पे्रम, विवाह, और जुर्म से भारत में उपजतीं सामाजिक जटिलताएं

24 अगस्त 2014
संपादकीय

भारत में अलग-अलग जातियों और धर्मों के बीच होने वाली शादियां देश की एकता को मजबूत करने वाली बन सकती थीं, या बन सकती हैं। लेकिन आज देश के कुछ हिस्सों में माहौल इतना जहरीला हो गया है कि कई जातियों की पंचायतें एक गोत्र के भीतर होने वाली शादियों के खिलाफ मौत के फरमान जारी करती हैं, दूसरी जाति में शादी करने पर कुछ मां-बाप अपने बच्चों को कत्ल कर देते हैं, और दूसरे धर्म में शादी होने पर वह एक बड़ा साम्प्रदायिक मुद्दा भी बन जाने का खतरा रहता है। भारत में राजनीतिक और सामाजिक ताकतें अपने परंपरागत ढांचों को बचाए रखने के लिए यह जरूरी समझती हैं कि कट्टरता कायम रहे, ताकि उनका कारोबार चलता रहे। इसलिए देश में आज हो रहे बलात्कार को लेकर, या दूसरे किस्म के सेक्स-अपराधों को लेकर लगातार धर्म के आधार पर ऐसी घटनाओं को देखकर उस तर्क के साथ ही उनका विश्लेषण होता है, उन पर नतीजे निकाले जाते हैं। 
लेकिन इस चर्चा में इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि दो धर्मों के लोगों के बीच के प्रेम संबंधों में, शादियों में, या सेक्स-अपराध के मामलों में अगर अधिकतर मामले किसी एक धर्म के लड़कों-आदमियों से जुड़े रहते हैं, और ऐसी घटनाएं लगातार होती हैं, तो लोग खबरों के आधार पर और पुलिस-सरकार के आंकड़ों के आधार पर धार्मिक या साम्प्रदायिक विश्लेषण किए बिना नहीं रहेंगे। हम दो धर्मों के लोगों के बीच, या दो जातियों के लोगों के बीच शादियों के हिमायती हैं, लेकिन जब देश का माहौल तनाव से भरा हुआ है, तो ऐसे प्रेम-प्रसंगों या शादियों के बाद अगर किसी जुर्म की नौबत आती है तो उसका असर पूरे समाज की साख पर भी पड़ता है। ऐसा किसी एक जाति के भीतर अधिक कन्याभू्रण हत्या होने से, या दहेज प्रताडऩा होने से भी होता है, लेकिन एक जाति के भीतर, एक धर्म के भीतर होने से उनमें साम्प्रदायिक तनाव की आशंका नहीं रहती। 
आज सबसे पहले लोगों को खुद जुर्म से बचने की जरूरत है ताकि  वे समाज के सामने एक गलत मिसाल न बनें। इसके बाद परिवार को सावधान रहने की जरूरत है कि उसके भीतर का कोई सदस्य किसी किस्म के जुर्म में शामिल न हो। और इसके बाद समाज को भी चौकन्ना रहना चाहिए कि उसके लोग कोई गलत काम न करें, कोई जुर्म न करें। हमारा यह मानना है कि अगर पे्रम और विवाह के बाद कोई बुरी बातें सामने नहीं आती हैं, कोई ज्यादती नहीं होती है, जुर्म नहीं होता है, तो समाज के दकियानूसी लोगों को भी अंतरजातीय और अंतरधर्मीय शादियों के खिलाफ तर्क नहीं मिलेंगे। अच्छी मिसालें दबी जरूर रह जाती हैं, चर्चा में कम आती हैं, खबर कभी भी नहीं बनतीं, लेकिन यह बात तो समाज और दुनिया की हर अच्छी मिसाल के साथ होती है। जब लोग धर्म और जाति के बंधन तोड़कर प्रेम और विवाह करते हैं, तो उनको इस सामाजिक चुनौती का भी ध्यान रखना चाहिए कि उनकी नाकामयाबी उनकी तरह के बाकी हजारों लोगों के खिलाफ तर्क बनाकर इस्तेमाल की जाएगी। आज समाज का कुछ दकियानूसी तबका जाति, धर्म, या रक्त की शुद्धि का तर्क बनाकर देश को अलग-अलग तबकों में बांटे रखना चाहता है। इस तस्वीर को बदलना आसान नहीं है, और जहां-जहां किसी किस्म की हिंसा या ज्यादती एक आधुनिक उदारता की तस्वीर को बिगाडऩे के लिए खड़ी हो जाती हैं, वहां उनको तुरंत सुधारने की जरूरत है। ऐसा न होने पर साम्प्रदायिक ताकतों को तुरंत ही ओवरटाईम करने के लिए रोजगार मिल जाता है। देश में कई संगठन ऐसा करके अपनी रोजी-रोटी चला रहे हैं, और ऐसे नफरत की नौबत न आने देना हर समझदार की जिम्मेदारी है। इसलिए हर किसी को अपने खुद को हिंसा और जुर्म से बचाना चाहिए, और फिर परिवार और समाज को भी ठीक रखना चाहिए।

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