चुनावी नतीजों के बाद मोदी को कुछ आत्ममंथन की जरूरत

25 अगस्त 2014
संपादकीय

बिहार और कर्नाटक के उपचुनावों में भाजपा को कुछ झटका लगा है, और कुछ और राज्यों से नतीजे अभी आते जा रहे हैं। इन नतीजों को लेकर खासकर बिहार को गौर से देखा जा रहा था, क्योंकि वहां दो दशक बाद भाजपा के खिलाफ लालू-नीतीश-कांगे्रस का एक अलग किस्म का मोर्चा खड़ा हुआ था, और शायद देश में यह पहला मौका है जब केंद्र में भाजपा के स्पष्ट बहुमत के साथ बनी सरकार है, और भाजपा का विरोध करने के नाम पर बिहार के तमाम गैरभाजपा-गैरएनडीए दल एक हुए। एक वक्त था जब कांगे्रस विरोध के नाम पर पार्टियां एक होती थीं, और अब भाजपा विरोध के नाम पर यह असंभव सा लगता बिहारी गठबंधन कामयाब साबित हुआ है।
चुनावी नतीजों को लेकर बहुत सी बारीक बातों का विश्लेषण किया जा सकता है, और शाम तक वह होने भी लगेगा, लेकिन हम बारीक बातों से परे कुछ मुद्दों पर बात करना चाहते हैं, जिन पर भाजपा-एनडीए के सबसे बड़े नेता, कर्ता-धर्ता, और प्रधानमंत्री, नरेन्द्र मोदी को सोचना चाहिए। इन उपचुनावों के नतीजों से परे भी देखें, तो देश में मोदी सरकार और भाजपा को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर तुरंत कुछ बातें सोचने की जरूरत है। मोदी की दिखाई हुई शुरूआती सद्भावना के बावजूद आज चाहे जिसकी गलती की वजह से हो, सरहद से लेकर राजधानियों तक भारत और पाकिस्तान के बीच एक तनातनी चल रही है, गोलियां चल रही हैं, और बातचीत बंद है। दूसरी तरफ देश के भीतर भी बाजार की कीमतों के मोर्चे पर लोगों को अच्छे दिन आए हुए दिख नहीं रहे हैं। तीसरी अधिक जरूरी बात यह है कि भाजपा और उसके सहयोगी संगठन देश में जगह-जगह, अलग-अलग मोर्चो पर ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं, जिनका सार्वजनिक चर्चा से कोई हल निकलना नहीं है, और जिनसे साम्प्रदायिक तनाव, कट्टरता, और सामाजिक टकराव को खड़े होने और बढऩे का मौका मिल रहा है।
हमको नहीं लगता कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी सरकार के सौ दिन भी पूरे होने के पहले इस तरह के टकराव को बढ़ावा दे रहे होंगे। अभी जो उपचुनाव हुए हैं, उनके नतीजों से अगर भाजपा और उसके सहयोगियों को कोई सबक लेना चाहिए, तो वह गैरजरूरी तनाव से परहेज करने का है। खुद प्रधानमंत्री ने लालकिले से अपने भाषण में दस बरस के लिए साम्प्रदायिक मुद्दों से परहेज करने की अपील की थी। यह उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके साथी उनकी इस अपील को सुनेंगे। जैसे-जैसे मोदी सरकार अपने सौ दिनों की तरफ बढ़ रही है, वैसे-वैसे उसे जनता से मिली रियायत का वक्त खत्म होने जा रहा है। इन सब बातों को देखकर मोदी और उनके साथियों को कुछ विश्लेषण और कुछ आत्ममंथन करना चाहिए।

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