यही है सही

18 अगस्त 2014
पिछले दो दिनों में दो बड़ी अदालतों के फैसले कुछ राहत वाले रहे। मद्रास हाईकोर्ट ने एक फिल्म पर रोक लगाने से इंकार कर दिया, और सुप्रीम कोर्ट ने एक दूसरी फिल्म के मामले में यही रूख दिखाते हुए कहा कि अगर फिल्म पसंद नहीं है तो देखने न जाएं। 
पिछले कई बरसों से लगातार फिल्म और कला को लेकर अधिकतर पार्टियों की सरकारें, और अदालतें भी इतना दकियानूसी नजरिया दिखा रही थीं कि विचारों की आजादी, कलात्मक अभिव्यक्ति का अधिकार, और यहां तक कि ऐतिहासिक सच को लिखना भी नामुमकिन हो चला था। किसी धर्म, जाति, समुदाय, व्यक्ति के बारे में लिखना, उसकी तस्वीर बनाना, उस पर फिल्म बनाना या नाटक करना एक खतरनाक काम हो गया था, और हो गया है। इन दो अदालतों के इन ताजा फैसलों से तस्वीर बहुत बदलने वाली तो नहीं है, क्योंकि आज भी दीनानाथ बत्रा जैसे हिंदू संस्कृतिवादी आंदोलनकारी अदालती कार्रवाई की धमकी देकर प्रकाशकों से इतिहास की किताबों को लुग्दी में बदलवा रहे हैं। और जब किसी के कानूनी नोटिस कोई प्रकाशक खुद ही डर-सहमकर पूरी की पूरी किताब ही खत्म कर दे, तो फिर उसमें तो अदालत खुद होकर दखल दे भी नहीं सकती। 
लेकिन पिछली कई फिल्मों पर तरह-तरह की अदालती रोक के लंबे सिलसिले के बाद अब यह राहत की एक बात है कि एक हाईकोर्ट ने अपने-आपको सुपर सेंसर बोर्ड बनाने से इंकार कर दिया, और दूसरी अदालत ने, सुप्रीम कोर्ट ने यह समझदारी का रूख दिखाया है कि जिन्हें फिल्म पसंद न हो, वे न देखें। 
हिंदुस्तान में यह भी समझने की जरूरत है कि पूरे देश के लिए एक सेंसर बोर्ड बना है, और देश के कुछ इलाकों के लिए फिल्मवालों का काम आसान करने को उसकी क्षेत्रीय शाखा भी बनी हुई है। ऐसे में उसमें अलग-अलग बहुत से जानकार लोगों के फिल्म देख लेने के बाद, उस पर सोच-विचार कर लेने, जरूरी लगते फेरबदल करवा लेने के बाद देश के किसी एक जिले की कोई एक छोटी सी अदालत भी जब बिना फिल्म देखे फिल्म से जुड़े लोगों को नोटिस भेजकर हाजिर होने को कहने लगती है, तो लगता है कि राष्ट्रीय स्तर पर बने हुए सेंसर बोर्ड का मतलब क्या है? 
लेकिन बात सिर्फ फिल्मों और सेंसर बोर्ड की नहीं है, आज जिंदगी के हर दायरे में, इंटरनेट पर पोस्ट की गई किसी बात या तस्वीर को लेकर, किसी भाषण के हिस्से को लेकर, किताब या लेख को लेकर, एक छोटी सी ट्वीट को लेकर जिस तरह से लोग कानून का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं, वह सिलसिला थमना चाहिए। इसी गोल धरती के दूसरे तरफ पश्चिम के कई देश ऐसे हैं जहां पर इनमें से एक भी केस अदालत में खड़ा नहीं हो सकता, क्योंकि वहां एक विकसिल सभ्यता अभिव्यक्ति की ऐसी आजादी की हिमायती है, जिसमें किसी धर्म के खिलाफ कहना और करना भी कानूनी है। हम आजादी के उस ऊंचे पैमाने की कल्पना भारत में अगले सौ-पचास बरस भी नहीं करते जिसमें कि एक धर्म का पादरी दूसरे धर्म की किताब को सार्वजनिक रूप से जलाता है, और यह पूरी तरह कानूनी भी रहता है। एक देश के काटूनिस्ट दूसरे देश में अधिक प्रचलित एक धर्म पर कार्टून बनाते हैं, और उनको इसकी इजाजत रहती है। हम अभी ऐसे किसी हक की वकालत नहीं कर रहे, लेकिन जिंदगी की आम बातों पर भी जब कानून का नाम लिखी लाठी लेकर पाखंडी कट्टरपंथी टूट पड़ते हों, तो वैसे देश में ये दो अदालती फैसले राहत वाले हैं। कुछ ही दिन पहले एक और फैसला आया था जिसमें किसी भी धर्मस्थल पर बिना इजाजत लगे हुए लाऊडस्पीकर हटाने का हुक्म दिया गया था। 
भारत में आज अपनी भावनाओं को ठेस पहुंचने की शिकायत करते हुए कोई भी पुलिस थाने या अदालत जाकर एक केस दर्ज करने की अपील कर सकते हैं। धर्म या जाति, इतिहास या आध्यात्म, किसी भी बात को लेकर किसी की भावनाएं आहत हो सकती हैं, लेकिन ऐसी शिकायतों पर जुर्म कायम करने का सिलसिला बहुत ही अलोकतांत्रिक और गैरजरूरी है। एक थाना जब अश्लीलता का मामला दर्ज करने लगता है, तो यह लगता है कि धर्म और इतिहास के मामलों में जो देश नग्न साधू-संन्यासियों से लेकर खजुराहो के मंदिरों तक की संपन्नता वाला है, जहां पर सैकड़ों बरस पहले कामशास्त्र जैसी किताब लिखी गई थी, वहां पर आज बात-बात पर अश्लीलता के मामले होने लगे हैं। 
दरअसल एक थाने में बैठकर यह मुमकिन भी नहीं रहता कि नग्नता और अश्लीलता के बीच फर्क किया जाए। और देश का कानून हर थानेदार को इसकी इजाजत देता है कि वह ऐसा केस दर्ज करे, और सामाजिक दबाव थानेदार को इस बात की जिम्मेदारी देता है कि वह केस जरूर दर्ज करे। ऐसे सुप्रीम कोर्ट का एक फिल्म के बारे में दिया गया ऐसा फैसला नीचे तक असर डालेगा, ऐसी हमें उम्मीद है।
कला से लेकर इतिहास तक, तथ्यों की सच्चाई और विचारों की आजादी के विरोध का सिलसिला दरअसल पाखंड की मजबूत चट्टान पर टिका हुआ है। जो लोग ऐसा विरोध करते हैं, उनके पास, उनके संगठन के पास अपनी हस्ती को जाहिर करने, साबित करने, और जिंदा रखने के लिए यही तरकीब होती है कि वे संस्कृति के चौकीदार और ठेकेदार बनकर खबरों में बने रहें। और जब देश में कानून को लागू करने वाले नेता और अफसर कायर और दब्बू रहते हैं, तो वे ऐसे ठेकेदारों की हिंसा, और कानून के बेजा इस्तेमाल के खिलाफ कुछ करते भी नहीं। ऐसे में सरकार के हिस्से का जिम्मा भी घूम-फिरकर अदालत पर आ जाता है, और अदालत ने अभी यह सही रूख दिखाया है। यही है सही।

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