गांधी के नाम के हिज्जे और गांधी की सोच पर अमल

30 सितंबर 2014
संपादकीय
अमरीका में अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुंह से मोहनदास करमचंद गांधी के बजाय मोहनलाल करमचंद गांधी निकल गया, तो भारत में कांगे्रस पार्टी सहित बहुत से मोदी-आलोचक उनके पीछे लग गए कि जिसे राष्ट्रपिता का नाम भी ठीक से याद न हो, वह प्रधानमंत्री बनने के लायक नहीं है। खासकर कांगे्रस पार्टी के बारे में ऐसी चूक के सिलसिले में हमको याद पड़ता है कि इसी अमरीका में संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक में यूपीए के विदेश मंत्री कृष्णा किसी दूसरे देश के विदेश मंत्री का भाषण पढऩे लग गए थे, और कुछ मिनट पढऩे के बाद उनके अफसर ने उन्हें पीछे से खींचकर गलती याद दिलाई थी। लेकिन किसी एक की गलती न तो किसी दूसरे के लिए गलती को सही ठहराने का आधार बनता, और न ही किसी कि ऐसी गलती उसे गलत इंसान ठहराती है।
चीजों को एक अनुपात और महत्व के हिसाब से ही देखना चाहिए। नरेन्द्र मोदी के भाषणों में, और उनके कार्यक्रमों में आलोचना के लायक दर्जनभर से अधिक गंभीर बातें रही होंगी, और अगर इस प्रवास के महत्व को अनदेखा करके आलोचना ही करना है, तो हम यहां पर उनकी गलतियों की एक लिस्ट बना सकते हैं। लेकिन किसी व्यक्ति, किसी मुद्दे, किसी मौके, या किसी संगठन के काम को संपूर्णता में देखा जाना चाहिए, और मोदी के इस अमरीका प्रवास की संपूर्णता नकारात्मक या निराशाजनक नहीं है। इसलिए किसी एक चूक को लेकर बड़ा मुद्दा बनाना यह भी साबित करता है कि आलोचकों के पास उससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं है, या उनको बड़ी खामियां निकालने की समझ नहीं है।
अब हम गांधी के हिज्जे पर ही लौटें, तो मोदी ने नाम गलत ले लिया, लेकिन इसी खबर के साथ-साथ यह भी देखने की जरूरत है कि उन्होंने देश की धरती पर और विदेश की धरती पर भी गांधी के सबसे पसंदीदा मुद्दों में से एक सफाई का मुद्दा उठाया है, और अभी जब हम यह लिख रहे हैं, पूरे देश में सफाई को एक अभियान के रूप में चलाने की बात हो रही है। जो लोग मोदी के इतिहास को गिनाते हुए उन्हें आज भी कोसते चलना चाहते हैं, उनको अपने इस हक के साथ-साथ यह भी देखना होगा कि मोदी ने घंटे भर के अपने भाषण में कम से कम दर्जनभर बार गांधी का नाम लिया, और बालिकाओं के लिए शौचालयों को, देश में सफाई को उन्होंने लालकिले से लेकर न्यूयॉर्क तक महत्वपूर्ण माना और बताया। एक देश के रूप में भारत की सोच को एक बहुत मामूली लगने वाली सफाई की जरूरत की तरफ ले जाने की यह कोशिश इसलिए छोटी नहीं है कि गंदगी से लोगों की जिंदगी बीमारियों से घिरती है, और पर्यटकों का आना-जाना भी इस वजह से घटता है, जिससे कि देश का बड़ा नुकसान भी होता है। साफ-सफाई को लेकर आज हम यहां इस बात को इसलिए भी आगे बढ़ा रहे हैं कि अगले दो-तीन दिन स्कूलों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक, और गली-मुहल्लों तक सफाई का एक अभियान देखने मिलेगा, और हिंदुस्तानी लोगों को अपने घर के भीतर भी, अपने बदन पर भी सफाई की एक आदत डालने की जरूरत है, और अगर प्रधानमंत्री ने इसे एक राष्ट्रीय मुद्दा बनाया है, और अपनी इस सोच के लिए पूरा का पूरा श्रेय गांधी को दिया है, तो मोदी की आलोचना करने के पहले कांगे्रस को यह सोचना चाहिए कि उसने खुद ने अपने भीतर, अपनी पार्टी और अपनी सरकारों में गांधी को कितना जिंदा रखा है? क्या कांगे्रस के आज की यह दुर्गत इसलिए ही नहीं हुई है कि वह गांधी की ईमानदारी की सोच से कोसों दूर चली गई थी, और सोच-समझकर चली गई थी।
मोदी की आलोचना के लिए ठोस मुद्दों की कोई कमी नहीं रहेगी, और उनके विरोधियों और आलोचकों को अपनी ताकत और अपने शब्द वैसे मुद्दों के लिए बचाकर रखना चाहिए, वरना बिन बात अगर वे आलोचना करते रहेंगे, तो किसी दिन आलोचना के लायक बात रहने पर भी उनको कोई नहीं सुनेगा। 

बात की बात

बात की बात

30 सितंबर, 2014

मोदी की इतनी शोहरत की अहमियत कम नहीं

29 सितंबर 2014
संपादकीय
भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बीती रात का न्यूयॉर्क का कार्यक्रम कई मायनों में देखने लायक था। दुनिया के इतिहास में प्रवासी भारतीयों ने शायद पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री के लिए इतना महंगा, इतनी चकाचौंध से भरा हुआ, और इतना कामयाब गैरसरकारी कार्यक्रम किया। इसके लिए बीस-पचीस हजार से अधिक लोग न्यूयॉर्क पहुंचे, और टिकट खरीदकर भी पन्द्रह-बीस हजार लोग अमरीका के एक सबसे बड़े सभागृह में बैठे, और मोदी को घंटे भर सुना।
अमरीका में बसे हुए भारतवंशियों को देखें, तो लंबा इतिहास गवाह है कि उनमें से बहुतायत भाजपा और मोदी समर्थकों की रहते आई है। ऐसे ही प्रशंसक और समर्थक इस आयोजन के पीछे अधिक सक्रिय थे, और पिछले दस बरसों में मोदी को अमरीका का वीजा न मिलने पर भी ये समर्थक संगठन मोदी के वीडियो भाषण का आयोजन करते आए थे। लेकिन लोकतंत्र में समर्थक और प्रशंसक पाने का हक तो हर किसी को रहता है, मनमोहन सिंह को भी था, सोनिया गांधी को भी था। पिछले बरसों में भारत में मनमोहन सिंह की सरकार रहते हुए वे खुद कई बार अमरीका गए, और अपने इलाज के सिलसिले में सोनिया गांधी ने इसी न्यूयॉर्क शहर के अस्पताल में कई बार गईं। ऐसे मौकों पर अगर भारतवंशियों ने इनके स्वागत में कोई कार्यक्रम नहीं किया, तो जाहिर तौर पर प्रवासी भारतीयों के बीच इनकी निजी लोकप्रियता कम रही होगी, कांगे्रस और यूपीए के काम इन भारतीयों को सुहा नहीं रहे होंगे, और कांगे्रस की नीतियां इन कामयाब भारतवंशियों को खुश करने वाली नहीं रही होंगी। हमारा ऐसा ख्याल है कि प्रधानमंत्री बने बिना भी अगर नरेन्द्र मोदी अमरीका का वीजा पाते, और अमरीका जा पाते, तो उनका स्वागत समारोह अमरीका में किसी भी भारतीय नेता का सबसे बड़ा स्वागत समारोह हुआ रहता। लेकिन अब जब कल का यह कार्यक्रम हो चुका है, तो बीती बातों को लेकर किसी कल्पना की गुंजाइश नहीं बचती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस मौके पर अपने समर्थकों और प्रशंसकों की भीड़ को जिस तरह बांधकर रखा, और उनकी कही हुई हर बात पर जिस तरह तालियां बजती रहीं, उनको देखकर यह बात भी साफ थी कि वहां मौजूद लोग मोदी की बातों को सुनने के पहले ही उन पर तालियां बजाना तय करके आए थे, और वह माहौल इस सभागृह के बाहर भी बिखरा हुआ था। भारत के मीडिया में शायद ही कोई टीवी चैनल ऐसा बचा था जिसने कल शाम से देर रात तक का लगभग पूरा वक्त न्यूयॉर्क के इस कार्यक्रम को समर्पित न किया हो। नरेन्द्र मोदी ने भारतीय प्रधानमंत्रियों की परंपरा तोड़कर मीडिया को अपने साथ विदेश प्रवास पर ले जाना बंद कर दिया है, लेकिन इसके बावजूद हिंदुस्तान का हर बड़ा मीडिया अपने खर्च पर अमरीका में इसलिए डेरा डाले हुए है, क्योंकि मोदी के कार्यक्रमों का समाचार-महत्व है, और उसे अनदेखा करना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है।
इस मौके पर नरेन्द्र मोदी के खासे लंबे भाषण में उन्होंने बहुत सी बातें प्रवासी भारतीयों के लिए कीं, बहुत सी बातें भारत में टीवी देखने वाले भारतीय नागरिकों के लिए भी कीं। लेकिन उन्होंने इस मौके का इस्तेमाल अमरीका से किसी बातचीत को करने के लिए नहीं किया, और न ही दुनिया के किसी और देश को कोई संदेश इस मौके पर दिया। शायद इस दौरे में उनके और बहुत से कार्यक्रम ऐसे हैं जिनमें वे बाकी लोगों से बात करें, बाकी लोगों के लिए बात करें। हम आखिर में कल शाम के कार्यक्रम को लेकर इतना ही कहना चाहते हैं कि इतनी शोहरत कोई छोटी बात नहीं होती है, और निर्वाचित लोकतंत्र में शोहरत की अहमियत कम नहीं होती है। नरेन्द्र मोदी ऐसी तमाम भीड़ में कही बातों को लेकर अपने खुद के लिए बहुत से ऐसे पैमाने गढ़ रहे हैं जिन पर पूरा उतरना और खरा उतरना किसी के लिए भी खासा मुश्किल होगा। आगे-आगे देखें, होता है क्या। 

