शहादत की इज्जत नहीं, दुनिया जीतने का घमंड

26 अगस्त 2014
संपादकीय
पिछले बरसों में कई ऐसे मौके आए जब किसी शहीद के परिवार ने यह मांग की कि जब तक प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री, कोई केन्द्रीय मंत्री या थल सेनाध्यक्ष, जब तक उनके घर नहीं पहुंचेंगे तब तक वे शहीद का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे। यह बात बड़ी खबर बनती है और सरकार इसमें एकदम खलनायक सी बन जाती हैं। ऐसे में परिवार को मदद मिलने की गुंजाइश भी बढ़ जाती है, और कई मामलों में यह सामने आया है कि शहादत के बरसों बाद तक शहीद की बीवी-बच्चों, या मां-बाप को सही मुआवजा नहीं मिल पाता। अपने परिवार के बहादुर सदस्य और कमाऊ संतान को खोने वाले लोग तकलीफ के ऐसे दौर में भावनात्मक रूप से विचलित भी रहते हैं, और इस दहशत में भी रहते हैं कि यह मौका निकल जाने के बाद परिवार को उसके कानूनी हक मिल पाएंगे, या शहीद की अगली पीढ़ी भी सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते बूढ़ी होगी। 
हिन्दुस्तानी लोकतंत्र में यह नौबत बहुत ही शर्मनाक है कि मोर्चों पर जो लोग जान देते हैं, उनकी दिलवाई गई हिफाजत तले महफूज बैठे हुए लोग अपनी कुर्सियां तोड़ते हैं, और शहादत के बाद परिवार के हक के साथ वैसा ही सुलूक करते हैं,जैसा कि किसी भी आम सरकारी फाईल के साथ करते हैं। यह देश कहने के लिए अपनी संस्कृति पर एक बेबुनियाद घमंड करता है, यह देश राष्ट्रवाद के उन्मादी नारे लगाते हुए पूरी दुनिया पर जीत हासिल करने, और दुश्मन को चीर देने की बात करता है। लेकिन यह देश किसी बहादुर के साथ, किसी शहीद के साथ, किसी खिलाड़ी-चैम्पियन के साथ जो सुलूक करता है, उससे भयानक खबरें उपजती हैं। दुनिया को जीतने का दावा करने वाले देश को पहले अपने आपकी हिंसा, बेईमानी, भ्रष्टाचार को जीतना होगा, और जब शहीदों के परिवारों को यह देश उनके हक का सम्मान और जमीन-पेंशन दे पाएगा, तभी उसको अपने आपको बचाने का भरोसा करना चाहिए। 
दरअसल भारतीय लोकतंत्र में सरकार का रूख इस कदर बेरहम रहता है, कि अभी कुछ समय पहले ही छत्तीसगढ़ में एक सरकारी दफ्तर में एक कर्मचारी को रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया। वह अपने ही विभाग के रिटायर हुए सहकर्मी की पेंशन के मामले में रिश्वत लिए बिना काम नहीं कर रहा था। यह बात भी जाहिर है कि ऐसे रिश्वतखोर कर्मचारियों को यह भी मालूम रहता है कि आने वाले दिनों में वे भी रिटायर होंगे, और उस दिन हो सकता है कि उनको भी अपने पेंशन के लिए धक्के खाने पड़ें। अब इस सिलसिले को तोडऩे के बजाय, वे भ्रष्टाचार के ऐसे ढांचे को मजबूत करने में लगे रहते हैं। हम आम भ्रष्टाचार की बात नहीं कर रहे, लेकिन जहां पर दिल को हिला देने वाले मामले रहते हैं, कामयाब खिलाडिय़ों के लिए सम्मान के मामले रहते हैं, शहीदों को हक देने के मामले रहते हैं, कुर्बानी देने वाले पुलिस वालों  के परिवार के मामले रहते हैं, वहां भी सरकार से लेकर समाज तक सब बेरहम साबित होते हैं। यह सिलसिला थमना चाहिए। अगर लोगों के भीतर ऐसे मामलों में भी वह भावना नहीं जागेगी, जिसे कि इंसान इंसानियत कहकर उस पर फख्र करते हैं, तो यह डूब मरने की बात है। 

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