकों पर कही जाती हैं, और उनके बारे में आज यहां पर अधिक लिखने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस के जिन लोगों ने मोदी की बातों को फुटपाथी या सड़कछाप कहा है, उनको उनका ईश्वर माफ करे, क्योंकि वे शायद ये नहीं जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं। सड़कों के किनारे और फुटपाथों पर पखाने के लिए बैठने को मजबूर महिलाओं की मजबूरी की जिम्मेदार कांग्रेस पार्टी को अब भी समझ नहीं आ रही है कि वह हाशिए के बाद और कहां जाएगी। मोदी की सरकार, पार्टी, और उनके गठबंधन को चाहिए कि सहज और आम लगती उनकी बातों पर वे अमल करके दिखाएं। 

आजादी के जश्न के इस मौके पर उससे जुड़ी जिम्मेदारियों की बात

14 अगस्त 2014
संपादकीय 
आजादी की सालगिरह पर भारत में एक बार फिर माहौल तिरंगा है, सरकार से लेकर संगठनों तक ने झंडे फहराने की तैयारी कर ली है, सरकारी ओहदों पर बैठे हुए लोग अपने-अपने भाषण तैयार करके बैठे हैं, या रिकॉर्ड करवा चुके हैं। दिल्ली की खबर है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लालकिले से अपने पहले भाषण को बिना लिखे हुए सीधे बोलेंगे और पौन घंटे से एक घंटे तक लंबा यह भाषण हो सकता है। देश की जनता एक और छुट्टी मनाने की तैयारी में है, और यह गनीमत मना रही है कि 15 अगस्त इतवार को नहीं पड़ा, वरना एक छुट्टी बेकार हो जाती। 
लेकिन आजादी की सालगिरह के इस जश्न और जलसे के बीच यह बात कहीं उठती भी नहीं है कि आजादी जिस जनता को मिली थी, मिली है, और जारी रहने की गारंटी है, उस जनता को आजादी के साथ कुछ अघोषित जिम्मेदारियां भी मिली थीं, जिनका एहसास आज लोगों को नहीं है। कोई भी हक बिना जिम्मेदारियों के नहीं होता। दुनिया के एक बड़े नेता का एक बयान इतिहास में कई बार गिनाया जाता है कि लोग यह न देखें कि उनके देश ने उनको क्या दिया, लोग यह देखें कि उन्होंने अपने देश को क्या दिया। आज आजाद हिन्दुस्तान पौन सदी पूरी करने की तरफ बढ़ रहा है, और लोगों की सोच बेहतर होने के बजाय गड़बड़ होती चल रही है। इसकी एक वजह शायद यह हो सकती है कि लोगों के सामने आदर्श के रूप में, मिसाल के रूप में बड़े ओहदों पर बैठे हुए लोग, और जो सामाजिक नेता हैं, उनकी अपनी हरकतों से उनकी प्रतिमाएं पिछले दशकों में खंडित हुई हैं, और बड़े लोगों पर से आम लोगों का विश्वास हट गया है। ऐसे अविश्वास के माहौल में लोग अपनी नागरिक जिम्मेदारियों की तरफ से भी लापरवाह हो जाते हैं। जब लोग देखते हैं कि मंत्री या अफसर, सांसद या विधायक के पास से टोकरे भर-भरकर काली दौलत निकलती है, तो उन आम लोगों को यह नसीहत फिजूल की लगती है कि कचरा घूरे पर ही डालना चाहिए, सड़क या नाली में नहीं, सार्वजनिक नल को जरूरत के बाद बंद रखना चाहिए, सड़कों पर ट्रैफिक का सम्मान करना चाहिए। जब बड़ी-बड़ी शर्मनाक मिसालें लोगों के सामने रहती हैं, तो उनको छोटी-छोटी बातें सिर्फ अपने पर लादने की जरूरत नहीं लगती। 
लेकिन आज इस मुद्दे पर यहां लिखने का हमारा मकसद आम जनता के बीच की इस बहुत आम निराशा पर बात को खत्म करना नहीं है। हमारा मकसद लोगों से यह चर्चा करना है कि सत्ता के सही या गलत कामों पर 5 बरसों में एक बार फैसला देने के अलावा अब लोग सूचना के अधिकार के रास्ते जनहित याचिका तक जाकर सत्ता को कटघरे में ला सकते हैं। ऐसे हक हासिल रहते हुए हताशा ठीक नहीं है। और ऐसी मिसालें को ही देखते हुए लोग अपनी जिम्मेदारियों से अपने को बरी कर लें यह भी ठीक नहीं है। लोकतंत्र के भीतर सत्ता के खिलाफ विरोध दर्ज करने का सिलसिला पूरे 5 बरस तक चल सकता है, और संसद के चुनाव से लेकर, विधानसभा के चुनाव, और म्युनिसिपल-पंचायत के चुनावों तक लोगों को 5 बरस में एक से ज्यादा बार भी वोट डालने का मौका मिलता है। इसलिए लोग अपने को बेबस और असहाय न समझें, और इन चुनावों से परे भी, इनके बीच के बाकी बरसों में भी लोगों को कई किस्म की लोकतांत्रिक आजादी मिलती है, और लोकतांत्रिक जिम्मेदारियों को पूरा करने की उम्मीद के साथ ही मिलती है। इसलिए सत्ता की कुछ गलत मिसालों को लेकर घर बैठ जाने से यह देश आजाद नहीं कहलाएगा। इस देश की आजादी तभी रहेगी जब अंग्रेजों की गुलामी से बाहर आ चुके लोग अपने लोकतांत्रिक-संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करके आजादी को कामयाब करेंगे। इस मौके पर देश भर में छुट्टी रहती है, लेकिन लोगों को इस चर्चा के लिए वक्त निकालना चाहिए, और स्वतंत्रता दिवस के मौके पर तो हम इस चर्चा एक बहाना निकालकर यह लिख रहे हैं, यह चर्चा तो साल के हर दिन हो सकती है, और अपने खुद के भीतर को रोजाना जिंदगी के कई मुद्दों को लेकर यह चर्चा हर किसी को करना चाहिए, कि उन्होंने आज आजादी की कौन सी जिम्मेदारियों का ख्याल रखा है, और किनको अनदेखा किया है।
0000000000

लोकतंत्र में भी संसद का इंतजाम राजतंत्र जैसा...