बात की बात

बात की बात


29 सितंबर, 2014


29 सितंबर, 2014

जयललिता की सजा से लोकतंत्र को नसीहत

28 सितंबर 2014
संपादकीय
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को कल एक विशेष अदालत द्वारा अठारह बरस चली कार्रवाई के बाद सुनाई गई सजा को अगर कोई भारतीय लोकतंत्र की जीत माने, तो यह बहुत बड़ी चूक होगी। एक पूरी पीढ़ी तो इस केस के चलते निकल गई, और उसके पहले एक पीढ़ी तक जयललिता का भ्रष्टाचार चला होगा। ऐसे में अगर भारत का लोकतंत्र किसी भ्रष्ट नेता को पहली अदालत से सजा दिलवाने में एक पीढ़ी लगाता है तो अभी तो जयललिता के सामने आगे के कानूनी विकल्प खुले हुए हैं और जाहिर है कि जिसकी इतनी बड़ी काली दौलत अदालत में साबित हुई है, उसके पास आगे कानूनी लड़ाई लडऩे के लिए और जाने कितनी ही दौलत बची हुई होगी। और यह लगता है कि जयललिता के महंगे वकील उनको शायद जेल से निकलवा भी लें, और शायद ऊपर की किसी अदालत से उनको राहत भी दिलवा दें। ऐसे में लोकतंत्र में इंसाफ का यह सिलसिला पूरी तरह पाखंड साबित होगा, और आज जो लोग पहली अदालत से जयललिता की सजा पर खुश हो रहे हैं उनको याद रखना चाहिए कि बड़े लोगों की सजा लंबे वक्त तक जारी रहने की भारत में कोई परंपरा नहीं रही है।
पिछले कुछ समय से केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट का रूख यह दिख रहा है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रहे मामलों को तेजी से निपटाया जाना चाहिए। अदालतों में इस बारे में तैयारी भी शुरू हो गई है, और जिन नेताओं को यह मालूम है कि वे मुजरिम हैं, वे बेचैन भी हैं। लेकिन यह देश तब तक नहीं सुधर पाएगा, जब तक भ्रष्ट नेताओं का कुर्सियों पर बने रहना जारी रहेगा। लोकतंत्र इस कदर लचीला है कि वह ऐसी तमाम रियायत, संदेह के आधार पर छूट हर किसी को देते चलता है, और ऐसे में जनता का खजाना इन लोगों के हाथ में रहता है, जांच करने वाली पुलिस ऐसे लोगों को सलाम करती है, और लोकतंत्र की भावना के साथ खुला सामूहिक बलात्कार होता है। इसलिए आज जब देश के कुछ और मुख्यमंत्री रहे हुए लोग अदालतों में भ्रष्टाचार के मामले झेल रहे हैं, कुछ और लोग केंद्रीय मंत्री रहते हुए भ्रष्टाचार के मामलों में कटघरों में खड़े हैं, तो राजनीतिक दलों को या तो खुद होकर ऐसी एक आचार संहिता बनानी होगी कि ऐसे लोग सरकार की किसी कुर्सी में न रहें, ये लोग संसद और विधानसभाओं में न रहें, और न ही पार्टी संगठनों के किसी पद पर रहें। जनता के वोटों से जो पार्टियां चलती हैं, उनको अपने-आप को सुधारना चाहिए, अपने मुजरिमों को किसी भी तरह की कुर्सियों से दूर रखना चाहिए, और अगर ऐसा नहीं होता है तो हम उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग लोकतंत्र के शब्दों और लोकतंत्र की भावना को देखते हुए ऐसा कोई रास्ता निकालें, जिस पर चलने से अभियुक्तों और आरोपियों को रोका जा सके। 
जयललिता भारतीय राजनीति में एक ऐसे परिवारवाद का प्रतीक भी हैं जो कि लालू यादव से लेकर मुलायम यादव तक, और गांधी-नेहरू से लेकर चौटाला-बादल तक, अब्दुल्ला से लेकर मायावती से होते हुए अनगिनत दूसरे कुनबों तक फैला हुआ है। एक तो कुनबापरस्ती, फिर भ्रष्टाचार, और फिर एक व्यक्ति की मनमानी वाले राज की पार्टियां। लोकतंत्र का कत्ल करने के लिए और क्या चाहिए? अगर अदालत और चुनाव आयोग भी कुछ नहीं सुधार सकते हैं, तो जनता को खुद होकर जगह-जगह इसे खारिज करना होगा। भ्रष्टाचार भ्रष्ट लोगों को मजबूत बनाता है, उन्हें दानवी ताकत देता है, और ईमानदार लोगों को खोखला बना देता है। लोकतंत्र ऐसी नौबत में कभी जिंदा नहीं रह सकता।

अम्मा और अम्मा

27 सितंबर 2014
संपादकीय
दक्षिण भारत से अभी दो खबरें आ रही हैं, कर्नाटक की एक जेल में बनाई गई एक विशेष अदालत किसी भी पल यह फैसला सुनाने जा रही है कि तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता के खिलाफ 18 बरस पहले शुरू हुए अनुपातहीन सम्पत्ति के भ्रष्ट आचरण वाले मामले में वे कुसूरवार हैं, या बेकसूर हैं। दूसरी खबर जो खबरों में कम आएगी वह यह है कि दक्षिण की एक आध्यात्मिक महिला, माता अमृतानंदमयी ने कश्मीर के बाढ़ पीडि़तों के लिए अपने आश्रम की तरफ से 25 करोड़ रूपए की सहायता राशि दी है। आज उनका 61वां जन्मदिन भी था, और इस समारोह में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी पहुंचे हुए थे। 
ये दो खबरें दक्षिण की ही दो महिलाओं को लेकर है। और पुरानी खबरों में झांकने पर यह पता लगता है कि माता अमृतानंदमयी ने उत्तराखंड में पिछले बरस हुई तबाही के बाद 50 करोड़ रूपए दान दिए थे। साथ-साथ यह भी पढऩा दिलचस्प है कि किस तरह जयललिता के ऊपर मुख्यमंत्री रहते हुए सौ-पचास करोड़ रूपए के भ्रष्टाचार का मामला अभी अदालत में तय हो रहा है, और किस तरह वे पिछले 18 बरसों से चल रहे इस मुकदमे के दौरान सत्ता की राजनीति में हैं, बरसों से सत्ता में हैं। यह भी देखने की बात है कि तमिलनाडू में जयललिता के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई नहीं हो सकती थी, इसलिए उनके असर और दबदबे को देखते हुए पड़ोस के कर्नाटक में एक जेल में विशेष अदालत बनाई गई, और उस पर इसी सुनवाई पर करोड़ों रूपए खर्च हुए। 
इन्हीं दो महिलाओं को लेकर यह बात भी एक जैसी है कि दोनों को उनके भक्तजन अम्मा कहते हैं, और जयललिता को किसी ने किसी को गले लिपटाते नहीं देखा, उनकी पार्टी के बुजुर्ग भी उनके पैरों पर दंडवत ही दिखते हैं, दूसरी तरफ माता अमृतानंदमयी हर किसी को गले लगाकर, लिपटाकर उनको अपना प्रेम और आशीर्वाद देती हैं। कुछ लोगों को यह बात अटपटी भी लग सकती है कि हम दो बिल्कुल ही अलग-अलग किस्म की महिलाओं को एक साथ यहां पर लिख रहे हैं, और यह बात  इन दोनों में से जो महिला विवादहीन और भली है, उसके लिए अपमान की है। लेकिन हमारा मानना है कि दो अलग-अलग किस्म के लोगों को एक साथ देखने पर ही अच्छे लोग और अधिक अच्छे दिखते हैं, और बुरे लोग और अधिक बुरे दिखते हैं। और यह मामला आज एक साथ एक दिन, एक ही वक्त आने से हम इस सामाजिक विरोधाभास को अनदेखा भी नहीं कर पा रहे हैं। 
जयललिता के बारे में लिखना अधिक आसान है, क्योंकि भ्रष्टाचार के मामले अनगिनत नेताओं पर चलते आए हैं, और ऐसे मामलों के चलते हुए भी वे अपनी कुर्सियों पर जमे हुए शायद और अधिक भ्रष्टाचार करते भी रहे हैं। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र रबर के एक ऐसे सामान जैसा है जिसे जितना चाहें खींचा जा सकता है। ऐसे में इस देश में लालू यादव से लेकर जयललिता तक, और येद्दियुरप्पा से लेकर चौटालाओं तक, हर किसी को देश की आखिरी अदालत से फैसला आने तक जनता की अदालत में जाने का हक, और उस हक का इस्तेमाल कैसा होता है, यह आज की एक तीसरी खबर में है। हरियाणा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला भ्रष्टाचार के मामले में जेल में सजा काट रहे हैं, और इलाज के नाम पर जेल से बाहर निकलकर अस्पताल में हैं। अभी अदालत यह देखकर हक्का-बक्का रह गई कि अस्पताल के नाम पर जमानत पाने वाले चौटाला हरियाणा में आमसभा के मंच पर हैं। और उनकी जगह कोई गरीब होता तो जेल के अस्पताल में, या बाहर सरकारी अस्पताल मेें मर चुका होता। 
ऐसे देश में नेताओं के खिलाफ हिकारत और नफरत इतनी बढ़ चुकी है कि सरकार को साफ-सुथरा चलाने की नरेन्द्र मोदी से उम्मीद के चलते देश की जनता ने उन्हें एक ऐतिहासिक बहुमत दिया। आने वाला वक्त बताएगा कि मोदी की सरकार ईमानदार रहती है, या बेईमान हो जाती है, लेकिन आज जयललिता का मामला देश की जनता को राजनीतिक भ्रष्टाचार के विकराल आकार के बारे में सोचने को बेबस कर रहा है। 

मोदी की तूफानी विदेश नीति तीस दिन, तीन महाशक्तियां

26 सितंबर 2014
संपादकीय
भारत का मीडिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अमरीका प्रवास को लेकर एक किस्म से झाग उगल रहा है। वह इतनी सारी जानकारी, इतने-इतने खुलासे से बता रहा है, कि मानो वह किसी क्रिकेट मैच में चीयरलीडर बन गया है, और मोदी के हर चौके-छक्के पर नाच रहा है। मोदी के कपड़े-लत्ते से लेकर, अमरीका में उनको लेकर भारतवंशियों की तैयारियों की छोटी-छोटी बातों तक, मीडिया हर बात को शायद इसलिए भी अतिरिक्त उत्साह से बता रहा है कि पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने विदेश प्रवास पर भारतीय मीडिया को साथ ले जाना बंद कर दिया है, और सिर्फ सरकारी मीडिया को प्रधानमंत्री के शाकाहारी, बिना शराब वाले विमान में जगह मिल रही है। फिर भी भारतीय मीडिया ने अपने खर्च से अपने लोगों को अमरीका भेजा है और वे मोदी के सौ घंटों के अमरीका प्रवास पर सौ-सौ घंटे का प्रसारण तो हर चैनल पर कर ही लेंगे। लेकिन भारतीय मीडिया की सबसे बड़ी ज्यादती एक किसी टीवी चैनल का गढ़ा हुआ यह नारा है- नरेन्द्र से नरेन्द्र तक। जिन लोगों को यह बात समझ न आ रही हो उन्हें शिकागो की धर्मसभा में स्वामी विवेकानंद (नरेन्द्र) के दिए हुए ऐतिहासिक भाषण को याद करना होगा। नरेन्द्र से नरेन्द्र तक! शब्दों में यह बात मोदी की तारीफ जरूर करती है, लेकिन एक ऐसा पैमाना मोदी के सामने खड़ा करती है, जिसे कि मोदी खुद भी पसंद नहीं करेंगे। 
अब भारतीय मीडिया के उत्साह से परे अगर कुछ बात की जाए, तो यह हैरान करने वाली बात है कि केंद्र सरकार में एक भी दिन काम का जिसका अनुभव न रहा हो, वह आदमी तीस दिनों के भीतर दुनिया की तीन महाशक्तियों से बात करने जा रहा है। जापान और चीन के बाद अब अमरीका से नरेन्द्र मोदी की बातचीत, हिंदुस्तान के इतिहास की शायद सबसे तेज रफ्तार विदेश नीति होगी। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के वक्त यह बात खटकती थी कि आज के जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मोदी बिना तजुर्बे के इस देश को दुनिया के बीच कहां खड़ा कर पाएंगे। लेकिन उन्होंने अपने शपथग्रहण में सार्क के सारे देशों को बुलाकर, और उसके बाद लगातार पड़ोसी देशों से लेकर जापान और चीन जैसे दो परस्पर विरोधियों से लंबी बातें कीं, और अब अमरीका की बारी है। 
इन तमाम अंतरराष्ट्रीय दौरों और वार्ताओं को लेकर हम अभी कामयाबी और नाकामयाबी के पैमाने नहीं निकाल रहे, लेकिन विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी ने जिस रफ्तार से, जिस गर्मजोशी और आत्मविश्वास से काम शुरू किया है, वह गुजरात के कल के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के आज के व्यक्तित्व का एक बिल्कुल नया पहलू है, और दुनिया इसे बड़ी उत्सुकता से, और गौर से देख रही है। मोदी का अमरीका प्रवास अभी शुरू हो ही रहा है, और वहां की सरकार से बातचीत के अलावा मोदी वहां बसे हुए भारतवंशियों से भी लंबी बात करने जा रहे हैं, और वहां बड़ी उत्सुकता से उनका इंतजार हो रहा है। प्रवासी भारतीयों के बीच वे, और भारतीय जनता पार्टी पहले से सबसे लोकप्रिय पार्टी रहे हैं, और अपनी पार्टी और खुद के उदार कारोबार के नजरिए के चलते वे ऐसे भारतवंशियों के बीच लोकप्रियता के हकदार भी हैं। 
मोदी की अमरीका के राष्ट्रपति से, और वहां की सरकार से बातचीत सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगी, और भारत की दिलचस्पी के, खासकर उसकी फिक्र के, बाकी देशों तक यह बातचीत बिखरेगी। ऐसे में अमरीकी सरकार से मोदी किस तरह कुछ हासिल करके आते हैं, यह बात मायने रखेगी। आज की भारत की बहुत जटिल अंतरराष्ट्रीय स्थिति यह है कि अमरीका अरब दुनिया में मुस्लिम आतंकी संगठनों के खिलाफ बरसों से फौजी कार्रवाई कर रहा है, और वह भारत से इसमें समर्थन चाहेगा। दूसरी तरफ भारत के कामगारों के हित, भारत के पेट्रोलियम-हित, तो अरब देशों से जुड़े हुए हैं ही, भारत दुनिया में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश भी है। ऐसे में भारत की अमरीका से आर्थिक उम्मीदें, और अमरीका की भारत से सैनिक उम्मीदें, किस तरह और कहां तक साथ-साथ चल सकेंगी, यह आने वाले बरस बताएंगे। फिलहाल यह पिछली आधी सदी में भारत के किसी प्रधानमंत्री की सबसे चर्चित अमरीका यात्रा है।

