असहमति के खिलाफ चल पड़ा है हिंदुस्तान

23 अगस्त 2014
संपादकीय

फोटोग्राफी और रंगों की दुनिया में काले और सफेद के बीच हल्के और गाढ़े सलेटी रंग का एक समंदर सा होता है, और यह पता नहीं चलता कि कब बात काले से निकलकर सफेद पर आ गई। ऐसा जिंदगी में भी होना चाहिए कि काले और सफेद दो सिरों के बीच हल्के और गाढ़ेपन की विविधता की खासी चौड़ी जगह होनी चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है। लोग इन दिनों अपना बर्दाश्त जितना खो रहे हैं, उससे कहीं अधिक जाहिर भी कर रहे हैं। फिर चाहे वह पाकिस्तान की सड़कों पर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के खिलाफ प्रदर्शन हो, या दिल्ली में खासे अरसे तक चला केजरीवाल का प्रदर्शन हो, या कल कर्नाटक में विख्यात साहित्यकार और विचारक यू.आर. अनंतमूर्ति के गुजरने पर हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा सड़क पर मनाई गई खुशी हो। लोगों के भीतर परस्पर विरोधी विचारधारा के खिलाफ बर्दाश्त घट रहा है, असहमति या विविधता के लिए सम्मान घट रहा है, और इन सबका हिंसक प्रदर्शन बढ़ते चल रहा है। 
भारत के लोकतंत्र में बात करें, तो जिंदगी के हर दायरे में राजनीति और धार्मिक कट्टरता का इतना बोलबाला हो गया है, कि जिंदगी की बहुत महीन और नाजुक बातें इन नारों और भालों तले कुचल गई हैं। लोग कांगे्रस-समर्थक अगर नहीं हैं, तो वे साम्प्रदायिक हैं, वे अगर भाजपा-समर्थक नहीं हैं, तो वे छद्म धर्मनिरपेक्ष हैं। ऐसे कुछ तबके गढ़ लिए गए हैं, और हर किसी को इन्हीं सांचों में नापा-परखा जा रहा है। विविधता को भारत की सोच से उसी तरह खत्म किया जा रहा है, जिस तरह अमरीका ने बुश के वक्त किया था, जब उसने यह चेतावनी दी थी कि दुनिया के देश या तो इराक पर अमरीकी हमले के साथ हैं, या फिर वे आतंक के हिमायती हैं। इन दोनों के बीच कोई और तबका रहने की गुंजाइश रखी नहीं गई थी। भारत में भी आज माहौल कुछ इसी तरह का है। 
और मोदी सरकार आने के बाद अगर इस सरकार की किसी खूबी या अच्छी बात को लेकर उसकी तारीफ की जाए, तो एक तबका तुरंत यह मान लेता है, और करार देता है कि ऐसी तारीफ करने वाले सत्ता बदलने के साथ धर्मांतरण कर चुके हैं। इसी तरह मोदी सरकार की किसी बात पर, उनके साथियों की किसी बात पर आलोचना की जाए तो बहुत से लोग तुरंत ही ऐसे आलोचकों के खिलाफ गालियां शुरू कर देते हैं, और उन्हें गद्दार, पाकिस्तानी, आतंकी, नक्सली, या इसी तरह के और कुछ तमगे देने लगते हैं। 
भारत में आज समाज के मुखर और सक्रिय तबके को यह हड़बड़ी लगती है कि वह समाज को अपने मुताबिक ढाल ले, अपने सांचों में फिट करके देख ले कि वे राष्ट्रपे्रमी हैं, या देशद्रोही। नतीजा यह हो रहा है कि भारतीय समाज में सोच की विविधता उसी तरह खत्म हो रही है जिस तरह बड़ी कंपनियों के हमलावर कारोबार की वजह से खेती की विविधता खत्म हो रही है, पेड़ों की विविधता खत्म हो रही है, जीव-जंतुओं की विविधता खत्म हो रही है। कुदरत की समझदार सोच को खत्म करके बाजार में खपने लायक पैकिंग में गिने-चुने किस्म की सोच को कारोबारी बाजार में चला रहे हैं। और राजनीति में यही हाल हो रहा है, सामाजिक मोर्चों पर यही हाल हो रहा है। हिंदुस्तान में वैचारिक विविधता और असहमति पर आधारित विचार-मंथन की संभावनाओं को खत्म किया जा रहा है। यह एक समाज के विकसित होने की संभावनाओं को खत्म करने से कम कुछ नहीं है। 

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