भारतीय लोकतंत्र में आया ओवरटाईम मेहनत का दौर

20 अगस्त 2014
संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बनाए जाने पर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जो तर्क उठाए जाते रहे, उन तर्कों के अलावा, और उनसे बढ़कर भी कुछ तर्क अमित शाह को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के खिलाफ उठे। वे अदालतों में गंभीर मामलों में उलझे हुए हैं, और जमानत पर छूटे हुए हैं। लेकिन सफलता के साथ बहस नहीं होती, और कामयाब के साथ कुश्ती नहीं होती। इसलिए भाजपा को ऐतिहासिक कामयाबी दिलाने वाले नरेन्द्र मोदी ने जब अपने दाएं हाथ की ताजपोशी की, तो भाजपा के भीतर अमित शाह के मुकाबले किसी नाम की चर्चा भी नहीं हुई। हम आज के बाद के बरसों की बात करें, और पीछे की बात अदालतों पर छोड़ दें, तो अमित शाह के साथ न सिर्फ भाजपा में बल्कि देश के राजनीतिक दलों में लीडरशिप का एक नया दौर शुरू हुआ है, जो कि बिल्कुल अलग अंदाज का है। 
आज हम इस नए दौर पर ही चर्चा करना चाहते हैं, जो कि पत्नी, और अपनी मां के परिवार से ही अलग अकेले रहने वाले नरेन्द्र मोदी की राजनीति से शुरू हुआ है, और परिवारवाद से परे रहने वाले अमित शाह तक आगे बढ़ा है। मोदी प्रधानमंत्री और शाह सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष। इन दोनों का कुनबापरस्ती से परे का जीवन, और हर दिन ओवरटाईम करने के अंदाज में काम करने का रोजमर्रा का ढर्रा, भारतीय राजनीति में एक बिल्कुल ही अनोखी और अलग बात है। कुछ वामपंथी राज्यों में कभी-कभी ऐसा देखने में आया था, लेकिन उनसे परे किसी बड़ी पार्टी में कभी ऐसा नहीं हुआ था कि परिवार से अलग-थलग और इतनी अधिक मेहनत करने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष आए हों, और जिनकी इतनी महत्वाकांक्षा हो, जो इतने सक्रिय हों, और जिनके साथ इतना मजबूत प्रधानमंत्री हो। 
आज देश की बाकी पार्टियों को एक नजर देखें, तो कांग्रेस एक कुनबे तक सीमित, उसी कुनबे पर आश्रित, पिछले बरसों में हर किस्म के गलत काम कर चुकी, और आज भी चौराहे पर खड़ी पार्टी की तरह रह गई है, जिसे देश ने पूरी तरह और बुरी तरह खारिज भी कर दिया है। हमारे पाठकों को याद होगा कि पिछले दो-तीन बरसों से लगातार हम कांग्रेस को आगाह करते आ रहे थे कि वह इस देश में विपक्ष भी नहीं बचेगी, उस वक्त हमको खुद यह अहसास नहीं था कि हमारी बात लोकसभा के भीतर विपक्ष के दर्जे के मामले में शब्दश: सही साबित होगी। हम तो कांग्रेस के देश में विपक्ष न रह जाने की बात कर रहे थे, लेकिन उस पार्टी में वैसी बातों को सुनने की गरज किसी को नहीं थी। इससे परे आधा दर्जन बड़ी पार्टियों को देखें, तो अन्नाद्रमुक  अपनी कुलदेवी जयललिता के चरणों तले जीती और पलती हुई पार्टी है। उत्तर भारत में सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा वाली समाजवादी पार्टी अपने कुनबे के बोझ से दबकर लुग्दी सी बन गई है, और यही हाल एक दूसरे कुनबे लालू का हुआ, यही हाल दक्षिण भारत में