लालकिले से आम लगती बातों की इस देश में खास अहमियत

16 अगस्त 2014
संपादकीय
लालकिले से अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बहुत अनौपचारिक अंदाज में अपनी सोच रखी, और लोगों को यह याद नहीं पड़ता कि क्या इसके पहले किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने बिना लिखे हुए भाषण से देश और दुनिया के सामने अपनी बात रखी थी। उन्होंने इस मौके की परंपरा से हटकर बहुत सी ऐसी बातें कहीं जो कि आम बातें मानी जाती हैं, या कम से कम कांग्रेस ने जिन बातों को फुटपाथी या सड़कछाप करार दिया है। लेकिन हम मोदी के अंदाज और उनकी बातों, दोनों से पूरी तरह सहमत हैं। इस मौके पर देश की अंतरिक्ष की उपलब्धि को गिनाना, फौजी ताकत को गिनाना, पड़ोसी देशों को चेतावनी देना, जैसे काम बहुत से प्रधानमंत्री करते आए हैं। नरेन्द्र मोदी के साथ यह सहूलियत है कि उनके सिर पर परंपराओं का टोकरा लगा हुआ नहीं है, और वे अपने अंदाज से काम कर सकते हैं, क्योंकि इस बार की केन्द्र सरकार तक उनकी पार्टी, उनके ही कंधों पर सवार होकर पहुंची है। इसलिए मोदी ने आजादी की इस सालगिरह पर अपनी सोच और अपने अंदाज की आजादी का फायदा भी उठाया, और हमारा यह अंदाज है कि उन्होंने सुनने वालों का दिल भी जीत लिया होगा। 
उनकी कुछ बातों का जिक्र करना हम यहां जरूरी समझते हैं। इस लोकतंत्र में आजादी की आधी और पौन सदी के बीच के इस दौर में जब सत्ता की सोच राजतंत्र की तरह काम करती है, तब मोदी का इस बात से भाषण शुरू करना कि वे प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, प्रधान सेवक के रूप में उपस्थित हैं, एक असर डालने वाली बात रही। हमारे पाठकों को याद भी होगा कि हम बरसों से यह बात लिखते आ रहे हैं कि सरकारी ओहदों के नाम जिलाध्यक्ष या जिलाधीश की जगह जिला जनसेवक होने चाहिए, ताकि नाम के मुताबिक सोच भी ढल सके। मोदी ने इस बात पर जोर दिया है, तो यह उम्मीद की जा सकती है कि उनकी सरकार, उनके सांसद, और उनकी पार्टी की राज्य सरकारें इस सोच पर गौर तो करेंगी। उन्होंने सरकार के लोगों से जितनी मेहनत करने की उम्मीद की है, वह वे पिछले महीनों में साबित भी करते आ रहे हैं, और इस बात को आजादी की सालगिरह पर महत्व देना भी हमारे हिसाब से ठीक है। वरना आज देश अंग्रेजों की गुलामी से तो आजाद हो गया है, लेकिन हिन्दुस्तानी सरकारों की गुलामी से जनता अब तक आजाद नहीं हो पाई है। मोदी अगर जनता के इस कमजोर तबके को सरकारी जुल्म से आजादी दिला सकते हैं, तो वह स्वतंत्रता की सालगिरह के अगले मौके पर एक बड़ी बात होगी।
मोदी ने देश की महिलाओं और लड़कियों को इस भाषण में सबसे अधिक महत्व देते हुए कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ आवाज उठाने से लेकर, स्कूलों में छात्राओं के लिए पखाने बनाने तक, और घरेलू महिलाओं के खुले में शौच पर जाने की शर्मिंदगी के खिलाफ जितना जोर देकर अपने भाषण का जितना बड़ा हिस्सा इस मुद्दे को दिया है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। इसके साथ-साथ उन्होंने बलात्कार का जिक्र करते हुए जिस तरह देश के लोगों को अपनी लड़कियों को सावधान करने के साथ-साथ अपने लड़कों को नसीहत देने की जो बात कही, वह भी हम एक साधारण लगने वाली लेकिन देश की एक सबसे महत्वपूर्ण बात मानते हैं, और इस मौके पर महिलाओं से जुड़ी इन बातों को इतने विस्तार से कहना, देश के लिए मायने रखने वाली बात है।  उन्होंने बेटियों को बूढ़े मां-बाप के लिए भी बेटों से अधिक मददगार करार दिया है, और यह भी एक बहुत जरूरी सोच है जिस पर समाज को लाने की जरूरत है।

उन्होंने माओवादी हथियारबंद आतंकियों से भी टकराव के बजाय, उनको नेपाल के माओवादियों से नसीहत लेने को कहा, और लोकतंत्र के रास्ते पर वापिस आने की अपील की। उनकी यह सोच उन्हीं की सरकार के कुछ दूसरे मंत्रियों की महज टकराव की सोच से अलग है, और हम इस फर्क को अच्छा मानते हैं। इसके अलावा नरेन्द्र मोदी ने गांधी का जिक्र करते हुए लोगों के बीच सफाई की जो बात कही, और उस पर जितना अधिक जोर दिया, उस पर जितने मिनट कहा, हम उसे भी महत्वपूर्ण मानते हैं, और भारत की पहचान देश के भीतर से लेकर देश के बाहर तक एक बहुत ही गंदे देश की है, और उसे बदलने पर जोर देने के लिए यह मौका बहुत सही था, और उन्होंने सड़कछाप कही जा रही इस बात को कहने का हौसला दिखाया, उसके लिए हम उनकी तारीफ करेंगे। 
देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार, और लोगों के मेहनत से काम करने, हुनरमंद होने के बारे में उन्होंने बहुत सी बातें कही हैं, जो हमारे हिसाब से बहुत से दूसरे मौकों पर कही जाती हैं, और उनके बारे में आज यहां पर अधिक लिखने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस के जिन लोगों ने मोदी की बातों को फुटपाथी या सड़कछाप कहा है, उनको उनका ईश्वर माफ करे, क्योंकि वे शायद ये नहीं जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं। सड़कों के किनारे और फुटपाथों पर पखाने के लिए बैठने को मजबूर महिलाओं की मजबूरी की जिम्मेदार कांग्रेस पार्टी को अब भी समझ नहीं आ रही है कि वह हाशिए के बाद और कहां जाएगी। मोदी की सरकार, पार्टी, और उनके गठबंधन को चाहिए कि सहज और आम लगती उनकी बातों पर वे अमल करके दिखाएं। 

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