संपादकीय
13 अगस्त 2014
पश्चिम बंगाल के भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो को उस वक्त निराश होना पड़ा जब वे अपनी मोटरसाइकिल पर संसद जाना चाहते थे और संसद परिसर के सुरक्षा कर्मचारियों ने उन्हें बताया कि इस अहाते में मोटरसाइकिल को इजाजत नहीं है। देश टीवी की खबरों में रोज संसद के अहाते में पहुंचते हुए सांसदों को गाडिय़ों से उतरते देखता है, और जाहिर है कि सस्ती से सस्ती चौपहिया गाड़ी मोटरसाइकिल के मुकाबले कई गुना महंगी रहती है, पेट्रोल या डीजल ज्यादा खाती है, सड़क पर जगह ज्यादा घेरती है, और संसद परिसर में पार्किंग की जगह भी दुपहिए से कई गुना अधिक लगती ही होगी। ऐसे में संसद परिसर में मोटरसाइकिल को न आने देना, और कारों को ही आने देना एक संपन्न और रईस सोच है, जो कि सत्ता की जगह से आम लोगों को दूर रखना चाहती है। 
हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले बरसों में हमने छत्तीसगढ़ के राजभवन से कुछ सालाना जलसों पर लोगों को पहुंचने वाले निमंत्रण पत्रों पर भी इसी जगह लिखा था कि न्यौते के साथ आने वाले पार्किंग के स्टिकर कारों के लिए होते हैं, उन पर कार तो लिखा होता है, लेकिन दुपहियों को इजाजत नहीं होती, और राजभवन के मेहमानों को अपने दुपहिए अहाते के बाहर सड़क किनारे खड़ा करके जाना होता है। यह पूरा राजसी सिलसिला ही गलत है, जो यह मानकर चलता है कि सत्ता के इर्द-गिर्द पहुंचने वाले लोगों के पास इतनी आर्थिक ताकत तो होनी ही चाहिए। हमने पिछले महीनों में लगातार यह भी छापा है कि किस तरह योरप के एक अतिविकसित देश से लेकर भूटान जैसे तीसरी दुनिया के देश तक के प्रधानमंत्री साइकिलों पर दफ्तर आते-जाते हैं। और भारत जैसे देश में छोटे-छोटे नेता बड़ी-बड़ी गाडिय़ों के लंबे-लंबे काफिलों में चलते हैं, संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए जज या दूसरे लोग भी लालबत्तियों और सायरन के साथ ही चलते हैं, मानो उन्हें बेइंसाफी की आग बुझाने जाना हो। 
लोकतंत्र में बड़ी गाडिय़ां किसी को बड़ा नहीं बना सकतीं। अगर संसद से आई हुई यह खबर सच है, तो संसद को अपना इंतजाम तुरंत बदलना चाहिए, और सांसदों का हौसला भी बढ़ाना चाहिए कि वे मोटरसाइकिलों या हो सके तो साइकिलों से भी वहां आएं। संसद या राजभवन से स्थापित हुई परंपराएं नीचे तक जाती हैं, और फिर हर जगह लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि उन्हें सम्मान चाहिए, तो वे कारों में आएं। भारत में इस सोच को बदलने की जरूरत है, और सत्ता के अहातों को, सार्वजनिक जगहों को, सड़कों और फुटपाथों को छोटी गाडिय़ों, दुपहियों और साइकिलों के साथ दोस्ताना बर्ताव वाला बनाना चाहिए। 

