संयुक्त राष्ट्र की औकात नहीं कि अमरीकी गिरोह से सवाल करे

1 अगस्त 2014
संपादकीय
फिलीस्तीन के गाजा पर इजराईल के बेहिसाब, बेकाबू, और बददिमाग हमलों को देखें, और उस पर संयुक्त राष्ट्र संघ की सारी पहल को देखें, तो लगता है कि संयुक्त राष्ट्र अब दुनिया के उन तमाम मामलों में प्रसंगहीन हो गया है जिनमें अमरीका की कोई ऐसी दिलचस्पी है, जो कि संयुक्त राष्ट्र की सोच के खिलाफ है। अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र को अपनी जमीन पर जगह क्या दी, उसने मानो इसे अपनी सरकार के एक दफ्तर जैसा ही दर्जा दिया। फिलीस्तीनियों के खिलाफ इजराईली हिंसा की आधी सदी से अधिक गुजर गई है, और दशकों से संयुक्त राष्ट्र ने फिलीस्तीनियों के हक में प्रस्ताव पारित किया है, लेकिन इस सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय मंच का यह दम नहीं है कि अमरीका की मर्जी के खिलाफ वह कुछ भी कर सके। उसका कामकाज दुनिया के इस सबसे बड़े मवाली देश से परे ही चल सकता है, और साथ-साथ अमरीकी गिरोह में शामिल देशों को छूना भी संयुक्त राष्ट्र के लिए मुमकिन नहीं है।
अभी कुछ ही बरस हुए हैं जब अमरीका ने झूठे सुबूत गढ़कर दुनिया के सामने पेश करके इराक पर हमला किया था, यह कहते हुए कि इराक में मानव संहार थोक में करने वाले रासायनिक और दूसरे किस्म के हथियार हैं, और दुनिया के हित में इराक पर हमला जरूरी है। बाद में साबित हुआ कि न तो इराक में ऐसे कोई हथियार थे, और न खुद अमरीकी सरकार के पास ऐसे कोई खुफिया सुराग थे। लेकिन संयुक्त राष्ट्र रोकते रह गया, सार्वजनिक रूप से अमरीका को ऐसे हमले के लिए मना करते रहा, और अमरीका ने न सिर्फ लाखों लोगों को मारने वाला यह हमला किया, बल्कि दुनिया के देशों को धमकी देकर एक गिरोह में बांटा, यह चेतावनी देते हुए, कि देश या तो इस हमले में अमरीका के साथ हैं, या फिर वे आतंक के साथ हैं। 
ऐसी तमाम बातों को देखें, तो लगता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ को बनाने का जो मकसद था, दुनिया की जिस जरूरत के पूरे होने की उम्मीद संयुक्त राष्ट्र से की जाती थी, वह सब अमरीकी दबदबे के तले दबकर रह गए। संयुक्त राष्ट्र दुनिया के बहुत से देशों में शांति सेना तैनात करने में कामयाब है, शरणार्थियों की मदद करना, बच्चों की मदद करना, इन सबमें कामयाब है, लेकिन इसलिए कामयाब है कि ऐसे अधिकतर मामलों में अमरीका के हित कहीं घायल नहीं होते। अमरीकी सरकार अगर इनमें से किसी मुद्दे पर, किसी मोर्चे पर खिलाफ हो जाए, तो संयुक्त राष्ट्र की यह औकात नहीं है कि वह वहां पर किसी जख्मी बच्चे पर मरहम भी लगा सके, किसी भूखे को खाना भी दे सकेगी। 
जिस तरह एक लतीफा चलता है कि एक आदमी कहता है कि वह अपने घर में सब कुछ अपनी मर्जी का करता है, अपनी बीवी की इजाजत से। उसी तरह आज संयुक्त राष्ट्र संघ की हालत हो गई है, वह अमरीका को छोड़कर, उसकी पसंद को छोड़, उसके गिरोह को छोड़, बाकी दुनिया के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मंच की तरह काम कर रहा है, तब तक कर रहा है, जब तक वह अमरीकी फौजी बूटों की राह में रोड़े की तरह नहीं खटकता। जिस दिन वैसी नौबत आती है, अमरीकी बूट एक ठोकर से संयुक्त राष्ट्र को राह के किनारे दूर फेंक देते हैं। यह नौबत बदलने के कोई आसार नहीं हैं, दुनिया के अलग-अलग मोर्चों पर अब अमरीका इस कदर हावी हो चुका है, कि उस पर किसी का बस नहीं है। पूरी दुनिया की जासूसी, पूरी दुनिया पर हमला, पूरी दुनिया के कारोबार पर रोक-टोक के उसके मनमर्जी के नियम-कायदे, इन सबको देखें तो अब लगता है कि पूरी दुनिया का ध्रुवीकरण एक ही ध्रुव के इर्द-गिर्द इतना बड़ा हो चुका है, कि बचे हुए देश तब तक बचे हुए हैं, जब तक कि उन पर हमला करने की अमरीका को जरूरत नहीं पड़ती। 
आज ऐसे में दुनिया को कुछ ऐसे बड़े नेताओं की जरूरत है, जो अपने देश की ताकत लेकर, नैतिकता की ताकत लेकर संयुक्त राष्ट्र सहित दूसरे मोर्चों पर अमरीकी दादागिरी के खिलाफ लोगों को एकजुट कर सकें, और इंसाफ की बात कर सकें। ऐसे आसार हमको दिखते नहीं हैं, और शायद आज से सौ-दो सौ बरस बाद पूरी दुनिया 4 जुलाई को ही अपना स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए मजबूर की जाएगी, अमरीका के साथ-साथ। 
एक बार फिर इजराईल और फिलीस्तीन के मोर्चे पर लौटें, तो अमरीका ने दुनिया के मुस्लिम देशों पर हमले करने की अपनी साजिश के तहत बेकसूर और बेघर किए गए फिलीस्तीनियों पर अपने गिरोह के इजराईल को छोड़ रखा है, और पूरी पश्चिमी दुनिया के वे बड़े देश भी आंख-मुंह बंद किए सैकड़ों बच्चों की लाशों को अनदेखा कर रहे हैं, जो तीसरी दुनिया के मजदूर देशों में बाल मजदूरी के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी चलाते रहते हैं। इतिहास इन तमाम बातों को दर्ज तो करते चल रहा है, लेकिन आखिर में जाकर इतिहास विजेता की कहानी रहती है, क्योंकि जंग में एक तो सब कुछ जायज रहता है, दूसरा यह कि जीतने वाले से कोई सवाल नहीं होते। आज संयुक्त राष्ट्र संघ की भी यह औकात नहीं है कि अमरीकी गिरोह से सवाल कर सके।

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