मेक इन इंडिया की सोच और हकीकत

25 सितंबर 2014
संपादकीय
अमरीका रवाना होने के ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ हफ्ते पहले अपने ही उछाले अपने नारे पर बने एक राष्ट्रीय अभियान की शुरूआत की, और कहा कि भारत में चीजों को बनाने का मेक इन अभियान चलाने की जरूरत है। उनकी यह बात इस हिसाब से ठीक है कि भारत में इतनी बड़ी आबादी है कि अगर वह हुनरमंद हो, और छोटे-बड़े कारखाने लगें, उनमें क्वालिटी का ध्यान रखा जाए, तो भारत दुनिया के बाजार में मुकाबले में खड़ा हो सकता है। लेकिन आज हकीकत यह है कि भारत में सामानों और इंसानों द्वारा दी जाने वाली सेवा, इन दोनों में क्वालिटी का कोई ठिकाना नहीं है, और देश के बाहर तो दूर रहा, देश के भीतर भी बहुत कम ब्रांड ऐसे हैं जिन पर कि लोग पूरा भरोसा करते हैं। 
लेकिन हम अक्सर यह बात लिखते हैं कि जिंदगी में उत्कृष्टता की तरफ बढ़े बिना और कोई रास्ता नहीं है। अभी इसरो की कामयाबी पर लिखे संपादकीय में भी इसी जगह दो दिन पहले हमने इसरो को उसकी तकनीकी उत्कृष्टता के लिए बधाई दी थी, और यह उम्मीद भी जताई थी कि हिंदुस्तान में हर कोई उससे पे्ररणा लेंगे। अब दो-तीन दिनों के भीतर ही नरेन्द्र मोदी ने मेक इन इंडिया नाम की अंतरिक्ष छूती हुई एक दूसरी उम्मीद सामने रखी है, और इसे हासिल करना कारखानों के अलावा राष्ट्रीय सोच पर भी निर्भर करेगा, और हिंदुस्तानियों की महत्वाकांक्षा पर भी। आज देश में स्कूल-कॉलेज के बच्चों से लेकर, बेरोजगारों और कामगारों तक एक अजीब सी निराशा दिखती है, और भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ लोगों के मन में भड़ास दिखती है। 
इस देश में सरकारी खरीद एक बुरा नाम है, और घटिया सामान के लिए आम जुबान में यह कहा जाता है कि यह गवर्नमेंट सप्लाई के लिए बना दिखता है। देश की सबसे बड़ी अकेली खरीददार, सरकार जब भ्रष्टाचार के चलते घटिया सामानों के बनाने के मुकाबले को बढ़ावा देती है, तो वह घटियापन गैरसरकारी खरीददारों तक भी पहुंच जाता है। दूसरी तरफ ग्राहकों के हक की हिफाजत के लिए बने कानूनों पर कोई अमल इस देश में नहीं होता, और लोग कम्पनियों और दुकानदारों पर मुश्किल से भरोसा कर पाते हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम के तहत भी लोगों को तरह-तरह के हुनर सिखाने का काम बहुत फर्जी तरीके से चल रहा है, और कागजी खानापूरी अधिक हो रही है। इसके अलावा आईटीआई या पॉलिटेकनिक जैसे प्रशिक्षण संस्थानों से निकले हुए लोगों के पास भी हुनर नहीं दिखता। 
ऐसे माहौल में भारत में बने हुए कामगार भी दुनिया भर में जाकर काम के बाजार में मुकाबला नहीं कर सकते, और देश के भीतर सामान बनाने में यहां के कारोबार-कारखाने दुनिया की उम्मीद की क्वालिटी नहीं पा रहे हैं। ऐसे में जो गिने-चुने ब्रांड अच्छे हैं, उनकी पूरी दुनिया में साख है और मांग है। हम नरेन्द्र मोदी के उछाले हुए इस नारे को आज की जरूरत पाते हैं, लेकिन एक भाषण से परे देश भर में उत्कृष्टता के लिए जागरूकता, और जिम्मेदारी की भावना लाना खासा मुश्किल काम होगा। लेकिन यह बात भी अपनी जगह सही है कि इसके बिना आने वाली दुनिया में न भारत की, न भारतीयों की कोई जगह बचेगी। इसलिए मेक इन इंडिया को कैसे एक हकीकत बनाया जा सकता है, इस पर केंद्र, राज्य, कारोबार, और लोगों को खुद भी सोचना होगा।

यह कामयाबी सिर्फ पुरूषार्थ की नहीं, महिला वैज्ञानिक भी हैं...

24 सितंबर 2014
संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज सुबह से इसरो में मंगलयान की कामयाबी को देखते हुए वैज्ञानिकों को बधाई दी और कहा कि यह इसरो का पुरूषार्थ है जिसने इस यान को मंगल तक पहुंचा दिया। वहां मौजूद अधिकतर वैज्ञानिक दक्षिण भारतीय थे, और उनमें से बहुतों को हिन्दी वाला हिस्सा कम समझ आया होगा, और खुशी और उत्तेजना के उस मौके पर लोगों का ध्यान भाषा पर गया भी नहीं होगा। इसरो की जो तस्वीरें अभी हमारे कम्प्यूटर पर दिख रही हैं उनमें दर्जन भर से अधिक महिला वैज्ञानिक भी शामिल हैं, जो रंग-बिरंगी सिल्क साडिय़ों में वहां पर खुशियां मना रही हैं। जाहिर है कि उस नियंत्रण कक्ष के भीतर कोई छोटे-मोटे कर्मचारी तो रहे भी नहीं होंगे, और इसरो की फेहरिस्त में बहुत सी महिला वैज्ञानिकों के नाम हैं। चूंकि इसरो की कामयाबी पर हम कल ही इस जगह लिख चुके हैं, इसलिए आज उस कामयाबी से परे के मुद्दे पर लिख रहे हैं, और यह सफाई देना इसलिए जरूरी है कि कोई यह न समझे कि कामयाबी के बजाय भाषा पर क्यों लिखा जा रहा है। 
भारत में बोलचाल में बहादुरी और कामयाबी के किसी भी काम को पुरूषार्थ कहने का चलन है। हिन्दी के शब्दकोष देखें तो उनमें भी पुरूषार्थ को ही मानव की सफलता करार दे दिया गया है, और जो हिन्दी भाषा एक पुरूषप्रधान समाज के दबदबे तले उपजी है, फली-फूली है, उससे लैंगिक समानता की उम्मीद की भी नहीं जा सकती। हम प्रधानमंत्री मोदी के एक शब्द को लेकर इसलिए लिख रहे हैं, क्योंकि आज का उनका पूरा भाषण हमने ध्यान से सुना है। और शिक्षक दिवस के मौके पर देश भर के बच्चों से उनकी बातचीत को भी हमने ध्यान से सुना था। उस दिन उन्होंने बच्चों के विकल्प के रूप में लगातार बालकों का इस्तेमाल किया था, और एक बार भी उन्होंने बच्चों के विकल्प के रूप में बालिका शब्द नहीं कहा था। बालिकाओं का जिक्र उन्होंने सिर्फ शौचालय के संदर्भ में शायद किया था। वे अकेले ऐसे नहीं हैं, और भारत में प्रमुख महिलाओं में भी अधिकतर का यही हाल है कि उनकी भाषा में लड़की या महिला की जगह आमतौर पर गायब रहती है। राजनीतिक दलों की महिलाएं प्रदर्शन करने जाती हैं, तो किसी को कमजोर और नालायक साबित करने के लिए उसे चूडिय़ां भेंट करती हैं, मानो कि चूड़ी पहनने वाली महिलाएं कमजोर और नालायक ही होती हैं। 
प्रधानमंत्री मोदी को अपनी भाषा में लड़कियों और महिलाओं को जगह देनी होगी, वरना उनके नीचे के तमाम अफसर-कर्मचारी, मंत्री-नेता बराबरी की भाषा न बोल पाएंगे, और न ही बराबरी का बर्ताव कर पाएंगे। भाषा की राजनीति किसी चूक से पैदा नहीं हुई है, सदियों से चली आ रही बेइंसाफी से इस भाषा को सोच-समझकर ऐसा बनाया गया कि बचपन से ही बच्चों को लड़कियों और महिलाओं को लड़कों और आदमियों से कमजोर समझाया गया। भारत की हिन्दी में शादी के कार्ड में दूल्हे के नाम के साथ तो चिरंजीवी लिखा रहता है, ताकि वह चिरकाल तक जीवित रहे, लेकिन दुल्हन के नाम के साथ सौभाग्यकांक्षिणी लिखा जाता है, मतलब यह कि वह सौभाग्य की आकांक्षा करती रहे, अपने सुहाग की आकांक्षा करती रहे, और पति से पहले गुजर जाए। 
भारत में अदालतों से लेकर आयोगों तक, और संसद से लेकर मीडिया तक, हर कहीं भाषा की गैरबराबरी को खत्म करने की जरूरत है। हम प्रधानमंत्री की भाषा को लेकर इसलिए लिख रहे हैं कि वे काफी मौकों पर काफी बोलते हैं, उन्हें काफी लोग सुनते हैं, और उनकी कही बातों पर खासी चर्चा और बहस होती है। हमने उनकी भाषा में इस गैरबराबरी के बारे में कहीं सुना नहीं है, कहीं पढ़ा नहीं है, और ऐसा इसलिए है कि सार्वजनिक जीवन के प्रमुख लोगों से लेकर मीडिया की महिलाओं तक को भाषा में गैरबराबरी में कोई बेइंसाफी नहीं दिखती। सदियों से दबी हुई सोच बराबरी की कल्पना भी नहीं कर पाती। लेकिन अब लोगों को इस बेइंसाफी को खत्म करना चाहिए, और प्रधानमंत्री को यह चर्चा छेड़कर भाषा को न्यायसंगत, बराबरी वाली बनाना चाहिए।

