इस पार्टी में महज नाम में ही समाजवाद है, और कहीं नहीं

22 अगस्त 14
संपादकीय

समाजवादी सोच की सरकार चलाने का दावा करने वाले तानाशाह, कुनबापरस्त, अलोकतांत्रिक मुलायम-कुनबे के राज से आखिरी अच्छी खबर कब आई थी, यह याद नहीं पड़ता है। अब वहां इस सरकार के बड़बोले और विवादास्पद मंत्री आजम खान के बारे में खबर आई है कि उनके घर के लिए प्रदेश के बाहर से आ रही भैंसों को प्रदेश की सीमा पर पुलिस ने अपनी हिफाजत में लिया, और भैंसों की गाड़ी को सायरन और लालबत्ती के साथ लाकर रास्ते में उनके ठहरने-खाने-पीने का इंतजाम किया, उनको मच्छरों से बचाने का इंतजाम किया। 
यह सिलसिला आजादी की आधी-पौन सदी के बीच का है, और भयानक है। वैसे तो उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी में समाजवाद महज उसके नाम में है, और उसके काम का कोई भी हिस्सा इस सोच को छूता भी नहीं है, बल्कि हकीकत यह है कि यह पार्टी उस सोच के ठीक खिलाफ चलती है। लेकिन अगर नाम पर न जाएं, तो वामपंथियों और शायद ममता बैनर्जी जैसी एकाध और पार्टी को छोड़ दें, तो सादगी तो मानो कोई अलोकतांत्रिक बात है, और उसे भारतीय लोकतंत्र से देश निकाला दे दिया गया है। निर्वाचित लोगों से लेकर दूसरे किसी भी तरह की सत्ता पर काबिज लोगों का सामंती रूख देखते ही बनता है, या कहने का दूसरा तरीका हो सकता है कि देखते नहीं बनता है। लोग सत्ता का बेजा इस्तेमाल इस तरह करते हैं, मानो वे सत्ता पर ही पैदा हुए थे, और सत्ता पर ही खत्म होंगे, अगली पीढिय़ों के लिए सत्ता की विरासत छोड़कर। 
गांधी की कांग्रेस से लेकर आरएसएस की भाजपा तक, इन दोनों के लोगों के तौर-तरीकों में जब जनता के पैसों की फिजूलखर्ची की सोच एक सरीखी हो गई, तो पंजाब में अकाली बाप-बेटे के लिए करोड़ों की कारें भी जायज हो जाती हैं, मायावती का सैकड़ों करोड़ का बंगला भी जायज हो जाता है, जयललिता के करोड़ों के गहने भी जायज हो जाते हैं, जगनमोहन की सैकड़ों करोड़ की दौलत भी जायज हो जाती है, और दिल्ली-गुडग़ांव इलाके में चौटालाओं की अरबों की दौलत भी जायज हो जाती है। काली कमाई से परे, जनता की नजरों के सामने, जनता के पैसों से जिस तरह के ऐशोआराम और अय्याशी की संस्कृति भारत में आम हो गई है, उसके चलते शहरों में भी अमन-पसंद लोगों के मन में कई बार नक्सलियों जैसी हिंसक बातें उठ खड़ी होती हैं, लेकिन फिर आम लोगों के हक इस लोकतंत्र में कुछ भी नहीं होने की वजह से लोग अपने मन की ऐसी हिंसक बातों को मार-मारकर बिठा देते हैं। 
अब अगर इसका कोई इलाज सोचें, तो अदालती रास्ता दिखता है, लेकिन भारत में अदालतें खुद लालबत्ती और सायरनों के साथ चलते हुए, अपने खुद के लिए सहूलियतें जुटाते हुए, दूसरों की तरफ संविधान की उंगली उठाने का हक कुछ हद तक तो खो ही चुकी हैं। ऐसे में आखिर क्या इलाज निकल सकता है? कैसे जनता के हक की सरकारी सुविधाएं, उसके खून-पसीने के हक वाले पैसे का बेदर्दी से सरकारी, संवैधानिक, संसदीय, और अदालती बेजा इस्तेमाल कम किया जा सकता है? घूम-फिरकर एक बार फिर अदालती रास्ता दिखता है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में शायद कोई ऐसे जज कभी मिल जाएं जो कि सत्ता के बेजा इस्तेमाल के खिलाफ कुछ कड़े आदेश देकर कुछ मजबूत परंपराएं कायम करें, और नेताओं से, सत्ता के दूसरे भागीदारों से वसूली करके बाकी लोगों के लिए एक नसीहत भी पेश करें। आज सूचना के अधिकार से लेकर मीडिया के चौकन्नेपन तक ने मिलकर ऐसे बहुत से बेजा इस्तेमाल उजागर किए हैं, और जनता के पैसों की ऐसी फिजूलखर्ची, बर्बादी के खिलाफ जनता को आपस में बात भी करनी चाहिए। 

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