इंटरनेट पर सरकार को चौकस और लोगों को चाल-चलन ठीक रखने की जरूरत

संपादकीय
6 अगस्त 2014
लंबे समय तक भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे गोविंदाचार्य ने मोदी सरकार की सोशल मीडिया पर मौजूदगी और उसके इस्तेमाल के खिलाफ अदालत में एक जनहित याचिका दायर की है और इसे भारतीय कानूनों के खिलाफ बताया है। उनका तर्क यह है कि सोशल मीडिया और ईमेल के सर्वर भारत के बाहर हैं और उनके इस्तेमाल से भारत सरकार की जानकारी देश के बाहर चली जाती है जो कि खुद सरकार के इस नियम के खिलाफ है कि कोई भी सरकारी जानकारी खास इजाजत के बिना देश के बाहर नहीं जानी चाहिए। गोविंदाचार्य आज भी हिंदूवादी विचारधारा के स्वदेशी आंदोलन वाले हैं, और वे लगातार सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात रखते हैं।
हम इंटरनेट के दो तरह के इस्तेमाल अलग-अलग मानते हैं, जिनमें से एक सार्वजनिक सोशल मीडिया है, जिसे सरकार अपनी बात रखने, लोगों की बात सुनने, और लोगों से बातचीत करने के लिए इस्तेमाल करती है। यह पूरा मामला खुला हुआ रहता है, और इसमें बिना किसी गोपनीयता के विचारों और सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है। दूसरा मामला ईमेल जैसी इंटरनेट सुविधाओं का है, और यहां पर एक खतरा सामने आता है। भारत सरकार ने एनआईसी नाम की अपनी कम्प्यूटर एजेंसी के मार्फत केंद्र और राज्य सरकारों के तमाम लोगों के लिए ईमेल की सुविधा उपलब्ध कराई है। और यह सुविधा सारे सांसदों तक है, और शायद दूसरी संवैधानिक संस्थाओं को भी यह उपलब्ध है। इसके बाद भी यह देखने में आता है कि मंत्रियों से लेकर सांसदों तक और बड़े-बड़े अफसरों तक के विदेशी सर्वरों वाले निजी ईमेल अकाउंट रहते हैं और सरकारी या गोपनीय जानकारी उसके मार्फत आती-जाती रहती हैं, और उन विदेशी सर्वरों में वह हमेशा ही खतरे में रहती है।
पिछले बरसों में लगातार इस बात के सुबूत आए हैं कि अमरीकी खुफिया एजेंसियां भारत सहित दुनिया के तकरीबन हर देश में संगठनों और लोगों की खुफिया निगरानी करती हैं। इनमें पूरी दुनिया के टेलीफोन कॉल, संदेश, और ईमेल के अलावा इंटरनेट पर आने-जाने वाली तमाम बातों की निगरानी शामिल है। ऐसे में कोई बेवकूफ ही यह मानकर चल सकता है कि अमरीकी सर्वरों में जमा भारतीय जानकारी को अमरीकी खुफिया एजेंसियां नहीं देखती होंगी। ऐसे में जब दुनिया के कारोबारी हित देशों की सुरक्षा से भी कई बार एक महत्वपूर्ण हो जाते हैं, तब सरकारों से परे कारोबार के मामले भी विदेशी सर्वरों में रहना खतरनाक होता है। 
लेकिन अपनी ही इस बात के खिलाफ हमारे सामने एक बड़ा मामला आज यह आया है कि रूस के कुछ हैकरों ने एक अरब से अधिक पासवर्ड चोरी कर लिए, और ऐसा करते हुए उन्होंने दसियों हजार वेबसाईटों से यह चोरी की। अब सवाल यह उठता है कि जो काम रूसी हैकर कर सकते हैं, वह काम चीनी और इजराइली हैकर भी कर सकते हैं, और अमरीका सहित तमाम ताकतवर सरकारों के सरकारी हैकर भी यह काम रात-दिन करते ही रहते हैं। ऐसे में भारत के मामले अमरीकी सर्वरों पर रहें, या कि भारतीय सर्वरों पर, क्या इस बात से कोई फर्क पड़ता है? दूसरी बात यह कि अगर भारतीय सर्वरों पर भी सरकारी या गोपनीय जानकारी वाली फाईलें रहती हैं, तो क्या वे हैकरों से सुरक्षित रहेंगी? 
आज जानकारों का यह मानना है कि भारत इंटरनेट पर अपनी असीमित जानकारी रहने के बावजूद साइबर सुरक्षा के मामले में बच्चा है। उसे अपनी गोपनीय बातों की हिफाजत की समझ भी नहीं है। ऐसे में भारत ने अपने-आपको बहुत नाजुक और खतरे के लिए खुला रखा हुआ है। और अब आखिर में इस बात का जिक्र जरूरी है कि सरकार की सोशल मीडिया पर मौजूदगी के अलावा नेताओं और अफसरों की जो निजी बातें सोशल मीडिया के निजी हिस्से में होती हैं, वे भी हैकरों से या अमरीकी जैसी खुफिया एजेंसियों से परे नहीं रहतीं। ऐसे में भारत के ऊंचे ओहदों पर बैठे हुए लोग कई किस्म की ब्लैकमेलिंग के लायक रहते हैं, और अमरीका जैसी बदनाम खुफिया एजेंसियों के लोग अपने ही राष्ट्रपति को भी ब्लैकमेल करने के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में भारत की सरकार को साइबर सुरक्षा के बारे में सोचना चाहिए, और लोगों को भी इंटरनेट पर, सोशल मीडिया और ईमेल पर अपने चाल-चलन को ठीक रखना चाहिए, क्योंकि इंटरनेट पर जाने के बाद लोग किसी गोपनीयता और निजता का दावा नहीं कर सकते। 

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