इसरो को सलाम

23 सितंबर 2014
संपादकीय

भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो की कामयाबी देखने लायक है। वैसे तो यह बात हमको कल सुबह मंगलयान की कामयाबी दर्ज हो जाने के बाद लिखनी चाहिए, लेकिन हम अब तक मंगलयान के सफर को अपने-आपमें एक बड़ी कामयाबी मानते हुए उस पर लिख रहे हैं, बिना यह राह देखे कि कल सुबह वह मंगल की जमीन पर ठीक से उतरकर अपना काम कर पाएगा या नहीं। पिछले करीब एक बरस का लगातार का सफर इस मंगलयान ने जितनी बारीकी से कामयाब किया है, वह कामयाबी अपने-आपमें आज ही बधाई देने के लायक है।
दो-तीन बरसों की मेहनत में जिस तरह इसरो ने कुल मिलाकर साढ़े चार सौ करोड़ रूपयों से यह पूरा अभियान तैयार किया, और धरती से लाखों मील दूर तक यह यान पूरी कामयाबी से सफर कर चुका है, वह देखने लायक है। खासकर एक ऐसे देश में जो कि सरहदों के लिए तोप से ताबूत तक की खरीदी में भ्रष्टाचार से घिरा हुआ हो, जहां पर उत्कृष्टता की सोच हिंदुस्तानियों के दिल-दिमाग में आमतौर पर हो ही नहीं, वहां पर एक पूरी तरह से सरकारी संस्थान, पूरी तरह से सरकारी अभियान को इतनी बारीक बखूबी से पूरा कर रहा है, यह अपने-आपमें हैरतअंगेज है। लोगों को याद होगा कि इसी इसरो ने पिछले बरसों में लगातार दुनिया के सबसे विकसित देशों के उपग्रह भी कामयाबी के साथ अपने रॉकेट पर ढोकर अंतरिक्ष में पहुंचाए हैं, और उनसे कमाई भी की है। ऐसे में आज जब यह देश फिजूल की फूहड़ बातों, और भड़काऊ-उकसाऊ साम्प्रदायिक बातों में घिरा हुआ है, तो एक संस्थान जाकर उस मंगल ग्रह पर अपने पैर रख रहा है, जिस मंगल ग्रह का असर गिनाकर भारत में ज्योतिषी लड़के-लड़कियों की शादी में अडंगा खड़ा करते हैं। अब मंगलयान के पांवतले आने के बाद इस ग्रह का असर लोगों की कुंडलियों पर कैसा होगा, यह देखना मजेदार होगा।
इस मुद्दे पर आज हम इसलिए लिख रहे हैं कि हिंदुस्तानियों को, जो जहां जिस काम को कर रहे हैं, उस काम में उत्कृष्टता की तरफ बढऩे की बहुत जरूरत है। जब लोगों को अपने काम में क्वालिटी की परवाह नहीं रह जाती, तब दुनिया में उनकी जरूरत घटती जाती है, और सामानों से लेकर सेवा तक, उससे कमाई की गुंजाइश भी खत्म होती जाती है। आज जब एक-एक सामान के अलग-अलग हिस्से दर्जन भर देशों में बनते हैं, और कोई तेरहवां देश उसकी मार्केटिंग करता है, तो ऐसे में जो देश, जहां के लोग क्वालिटी के लिए लापरवाह रहेंगे, वैसे देश और लोग मंगल ग्रह तो दूर रहा, खुद अपने शहर के बाजार में भी नहीं पहुंच पाएंगे, वहां भी दूसरे देश से आया सामान बिकेगा, दूसरे देश-प्रदेश से आए कारीगर काम करेंगे।
सौ फीसदी हिंदुस्तानी हाथों और हुनर से काम करते इसरो की मिसाल से देश के हर किसी को कुछ न कुछ सीखने और नसीहत लेने की जरूरत है। न हिंदुस्तानी कामगार कमजोर हैं, न यहां के सामान कमजोर हैं। यहां कि कल्पना कुछ घंटों में मंगल पर पांव धरने वाली है, और दुनिया के सबसे अव्वल आधा दर्जन देशों में से भारत को एक बनाने का यह काम इस एक संस्थान ने किया है। लेकिन इससे सीखकर देश के हर पढऩे-लिखने वाले, हर काम करने वाले अपने-आप को बेहतर बना सकते हैं, अपने काम में सुधार ला सकते हैं, और आसमान को छू सकते हैं, उसे चीरकर दूसरे ग्रहों तक जा सकते हैं। 

याद रखें कि लोकतंत्र के चुनाव फोटोशॉप से नहीं लड़े जा सकते

22 सितंबर 2014
संपादकीय

भारत और भारत से जुड़े हुए लोगों का सोशल मीडिया मोटे तौर पर अगर किसी एक इंसान को सबसे अधिक समर्पित है, तो वह है नरेन्द्र मोदी। इंटरनेट पर मोदी की धिक्कार और उनकी जय-जयकार करने वाले लोगों का यह पसंदीदा शगल है कि वे मोदी के बारे में कुछ लिखें। जय-जयकार करने वाले मोदी और उनसे जुड़ी बातों के आसपास की किसी खामी को भी देखना नहीं चाहते, और वे खूबियों को चारों तरफ फैलाने में लगे रहते हैं। ऐसा करते हुए वे कई किस्म की झूठी तस्वीरों को फैला देते हैं, और मानो मोदी की लकीर को अधिक लंबा करने के लिए मोदी-भक्त उनके राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ झूठी खबरें, झूठी तस्वीरें, और झूठे वीडियो भी फैलाते रहते हैं। और दिलचस्प बात यह है कि मोदी की ऐतिहासिक जीत से निराश, उनसे नफरत करने वाले लोग भी मोदी के खिलाफ ऐसी ही तमाम झूठी बातों का इस्तेमाल भी करते रहते हैं, उनको बदनाम करने के लिए। 
अब ऐसी साइबर जंग के बीच इस मुद्दे पर आज हम इसलिए लिख रहे हैं कि मोदी का बीता हुआ कल तो इतिहास में दर्ज है ही। आज वे दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं। और आने वाले कल के इतिहास में उनका आज का काम, और कार्यकाल के बाकी आने वाले कलों का काम भी दर्ज हो ही जाएगा। लेकिन पिछले सौ से कुछ अधिक दिनों में नरेन्द्र मोदी ने जो काम किए हैं, उनको देखे बिना, और उनके साथ के लोगों ने जो काम किए हैं, उनको भी देखे बिना, सिर्फ समर्थन या विरोध का अभियान सिर्फ जगह घेर रहा है, कोई मकसद पूरा नहीं कर रहा है। 
ऐसी नौबत में हमको एक बात लगती है जो कि इन दोनों ही तबकों को सोचनी चाहिए। जिन लोगों को नरेन्द्र मोदी से शिकायत है, और जो लोग बरसों से उनके आलोचक रहे हैं, उनको एक बात सोचनी और तय करनी चाहिए, कि  क्या वे अपने पैमानों पर मोदी को एक बेहतर इंसान बनने का मौका देना चाहते हैं, या फिर वे मोदी को अपने पैमानों पर खराब इंसान बने रहने की जिद पर अड़े रहना चाहते हैं? कुछ लोगों को यह निराशा हो सकती है कि अब तक नरेन्द्र मोदी ने खुद कोई ऐसा काम नहीं किया है जिससे कि उनकी साख बहुत गिरे। ऐसे लोग प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी के कामकाज की कामयाबी या खूबी को देखना नहीं चाहते। 
दूसरी तरफ मोदी के भक्त हैं जो मोदी राज में मोदी के मंत्रियों, और उनके राजनीतिक साथियों के किए गलत, भड़काऊ, और साम्प्रदायिक कामों को भी इस कीमत पर भी अनदेखा करना चाहते हैं कि उनसे चाहे प्रधानमंत्री के अच्छे कामों का नुकसान ही क्यों न हो जाए। एक चुनाव जीतने के लिए, या दूसरे चुनाव की तैयारी में किसी एक प्रदेश में या पूरे देश में धार्मिक और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिशों को भी मोदी के भक्त अनदेखा कर रहे हैं, और सैकड़ों बरस पहले लिखी गई एक बात को भी वे अनदेखा कर रहे हैं कि समझदार को निंदक नियरे राखना चाहिए। मोदी के समर्थन में कीर्तन करने वालों को यह समझना चाहिए कि अगले पांच बरस मोदी को उनके समर्थन की जितनी जरूरत नहीं है, उतनी जरूरत मोदी को ऐसे आलोचकों की है जो कि अगले आम चुनाव तक उनको गलतियां करने से बचाएं। 
जब तर्कों और तथ्यों से परे, भावनाओं और दुर्भावनाओं से सामाजिक प्रचार किया जाता है, तो उनसे एक ऐसी हवा बनती है कि हकीकत उसके पीछे दिखना बंद हो जाती है। मोदी के समर्थकों और मोदी के विरोधियों इन दोनों को यह समझना चाहिए कि अपनी नीयत, और अपने मकसद को पूरा करने के लिए उनको झूठ बहुत दूर तक साथ नहीं दे सकेगा। और आज के माहौल में एक सच यह है कि मोदी के समर्थकों के पास लोकतांत्रिक पैमानों पर, राष्ट्रीय चुनावी मुकाबलों में, पाने को और कुछ नहीं बचा है, अब जो कुछ बचा है, वह आज हासिल को खोने का खतरा ही बचा है। साथ ही दूसरी तरफ मोदी विरोधी राजनीतिक दल आज अपनी जिंदगी में सबसे नीचे पहुंच चुके हैं, और अगले चुनाव में उनके पास सिर्फ हासिल ही हासिल करने को बचा रहेगा। ऐसे में समर्थकों और विरोधियों को झूठ छोड़कर सच की बात करनी चाहिए, क्योंकि लंबी लड़ाई में सच उजागर हो ही जाता है। लोकतंत्र के आम चुनाव फोटोशॉप जैसे सॉफ्टवेयर से नहीं लड़े जा सकते जिससे कि तस्वीरों में छेडख़ानी करके कुछ वक्त के लिए झूठ को सच दिखाने की कोशिश होती है।