बेबसी में सही, विपक्षी एकता लोकतंत्र के लिए बेहतर

12 अगस्त 2014
संपादकीय
राजनीति के बारे में कुछ भद्दी सी जुबान में एक बात हमेशा से कही जाती है कि उसने कब कौन किसके साथ हमबिस्तर हो जाए, ठिकाना नहीं रहता। लोगों को पिछले कुछ महीनों में बिहार में इस बात की सबसे बड़ी मिसाल मिली है लालू यादव और नीतीश कुमार के साथ आने से। इन दोनों के बीच इस लंबी जिंदगी में सांप-नेवले जैसे मधुर संबंध चले आ रहे थे, और आज जिस तरह वे दोनों मोदी के खिलाफ एक हुए हैं, वह कुछ देर से जरूर हुआ है, लेकिन हुआ भी है। साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ एक मोर्चा बनाने के लिए बिहार की इन दो ताकतों ने एक नया सिलसिला शुरू किया है, और इस मोर्चे में कांगे्रस भी इनके साथ है। ऐसा कुछ और जगहों पर भी हो सकता है, और देश की सत्ता में भाजपा के आने के बाद भारतीय राजनीति में गैरभाजपाई दलों में एक नया धु्रवीकरण हो रहा है, जो कि कुछ हद तक शायद सिद्धांतों पर आधारित है, और कुछ हद तक वह अपने अस्तित्व को बचाने के लिए सारे तिनके एक साथ आकर तैर रहे हैं।
लेकिन आने वाले महीनों में कुछ राज्यों में चुनाव होंगे, और लोकसभा के अगले आम चुनाव के पहले बाकी राज्यों में भी धीरे-धीरे करके चुनाव होंगे। इन तमाम जगहों पर गैरभाजपाई ताकतें अगर साम्प्रदायिकता-विरोध के नारे के साथ एक होती हैं, तो भी हमारे हिसाब से एक बड़ा रोड़ा बचा ही रहेगा। केंद्र में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में जो सरकार आई है, उसके बारे में दो दिन पहले ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने यह कहा है कि एनडीए की सरकार किसी एक व्यक्ति या पार्टी के कारण नहीं बनी है, बल्कि यूपीए सरकार से जनता की नाराजगी की वजह से बनी है। उनकी इस बात को हम पिछले छह महीने में दर्जन भर से अधिक बार, आम चुनाव के पहले भी, और उसके बाद भी, लिख चुके हैं। भारत की जनता के मन में एनडीए के लिए जितनी चाह रही होगी, उससे कई गुना अधिक यूपीए सरकार के खिलाफ उसके मन में आह थी। नतीजा यह हुआ कि खुद भाजपा ने जैसी जीत की उम्मीद नहीं की थी, वैसी छप्परफाड़ जीत उसे नसीब हुई। दरअसल यूपीए ने छप्पर फाड़कर तैयार रखा था, और जीत उसमें से भाजपा पर बरस गई। ऐसे में आज देश में अगर अलग-अलग प्रदेशों में भाजपा की विचारधारा के विरोधी लोग एक होते हैं, तो यह अगले आम चुनाव तक भाजपा और एनडीए के लिए छोटी चुनौती की बात नहीं होगी। लेकिन धर्मनिरपेक्षता की एक सैद्धांतिक एकजुटता के अलावा भी लोगों को कुछ और मुद्दों पर सोचना होगा। लालू को भ्रष्टाचार से घिरे अपने इतिहास के बारे में सोचना होगा, मुलायम को अपनी कुनबापरस्ती की नसबंदी करनी होगी, ममता बैनर्जी को अपने से परे हर किसी से एक तानाशाह परहेज के बारे में सोचना होगा, और भी अलग-अलग क्षेत्रीय दलों को अपनी तंगदिली और अपने तंगनजरिए से बाहर आना होगा, और तब जाकर धर्मनिरपेक्ष एकजुटता कोई शक्ल ले सकेगी। लालू और नीतीश ने एक होकर एक खासी बड़ी मिसाल सामने रखी है, और हाशिए पर बैठी कांगे्रस अगर अपनी बेरोजगारी के इन दिनों का इस्तेमाल लोगों को एक करने में करती है, लोगों में होती एकता के साथ जाने में करती है, तो वह एक मजबूत गठबंधन हो सकता है। भारत में आज संसद में विपक्ष जिस तरह विपक्ष के दर्जे का हकदार भी नहीं रह गया, वैसी विपक्षी फटेहाली के दिनों में इन लोगों को सुधरने की जरूरत भी है। अगर ऐसा होता है तो इससे केंद्र की मोदी सरकार को चौकन्ना बने रहने में मदद भी मिलेगी, और कुल मिलाकर यह देश के लोकतंत्र के हित में होगा। 

