जनता की जिंदगी आसान बनाने मोदी के कुछ गैरसामंती नुस्खे

29 अगस्त 2014
संपादकीय

महज एक राज्य के मुख्यमंत्री का काम करने वाले नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर लोगों को यह अंदाज नहीं था कि पूरे देश को चलाने का काम वे ठीक से कर पाएंगे या नहीं, और बाकी दुनिया के साथ हिंदुस्तान के रिश्तों को वे कहां ले जा पाएंगे। लेकिन जिन लोगों को मोदी से उनकी राजनीतिक पैदाइश के समय से नफरत है, वैसे लोगों को छोड़ दें, तो मोदी के कई छोटे-छोटे फैसले जनता की जिंदगी को आसान बनाने वाले हैं। अभी उनको अपने-आपको कामयाब या नाकामयाब साबित करने में खासा वक्त लगने वाला है, और उनके अभी सौ दिन भी पूरे नहीं हुए हैं, और पन्द्रह सौ से अधिक दिन बचे हुए भी हैं। ऐसे में अगर उन्होंने एक छोटा सा फैसला पूरे देश को लागू करने को कहा कि सरकारी कामकाज में कदम-कदम पर, बात-बात पर लोगों से, गरीबों और बेरोजगारों से, छात्र-छात्राओं और अनपढ़ लोगों से हलफनामा लेना बंद किया जाए, और लोग अपने दस्तावेजों को खुद ही सत्यापित कर सकें, तो यह छोटा सा दिखने वाला, लेकिन जिंदगी को बड़ा आसान करने वाला बड़ा फैसला है। जो लोग सरकारी दफ्तरों, स्कूल-कॉलेजों, और अदालतों में धक्के खाते हैं, उन्हीं को मालूम है कि एक-एक हलफनामे के लिए कितनी जहमत उठानी पड़ती है, कितना खर्च करना पड़ता है। अब मोदी के बारे में यह खबर है कि वे ऐसी तैयारी कर रहे हैं कि देश के हर नागरिक के कागजात, दस्तावेज, इंटरनेट पर उन्हें मुफ्त में सरकार की तरफ से दी जाने वाली एक डिजिटल तिजोरी में रखे रहेंगे, और सरकार के किसी भी अमले को जब जरूरत रहेगी, तो वे वहां से कागजात लेकर देख सकेंगे। आज हिंदुस्तान में सरकारी और अदालती ढर्रा इस तरह का है कि मानो जनता को तकलीफ देकर कर्मचारी-अधिकारी मजा पाते हैं। मनोविज्ञान में जिस मानसिक रोग को परपीड़क होना कहते हैं, वैसी बात सरकारी दफ्तरों में आम दिखती है। ऐसे में मोदी अगर लोगों की जिंदगी को सचमुच ही सरकारी बंधनों से आजाद कर सकते हैं, तो यह सबसे कमजोर तबके के लिए एक बहुत बड़ी आजादी होगी।
और नरेन्द्र मोदी ऐसा करके कोई करिश्मा नहीं कर रहे हैं, कोई जादू नहीं कर रहे हैं। दरअसल पचास बरस इस देश पर राज करने वाली कांगे्रस की सोच राजसी हो गई थी, और उसकी सरकारों, उसके नेताओं, उसके सलाहकारों में लोगों की जिंदगी को आसान करने के खिलाफ एक सामंती सोच जमी हुई थी। आसानी से चारों तरफ बिखरी हुई और मौजूद टेक्नालॉजी का इस्तेमाल जिंदगी को आसान करने के लिए हमेशा ही किया जा सकता था, लेकिन अपने-आपको पैदाइशी शासक मानने वाले कांगे्रस के लोगों ने कभी ऐसा सोचने की जरूरत ही नहीं समझी। और कांगे्रस-यूपीए, या दूसरी पार्टियों की राज्यों की सरकारों के सामने दुनिया से सीखने का मौका हमेशा ही था। अमरीकी सरकार के हर फार्म पर उसे भरने में लगने वाले अनुमानित समय को भी लिखा जाता है, और सरकार लगातार यह कोशिश करती है कि लोगों से गैरजरूरी जानकारी न मांगी जाए, गैरजरूरी कागजात न मांगे जाएं। मोदी ने कोई नया आविष्कार नहीं किया है, उन्होंने महज एक सामान्य समझबूझ को लागू किया है, लेकिन वे जिस गरीबी से उठकर आए हैं, शायद वह तजुर्बा उनको सामंती तौर-तरीकों को खत्म करने की तरफ बढ़ा रहा है। और आज ऐसा नहीं है कि सिर्फ मोदी ही देश में ऐसा कर सकते हैं, कदम-कदम पर राज्य सरकारें, और स्थानीय संस्थाएं भी ऐसा कर सकती हैं, उनको करना भी चाहिए। देश में बदलाव की एक हवा चल रही है, और सामंती तौर-तरीकों के खिलाफ जनता का बर्दाश्त खत्म हो रहा है। 

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