जांच के कतरा-कतरा नतीजे मीडिया को परोसना बंद हो

10 अगस्त 2014
संपादकीय
अभी उत्तरप्रदेश के बलात्कार के कुछ मामले, और इनमें से कम से कम एक मामला धर्मांतरण के आरोप का भी है, खबरों में बने हुए हैं। यह प्रदेश साम्प्रदायिक टकराव, हिंसा, और अलगाव को झेल रहा है, और कुछ गंभीर अखबारों की ऐसी खोजी रिपोर्ट भी छपी हैं कि अधिकतर साम्प्रदायिक टकराव उन इलाकों में किए गए हैं, जहां पर कि विधानसभा के उपचुनाव होने हैं। इन दोनों बातों के बीच रिश्ते को समझा जा सकता है, और एक से अधिक राजनीतिक दल ऐसे हैं, जो ऐसे टकराव को खड़ा करके उससे होने वाले वोटों के धार्मिक या साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से फायदा पा सकते हैं। ऐसा शक है कि ऐसी राजनीतिक ताकतें ऐसे ध्रुवीकरण को एक साजिश के तहत खड़ा कर रही हैं। 
इस बीच मीडिया में ऐसे बहुत से बलात्कार के मामलों को लेकर तरह-तरह की जानकारी पुलिस और नेताओं के तरफ से दी जा रही है, और उत्तरप्रदेश की पुलिस, और वहां के प्रशासन के आला अफसर यह कह रहे हैं कि वे पूरी पारदर्शिता निभाने के लिए हर जानकारी लोगों के सामने रख रहे हैं। किसी जांच के दौरान कतरा-कतरा जानकारी रोज मीडिया के मार्फत देश-प्रदेश के सामने इस तरह परोसने और पेश करने का तर्क हमारी समझ से परे है। खासकर तब जबकि एक मेडिकल जांच के नतीजे के खिलाफ दूसरे किस्म के नतीजे दूसरी मेडिकल जांच से सामने आ रहे हैं, पोस्टमार्टम में पहले कुछ आ रहा है, और फिर दूसरे पोस्टमार्टम में ठीक उल्टा नतीजा दिख रहा है। ऐसे में अपराध की जांच, सत्ता और विपक्ष के राजनीतिक दबाव, और जमीन पर दो या अधिक समुदायों के बीच लगातार चल रहे हिंसक टकराव को देखें, तो लगता है कि हर जानकारी को रोजाना पेश करने से किसका भला हो रहा है? 
आज चर्चित मामलों में जन दबाव के चलते पुलिस और जांच एजेंसियां ठीक से काम भी नहीं कर पाती हैं। और उत्तरप्रदेश जैसे राज्य में सत्ता हांकने वाली ताकतें अपनी साख बचाने के लिए हर जुर्म को झूठा साबित करने पर उतारू दिखती हैं, जैसे कि बलात्कार के कई मामलों में ममता बैनर्जी ने भी किया, और हमने इसी जगह इस रूख के बारे में बार-बार लिखा भी है। हमारा यह मानना है कि जांच के बीच आधी-अधूरी सच्चाई वाले निष्कर्षों को जनता के सामने एक बार रख देने के बाद किसी और अधिक विश्वसनीय जांच से जब नतीजे दूसरे आते हैं, तो भारत में लोगों को सत्ता के दबाव या किसी राजनीतिक साजिश का शक होता है, और बहुत से मामलों में यह शक सही भी होता है। दूसरा एक खतरा ऐसे मामलों में यह भी रहता है कि अदालत के पास सुनवाई के लिए पहुंचने के पहले चर्चित मामलों में इतना भारी जनमत तैयार हो चुका रहता है, कि अदालतें चाहे-अनचाहे एक दबाव का शिकार तो हो ही सकती हैं। 
सरकारों को हमारी सलाह है कि ऐसे नाटकीय अंदाज वाली पारदर्शिता से बचें, और जांच के निष्कर्षों को टुकड़े-टुकड़े में, छांट-छांटकर जनता के सामने परोसना भी बंद करें। ऐसा करना न तो लोकतांत्रिक बेबसी है, और न ही इंसाफ के लिए ऐसा करना सही है। जांच एजेंसियों का काम जांच करना होना चाहिए, और मामले से जुड़े नतीजों को विश्वसनीय जांच के आखिरी नतीजों के आ जाने तक, जनमत तैयार करने के लिए, जनता का विरोध शांत करने के लिए, इस्तेमाल करना बंद होना चाहिए। उत्तरप्रदेश और बंगाल के बहुत से मामले सरकार की राजनीति का हिस्सा दिखते हैं, और यह एक खतरनाक तौर-तरीका है। 

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