भ्रष्टाचार हो जाने के पहले ही निगरानी से रोकने की जरूरत

11 अगस्त 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज और पे्रस काउंसिल के अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने एक बार फिर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया है, और अपने ब्लॉग पर उन्होंने ऐसे एक मामले का खुलासा किया है, और कुछ दूसरे मामलों की तरफ इशारा किया है। कुछ हफ्ते पहले भी उन्होंने तमिलनाडु के एक जज के भ्रष्ट होने की बात कही थी, और यह विवाद खड़ा किया था कि वहां के एक राजनीतिक दल के दबाव में केंद्र की यूपीए सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप अनदेखे करते हुए उस जज को पदोन्नति दी थी। अब उन्होंने कई और बातें उठाई हैं, जो कि आज के ही इस अखबार की खबरों में जा रही हैं, इसलिए उनको यहां खुलासे से नहीं लिखा जा रहा। 
अभी हम उनकी ताजा बातों में से इस बात पर आना चाहते हैं कि उन्होंने देश के मुख्य न्यायाधीश को ऐसे एक भ्रष्ट जज के फोन नंबर दिए थे कि उनकी निगरानी रखने से उस जज के दलालों से उसकी बातचीत पकड़ में आ जाएगी। हमारे पाठकों को याद होगा कि हमने पिछले बरसों में कई बार यह लिखा है कि सरकारी और दूसरे संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के सरकारी कामकाज वाले टेलीफोन की निगरानी एक आम बात होनी चाहिए, और भ्रष्टाचार के होने के पहले उस पर निगरानी रखने के लिए सरकार की एक ऐसी सतर्कता एजेंसी होनी चाहिए, जिसके पास फोन सुनने का हक हो। अपने सरकारी या कानूनी कामकाज के लिए सरकारी तनख्वाह पाने वाले लोग जिन संचार साधनों का इस्तेमाल करते हैं उन पर नजर रखना सरकार का हक होना चाहिए। अपने निजी काम के लिए लोग निजी फोन या ईमेल खातों का इस्तेमाल करें। यह बात लोगों की निजी जिंदगी में दखल बढ़ा सकती है, और इसीलिए हम ऐसी एक जरूरी एजेंसी की वकालत करते हुए भी यह कह रहे हैं कि सरकारी फोन सरकारी काम के लिए होने चाहिए, और उन पर निगरानी का प्रावधान ऐसे हर अधिकारी-कर्मचारी, जज या दूसरे लोगों को मालूम भी होना चाहिए।
आज सरकार मोटे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हुए मामलों पर ही लोगों के फोन टैप कर सकती है। कुछ दूसरे तरह के अपराधों की जांच में जांच एजेंसियां टेलीफोन कॉल के रिकॉर्ड निकलवा सकती हैं। लेकिन सरकार और अदालत के कामकाज के फोन पर भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनी एजेंसियों की कुछ अधिक और आसान पकड़ होनी चाहिए, जिससे कि भ्रष्टाचार होने के पहले थम सके। हम यह भी समझते हैं कि आज लोग आसानी से एक से अधिक फोन रखते हैं, और भ्रष्ट बातों के लिए लोग सरकारी फोन का इस्तेमाल पूरी तरह छोड़ देंगे। लेकिन हमारी जो सलाह है उसकी वजह से जांच एजेंसियों को अगर कोई फायदा हो सकेगा, तो होगा, कम से कम कोई नुकसान नहीं होगा। और इसके साथ-साथ सरकार और न्यायपालिका यह नियम भी बना सकती हैं कि उनके लोग अपने सरकारी और अदालती कामकाज की बातों को सिर्फ सरकारी फोन पर करें। 
भ्रष्टाचार हो जाने के बाद उनकी जांच-पड़ताल का क्या नतीजा निकलता है, यह बोफोर्स के दशकों बाद आज भी दिख रहा है। इसलिए असरदार तरीका तो यही होगा कि भ्रष्टाचार के पहले ही उसे सुबूतों के साथ पकडऩे और रोक देने का काम किया जाए, जैसा कि अभी सिंडीकेंट बैंक के चेयरमैन को सुबूतों के साथ पकडऩे में हुआ है। सीबीआई छह महीनों से इस आला अफसर की बातों को सुन रही थी, रिकॉर्ड कर रही थी, और तब उसने रंगेहाथों पकड़े बिना भी यह गिरफ्तारी कर ली है।  ऐसे बचाव से ही देश बच सकेगा, डूब जाने के बाद तो लाश ही निकल सकती है, जिंदगी नहीं निकल सकती। 

जांच के कतरा-कतरा नतीजे मीडिया को परोसना बंद हो

10 अगस्त 2014
संपादकीय
अभी उत्तरप्रदेश के बलात्कार के कुछ मामले, और इनमें से कम से कम एक मामला धर्मांतरण के आरोप का भी है, खबरों में बने हुए हैं। यह प्रदेश साम्प्रदायिक टकराव, हिंसा, और अलगाव को झेल रहा है, और कुछ गंभीर अखबारों की ऐसी खोजी रिपोर्ट भी छपी हैं कि अधिकतर साम्प्रदायिक टकराव उन इलाकों में किए गए हैं, जहां पर कि विधानसभा के उपचुनाव होने हैं। इन दोनों बातों के बीच रिश्ते को समझा जा सकता है, और एक से अधिक राजनीतिक दल ऐसे हैं, जो ऐसे टकराव को खड़ा करके उससे होने वाले वोटों के धार्मिक या साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से फायदा पा सकते हैं। ऐसा शक है कि ऐसी राजनीतिक ताकतें ऐसे ध्रुवीकरण को एक साजिश के तहत खड़ा कर रही हैं। 
इस बीच मीडिया में ऐसे बहुत से बलात्कार के मामलों को लेकर तरह-तरह की जानकारी पुलिस और नेताओं के तरफ से दी जा रही है, और उत्तरप्रदेश की पुलिस, और वहां के प्रशासन के आला अफसर यह कह रहे हैं कि वे पूरी पारदर्शिता निभाने के लिए हर जानकारी लोगों के सामने रख रहे हैं। किसी जांच के दौरान कतरा-कतरा जानकारी रोज मीडिया के मार्फत देश-प्रदेश के सामने इस तरह परोसने और पेश करने का तर्क हमारी समझ से परे है। खासकर तब जबकि एक मेडिकल जांच के नतीजे के खिलाफ दूसरे किस्म के नतीजे दूसरी मेडिकल जांच से सामने आ रहे हैं, पोस्टमार्टम में पहले कुछ आ रहा है, और फिर दूसरे पोस्टमार्टम में ठीक उल्टा नतीजा दिख रहा है। ऐसे में अपराध की जांच, सत्ता और विपक्ष के राजनीतिक दबाव, और जमीन पर दो या अधिक समुदायों के बीच लगातार चल रहे हिंसक टकराव को देखें, तो लगता है कि हर जानकारी को रोजाना पेश करने से किसका भला हो रहा है? 
आज चर्चित मामलों में जन दबाव के चलते पुलिस और जांच एजेंसियां ठीक से काम भी नहीं कर पाती हैं। और उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में सत्ता हांकने वाली ताकतें अपनी साख बचाने के लिए हर जुर्म को झूठा साबित करने पर उतारू दिखती हैं, जैसे कि बलात्कार के कई मामलों में ममता बैनर्जी ने भी किया, और हमने इसी जगह इस रूख के बारे में बार-बार लिखा भी है। हमारा यह मानना है कि जांच के बीच आधी-अधूरी सच्चाई वाले निष्कर्षों को जनता के सामने एक बार रख देने के बाद किसी और अधिक विश्वसनीय जांच से जब नतीजे दूसरे आते हैं, तो भारत में लोगों को सत्ता के दबाव या किसी राजनीतिक साजिश का शक होता है, और बहुत से मामलों में यह शक सही भी होता है। दूसरा एक खतरा ऐसे मामलों में यह भी रहता है कि अदालत के पास सुनवाई के लिए पहुंचने के पहले चर्चित मामलों में इतना भारी जनमत तैयार हो चुका रहता है, कि अदालतें चाहे-अनचाहे एक दबाव का शिकार तो हो ही सकती हैं। 
सरकारों को हमारी सलाह है कि ऐसे नाटकीय अंदाज वाली पारदर्शिता से बचें, और जांच के निष्कर्षों को टुकड़े-टुकड़े में, छांट-छांटकर जनता के सामने परोसना भी बंद करें। ऐसा करना न तो लोकतांत्रिक बेबसी है, और न ही इंसाफ के लिए ऐसा करना सही है। जांच एजेंसियों का काम जांच करना होना चाहिए, और मामले से जुड़े नतीजों को विश्वसनीय जांच के आखिरी नतीजों के आ जाने तक, जनमत तैयार करने के लिए, जनता का विरोध शांत करने के लिए, इस्तेमाल करना बंद होना चाहिए। उत्तरप्रदेश और बंगाल के बहुत से मामले सरकार की राजनीति का हिस्सा दिखते हैं, और यह एक खतरनाक तौर-तरीका है। 

राज्य में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार सरकारी अमले की भागीदारी

9 अगस्त 2014
संपादकीय

राजनीति और सार्वजनिक जीवन में कई बार कुछ दिनों के भीतर तस्वीर इतनी बदल जाती है, कि पहचान नहीं आती। कुछ समय पहले तक छत्तीसगढ़ की राशन व्यवस्था देश में सबसे अच्छी मानी जाती थी, और इन दिनों इसी व्यवस्था को लेकर जनता के बीच सबसे बड़ी तकलीफ भी खड़ी हो गई है, और विपक्षी कांग्रेस पार्टी को जनता के बीच जगह बनाने का सबसे बड़ा मौका इसी से मिला है। कुछ महीने पहले प्रदेश में लाखों लोगों के राशन कार्ड ऐसे बने थे, कि जिनको लेकर आज राज्य सरकार यह कह रही है कि वे लोग गरीबी के उस दर्जे के रियायती राशन के हकदार नहीं हैं। ऐसे मामले गिनती में इतने अधिक हैं, और प्रदेश के हर जिले में हैं। सरकार के सामने 10 लाख से अधिक ऐसे राशन कार्ड खड़े हो गए हैं कि जिनकी जांच जारी है। डेढ़ लाख राशन कार्ड खारिज किए जा चुके हैं। ऐसे में गरीबी की रेखा के नीचे, या उसके ठीक ऊपर के लोगों के सामने यह राशन कार्ड आज जिंदगी का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है, और जिनके राशन कार्ड खारिज हो गए हैं, या होने का खतरा है, उन लोगों के लिए मानो जिंदगी पर ही तलवार लटक गई है। 
इसी सिलसिले में मुख्यमंत्री के खुद के विधानसभा क्षेत्र राजनांदगांव में बड़े-बड़े नेताओं और संपन्न लोगों के नाम से जब राशन कार्ड मिले, और उनके नाम गरीबी की रेखा के नीचे दर्ज पाए गए, तो ऐसे कार्ड बनाने वाले कर्मचारियों-अधिकारियों की गिरफ्तारी भी हुई है। इससे यह जाहिर है कि बहुत ही सस्ते राशन को पाने के लिए बड़ी संख्या में गैरगरीब लोगों ने राशन कार्ड बनवा लिए, और आज जो लोग अपना कार्ड रद्द होते देख रहे हैं उनमें कुछ या अधिक लोग ऐसे भी हैं। सरकार ने किस हड़बड़ी में, बिना पूरी जांच किए ऐसे कार्ड बनाए, कैसे इस काम में बड़े पैमाने पर जालसाजी हुई, वह एक अलग जांच और कार्रवाई का मुद्दा है। लेकिन कांग्रेस पार्टी को यह एक बड़ा नाजुक मुद्दा हाथ लगा है, जो प्रदेश की दसियों लाख गरीब आबादी से सीधे जुड़ा हुआ है, उनकी जिंदगी का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है। 
लेकिन सरकारी रियायत और सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का फायदा पाने के मामले में छत्तीसगढ़ में भयानक लूटपाट जारी है। कल ही हमने जांजगीर-चांपा जिले में मनरेगा के तहत बड़े पैमाने पर जालसाजी करके मजदूरों के फर्जी नाम गढ़कर करोड़ों की गड़बड़ी की रिपोर्ट छापी है। और हमारा पक्का भरोसा है कि यह जिला अकेला ऐसा नहीं हो सकता। निर्वाचित प्रतिनिधि और अफसर-कर्मचारी अगर एक जिले में जालसाजी-धोखाधड़ी करने का कोई रास्ता निकालते हैं, तो उसका इस्तेमाल बाकी जिलों में जरूर होता है। अब अगर केन्द्र सरकार से आने वाले हजारों करोड़ रूपए की रोजगार योजना में एक मजदूर के नाम से दो-दो, तीन-तीन जगह मजदूरी निकली है, तो पैसा चाहे केन्द्र सरकार का हो, उसमें लूटपाट तो राज्य में हुई है। सीएजी ने अभी अपनी रिपोर्ट में यह लिखा है कि स्कूलों में कम्प्यूटर शिक्षा देने के नाम पर पिछले बरसों में जमकर धांधली हुई है। ऐसा ही हाल दूसरे कई मामलों में भी है। रियायती रसोई गैस के घोटाले में सैकड़ों करोड़ का मामला तो राज्य सरकार पकड़ ही चुकी है, और उसमें धांधली रात-दिन जारी है। 
किसी राज्य में सफलता के साथ-साथ अगर बड़े पैमाने पर ऐसा व्यापक भ्रष्टाचार है, तो उसे अपनी फिक्र करनी चाहिए। हम इनमें से एक भी भ्रष्टाचार ऐसा नहीं देख रहे हैं जिसमें सरकार के लोगों की मर्जी और भागीदारी के बिना जनता अकेले ही कुछ चुराकर ले गई हो। और जब सरकार का अमला भ्रष्टाचार में शामिल हो जाता है, तो फिर सरकार के अलावा इसमें कोई जिम्मेदार नहीं है। थोड़े-बहुत निजी लोग भ्रष्टाचार में अगर भागीदार हैं, उन्होंने गलत जानकारी दी है, या बेईमानी की है, तो पहले उसमें भागीदार सरकारी अमला जिम्मेदार है। राज्य सरकार को अपनी मशीनरी को ठीक से परखना चाहिए, और भ्रष्टाचार पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। और लोग चाहे इस बात को भूल गए हों, लेकिन हमें यह याद है कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को सीटों का बहुमत तो मिला था, लेकिन पूरे प्रदेश में उसके वोट कांग्रेस के वोटों से कुल पौन फीसदी ही ज्यादा थे।  

कल की खेतिहर मजदूर की हवाई फिजूलखर्चियां, किस्सा कमला बेनीवाल का

8 अगस्त 2014
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी से गुजरात में तिरछे-तिरछे चलने वाली राज्यपाल कमला बेनीवाल को बर्खास्त करने पर कांग्रेस कुछ हल्ला तो कर रही है, लेकिन वह प्रतीकात्मक अधिक है। यूपीए सरकार की मनोनीत राज्यपाल रहते हुए कमला बेनीवाल ने गुजरात में लगातार मोदी से टकराव रखा था, और उस टकराव के सही या गलत होने के बारे में हम अभी कुछ नहीं कह रहे हैं। लेकिन राज्यपाल रहते हुए जिस तरह उन्होंने अपने घर जाने के लिए तिरपन बार सरकारी विमान का इस्तेमाल किया, और उस पर आठ करोड़ से अधिक खर्च हुआ, वह बात तो उसी समय रूक जानी चाहिए थी। पता नहीं राज्य सरकार ने एक बागी राज्यपाल पर इतनी दरियादिली क्यों दिखाई थी, लेकिन ऑडिट की आपत्ति से यह सिलसिला तभी थम जाना था जब जनता के पैसों की इतनी बरबादी नहीं हुई थी। लेकिन कमला बेनीवाल को हटाने के पीछे यह वजह नहीं है, और शायद उनके खिलाफ राजस्थान में मंत्री और उपमुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जो काम किया था, उसकी जांच-रिपोर्ट आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के काम आई, और उस जांच रिपोर्ट के तथ्यों को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी अनदेेखा नहीं कर सके। 
खबरों में जो जानकारियां आई हैं, उनके मुताबिक कमला बेनीवाल ने राजस्थान में मंत्री और उपमुख्यमंत्री रहते हुए, खेतों में रोज 16-16 घंटे काम करने का हलफनामा देकर गरीब किसानों के लिए सस्ती जमीन के प्रावधान का इस्तेमाल किया था, और जमीन हासिल की थी। इसकी पूरी जानकारी आज के ही अखबार में जा रही है, इसलिए उसे यहां अधिक खुलासे से लिखने की जरूरत नहीं है। लेकिन इस बेशर्मी पर हमको हैरानी होती है कि सत्ता का उपभोग करते हुए जो महिला कांग्रेस नेता अपने को गरीब खेतिहर मजदूर बताकर रियायती जमीन पाती है, वही महिला नेता राज्यपाल बनने के बाद पड़ोस के प्रदेश में अपने घर आने-जाने के लिए सरकारी विमान पर आठ करोड़ से अधिक का खर्च करवाती है। आज लिखने का हमारा मकसद कमला बेनीवाल बिल्कुल नहीं है, लेकिन ऐसा करने वाले वे हजारों हिन्दुस्तानी नेता हैं, जो कि इस गरीब देश के कुपोषण के शिकार और भूखे लोगों के हक के पैसों से अपने लिए इस तरह के आलीशान फिजूलखर्च इंतजाम करते हैं कि जिनको देखकर सैकड़ों बरस पहले के राजा-महाराजा भी शरमा जाएं। इस देश में ऑडिट का इंतजाम है, सीएजी की रिपोर्ट सार्वजनिक होती है, लेकिन उसके बाद भी इस तरह के ऐशो आराम पर कोई रोक नहीं लगती है, यह बहुत हैरानी की बात है। ऐसी बहुत सी जानकारी इन दिनों सूचना के अधिकार के तहत निकल रही है, और जनहित याचिकाओं के रास्ते अदालत तक भी पहुंच रही हैं। भारतीय लोकतंत्र में जनता के पैसों की बर्बादी को रोकने के लिए लगातार इन दोनों लोकतांत्रिक औजारों का इस्तेमाल होना चाहिए, और उसके बाद भी अगर लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाली पार्टियां और उनके नेता अगर अपने तौर-तरीके नहीं सुधारते हैं, तो देश में एक चौथाई हिस्से में तो नक्सली छा ही चुके हैं। जहां-जहां जनता को ऐसे आरामतलब और फिजूलखर्च नेताओं से नफरत होगी, वहां-वहां उनके मन की यह बेबसी होगी कि वे हिंसक नक्सलियों के लिए हमदर्दी रखें। हिन्दुस्तान से नक्सल हिंसा को सिर्फ बंदूकों से खत्म नहीं किया जा सकेगा, सत्ता की लोकतांत्रिक सादगी की मिसाल के बिना पुलिस इस मोर्चे पर कुछ अधिक नहीं कर पाएगी। और पुलिस के अधिक इस्तेमाल का खर्च भी आखिर जनता के ही पैसों से होता है। 