तनाव से गुजरते महाराष्ट्र के दो सबसे स्वाभाविक गठबंधन

21 सितंबर 2014
संपादकीय
महाराष्ट्र की राजनीति में इस पल सब कुछ अनिश्चित चल रहा है। विधानसभा चुनाव के दो बड़े पुराने गठबंधन आपस में तो बाद में उलझेंगे, आज तो दोनों अपने-अपने घरों की महाभारत में लगे हुए हैं। भाईयों के बीच तलवारें खिंची हुई हैं, और ऐसा लग रहा है कि दो गठबंधनों के मुकाबले अगर चार पार्टियां अलग-अलग चुनाव में उतरेंगी, तो आखिरी वोट की गिनती तक यह समझ नहीं आएगा कि कौन जीतेगा, कौन हारेगा। लेकिन आज कल में ही इन दोनों के होने वाले फैसले के पहले ही हम इन गठबंधनों की कुछ बुनियादी बातों के बारे में लिख रहे हैं, क्योंकि आज इस राजनीतिक उठापटक से बड़ी और कोई खबर नहीं है, और इन गठबंधनों की बुनियादी बातें आज कल में कोई फेरबदल होने पर भी इतिहास को नहीं बदलने वाली हैं। 
महाराष्ट्र में शिवसेना और भाजपा इन दोनों की जगह मोटे तौर पर हिन्दू वोटों के बीच है, और इनके गठबंधन की समझदारी यह रही कि इन्होंने उन वोटों को बंटने नहीं दिया, और आपस में सीटें बांटकर लंबे समय से काम चलाया। बाल ठाकरे और अटल बिहारी बाजपेयी के वक्त से चले आ रहा यह गठबंधन बड़ा ही स्वाभाविक है, क्योंकि हिन्दुत्व की आक्रामकता की धार का फर्क होने के बावजूद इन दोनों का मिजाज एक है, और महाराष्ट्र में जिन पार्टियों या जिस गठबंधन से इनका मुकाबला रहता है, उनके परंपरागत वोटरों के खिलाफ यही धार काम भी आती है। इन दोनों के बीच एक बुनियादी फर्क यह भी है कि शिवसेना का महाराष्ट्र के बाहर न तो कोई वजूद है, और न ही उसकी कोई हसरत है। लेकिन एक प्रदेश तक सीमित आक्रामक क्षेत्रीयतावाद चलाने वाली यह पार्टी हिन्दुत्व के साथ-साथ मराठी मानुस की आक्रामकता से भी काम करती है, और यह मुद्दा एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी भाजपा के राष्ट्रीय मिजाज के खिलाफ जाता है। फिर भी किसी तरह यह गठबंधन ऐसा चलते रहा कि क्षेत्रीय हिंसा भी शिवसेना को भाजपा से अलग नहीं कर पाई, और न ही राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा को अपने एक प्रांतीय भागीदार की हिंसा के लिए विरोधी पार्टियां कभी कटघरे में खड़ा कर पाईं। 
अब दूसरे गठबंधन की कुछ बात करें, तो कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी एक ही घर के दो भाईयों की पार्टियां हैं, और सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोडऩे वाले शरद पवार ने अपनी अलग पार्टी बनाकर भी कांग्रेस के साथ चुनाव और सरकार में गठबंधन जारी रखा, और यह कामयाब भी रहा, राज्य में भी, और केन्द्र में भी। इन दोनों पार्टियों के नेताओं और मंत्रियों के बीच खींचतान उतनी ही चलती रहीं, जितनी कि किसी एक अकेली सत्तारूढ़ पार्टी के बड़े नेताओं के बीच आपस में भी चलती ही हैं। लेकिन इस बार चुनाव के पहले सीटों के बंटवारे को लेकर एनसीपी और कांग्रेस के बीच तनातनी और टकराव कमोबेश वैसे ही हैं जैसे कि शिवसेना और भाजपा के बीच चल रहे हैं। 
जैसा कि भाजपा और शिवसेना के मामले में है, कांग्रेस और एनसीपी का गठबंधन विचारों और सिद्धांतों के आधार पर वैसा ही स्वाभाविक है, जैसा कि उसके मुकाबले खड़े हिन्दुत्व गठबंधन का है। आज महाराष्ट्र में सरकार बनाने, और मुख्यमंत्री बनने के मुद्दे को लेकर इन दोनों गठबंधनों के बीच काफी तनाव की खींचतान चल रही है, क्योंकि महाराष्ट्र की सत्ता छोटी बात नहीं होती। किसी भी राजनीतिक दल के लिए देश में चंदा उगाही की सबसे बड़ी जगह महाराष्ट्र को माना जाता है, और वहां पर राज करना किसी भी पार्टी के लिए देश के किसी भी दूसरे राज्य पर राज के मुकाबले अधिक बड़ी बात होती है। 
आज की तमाम खींचतान के बीच यह बात जाहिर है कि इन चार पार्टियों के बीच ये दो गठबंधन ही स्वाभाविक हैं, और बहुत हद तक नीयत और नीति-सिद्धांत की ईमानदारी पर बने हुए हैं। आगे-आगे देखें, होता है क्या।

उत्तरप्रदेश की तरह पूरे देश में साइकिलें टैक्स फ्री हों

20 सितंबर 2014
संपादकीय

देश-विदेश की खबरों की भीड़ में पिछले हफ्ते एक छोटी सी खबर पर लिखना रह गया था, जो कि बहुत जरूरी था, और शायद कुछ दूसरे मुद्दों के मुकाबले जिसे खबरों में अधिक आना भी चाहिए था। उत्तरप्रदेश में साइकिलों पर से टैक्स हटाना तय किया है। यह देश के सबसे गरीब प्रदेशों में से एक है, और जाहिर है कि यहां पर साइकिल चलाने वाली काफी होंगे। दूसरी बात यह भी कि सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह भी साइकिल है, और साल दो साल में कभी-कभार इस पार्टी के मुलायम सिंह यादव या अखिलेश यादव साइकिल चलाते तस्वीरों में दिख भी जाते हैं। एक दूसरी खबर मध्यप्रदेश से आई थी कि वहां अस्सी बरस का एक आदमी रोज अपना बनाया सामान बेचने साइकिल से चालीस किलोमीटर का सफर तय करता है। 
इन दो खबरों से परे भी कुछ महीने पहले की खबर और तस्वीर हमारे पाठकों को याद होगी कि किस तरह योरप के एक देश का प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री साइकिल पर अपने दफ्तर जा रहा था, और पिछले महीनों में जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भूटान गए, तो वहां के प्रधानमंत्री भी खबरों में कुछ अधिक आए कि वे किस तरह साइकिल से चलते हैं। कल-परसों ही हमने इसी अखबार में यह छापा कि किस तरह यूपीए के विमान मंत्री प्रफुल्ल पटेल देश के सबसे बड़े बैंक दीवालिया विमान सेवा मालिक विजय माल्या के साथ एक निजी विमान में खाली सीटों के साथ सफर कर रहे थे, और किस तरह आज मोदी सरकार के विमान मंत्री हवाई अड्डे पर आम मुसाफिरों की तरह अपना सामान लेकर एयरपोर्ट-बस में चलते हैं, विशेष कार के अपने हक का इस्तेमाल न करते हुए। 
कुल मिलाकर बात यह है कि हिन्दुस्तान में साइकिल का सम्मान जिस तरह कम किया गया है, वह भयानक है। सार्वजनिक पार्किंग की जगहों पर साइकिलों को रखना सबसे ही दिक्कत वाले कोने पर होता है, ट्रेन और बसों में लोग साइकिल नहीं ले जा सकते, और सड़कों पर ट्रैफिक के बीच साइकिलों के लिए हिफाजत की कोई लेन नहीं होती। जो लोग पेट्रोल बचाने के लिए और अपनी सेहत बचाने के लिए, प्रदूषण बचाने के लिए, और ट्रैफिक जाम बचाने के लिए साइकिल चलाना चाहते हैं, वे दूसरी गाडिय़ों तले कुचल जाने के डर से ऐसा हौसला नहीं कर पाते। और फिर राज्य सरकारें हैं जो कि हजारों करोड़ के खर्च से चौड़ी सड़कें बनवाती हैं ताकि बड़ी-बड़ी गाडिय़ां तेज रफ्तार से चल सकें, लेकिन साइकिल पर टैक्स खत्म करने की जो सलाह हम बरसों से देते आ रहे हैं, उस पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता क्योंकि फैसले लेने वाले लोगों में से कोई भी साइकिलों पर नहीं चलते। 
पूरे देश में साइकिलों पर किसी भी तरह का टैक्स एकदम खत्म कर देना चाहिए। कम से कम साधारण साइकिलों पर तो कोई टैक्स नहीं रहना चाहिए, और पांच-दस हजार रूपए से अधिक दाम वाली महंगी फैशनेबल साइकिलों पर सरकार जितना चाहे उतना टैक्स लगाए। लोग अगर साइकिलों पर चलेंगे, जो कि मजबूरी में चलते ही हैं, तो वे विदेशी मुद्रा से खरीदे जाने वाले पेट्रोलियम को भी बचाते हैं, सड़कों पर कम जगह घेरते हैं, किसी दूसरे को कुचलकर मार नहीं सकते, और प्रदूषण नहीं बढ़ाते। साइकिल चलाने वालों की सेहत पर सरकारी इलाज की जरूरत भी कम पड़ती है, और सरकार पर बोझ नहीं पड़ता। इन तमाम बातों को देखते हुए पूरे देश को एक साथ, या अलग-अलग प्रदेशों को अपने स्तर पर भी साइकिलों को पूरी तरह टैक्स फ्री करना चाहिए, और उनको रखने के लिए सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षित और सुविधाजनक इंतजाम भी करना चाहिए। 

अजित सिंह जनता के पैसों से जिंदगी भर का श्राद्ध चाहते हैं

19 सितंबर 2014
संपादकीय

दिल्ली में एक पिछले केंद्रीय मंत्री अजित सिंह के सरकारी बंगले को खाली कराने को लेकर उनके प्रभाव क्षेत्र वाले इलाके में सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन हुआ है। उत्तरप्रदेश के जिस हिस्से से चौधरी चरण सिंह केंद्र सरकार में पहुंचे थे, वहां से उनके बाद उनके बेटे अजित सिंह केंद्रीय मंत्री बने, और अब उनके बेटे जयंत भी राजनीति में आ चुके हैं। कुर्सी पर न रहने पर बंगला खाली कराने के लिए तमाम नोटिसों के बाद अब जाकर केंद्र सरकार ने दिल्ली में बंगले का बिजली-पानी काटा, तो उत्तरप्रदेश में अजित सिंह समर्थकों ने दिल्ली की तरफ आने वाले पानी की नहर काट दी। अब अजित सिंह, उनके बेटे, और उनके समर्थक इस बात को एक मुद्दा बना रहे हैं कि इस बंगले को चौधरी चरण सिंह की याद में एक स्मारक बनाया जाए। 
लोकतंत्र और सभ्य सार्वजनिक जीवन में यह एक शर्मनाक नौबत होती है जब किसी गुजर चुके नेता या प्रमुख व्यक्ति के नाम का झंडा-डंडा लेकर चलने वाले महज उनके कुनबे के लोग रह जाते हैं। आज परिवार के लोगों के अलावा चौधरी चरण सिंह का कहां पर कोई नाम लेवा रह गया है? परिवार के लोगों के जो राजनीतिक साथी और कार्यकर्ता हैं, उनको चौधरी चरण सिंह की भावनाओं से जुड़ा हुआ बताकर उनके हिंसक प्रदर्शन को बंगले पर कब्जे के लिए इस्तेमाल करने का यह शर्मनाक रूख भारतीय राजनीति में ही देखने मिलता है। और अजित सिंह के पास यह मिसाल भी है कि दिल्ली में एक सरकारी बंगला बाबू जगजीवन राम के स्मारक के लिए दे दिया गया है, और एक सरकारी बंगला कांशीराम की याद में दे दिया गया है, तो फिर चौधरी चरण सिंह की याद में क्यों नहीं? 
यह बहुत ही घटिया सोच है कि किसी की याद को जिंदा रखने के लिए उसका कुनबा सरकारी अनुदान मांगे, सार्वजनिक दान मांगे, और गुजर चुके इंसान की सोच को आगे बढ़ाने के बजाय जनता की संपत्ति पर कब्जे को आगे बढ़ाए। सार्वजनिक जीवन में बहुत से लोग ऐसे रहते हैं जो अपने कुनबे की यादों को महान साबित करने के फेर में अपनी पूरी जिंदगी निकाल देते हैं। हकीकत यह है कि ऐसी हरकतों से महानता कीजायज बुनियाद भी अगर रहती है, तो वह खत्म हो जाती है। लोकतंत्र में जिंदा और मुर्दा कुनबापरस्ती, हिंदुओं में श्राद्धपक्ष और बाकी धर्मों में उनके रिवाज के मुताबिक ही होनी चाहिए, जनता के पैसों से ऐसी हरकत बहुत ही नाजायज है।
आज एक और जगह पर कुछ इसी तरह की मांग उठ रही है कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर लंदन में जिस घर में रहे उसे भारत सरकार खरीदकर उनका स्मारक बनाए। हो सकता है कि महाराष्ट्र के सामने खड़े हुए चुनावों को देखते हुए महाराष्ट्र के राजनीति दल ऐसे किसी दबाव में भी आ जाएं, और चुनावी घोषणापत्र में ऐसा कोई वायदा कर दें। लेकिन मुंबई की ही एक तस्वीर चार दिन पहले आई है कि वहां पर जिस मकान में अंबेडकर बरसों रहे, और जिस दौर में उन्होंने रहते हुए ऐतिहासिक काम किए, वह मकान आज बुरी बदहाली झेल रहा है, और उसे स्मारक बनाने की बात के बजाय, लंदन के मकान को खरीदकर स्मारक बनाने की मांग की जा रही है।
किसी भी सरकारी मकान को ऐसा कोई भी स्मारक बनाने के लिए देने के खिलाफ जनता में से किसी को सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए, और इस सिलसिले पर रोक लगाने के लिए एक स्पष्ट आदेश मांगना चाहिए। अजित सिंह और उनके समर्थकों को शर्म आनी चाहिए कि जनता की संपत्ति पर उनकी इस तरह की नीयत है, और उसे पूरा करने के लिए वे सड़कों पर हिंसा करवा रहे हैं। भारत की राजनीति में कुनबापरस्ती का यह भी एक नुकसान है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग जिंदा रहने तक संसद और विधानसभाओं की सीटों पर काबिज रहते हैं, और अब मर जाने पर भी उनकी स्मृतियां सरकारी बंगलों पर अवैध कब्जा बनाए रहती हैं। इस सोच को धिक्कारना चाहिए, सार्वजनिक मीडिया में इसके खिलाफ लिखना चाहिए। अजित सिंह जनता के पैसों से जिंदगी भर का श्राद्ध चाहते हैं।

