लोकतंत्र में भी संसद का इंतजाम राजतंत्र जैसा...

संपादकीय
13 अगस्त 2014
पश्चिम बंगाल के भाजपा सांसद बाबुल सुप्रियो को उस वक्त निराश होना पड़ा जब वे अपनी मोटरसाइकिल पर संसद जाना चाहते थे और संसद परिसर के सुरक्षा कर्मचारियों ने उन्हें बताया कि इस अहाते में मोटरसाइकिल को इजाजत नहीं है। देश टीवी की खबरों में रोज संसद के अहाते में पहुंचते हुए सांसदों को गाडिय़ों से उतरते देखता है, और जाहिर है कि सस्ती से सस्ती चौपहिया गाड़ी मोटरसाइकिल के मुकाबले कई गुना महंगी रहती है, पेट्रोल या डीजल ज्यादा खाती है, सड़क पर जगह ज्यादा घेरती है, और संसद परिसर में पार्किंग की जगह भी दुपहिए से कई गुना अधिक लगती ही होगी। ऐसे में संसद परिसर में मोटरसाइकिल को न आने देना, और कारों को ही आने देना एक संपन्न और रईस सोच है, जो कि सत्ता की जगह से आम लोगों को दूर रखना चाहती है। 
हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले बरसों में हमने छत्तीसगढ़ के राजभवन से कुछ सालाना जलसों पर लोगों को पहुंचने वाले निमंत्रण पत्रों पर भी इसी जगह लिखा था कि न्यौते के साथ आने वाले पार्किंग के स्टिकर कारों के लिए होते हैं, उन पर कार तो लिखा होता है, लेकिन दुपहियों को इजाजत नहीं होती, और राजभवन के मेहमानों को अपने दुपहिए अहाते के बाहर सड़क किनारे खड़ा करके जाना होता है। यह पूरा राजसी सिलसिला ही गलत है, जो यह मानकर चलता है कि सत्ता के इर्द-गिर्द पहुंचने वाले लोगों के पास इतनी आर्थिक ताकत तो होनी ही चाहिए। हमने पिछले महीनों में लगातार यह भी छापा है कि किस तरह योरप के एक अतिविकसित देश से लेकर भूटान जैसे तीसरी दुनिया के देश तक के प्रधानमंत्री साइकिलों पर दफ्तर आते-जाते हैं। और भारत जैसे देश में छोटे-छोटे नेता बड़ी-बड़ी गाडिय़ों के लंबे-लंबे काफिलों में चलते हैं, संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए जज या दूसरे लोग भी लालबत्तियों और सायरन के साथ ही चलते हैं, मानो उन्हें बेइंसाफी की आग बुझाने जाना हो। 
लोकतंत्र में बड़ी गाडिय़ां किसी को बड़ा नहीं बना सकतीं। अगर संसद से आई हुई यह खबर सच है, तो संसद को अपना इंतजाम तुरंत बदलना चाहिए, और सांसदों का हौसला भी बढ़ाना चाहिए कि वे मोटरसाइकिलों या हो सके तो साइकिलों से भी वहां आएं। संसद या राजभवन से स्थापित हुई परंपराएं नीचे तक जाती हैं, और फिर हर जगह लोगों से यह उम्मीद की जाती है कि उन्हें सम्मान चाहिए, तो वे कारों में आएं। भारत में इस सोच को बदलने की जरूरत है, और सत्ता के अहातों को, सार्वजनिक जगहों को, सड़कों और फुटपाथों को छोटी गाडिय़ों, दुपहियों और साइकिलों के साथ दोस्ताना बर्ताव वाला बनाना चाहिए। 

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