कुछ मामलों में आज 16 बरस की उम्र भी बालिग सरीखी...

7 अगस्त 2014
संपादकीय
पिछले एक बरस से भारत में यह बहस चल रही है कि सेक्स-अपराधों या हिंसक-अपराधों के लिए नाबालिग होने की उम्र सीमा को घटाकर कम किया जाए या नहीं। दिल्ली में देश के सबसे चर्चित निर्भया बलात्कार कांड में सबसे खूंखार अपराधी नाबालिग था, और उसी वक्त से यह बहस चल रही थी, और आज कानून में फेरबदल करके ऐसे मामलों में नाबालिग की उम्र सीमा 18 बरस से घटाकर 16 बरस करने की चर्चा है। हमने इस पूरे एक बरस में इस बारे में अपनी राय नहीं लिखी थी, क्योंकि हम सबकी बातों को सुनना चाहते थे, और फिर अपनी सोच बनाना चाहते थे। तमाम तर्कों को सुनने के बाद, और कल दिल्ली में नाबालिग लड़कों द्वारा दिनदहाड़े खुली सड़क पर की गई एक हत्या को देखते हुए अब यह लगता है कि गिरोहबंदी करके अगर नाबालिग लोग ऐसे गंभीर जुर्म करते हैं, तो उम्र सीमा को घटाकर 16 बरस करना ठीक होगा। कोई एक अकेला लड़का या लड़की विचलित होकर किसी अस्थिर दिमागी हालत में कोई अपराध अचानक कर बैठे, तो वह एक अलग बात हो सकती है। लेकिन जब गिरोहबंदी करके लोग ऐसा करें, तो उन्हें नाबालिग होने की रियायत कुछ मामलों में तो नहीं मिलनी चाहिए। खासकर इसलिए भी नहीं मिलनी चाहिए कि ऐसे कुछ लोगों को सजा मिलने के बाद उनकी उम्र और पीढ़ी के बाकी लोगों के सामने सजा की एक मिसाल रहेगी। आज रियायत की एक मिसाल लोगों को सजा की गंभीरता का अहसास नहीं करने दे रही। यह जरूर हो सकता है कि 16 और 18 बरस के बीच के मुजरिमों के लिए रहने का एक इंतजाम ऐसा किया जाए कि वे न तो 16 से कम उम्र के लोगों के साथ सुधारगृह में रखे जाएं, और न ही 18 से अधिक उम्र के वयस्क मुजरिमों के साथ। 
आज देश में निजी अपराधों की हालत बहुत ही भयानक है। बलात्कार मानो इस देश की संस्कृति बन गया है, लोग बात-बात पर कत्ल करने लगे हैं, और इन दोनों से नीचे के दर्जे के जुर्म गिनती में बहुत अधिक हैं, लेकिन गंभीरता में कम होने की वजह से वे खबरों में कम आते हैं। नतीजा यह होता है कि कम उम्र के लड़के-लड़कियों को जुर्म करने की मिसालें तो मिलती रहती हैं, लेकिन जुर्म के बाद की सजा का अहसास उनको ठीक से नहीं हो पाता। और यह बात सिर्फ नाबालिग मुजरिमों के साथ नहीं है, जो बालिग मुजरिम हैं, वे भी जुर्म के बाद की सजा के बारे में गंभीरता से नहीं सोचते हैं कि उनके बाद उनके परिवार का क्या हाल होगा। इसलिए सभी लोगों की जुर्म और सजा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि मुजरिमों की उम्र के मुताबिक मिसालें सामने रहें, और उन्हें सावधान करने के काम आएं। 
हमारी यह बात मानवाधिकारवादियों को कुछ खटक सकती है, क्योंकि वे इस उम्र सीमा को घटाने के खिलाफ हैं, लेकिन आज की पीढ़ी को कम उम्र से ही फिल्मों और टेलीविजन की वजह से, मीडिया और सामाजिक माहौल की वजह से जुर्म की अधिक जानकारी मिलती रहती है, और सेक्स या हिंसा के मामले कम उम्र में ही सामने आने लगे हैं। आज न सिर्फ जुर्म के मामले में, बल्कि दोपहिया गाडिय़ों को चलाने के मामले में भी 16 बरस की उम्र से इजाजत देने की जरूरत है। आज यह पीढ़ी समय से पहले शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व होती जा रही है, और 16 से 18 बरस के बीच के दो बरसों को कई मामलों में नाबालिग मानना अब ठीक नहीं है। 

