वादाखिलाफी को बलात्कार मानना गड़बड़ लगता है...

4 अगस्त 2014
शिवसेना ने अपने एक ताजा बयान से लोगों में नाराजगी पैदा की है क्योंकि उसका कहना है- ''छेडख़ानी और रेप का आरोप लगाकर सनसनी फैलाना अब फैशन हो गया है। एक मॉडल पुलिस में उत्तम सेवा देने वाले एक आईपीएस अफसर पर सीधे रेप का आरोप लगाती है, और वो पुलिस अधिकारी खलनायक ठहराया जाता है। महिलाएं छेडख़ानी जैसे मामलों को खतरनाक हथियार समझती हैं। इस मामले में पीडि़ता को 6 महीने बाद याद आया कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। आखिरकार 6 महीने बाद कैसे किसी लड़की को याद आ सकता है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। चरित्र का हनन, बदनामी राजनीति और सरकार में बड़ा हथियार बन गए हैं। एक-दूसरे को रास्ते से हटाने के लिए इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। कानून महिलाओं के साथ है लेकिन इसका ये मतलब नहीं है इसका गलत इस्तेमाल किया जाए।ÓÓ
शिवसेना के इस बयान से परे भी यह बात बहुत से लोगों के मन में आती है कि महिलाओं की खास हिफाजत के लिए भारतीय हालात में उनको जो खास कानूनी हक दिए गए हैं, उनका बेजा इस्तेमाल होता है। इनमें दहेज प्रताडऩा, कामकाज की जगह पर यौन प्रताडऩा, और सेक्स-अपराध जैसे कुछ जुर्म हैं, जिनसे महिलाओं को बचाने के लिए भारतीय कानून में उनको आदमियों के मुकाबले कुछ अधिक हक दिए गए हैं। समय-समय पर ऐसे बयानों के खिलाफ हम लिखते भी रहे हैं, जिनमें कि नेता और अफसर किसी महिला द्वारा दर्ज की गई शिकायत की जांच के पहले ही उसकी नीयत पर शक खड़ा करना शुरू कर देते हैं। मुंबई का यह मामला वैसा ही है जिसमें एक मॉडल ने एक आईपीएस अफसर के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखाई है।
इस मामले की जांच अभी शुरू हुई ही है, और इस पर कुछ भी कहना जायज नहीं है, लेकिन हम ऐसे तर्कों के बारे में बात कर रहे हैं जो कि बलात्कार की कुछ शिकायतों के साथ पुलिस में दर्ज किए जाते हैं। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें महिलाएं कई बरस से उनके साथ किए जा रहे बलात्कार का आरोप लगाते हुए पुलिस रिपोर्ट में यह लिखाती हैं कि शादी का झांसा देकर, शादी का वायदा करके, उससे देहसंबंध बनाए गए, और फिर बाद में उसे पता लगा कि आदमी या तो शादीशुदा था, या बाद में उसकी कहीं और शादी हो रही है, या उसकी शादी की नीयत ही नहीं है।
अब हम एक ऐसी स्थिति की कल्पना करें जिसमें कि एक लड़के और एक लड़की के बीच, या एक आदमी और एक औरत के बीच दोस्ती होती है, पे्रम होता है, या बिना प्रेम के भी देहसंबंध बनते हैं, जारी रहते हैं, और फिर बाद में किसी वजह से शादी नहीं हो पाती, या दोनों में से कोई भी एक पक्ष शादी के अपने वायदे को पूरा करना मुमकिन या ठीक नहीं पाता। ऐसा कई वजहों से हो सकता है, लोगों की दोस्ती, लोगों के पे्रम, या इससे भी आगे बढ़कर लोगों के देहसंबंध बनते हैं, और टूटते हैं। किसी झांसे या धोखे की नीयत के बिना भी संबंध आते-जाते रहते हैं। दो वयस्क लोगों के बीच इनमें से किसी भी किस्म के संबंध बनना और टूटना तब तक जुर्म नहीं है, जब तक कि वह मर्जी के खिलाफ न हो। 