करूणानिधि की द्रमुक का हुआ। पंजाब में एक और कुनबे के घर से चलती पार्टी अकाली दल को पिछले चुनाव में नुकसान सामने आया, और आगे आ भी सकता है। पूरा हरियाणा कुनबों से पटा है, वहां की पार्टियों को अलग-अलग गिनना मुश्किल है। उत्तर भारत की ही एक और बड़ी संभावनाओं वाली बड़ी पार्टी, बसपा का हाल जयललिता की अन्नाद्रमुक जैसा है, और वह अपनी मालकिन मायावती की मनमानी के बोझ तले पिस रही है। उधर वामपंथ के एक बड़े गढ़ रहे बंगाल में वामपंथी अंदाज के ठीक खिलाफ एक तानाशाह ममता बैनर्जी की पार्टी है, जिसमें उनके अलावा किसी दूसरे का नाम भी किसी को नहीं मालूम है। ऐसी और भी बहुत सी मिसालें हैं, जिनमें महाराष्ट्र की शिवसेना है, कश्मीर की दोनों बड़ी पार्टियां हैं, आन्ध्र और तेलंगाना में मनमानी उजागर कर रहीं, वहां की क्षेत्रीय पार्टियां हैं। 
कुल मिलाकर हम भारत की एक ऐसी राजनीतिक तस्वीर देखते हैं, जिनमें राजनीतिक दल अपने-अपने कुनबों तले कराह रहे हैं, जिनमें लोग राजनीतिक ताकत को दुह रहे हैं, और अनुपातहीन संपत्तियों के मामलों में अदालतों में खड़े हैं, सैकड़ों और हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार में फंसे हुए हैं। ऐसे में मोदी और अमित शाह, परिवार और कुनबापरस्ती के खिलाफ, पूरे वक्त काम करने वाले ऐसे नेता बनकर सामने आए हैं, जिनके बारे में कोई मंत्री यह कह रहा है कि महीने भर में उसका तीन किलो वजन गिर गया, क्योंकि प्रधानमंत्री चैन से बैठने नहीं देते। और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का कहना है कि मोदी न खुद सोते हैं, और दूसरों को सोने देते हैं। एक देश के प्रधानमंत्री की शक्ल में हमने एक मजदूर की तरह काम करते मनमोहन सिंह को भी देखा था, लेकिन ऐसी मजदूरी किस काम की थी कि अपने आसपास की, अपने मातहतों की, लूटपाट और डकैती की तरफ से मुखिया ने आंखें बंद कर रखी हों। ऐसे में खुद मेहनत करने, दूसरों से मेहनत करवाने, और कुनबापरस्ती को परे रखने की दो-तीन बुनियादी शर्तों वाले इन दो नेताओं के काम से इनके सहयोगी दलों में भी एक बेचैनी हो रही है, अपनी खुद की पार्टी के बहुत से नेताओं के लिए भी ये ऊंचे पैमाने बड़ा ऊंचा दबाव बनकर आए हैं। हम इन दोनों की नीतियों और सिद्धांतों की अभी बात नहीं कर रहे, क्योंकि उनके लिए वे विधायिका से लेकर न्यायपालिका तक जवाबदेह रहते आए हैं और जवाबदेह रहते रहेंगे, लेकिन राजनीति और सरकार की चोटी पर जिस तरह की मेहनत और काम की एक नई संस्कृति दिखाई पड़ रही है, वह अगर सही दिशा में जाती है, तो पार्टी और सरकार इन दोनों की उत्पादकता बहुत अधिक बढऩे की एक संभावना है, जो कि बाकियों के सामने भी हमेशा ही थी, लेकिन वे लोग कुनबों में मस्त थे, कुनबों में मस्त हैं, और आखिर में शायद उनके पास सिर्फ कुनबे ही बचेंगे। भारतीय लोकतंत्र में राजनीति और सरकार को हरामखोरी की जगह माना जाता था, अब वहां पर ओवरटाईम मेहनत का नया दौर देखने लायक है।

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