Bat ke bat, बात की बात,

18 sept 2014

18 sept 2014

हे मां, हेमा...

18 सितंबर 2014
संपादकीय
शास्त्रीय नृत्य से हिंदी फिल्मों तक का खूबसूरत सफर करने वाली अभिनेत्री हेमा मालिनी भाजपा की तरफ से संसद में हैं। वे पहले भी पढ़ी-लिखी थीं, और मुंबई जैसे महानगर में उन्होंने एक लंबी जिंदगी गुजारी है। इसके अलावा यह बात भी जाहिर है कि वे महिला और राजनीति के नाते वे सार्वजनिक जीवन में हैं। ऐसे में अगर वे खुद होकर कोई बात कहती हैं, तो वे उसे लेकर किसी रियायत की हकदार नहीं रहतीं, और उनके शब्द और उनकी भावना आलोचना के लिए खुले रहते हैं। ऐसे में उन्होंने अभी वृंदावन में बसी हुई ऐसी महिलाओं के बारे में बहुत ही ओछी और घटिया बात कही है जो कि अपने पति खोने के बाद भारतीय समाज-व्यवस्था में विधवा कहलाते हुए वृंदावन के आश्रमों में मौत का इंतजार करती हैं, और जिन्हें दुनिया के मीडिया में बहुत दर्द और तकलीफ के साथ वृंदावन-विडो कहा जाता है। 
खबरों के मुताबिक हेमा मालिनी ने अभी कहा कि बिहार और बंगाल की विधवाओं को अपने-अपने राज्यों में ही रहना चाहिए, और वृंदावन में आकर भीड़ नहीं लगानी चाहिए। मथुरा लोकसभा सीट से भाजपा सांसद हेमा मालिनी ने कहा, वृंदावन में बसी विधवाओं के पास बैंक बैलेंस, अच्छी आय और अन्य सुविधाएं हैं, लेकिन उन्हें भीख मांगने की आदत पड़ गई है। उत्तर प्रदेश के वृंदावन में हजारों विधवाएं बसी हुई हैं। पैंसठ वर्षीय हेमा मालिनी ने यह टिप्पणी अपने संसदीय क्षेत्र मथुरा के दौरे में कही, और वृंदावन भी मथुरा जिले का ही हिस्सा है। हेमा मालिनी के कैमरों पर कहे गए बयान में उन्होंने कहा था, वृंदावन में 40,000 विधवाएं हैं... मुझे लगता है, शहर में और जगह नहीं है... एक बड़ी तादाद बंगाल से आ रही है... यह सही नहीं है... वे बंगाल में ही क्यों नहीं रुकी रहतीं...? वहां भी अच्छे मंदिर हैं... यही बात बिहार पर भी लागू होती है। बुरी हालत में मौजूद एक आश्रय स्थल का दौरा करने के बाद हेमा मालिनी ने कहा कि वह इस बारे में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बात करेंगी।
हेमा मालिनी अपनी तमाम खूबसूरती के बावजूद उम्रदराज हैं, और हिंदू समाज में इतनी लंबी जिंदगी गुजारने के बाद उनको इस धर्म के तहत महिलाओं की हालत के बारे में जरूर अंदाज होगा। कोई महिला अपनी मर्जी से पति नहीं खोती, और कोई महिला विधवा कहलाना नहीं चाहती। यह तो भारत की पुरूषप्रधान हिंसक समाज-व्यवस्था है कि मर्द अपने से खासी कम उम्र की लड़कियों से शादी करते हैं, और जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय महिला की औसत उम्र भारतीय पुरूष से तीन-चार बरस अधिक है। नतीजा यह होता है कि आंकड़ों के मुताबिक किसी महिला को ही जिंदगी के आखिरी बरस अकेले रहना पड़ता है। और भारतीय समाज में चाहे हिंदू औरत हो, चाहे मुस्लिम शाहबानो, किसी को कोई इंसानी हक तो मिलते नहीं हैं, और हालत यह रहती है कि पति खो चुकी महिला अमूमन सफेद कपड़ों में, किसी भी तरह की साज-सज्जा से दूर, साधारण खान-पान से भी दूर, घर और समाज के खुशी के मौकों से दूर, जायदाद पर हक से दूर, दबी-कुचली और बिना हक के रह जाती है। नतीजा यह होता है कि उसे घर से निकालकर बाकी परिवार राहत की सांस लेता है, या ऐसी महिलाएं दूसरी अपने जैसी महिलाओं के बीच अधिक बराबरी का इंसानी हक पाती हैं। विधवा कही जाने वाली दूसरी महिलाओं के बीच रहकर वे सामाजिक उपेक्षा और प्रताडऩा से परे बची जिंदगी अपने उस तबके में बराबरी के दर्जे के साथ गुजारती हैं। 
ऐसे में भाजपा की सांसद एक महिला अपने चुनाव क्षेत्र में धार्मिक और सामाजिक वजहों से शरण पाकर मौत का इंतजार करने वाली ऐसी तकलीफजदा महिलाओं के खिलाफ ऐसी हिंसक बात करती है, तो ऐसी हेमा मालिनी की इंसानी समझ पर भी हमें तरस आता है, और उनकी पार्टी को भी यह सोचना चाहिए कि क्या वह कल तक राजस्थान में जिस सती प्रथा का समर्थन करती थी, क्या आज 21वीं सदी में भी वह महिलाओं के खिलाफ वैसी ही हिंसक बनी रहना चाहती है? और अगर वह ऐसा चाहती है, तो फिर कल्पना चावला के अंतरिक्ष में जाने पर उसे फख्र करने का क्या हक रहेगा? 
राजनीतिक दलों को अपने साक्षर और पढ़े-लिखे नेताओं को इंसानियत सिखाने का एक ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाना चाहिए, ताकि हेमा मालिनी जैसी स्वप्नसुंदरी का चांद सा चेहरा दांत बाहर निकले हुए ड्रैकुला के खून सने चेहरे जैसा न लगे। हम ऐसी समाज-व्यवस्था और ऐसी सोच दोनों को लेकर शर्मिंदा हैं, कि यह उसी देश में है, जहां पर कि हम बसे हुए हैं। आखिरी में हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि जिस इलाके से हेमा मालिनी चुनाव लड़कर जीती हैं, और उसके बाद ऐसी हिंसक बात कह रही हैं, उसी इलाके से ऐसी अनगिनत खबरें और तस्वीरें पिछले एक-दो बरस में निकलकर सामने आई हैं कि सुलभ शौचालयों के संस्थापक बिंदेश्वरी पाठक ने किस तरह इन महिलाओं के लिए होली का आयोजन किया, और उन्हें अपने घर एक बार जाने-आने के लिए हवाई टिकटों का इंतजाम भी किया। राजनीति से परे का एक सामाजिक मुखिया इस तरह के समाज सुधार की पहल कर रहा है, और अरबपति महिला सांसद इस किस्म की दकियानूसी, और हिंसक बातें कर रही है।

घूरे पर चकाचौंध

17 सितंबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर इन दिनों बड़े अजीब से दौर से गुजर रही है। दुनिया के शायद दर्जन भर देशों के क्रिकेट खिलाड़ी यहां पर एक टूर्नामेंट के लिए आए हुए हैं, और प्रदेश का सबसे बड़ा स्टेडियम जगमग है। दूसरी तरफ शहर का एक दूसरा स्टेडियम कौन बनेगा करोड़पति की तैयारी में लगा हुआ है, और राजधानी के लोग क्रिकेट सितारों को देखकर हटे भी नहीं होंगे, कि यहां से केबीसी का जीवंत प्रसारण होगा। शहर के अलग-अलग हिस्से बाहर से आए हुए ऐसे सितारा मेहमानों की खातिरदारी में सजे हुए हैं, और बड़ी होटलों, यहां के मॉल्स, और यहां के स्टेडियम बड़ी मेहनत और खर्च से इस मौके पर अपने को अच्छा दिखा रहे हैं। 
लेकिन दूसरी तरफ पिछले कई महीनों से छत्तीसगढ़ की यह राजधानी कचरे से लदती चली जा रही है, और यहां के म्युनिसिपल ने राज्य सरकार के मातहत जिस तरह का एक ठेका एक निजी कंपनी को दिया था, उसके खिलाफ आज कांग्रेस और भाजपा दोनों के निर्वाचित पार्षद खड़े हैं, मंत्री खड़े हैं, विधायक खड़े हैं, और सांसद भी खड़े हैं। अब यह समझ नहीं आ रहा है कि म्युनिसिपल की निर्वाचित कांग्रेसी महापौर से लेकर, वहां पर भाजपा के पार्षदों के बहुमत तक, और राज्य सरकार के अफसरों और मंत्रियों तक, इनमें से किस पर इस ठेके की जिम्मेदारी जा रही है, और शहर किस तरह इस कचरे से उबर सकता है? सैकड़ों करोड़ खर्च करके भी अगर इस एक शहर का कचरा न म्युनिसिपल खुद के कर्मचारियों से उठा पाया, और न ही ठेका देकर इसकी सफाई हो पाई, तो आखिर इस घूरे के लिए जिम्मेदार कौन है? पूरे शहर में गंदगी का आलम ऐसा है कि मेहमानों के लिए होने वाली साज-सज्जा और बहुत बुरी तरह खटक रही है, और लोगों को लग रहा है कि क्या सिर्फ बड़े आयोजनों के लिए ही, सिर्फ उन्हीं जगहों पर, सिर्फ उन्हीं मौकों पर यह शहर साफ हो सकेगा? पिछले महीनों में कई तरह की बीमारियां शहर में फैलीं, पिछला एक बरस बहुत सी पीलिया मौतों का गवाह रहा, और मौतों से नीचे के दर्जे की बीमारियों से यहां के दसियों हजार लोग अस्पताल पहुंचे। 
अब राजधानी के सरकारी अस्पतालों की बदहाली के किस्से अखबारों में उसी तादाद में भरे हुए हैं, जिस तादाद में शहर में कचरा लदा हुआ है। सफाई के लिए जिम्मेदार जो नेता और अफसर हैं, उनकी गाडिय़ों में शीशे चढ़े रहते हैं, और गंदगी की बदबू वहां तक नहीं जाती। लेकिन जिन आम लोगों को ऐसी गंदगी के आसपास जीना पड़ता है, उसी के करीब से गुजरना पड़ता है, वे लोग जानते हैं कि हालत कितनी भयानक है, और सेहत के लिए किस कदर खतरनाक है। दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों में हालत इतनी खराब है कि मन में यह सवाल उठता है कि अगर राजधानी के सरकारी मेडिकल कॉलेज के सबसे बड़े अस्पताल का हाल इतना खराब है, तो गांव-जंगल में सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों का क्या हाल होगा? 
इस प्रदेश में बड़े जलसों की चकाचौंध, और अखबारी सुर्खियों के साथ-साथ जमीनी हकीकत पर भी सरकार को ध्यान देने की जरूरत है, और सत्तारूढ़ पार्टी को यह समझकर भी चौकन्ना हो जाना चाहिए कि कुछ महीनों के भीतर पंचायत और म्युनिसिपलों के चुनाव होने जा रहे हैं। एक तरफ तो पूरा प्रदेश ऐसे गरीबों को सड़कों पर देख रहा है, जिनके राशन कार्ड खारिज कर दिए गए हैं। और इसके अलावा रायपुर जैसा पूरे का पूरा शहर घूरा बना हुआ है। ऐसी गंदगी के लिए म्युनिसिपल और राज्य शासन में बैठे हुए नेताओं और अफसरों को नींद कैसे आती है, यह सोच पाना भी मुश्किल है। राज्य के जिम्मेदार लोगों के लिए यह नौबत तुरंत जागकर काम करने की है, वरना दीवारों पर लिखी एक बात सबको याद रखनी चाहिए- चिट्टी को तार समझना, नहीं तो बीमार को पार समझना। 

हिंसक साम्प्रदायिकता का ताजा सैलाब वोटरों ने खारिज किया

16 सितंबर 2014
संपादकीय

देश के कई राज्यों से लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों के जो नतीजे आ चुके हैं, और जो रूझान दिख रहा है वह भाजपा और नरेन्द्र मोदी के लिए फिक्र का सामान है। भाजपा के राज्यों, गुजरात और राजस्थान में इस पार्टी की शिकस्त दिख रही है, और खासकर राजस्थान में कांगे्रस पार्टी भाजपा से ऐसी सीटें छीन चुकी है जो कि कुछ महीने पहले ही भाजपा ने पचास-पचास हजार की लीड से हासिल की थीं। लेकिन इन चुनावों में जो सबसे अहमियत की बात सामने आई है वह उत्तरप्रदेश में भयानक साम्प्रदायिक और हिंसक अंदाज में भाजपा के आदित्यनाथी प्रचार का खारिज हो जाना। पिछले लोकसभा चुनाव में जिस समाजवादी पार्टी को वहां के मतदाताओं ने सिर्फ मुलायम की रसोईघर में खाने वाले लोगों तक सीमित कर दिया था, उसी उत्तरप्रदेश में भाजपा के भारी हाईवोल्टेज प्रचार पर मतदाताओं ने खारिज की सील लगा दी है। 
कल इसी जगह हमने नरेन्द्र मोदी के आसपास के मंत्रियों, नेताओं, और उनके समविचारक संगठनों की साम्प्रदायिक और हिंसक बयानबाजी के खिलाफ लिखते हुए प्रधानमंत्री को इससे देश में बढ़ रहे तनाव की तरफ से अगाह किया था। कल हमको देश भर में बिखरे हुए इन उपचुनावों के नतीजों का अंदाज भी नहीं था, और न ही हमें कल कड़ी बातें लिखते हुए नतीजों पर कोई अटकल ही लगाई थी। लेकिन आज आए नतीजे भाजपा के लिए एक आत्ममंथन का मौका लेकर आए हैं, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी यह सोचना होगा कि लालकिले से उनकी साम्प्रदायिकता के खिलाफ की गई अपील के ठीक खिलाफ उनके साथी पिछले महीनों से जो कर रहे हैं, उसके इस चुनावी नतीजे के बाद क्या मोदी घर के भीतर या सार्वजनिक रूप से अपनी चुप्पी तोड़ेंगे? 
लोगों को याद होगा कि एक वक्त भाजपा के नौजवान सितारे वरूण गांधी ने मुसलमानों के हाथ काटने का बयान दिया था, जो कि अदालत में खड़ा नहीं हो पाया, हालांकि पूरे देश ने उसे अच्छी तरह देखा-समझा था। उसके बाद से लेकर अब तक कभी लव-जेहाद का नारा उछालकर, तो कभी गाय के मांस निर्यात करके आतंक को पैसा देने की बात कहकर, आए दिन मोदी के मंत्रियों ने, भाजपा के नेताओं ने, और सहयोगी संगठनों ने खाई खोदकर धु्रवीकरण की कोशिश की, और आज के नतीजे बताते हैं कि वे कोशिशें मतदाताओं ने पूरी तरह खारिज कर दीं। दरअसल भाजपा के कुछ लोगों को यह खुशफहमी हो गई थी कि पिछले आम चुनाव में मतदाताओं ने पूरे के पूरे वोट भाजपा का साथ देने के लिए दिए थे। वे वोट तो अधिकतर यूपीए और कांगे्रस के कुकर्मों के खिलाफ थे, और थकी हुई निराश जनता की नाराजगी और नफरत का सुबूत थे। खुद भाजपा को यह मालूम था कि उसे मिली हुई सीटें उसकी ही उम्मीद से ज्यादा थीं, और कांगे्रस के खिलाफ नकारात्मक वोटों से वे सीटें इतनी बढ़ीं थीं।
लेकिन जैसा कि हमने कल भी लिखा है, हमारी फिक्र न तो भाजपा के लिए है, और न ही उपचुनावों के इन नतीजों के लिए है। हमारी फिक्र देश में साम्प्रदायिक सद्भाव बने रहने के लिए है, धर्मांधता, साम्प्रदायिकता, हिंसा, और धार्मिक धु्रवीकरण को रोकने के लिए है। प्रधानमंत्री ने जब खुद होकर दस बरसों के लिए साम्प्रदायिकता को ताक पर रखने की अपील की है, तो उनको यह भी सोचना चाहिए कि उनके साथी, उसके ठीक खिलाफ काम कैसे कर रहे हैं? यह मौका नरेन्द्र मोदी के व्यक्तिगत आत्ममंथन का इसलिए है क्योंकि सरकार और पार्टी में, सत्तारूढ़ गठबंधन में वे अकेले ही सबकुछ रह गए हैं। ऐसे में शिकस्त की तोहमत भी सीधे उन्हीं के नाम पर लिखाएगी। देश को नफरत से बचाने के लिए नरेन्द्र मोदी को अपने लोगों पर काबू पाने की जरूरत है, ऐसा न होने पर अगले आम चुनावों में उनका असर कितना घट जाएगा, इसकी हमको तो फिक्र नहीं है, लेकिन उनको खुद को शायद यह फिक्र जरूरी लगे।

मोदी के विभाजित व्यक्तित्व से उबरने की जरूरत...

15 सितंबर 2014
संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कामकाज के सौ दिन हो चुके हैं, और आए दिन उनके काम के तौर-तरीकों को लेकर खबरें आती हैं, कि वे कितनी मेहनत करते हैं, और अपने साथियों से कितनी मेहनत की उम्मीद भी करते हैं। अपने खुद के शब्दों में वे एक हेडमास्टर की तरह लोगों से खूब काम लेते भी हैं। उनकी सरकार मीडिया के साथ भारतीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के रिश्तों की परंपरा को ताक पर रखकर काम पर ध्यान दे रही है, और मीडिया हाशिए पर बैठा हुआ सोच रहा है कि उसकी यह बदहाली कब तक रहेगी। कल तक देश के जो चुनिंदा अखबारनवीस और मीडिया मालिक प्रधानमंत्री के विदेश प्रवास पर उनके विशेष विमान में कुछ मिनटों के सवाल-जवाब, और बाकी वक्त के शराब-कबाब का मजा लेते आए थे, उनके आज प्रधानमंत्री के विमान में कोई जगह नहीं रह गई है। लेकिन इन बातों को लेकर हम आज यहां चर्चा नहीं कर रहे, चर्चा का मुद्दा एक दूसरे किस्म का फर्क है, जो कि प्रधानमंत्री मोदी, और भाजपा के सबसे ताकतवर नेता मोदी के बीच के फर्क का है, और यह फर्क खाई सा दिख रहा है। 
मनोविज्ञान में एक स्थिति रहती है जिसे कि विभाजित-व्यक्तित्व (स्पिलिट पर्सनेलिटी) कहा जाता है, नरेन्द्र मोदी के भीतर आज वैसे ही दो व्यक्तित्व दिख रहे हैं। एक है, जो कि लालकिले से आजादी की सालगिरह पर खुद होकर कहता है कि देश के लोग दस बरस के लिए साम्प्रदायिकता की बात न करें, और देश को आगे बढ़ाने में लग जाएं। साम्प्रदायिकता पर दस बरस का युद्धविराम मांगने वाला प्रधानमंत्री पिछले सौ से अधिक दिनों में अपनी पार्टी और अपने विचारधारा वाले संगठनों के नेताओं के भड़काऊ, हिंसक, और साम्प्रदायिक बयानों पर अगर मुंह भी नहीं खोल रहा, तो यह दो बिल्कुल अलग-अलग भूमिकाएं हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री की हैसियत से नरेन्द्र मोदी साख कमाने में लगे हैं, और दूसरी तरफ उनकी पार्टी के मंत्री-नेता, उनके हमख्याल संगठनों के नेता देश की एकता को खाक में मिलाने में लगे हैं। ऐसा तो हो नहीं सकता कि प्रधानमंत्री देश और दुनिया के सरकारी कामकाज में इस कदर मशगूल हैं कि वे अपने साथियों की फैलाई जा रही जुबानी हिंसा को देख भी नहीं पा रहे, सुन भी नहीं पा रहे। 
एक के बाद एक भाजपा मंत्री, भाजपा सांसद, भाजपा के बड़े-बड़े नेता जिस तरह के सार्वजनिक बयान दे रहे हैं, भड़काऊ शब्दावली को गढ़ रहे हैं, और चुनाव में पार्टी के नारों में उनका इस्तेमाल कर रहे हैं, वह भयानक है। मोदी के मंत्रियों की कही बातें देश की एकता को चूर-चूर करने की ओर बढ़ रही हैं, कई मंत्री अवैज्ञानिक और तर्कहीन निष्कर्ष सामने रख रहे हैं, मेनका गांधी यह कह रही है कि जानवरों के गोश्त के कारोबार की कमाई देश के खिलाफ आतंकियों को दी जा रही है। देश की महिला और बाल विकास मंत्री बिना किसी खुफिया रिपोर्ट, बिना किसी सरकारी रिपोर्ट के ऐसी बात कह रही हैं, और देश से मांस के निर्यात पर रोक लगाने की मांग कर रही हैं। खुद मोदी सरकार के ढांचे में ऐसी कोई बात अगर कही भी जानी है तो यह बात महिला बाल विकास मंत्री के दायरे से परे की है। 
महीनों से चली आ रही इस तरह की सार्वजनिक बयानबाजी से देश के अल्पसंख्यक तबकों, और धर्मनिरपेक्ष लोगों के बीच भारी फिक्र है कि यह देश को किस तरफ ले जाया जा रहा है। और ऐसे में तनाव फैलाने वाले नेताओं के सबसे बड़े मुखिया, नरेन्द्र मोदी इस पर कुछ उसी तरह चुप हैं, जिस तरह पिछली सरकार में भ्रष्टाचार पर मनमोहन सिंह चुप थे, तो उसके क्या मतलब निकाले जाएं? नरेन्द्र मोदी क्या अपनी खुद की एक शानदार तस्वीर बनवाते हुए बाकी कामों के लिए अपनी पार्टी और सरकार के बाकी लोगों को खुला छोड़कर चल रहे हैं? उनको यह बात याद रखनी होगी कि जिस तरह मनमोहन सिंह को अनदेखी और चुप्पी का हक नहीं दिया गया, और आज इतिहास से लेकर अदालत तक, सीएजी की रिपोर्ट, किताब, और इंटरव्यू तक यह चुप्पी कटघरे में है, उसी तरह अपने साथियों के हिंसक बयानों पर मोदी की चुप्पी कल के इतिहास के कटघरे में रहेगी।
हम नरेन्द्र मोदी की एक व्यक्ति के रूप में फिक्र नहीं कर रहे, अपनी फिक्र के लिए वे पर्याप्त सक्षम और समझदार हैं। हमें फिक्र है भारतीय लोकतंत्र की, जिसमें लंबे अरसे बाद कोई प्रधानमंत्री इतना अधिक काम करता और करवाता दिख रहा है, लेकिन वह अपने मंत्रियों, साथियों, और संगठनों के आक्रामक रूख को पूरी तरह अनदेखा भी कर रहा है। यह एक खतरनाक नौबत है, और अगर यह नरेन्द्र मोदी की सोची-समझी रणनीति है, तो भी यह लोकतंत्र के लिए घातक है। और अगर यह उनकी सोची-समझी नीति नहीं है, तो लोकतंत्र में ऐसी अनदेखी का हक प्रधानमंत्री को नहीं मिल सकता। उनके भीतर के इन दो व्यक्तित्वों को यह तय करना होगा कि उनमें से असली कौन है, और कौन सरकार और सत्ता के प्रति जवाबदेह है, और कौन अपने साथियों के प्रति।

