कल की खेतिहर मजदूर की हवाई फिजूलखर्चियां, किस्सा कमला बेनीवाल का

8 अगस्त 2014
संपादकीय
नरेन्द्र मोदी से गुजरात में तिरछे-तिरछे चलने वाली राज्यपाल कमला बेनीवाल को बर्खास्त करने पर कांग्रेस कुछ हल्ला तो कर रही है, लेकिन वह प्रतीकात्मक अधिक है। यूपीए सरकार की मनोनीत राज्यपाल रहते हुए कमला बेनीवाल ने गुजरात में लगातार मोदी से टकराव रखा था, और उस टकराव के सही या गलत होने के बारे में हम अभी कुछ नहीं कह रहे हैं। लेकिन राज्यपाल रहते हुए जिस तरह उन्होंने अपने घर जाने के लिए तिरपन बार सरकारी विमान का इस्तेमाल किया, और उस पर आठ करोड़ से अधिक खर्च हुआ, वह बात तो उसी समय रूक जानी चाहिए थी। पता नहीं राज्य सरकार ने एक बागी राज्यपाल पर इतनी दरियादिली क्यों दिखाई थी, लेकिन ऑडिट की आपत्ति से यह सिलसिला तभी थम जाना था जब जनता के पैसों की इतनी बरबादी नहीं हुई थी। लेकिन कमला बेनीवाल को हटाने के पीछे यह वजह नहीं है, और शायद उनके खिलाफ राजस्थान में मंत्री और उपमुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जो काम किया था, उसकी जांच-रिपोर्ट आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के काम आई, और उस जांच रिपोर्ट के तथ्यों को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी अनदेेखा नहीं कर सके। 
खबरों में जो जानकारियां आई हैं, उनके मुताबिक कमला बेनीवाल ने राजस्थान में मंत्री और उपमुख्यमंत्री रहते हुए, खेतों में रोज 16-16 घंटे काम करने का हलफनामा देकर गरीब किसानों के लिए सस्ती जमीन के प्रावधान का इस्तेमाल किया था, और जमीन हासिल की थी। इसकी पूरी जानकारी आज के ही अखबार में जा रही है, इसलिए उसे यहां अधिक खुलासे से लिखने की जरूरत नहीं है। लेकिन इस बेशर्मी पर हमको हैरानी होती है कि सत्ता का उपभोग करते हुए जो महिला कांग्रेस नेता अपने को गरीब खेतिहर मजदूर बताकर रियायती जमीन पाती है, वही महिला नेता राज्यपाल बनने के बाद पड़ोस के प्रदेश में अपने घर आने-जाने के लिए सरकारी विमान पर आठ करोड़ से अधिक का खर्च करवाती है। आज लिखने का हमारा मकसद कमला बेनीवाल बिल्कुल नहीं है, लेकिन ऐसा करने वाले वे हजारों हिन्दुस्तानी नेता हैं, जो कि इस गरीब देश के कुपोषण के शिकार और भूखे लोगों के हक के पैसों से अपने लिए इस तरह के आलीशान फिजूलखर्च इंतजाम करते हैं कि जिनको देखकर सैकड़ों बरस पहले के राजा-महाराजा भी शरमा जाएं। इस देश में ऑडिट का इंतजाम है, सीएजी की रिपोर्ट सार्वजनिक होती है, लेकिन उसके बाद भी इस तरह के ऐशो आराम पर कोई रोक नहीं लगती है, यह बहुत हैरानी की बात है। ऐसी बहुत सी जानकारी इन दिनों सूचना के अधिकार के तहत निकल रही है, और जनहित याचिकाओं के रास्ते अदालत तक भी पहुंच रही हैं। भारतीय लोकतंत्र में जनता के पैसों की बर्बादी को रोकने के लिए लगातार इन दोनों लोकतांत्रिक औजारों का इस्तेमाल होना चाहिए, और उसके बाद भी अगर लोकतांत्रिक होने का दावा करने वाली पार्टियां और उनके नेता अगर अपने तौर-तरीके नहीं सुधारते हैं, तो देश में एक चौथाई हिस्से में तो नक्सली छा ही चुके हैं। जहां-जहां जनता को ऐसे आरामतलब और फिजूलखर्च नेताओं से नफरत होगी, वहां-वहां उनके मन की यह बेबसी होगी कि वे हिंसक नक्सलियों के लिए हमदर्दी रखें। हिन्दुस्तान से नक्सल हिंसा को सिर्फ बंदूकों से खत्म नहीं किया जा सकेगा, सत्ता की लोकतांत्रिक सादगी की मिसाल के बिना पुलिस इस मोर्चे पर कुछ अधिक नहीं कर पाएगी। और पुलिस के अधिक इस्तेमाल का खर्च भी आखिर जनता के ही पैसों से होता है। 

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