अब यह समझना कुछ मुश्किल पड़ता है कि किस तरह मर्जी के खिलाफ बरसों तक किसी के देहसंबंध बने रह सकते हैं। ऐसा किसी धमकी के तहत, किसी ब्लैकमेलिंग के तहत तो हो सकता है, लेकिन उसके बिना बिना विरोध, मौन सहमति से अगर यह सिलसिला जारी रहता है, तो आगे जाकर उसको जुर्म करार देना पहली नजर में सही नहीं लगता है। और दोस्ती के बाद पे्रम या बिना पे्रम, शादी का वायदा करना, देहसंबंध बनने के बिना, या बनने के बाद, उसे पूरा न करना भी किसी तरह से जुर्म नहीं लगता है। क्योंकि बिना देहसंबंध भी वायदे बनते और टूटते रहते हैं, और उनकी मजबूती की गारंटी के लिए किसी फेविकोल के मजबूत जोड़ की गुंजाइश नहीं रहती। 
अब आज इस पर लिखने का दिल इसलिए कर रहा था कि आज जिस तरह बहुत से मामलों में बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज हो रही है, लोगों को महीनों तक जमानत नहीं मिल रही है, बरसों तक फैसले नहीं हो रहे हैं, और उसके बाद या तो सजा हो रही है, या फिर बिना सजा रिहाई हो रही है, उसे देखते हुए लगता है कि क्या ऐसे कानूनी माहौल के चलते हुए लोगों के आपसी संबंधों की संभावनाओं पर एक मानसिक दबाव ऐसा पड़ेगा कि संबंध ही स्वाभाविक न रह पाएं।
यह लिखने का यह मकसद नहीं है कि बलात्कार की शिकायतों में से बहुत सी झूठी रहती हैं। हमारा तो मानना इससे उल्टा यह है कि बलात्कार की सही शिकायतों में से बहुत ही कम दर्ज हो पाती हैं, और बाकी शिकायतों का दम घुट जाता है। सामाजिक अपमान, पारिवारिक दबाव, और अदालतों का डरावना माहौल मिलाकर लोगों को बलात्कार को सबक के साथ बर्दाश्त कर लेने पर ही अधिक मजबूर करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ जितने भी मामलों में शादी के वायदे के बाद बने देहसंबंधों के बाद शादी न होने की स्थिति में दर्ज कराई गई रिपोर्ट को बलात्कार मानना थोड़ा अटपटा लगता है, और उसके लिए कानून में एक बारीक फर्क करने की जरूरत है। 
किसी भी वयस्क लड़की या महिला को किसी वयस्क लड़के या आदमी के किए हुए वायदे पर भरोसा करके उसे अपनी देह दे देने की कोई मजबूरी नहीं रहती। ऐसा करते हुए उसकी एक सहमति रहती है, जो बाद के हालात बदलने पर भुला दी जाती है। ऐसे मामलों की खबरों को देख-सुनकर ऐसा लगता है कि आज लोगों के मन में संबंधों को लेकर एक दहशत खड़ी हुई होगी कि आज की सहमति कल कब, किस वजह से, पुलिस रिपोर्ट में बदल जाए? आज का हमारा पूरा लिखना सिर्फ ऐसे ही मामलों को लेकर है जिनमें पहले की सहमति बरसों बाद जाकर शिकायत बन जाती है। ऐसे मामले लोगों के मन में सच्चा पे्रम भी कुचलने के लिए काफी रहते होंगे, क्योंकि आज के पे्रम के तहत की गई बातें कल जाकर किस तरह कटघरे में खड़ी कर देंगी, जिसका अंदाज आज कोई नहीं लगा सकते। 
ऐसे कानून में बदलाव की जरूरत है जो कि शादी के वायदे के साथ बने देहसंबंधों को आगे शिकायत होने पर बलात्कार मानता हो। बहुत से ऐसे मामले रहते हैं जिनमें देहसंबंधों के बिना भी शादी के वायदे बनते और टूटते रहते हैं, इसी तरह इन वायदों के साथ-साथ, उनके बाद भी ऐसे संबंध बन सकते हैं, और बाद में देह से परे के कई किस्म के मुद्दों को लेकर वायदा पूरा करना पाना नामुमकिन हो सकता है, या लोगों को लग सकता है कि यह रिश्ता ठीक नहीं चलेगा। ऐसी कई नौबतों में लोग अपने वायदे से मुकरने का पूरा हक रखते हैं। एक वादाखिलाफी को बलात्कार मान लेना गड़बड़ लगता है, और इस कानून में बदलाव होना चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें