संपन्न तबके की खपत से पैदा मौसम की मार विपन्न लोगों पर

17 अगस्त 2014
संपादकीय

हिंदुस्तान सहित पूरी दुनिया में बाढ़ सहित मौसम की दूसरी किस्म की मार बढ़ती चल रही है। दुनिया का मौसम का मिजाज इतना बदल रहा है कि वह हर किस्म के रिकॉर्ड तोड़ रहा है। बहुत कम वक्त में बहुत अधिक बारिश, कहीं पर बहुत अधिक बर्फ, कहीं पर बहुत गर्म लू, और इन सबसे अनगिनत बेदखली, मौतें, और नुकसान। लेकिन सभी जगहों पर मौसम की मार को लेकर फिक्र नुकसान होने के साथ-साथ मदद-राहत, और भरपाई तक दिखती है। मौसम इतना उखड़ा हुआ क्यों है, इस बारे में बात कुछ सम्मेलनों में आई-गई हो जाती है। 
इंसानों ने पिछली एक सदी में सामानों की अपनी खपत इतनी बढ़ा दी है, हर किस्म की जगह पर हर किस्म की बसाहट इतनी बेदिमागी से की है, कि मौसम की मार से बचना आसान भी नहीं है। समंदरों के किनारे से पेड़ों को काटकर ऐसा हाल बना दिया गया है कि अब जब तूफान आता है, तो उसके थपेड़े रोकने को कोई पेड़ नहीं होते, और पानी के करीब तक बस गई आबादी को तूफान सीधे मटियामेट कर देते हैं। पहाड़ों पर पेड़ इस रफ्तार से कट रहे हैं कि जमीन को थामने के लिए जड़ें कम होती जा रही हैं, बारिश की मार से मिट्टी को बचाने के लिए पत्तों और तनों का छाता खत्म हो गया है, आसपास खदानों की वजह से कहीं जमीन में दरारें पड़ रही हैं, तो कहीं पहाड़ों पर बढ़ती हुई भीड़ की वजह से वहां का कमजोर ढांचा चौपट हुए जा रहा है। 
लेकिन इंसान हैं कि सामानों की खपत बढ़ती ही चली जा रही है। सबसे ताकतवर और सबसे रईस तबका खपत सबसे अधिक करता है, और उससे पर्यावरण पर होने वाला बुरा असर सबसे गरीब पर सबसे अधिक पड़ता है। सबसे गरीब ही नदियों के सबसे किनारे बसने को मजबूर होता है, समंदर के किनारे मछुआरों की बस्तियां ही सबसे अधिक होती हैं, पेड़ों के बिना नंगे रह गए कांक्रीट के शहरी ढांचों के एयरकंडीशनरों से बढ़ती झुलसाने वाली गर्मी में मजदूर बिना छांह रह जाते हैं। जिन देशों में ठंड का कहर बर्फ की बढ़ती ऊंचाई के साथ बढ़ते चल रहा है, वहां पर सबसे बुरा हाल बेघर लोगों का होता है, या ऐसे लोगों का होता है जिनके पास घरों को गर्म रखने, खुद को गर्म रखने के इंतजाम नहीं हैं। 
कुल मिलाकर एक ही बात दिखती है कि संपन्न तबके की लाई गई बर्बादी की सबसे बुरी मार सबसे विपन्न तबके पर पड़ रही है। ऐसे में कारोबारियों के बाजार को बढ़ाते चलने वाली पूंजीवादी सरकारों से यह उम्मीद बेकार है कि वे खपत कम करवाने की कोशिश करेंगी। यहां पर हम इस झूठ को भी खारिज करना चाहेंगे कि यह धरती बढ़ती हुई आबादी का बोझ नहीं ढो पा रही है। दरअसल आबादी का एक बहुत छोटा हिस्सा ही सबसे अधिक खपत वाला है, और आबादी का निचला आधा गरीब हिस्सा तो धरती पर मानो कोई बोझ बढ़ाता ही नहीं। ऐसे में मौसम की बढ़ती मार को कम करने के रास्ते इतनी दूर से घूमकर आते हैं कि सरकारों के लिए उनका नक्शा बनाने भी आसान नहीं है। और आज तो दुनिया के कारोबार के बोलबाले के चलते पर्यावरण की बात भी करना अपने-आपको नक्सली करार देने जैसा है। 

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