कुछ मामलों में आज 16 बरस की उम्र भी बालिग सरीखी...

7 अगस्त 2014
संपादकीय
पिछले एक बरस से भारत में यह बहस चल रही है कि सेक्स-अपराधों या हिंसक-अपराधों के लिए नाबालिग होने की उम्र सीमा को घटाकर कम किया जाए या नहीं। दिल्ली में देश के सबसे चर्चित निर्भया बलात्कार कांड में सबसे खूंखार अपराधी नाबालिग था, और उसी वक्त से यह बहस चल रही थी, और आज कानून में फेरबदल करके ऐसे मामलों में नाबालिग की उम्र सीमा 18 बरस से घटाकर 16 बरस करने की चर्चा है। हमने इस पूरे एक बरस में इस बारे में अपनी राय नहीं लिखी थी, क्योंकि हम सबकी बातों को सुनना चाहते थे, और फिर अपनी सोच बनाना चाहते थे। तमाम तर्कों को सुनने के बाद, और कल दिल्ली में नाबालिग लड़कों द्वारा दिनदहाड़े खुली सड़क पर की गई एक हत्या को देखते हुए अब यह लगता है कि गिरोहबंदी करके अगर नाबालिग लोग ऐसे गंभीर जुर्म करते हैं, तो उम्र सीमा को घटाकर 16 बरस करना ठीक होगा। कोई एक अकेला लड़का या लड़की विचलित होकर किसी अस्थिर दिमागी हालत में कोई अपराध अचानक कर बैठे, तो वह एक अलग बात हो सकती है। लेकिन जब गिरोहबंदी करके लोग ऐसा करें, तो उन्हें नाबालिग होने की रियायत कुछ मामलों में तो नहीं मिलनी चाहिए। खासकर इसलिए भी नहीं मिलनी चाहिए कि ऐसे कुछ लोगों को सजा मिलने के बाद उनकी उम्र और पीढ़ी के बाकी लोगों के सामने सजा की एक मिसाल रहेगी। आज रियायत की एक मिसाल लोगों को सजा की गंभीरता का अहसास नहीं करने दे रही। यह जरूर हो सकता है कि 16 और 18 बरस के बीच के मुजरिमों के लिए रहने का एक इंतजाम ऐसा किया जाए कि वे न तो 16 से कम उम्र के लोगों के साथ सुधारगृह में रखे जाएं, और न ही 18 से अधिक उम्र के वयस्क मुजरिमों के साथ। 
आज देश में निजी अपराधों की हालत बहुत ही भयानक है। बलात्कार मानो इस देश की संस्कृति बन गया है, लोग बात-बात पर कत्ल करने लगे हैं, और इन दोनों से नीचे के दर्जे के जुर्म गिनती में बहुत अधिक हैं, लेकिन गंभीरता में कम होने की वजह से वे खबरों में कम आते हैं। नतीजा यह होता है कि कम उम्र के लड़के-लड़कियों को जुर्म करने की मिसालें तो मिलती रहती हैं, लेकिन जुर्म के बाद की सजा का अहसास उनको ठीक से नहीं हो पाता। और यह बात सिर्फ नाबालिग मुजरिमों के साथ नहीं है, जो बालिग मुजरिम हैं, वे भी जुर्म के बाद की सजा के बारे में गंभीरता से नहीं सोचते हैं कि उनके बाद उनके परिवार का क्या हाल होगा। इसलिए सभी लोगों की जुर्म और सजा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि मुजरिमों की उम्र के मुताबिक मिसालें सामने रहें, और उन्हें सावधान करने के काम आएं। 
हमारी यह बात मानवाधिकारवादियों को कुछ खटक सकती है, क्योंकि वे इस उम्र सीमा को घटाने के खिलाफ हैं, लेकिन आज की पीढ़ी को कम उम्र से ही फिल्मों और टेलीविजन की वजह से, मीडिया और सामाजिक माहौल की वजह से जुर्म की अधिक जानकारी मिलती रहती है, और सेक्स या हिंसा के मामले कम उम्र में ही सामने आने लगे हैं। आज न सिर्फ जुर्म के मामले में, बल्कि दोपहिया गाडिय़ों को चलाने के मामले में भी 16 बरस की उम्र से इजाजत देने की जरूरत है। आज यह पीढ़ी समय से पहले शारीरिक और मानसिक रूप से परिपक्व होती जा रही है, और 16 से 18 बरस के बीच के दो बरसों को कई मामलों में नाबालिग मानना अब ठीक नहीं है। 

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