एक राज्य से आए मोदी की अंतरराष्ट्रीय पहल की चर्चा

4 अगस्त 14
संपादकीय
इस वक्त भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पड़ोसी देश नेपाल के विख्यात पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा कर रहे हैं। कल उन्होंने नेपाल में एक अभूतपूर्व स्वागत पाया, और भारत में भी नेपाल के साथ इस गर्मजोशी को उत्साह से देखा जा रहा है। इसके पहले मोदी अपने शपथ ग्रहण के दिन ही सभी सार्क देशों के प्रमुखों से बात कर चुके थे जिनको उन्होंने एक नई परंपरा शुरू करके अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया था। इसके बाद वे ब्राजील में ब्रिक्स देशों के प्रमुखों के साथ लंबी मुलाकातें करके लौटे, और उनके भारत आने के कुछ दिनों के भीतर ही अमरीका के विदेश मंत्री ने बड़ी गर्मजोशी के साथ भारत आकर दोनों देशों के संबंध बेहतर और मजबूत बनाने की बातें कीं। 
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते समय पूरी दुनिया के मन में यह बात थी कि उनके पास न तो देश की राजधानी में काम करने का कोई अनुभव था, न ही केन्द्र सरकार में उन्होंने एक दिन भी काम किया था। विदेशों के साथ संबंधों का उनका अनुभव एक गुजरात राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कारोबार तक सीमित था, और आर्थिक मोर्चे पर उस राज्य की साख बहुराष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के बीच अच्छी थी। उससे ज्यादा विदेशी संबंधों का अनुभव उनका नहीं था। दूसरी बात यह कि गुजरात दंगों के जिन दिनों से उबरकर उन्होंने दो बार गुजरात राज्य के चुनाव जीते, उसके बाद अपनी पार्टी भाजपा को जीता, और फिर देश के आमचुनाव अपने बलबूते पर जीते, उन सबको देखते हुए लोगों के मन में मोदी की अंतरराष्ट्रीय संभावनाओं को लेकर उम्मीदों से अधिक आशंकाएं थीं, लेकिन पहले कुछ महीनों में ही मोदी ने उन आशंकाओं को तोड़ दिया है, हालांकि अभी उनके कार्यकाल का लगभग पूरा हिस्सा बाकी है, और आने वाले कई बरस उनके अंतरराष्ट्रीय फैसलों को सही या गलत साबित करेंगे। 
पिछले दो-ढाई महीनों में मोदी ने जो अंतरराष्ट्रीय नीति, और भारतीय विदेश नीति बताई है, वह तारीफ की हकदार है। पड़ोस के सारे सार्क देशों को न्यौता देना, प्रधानमंत्री बनने के पहले ही उनका एक मास्टरस्ट्रोक था, और सच तो यह है कि किसी को भी उनसे वह उम्मीद नहीं थी। दूसरी बात यह कि हर किसी को यह अच्छी तरह मालूम है कि अब तक उनके अंतरराष्ट्रीय फैसले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के किसी सक्रिय योगदान के बिना, अकेले प्रधानमंत्री के स्तर पर, उनके निजी विचार-विमर्श पर आधारित हैं। जहां तक विदेश मंत्री की बात है, तो उन्होंने इजराईल-फिलीस्तीन मुद्दे पर संसद में बहस तक नहीं होने दी, लेकिन जब एक देश के रूप में भारत को अपना रूख दिखाना था, तो कुछ दिनों के भीतर ही प्रधानमंत्री मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में फिलीस्तीन के पक्ष में वोट दिया, जबकि अमरीका हमेशा की तरह इजराईल के साथ रहा। मतलब यह कि अमरीकी रूख के खिलाफ भी, भारतीय विदेश मंत्री के संसदीय रूख के खिलाफ भी, भारत ने एक देश के रूप में, और मोदी ने एक प्रधानमंत्री के रूप में अंतरराष्ट्रीय मतदान में इजराईल का विरोध किया। यहां यह जिक्र करना जरूरी है कि पिछले बरसों में सुषमा स्वराज भारत-इजराईल मैत्री संघ की भारतीय मुखिया रही हैं, और इजराईल के लिए उनका लगाव जगजाहिर है। इस पूरे सिलसिले का जिक्र इसलिए जरूरी है कि मोदी की विदेश नीति सुषमा से प्रभावित नहीं है, वह एक देश की विदेश नीति के रूप में विदेश मंत्री से ऊपर तय की जा रही है। यही वजह है कि पिछले दो-ढाई महीनों में किसी भी अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर भारत की विदेश मंत्री को कोई अहमियत नहीं मिली है। 
मोदी ने काम सम्हालते ही सबसे पहले भूटान जाकर अपने और चीन के बीच बसे हुए फौजी अहमियत वाली जमीन पर बसे एक पड़ोसी देश के साथ रिश्ते मजबूत किए। अब वे नेपाल पहुंचे हैं, और भारत-चीन के बीच यह दूसरा देश है। पाकिस्तान के साथ उन्होंने खासी लंबी बातचीत की है, और श्रीलंका के मोर्चे पर तनाव घटाने का काम भी किया है। एक तरफ अमरीका के साथ, दूसरी तरफ चीन के साथ, और तीसरी तरफ रूस के साथ उन्होंने बातचीत तेजी से आगे बढ़ाई है। एक प्रदेश से आने वाले गैरअंग्रेजीभाषी नेता की यह कामयाबी कम नहीं है। लेकिन मोदी की तारीफ करना हमारा मकसद नहीं है, हिन्दुस्तान की विदेश नीति पर चर्चा करना अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि कम ही लोग इस बात का अंदाज लगाते हैं कि पाकिस्तान के साथ लगी सरहद पर हिन्दुस्तान का जो खर्च होता है, वह खर्च इस देश में हर स्कूल की जरूरत पूरी कर सकता है, हर अस्पताल को दवाईयों से भर सकता है। ऐसे में अगर नरेन्द्र मोदी हिन्द महासागर क्षेत्र में तनाव को घटाने में कामयाब होते हैं, तो वह तमाम देशों की कमाई बढ़ाने से अधिक बड़ा काम होगा। 
दरअसल नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी रहते हुए जिस तरह का आक्रामक रूख पाकिस्तान के खिलाफ दिखा रहे थे, वह रूख प्रधानमंत्री बनने के बाद ओहदे और देश की जिम्मेदारियों से बिल्कुल ही बदल गया है। और हम ऐसे किसी भी यू-टर्न को सही मानते हैं, और उसका स्वागत करते हैं जो कि मुड़कर अमन-चैन की तरफ जाता है। हम लोगों को किसी वक्त उनकी कही हुई युद्धोन्माद की बातों को याद दिला-दिलाकर उनसे जंग के वायदों को पूरा करने पर भरोसा नहीं रखते। एक चुनावी भाषण अलग होता है, और एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए दिया गया भाषण अलग होता है। एक ओहदे की जिम्मेदारियां लोगों को किस हद तक बदल सकती हैं, किस हद तक बेहतर बना सकती हैं, सकारात्मक बना सकती हैं, आज मोदी इसकी एक मिसाल है। 
भारत का प्रधानमंत्री घरेलू मामलों में किसी एक पार्टी का हो सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर उसे अपनी पार्टी के नारों और मुद्दों से परे देश के व्यापक हित के बारे में सोचना ही पड़ता है। लोगों को यह याद होगा कि एक वक्त प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी को मुखिया बनाकर भेजा था। पाकिस्तान के साथ 1971 के युद्ध में फतह हासिल करके बांग्लादेश का निर्माण करने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी की अभूतपूर्व और ऐतिहासिक शब्दों में तारीफ की थी। मोदी सरकार बनने के बाद उनके सबसे करीबी और सबसे ताकतवर मंत्रियों में से एक अरूण जेटली ने विदेशी संबंधों पर केन्द्रित एक खुफिया रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की अपनी मांग अपने ब्लॉग से हटा दी है। यह सब सार्वजनिक जिम्मेदारियों के तकाजे से किए गए काम हैं, और हम नरेन्द्र मोदी की इस बात के लिए तारीफ करेंगे कि उन्होंने पड़ोसियों के साथ रिश्ते गहरे बनाने का काम तेजी से शुरू किया है, और ऐसे ही उत्साह की जरूरत भी थी। मोदी को एक फायदा यह भी है कि पिछले पांच बरसों के यूपीए सरकार का काम एक बड़े शून्य की तरह रहा, और आज मोदी आसानी से उस शून्य को भर चुके हैं। आज दुनिया के हर देश को पड़ोसियों से, और बाकी देशों से भी, रिश्ते बेहतर रखने चाहिए, अपने खुद के नागरिकों की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए भी यह जरूरी है। इसके साथ-साथ उन्होंने जरूरत के मौके पर, जरूरत के मुताबिक फिलीस्तीनियों के पक्ष में भारत का वोट देकर एक सही फैसला लिया है, और संसद में भारतीय विदेश मंत्री की चूक को तुरंत ही सुधार भी लिया है। आज हमारे साथ-साथ बाकी की दुनिया भी मोदी के रूख और उनकी पहल को उत्सुकता से देख रही है, और इस पर बाकी दुनिया में भी खासी गंभीर चर्चा हो रही है।  

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