इंटरनेट पर सरकार को चौकस और लोगों को चाल-चलन ठीक रखने की जरूरत

संपादकीय
6 अगस्त 2014
लंबे समय तक भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे गोविंदाचार्य ने मोदी सरकार की सोशल मीडिया पर मौजूदगी और उसके इस्तेमाल के खिलाफ अदालत में एक जनहित याचिका दायर की है और इसे भारतीय कानूनों के खिलाफ बताया है। उनका तर्क यह है कि सोशल मीडिया और ईमेल के सर्वर भारत के बाहर हैं और उनके इस्तेमाल से भारत सरकार की जानकारी देश के बाहर चली जाती है जो कि खुद सरकार के इस नियम के खिलाफ है कि कोई भी सरकारी जानकारी खास इजाजत के बिना देश के बाहर नहीं जानी चाहिए। गोविंदाचार्य आज भी हिंदूवादी विचारधारा के स्वदेशी आंदोलन वाले हैं, और वे लगातार सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात रखते हैं।
हम इंटरनेट के दो तरह के इस्तेमाल अलग-अलग मानते हैं, जिनमें से एक सार्वजनिक सोशल मीडिया है, जिसे सरकार अपनी बात रखने, लोगों की बात सुनने, और लोगों से बातचीत करने के लिए इस्तेमाल करती है। यह पूरा मामला खुला हुआ रहता है, और इसमें बिना किसी गोपनीयता के विचारों और सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। दूसरा मामला ईमेल जैसी इंटरनेट सुविधाओं का है, और यहां पर एक खतरा सामने आता है। भारत सरकार ने एनआईसी नाम की अपनी कम्प्यूटर एजेंसी के मार्फत केंद्र और राज्य सरकारों के तमाम लोगों के लिए ईमेल की सुविधा उपलब्ध कराई है। और यह सुविधा सारे सांसदों तक है, और शायद दूसरी संवैधानिक संस्थाओं को भी यह उपलब्ध है। इसके बाद भी यह देखने में आता है कि मंत्रियों से लेकर सांसदों तक और बड़े-बड़े अफसरों तक के विदेशी सर्वरों वाले निजी ईमेल अकाउंट रहते हैं और सरकारी या गोपनीय जानकारी उसके मार्फत आती-जाती रहती हैं, और उन विदेशी सर्वरों में वह हमेशा ही खतरे में रहती है।
पिछले बरसों में लगातार इस बात के सुबूत आए हैं कि अमरीकी खुफिया एजेंसियां भारत सहित दुनिया के तकरीबन हर देश में संगठनों और लोगों की खुफिया निगरानी करती हैं। इनमें पूरी दुनिया के टेलीफोन कॉल, संदेश, और ईमेल के अलावा इंटरनेट पर आने-जाने वाली तमाम बातों की निगरानी शामिल है। ऐसे में कोई बेवकूफ ही यह मानकर चल सकता है कि अमरीकी सर्वरों में जमा भारतीय जानकारी को अमरीकी खुफिया एजेंसियां नहीं देखती होंगी। ऐसे में जब दुनिया के कारोबारी हित देशों की सुरक्षा से भी कई बार एक महत्वपूर्ण हो जाते हैं, तब सरकारों से परे कारोबार के मामले भी विदेशी सर्वरों में रहना खतरनाक होता है। 
लेकिन अपनी ही इस बात के खिलाफ हमारे सामने एक बड़ा मामला आज यह आया है कि रूस के कुछ हैकरों ने एक अरब से अधिक पासवर्ड चोरी कर लिए, और ऐसा करते हुए उन्होंने दसियों हजार वेबसाईटों से यह चोरी की। अब सवाल यह उठता है कि जो काम रूसी हैकर कर सकते हैं, वह काम चीनी और इजराइली हैकर भी कर सकते हैं, और अमरीका सहित तमाम ताकतवर सरकारों के सरकारी हैकर भी यह काम रात-दिन करते ही रहते हैं। ऐसे में भारत के मामले अमरीकी सर्वरों पर रहें, या कि भारतीय सर्वरों पर, क्या इस बात से कोई फर्क पड़ता है? दूसरी बात यह कि अगर भारतीय सर्वरों पर भी सरकारी या गोपनीय जानकारी वाली फाईलें रहती हैं, तो क्या वे हैकरों से सुरक्षित रहेंगी? 
आज जानकारों का यह मानना है कि भारत इंटरनेट पर अपनी असीमित जानकारी रहने के बावजूद साइबर सुरक्षा के मामले में बच्चा है। उसे अपनी गोपनीय बातों की हिफाजत की समझ भी नहीं है। ऐसे में भारत ने अपने-आपको बहुत नाजुक और खतरे के लिए खुला रखा हुआ है। और अब आखिर में इस बात का जिक्र जरूरी है कि सरकार की सोशल मीडिया पर मौजूदगी के अलावा नेताओं और अफसरों की जो निजी बातें सोशल मीडिया के निजी हिस्से में होती हैं, वे भी हैकरों से या अमरीकी जैसी खुफिया एजेंसियों से परे नहीं रहतीं। ऐसे में भारत के ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोग कई किस्म की ब्लैकमेलिंग के लायक रहते हैं, और अमरीका जैसी बदनाम खुफिया एजेंसियों के लोग अपने ही राष्ट्रपति को भी ब्लैकमेल करने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में भारत की सरकार को साइबर सुरक्षा के बारे में सोचना चाहिए, और लोगों को भी इंटरनेट पर, सोशल मीडिया और ईमेल पर अपने चाल-चलन को ठीक रखना चाहिए, क्योंकि इंटरनेट पर जाने के बाद लोग किसी गोपनीयता और निजता का दावा नहीं कर सकते।