कश्मीर से निकले सबक

14 सितंबर 2014
संपादकीय
भारत के जम्मू-कश्मीर में बाढ़ के बाद राहत और बचाव को लेकर राज्य सरकार देश और दुनिया के निशाने पर है। हर कोई यही कह और लिख रहा है कि वहां जो मदद हो पाई, वह सेना ने की है, या केन्द्र सरकार के भेजे हुए दूसरे राष्ट्रीय बचाव दलों ने की है। लोग इस नौबत को लेकर वहां के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का मखौल उड़ा रहे हैं, वहां की जनता मुख्यमंत्री को कोस रही है, और मीडिया का भी मोटे तौर पर यही रूख है। लेकिन ऐसी नौबत में केन्द्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारियों और उनके काम को लेकर बारीकी से कुछ समझने की जरूरत है। 
कश्मीर में बाढ़ से इतना बड़ा नुकसान हो सकता है, इसका अंदाज कुछ पर्यावरणवादियों को तो था, राज्य सरकार को भी इसका कुछ अंदाज था, और उसने 22 हजार करोड़ की एक योजना बरसों पहले केन्द्र सरकार को भेजी थी कि किस तरह कश्मीर की नदियों में पट चुकी गाद को हटाने की जरूरत है। लगातार पेड़ कटने, या निर्माण होने की वजह से पहाड़ों की मिट्टी कट-कटकर बहकर नदियों में पहुंचती है, और उन नदियों की पानी बहाकर ले जाने, या ढोने की क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में किसी भी प्रदेश की यह ताकत नहीं होती कि इतनी बड़ी लागत वाली योजना वह केन्द्र की मदद के बिना खुद लागू कर सके। लेकिन कश्मीर में आज के हालात सिर्फ राज्य सरकार की इस योजना से जुड़े हुए नहीं हैं। यह जाहिर है कि किसी मुसीबत के वक्त के लिए राज्य सरकार की बचाव की तैयारी में कमी भी थी। कश्मीर हिमालय पर्वतमाला के पास का ऐसा राज्य है जहां कई किस्म की प्राकृतिक विपदाएं पहले भी आती रही हैं, और ऐसी नौबत में बचाव और राहत के लिए बेहतर तैयारी रहनी चाहिए। इस बारे में कुछ हफ्तों बाद ही बात करना बेहतर होगा क्योंकि आज तो वहां सरकार का अमला खुद ही बाढ़ से घिरा हुआ छतों पर बैठा हुआ था, मुख्यमंत्री अपने ही 90 फीसदी मंत्रियों से फोन पर बात नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि फोन और बिजली, सड़क और रास्ते सभी बंद थे। 
लेकिन जो लोग यह सोच रहे हैं कि कश्मीर में जो कुछ मदद पहुंची है, और जितनी जिंदगियां भी बचाई जा सकी हैं, वे सिर्फ केन्द्र की मोदी सरकार के किए हुए हुई हैं, वह सोचना सही नहीं है। भारत के संघीय ढांचे में केन्द्र सरकार के अधिकार राज्यों से मिले हुए ही रहते हैं, और राज्यों की कई किस्म की जिम्मेदारियां भी केन्द्र की ही रहती हैं। कहीं पर हिंसा फैली हो, या बाढ़-भूकंप हो, पूरे देश में भारतीय सेना जाकर पहले भी काम करते आई है, और युद्ध से परे सेना की ऐसी कुछ जिम्मेदारियां रखी भी गई हैं। भारत की सेना का खर्च राज्यों की कमाई से ही होकर आता है, क्योंकि राज्यों से परे केन्द्र का अपने आपमें कोई अस्तित्व नहीं है। इसलिए सेना ने कश्मीर में जो शानदार काम किया है, वह सेना की जिम्मेदारियों में शामिल है, केन्द्र सरकार की जिम्मेदारियों में शामिल है। भारत के संघीय ढांचे की यह एक बुनियादी बात है कि केन्द्र सरकार के हाथ में जो साधन और सुविधाएं हैं, उनका इस्तेमाल अलग-अलग वक्त पर राज्यों की अलग-अलग जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है। अगर हर राज्य के लिए हर मुसीबत के वक्त बचाव का ऐसा ढांचा स्थायी रूप से बनाकर रखा जाएगा, तो वह राज्यों या केन्द्र की जेब से ही बनेगा, और वह लागत लोगों को भूखा मारकर ही जुटाई जा सकेगी। 
कश्मीर की यह बाढ़ भारत को कुछ किस्म के सबक दे रही है। एक तो यह कि राज्यों को बचाव का अपना ढांचा खड़ा करना चाहिए, जो कम लागत का हो, लेकिन मुसीबत के वक्त काम आ सके। दूसरी बात यह कि केन्द्र सरकार को भी राज्यों के ऐसे आपदा प्रबंधन को जांचना-परखना चाहिए, क्योंकि आखिर में जाकर बोझ या जिम्मेदारी केन्द्र सरकार पर ही आती है। तीसरी बात यह कि पर्यावरण के जिन खतरों की तरफ से लोग आगाह करते हैं, उन चेतावनियों को भी परखना चाहिए, तौलना चाहिए। हम यह कहना नहीं चाहते कि 22 हजार करोड़ की लागत से कश्मीर की नदियों से गाद निकालने का काम कर लिया जाना चाहिए था, क्योंकि पर्यावरण की आशंकाओं और खतरों से निपटने के लिए देश-प्रदेश की क्षमताओं को भी देखना होता है। हर खतरे की हर आशंका से बचाव की पूरी तैयारी शायद दुनिया के सबसे संपन्न देशों के लिए भी मुमकिन नहीं होती। लेकिन फिर भी पर्यावरणवादी जो कहते हैं, उन्हें समय के पहले मिली हुई एक चेतावनी मानकर उसे जांचना जरूर चाहिए। आज की इस नौबत में हम एक अकेली राज्य सरकार को कोसना नहीं चाहते, और केन्द्र सरकार जो कर रही है, वह उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन इस बीच भी बाकी राज्यों को अपने-अपने घर सम्हालने चाहिए।

श्वेता कट्टी: लीक से हटकर एक और पहल की वजह

संपादकीय
13 सितंबर 2014 
मुंबई के लालबत्ती इलाके कमाठीपुरा में पली और ऐसी जगहों में रहने के खतरे झेलकर बढ़ी 18 बरस की श्वेता कट्टी को राष्ट्रसंघ ने युवा साहसिकता पुरस्कार के लिए चुना है। न्यूयॉर्क के बार्ड कॉलेज में वजीफा पाकर पढऩे के लिए चुनी गई श्वेता कट्टी को इसके पहले मशहूर अमरीकी पत्रिका न्यूज़वीक दुनिया की 25 अहम महिलाओं में, मलाला युसुफजई के साथ शुमार कर चुकी है। श्वेता, और उसके जैसे कमाठीपुरा, सोनागाछी या जीबी रोड जैसे इलाकों से उबरकर कहीं पहुंचने वाले बच्चे, यौन कर्मियों के अधिकारों के लिए बोलने, और काम करने वालों के लिए एक उम्मीद है, यह मुश्किलों में जीते, और आगे बढऩे की जद्दोजहद में लगे रहते लोगों को ढांढस बंधाते हैं। लेकिन इन्हें देखकर भारत जैसे देश के सामाजिक राजनीतिक और न्यायिक कर्ताधर्ताओं की आंखें भी खुलनी चाहिए, कि अगर वह चाहे, तो इन बच्चों की हालात से जंग कुछ आसान हो सकती है। एक सामाजिक संस्था का सहारा पाकर जिंदगी में आगे बढ़ रही श्वेता ने वह तमाम खतरे झेले हंै, और उन अनुभवों से गुजरी है, जिनका उसके जैसे बच्चों को खतरा रहता है। लेकिन उसे इन खतरों से उबरकर आगे बढ़ाने का काम, दान पर चलती एक संस्था की मेहनत, और उसके हौसलों ने किया है। उसके जैसे बच्चों के हौसले कितने कमजोर हो सकते हंै, यह सोच पाना कोई मुश्किल नहीं। नेता, सरकार, और न्यायपालिका की ताकत के आगे, ऐसे हौसले जीतने के मामले जितने गिने-चुने हो सकते हंै, उतना ही गिना-चुना श्वेता का मामला भी है। लेकिन महज इस बात से उसके, और उसकी मां जैसे लोगों के अधिकारों की दलीलें कमज़ोर नहीं की जा सकतीं।
यह कितनी अजीब बात है, कि वात्स्यायन के देश में,सभ्यता संस्कृति के  लिहाज से सबसे समृद्ध माने जाते दौर में वेश्यावृत्ति और देह व्यापार समाज में एक दर्जा रखता था। आज़ादी के बाद दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र बने इस देश में इस तबके की हालत बदतर होते चली गई। इनकी मौजूदगी की हकीकत से नजर चुराते हुए, एक बीमारी की तरह इस समाज से इन्हें तरह पूरी तरह से खत्म करने के इरादे का दंभ दिखाने में देश जुट गया। सीता(सप्रेशन ऑफ इमॉरल ट्रेफिक एक्ट), और पिता (प्रिवेंशन ऑफ इमॉरल ट्रेफिक एक्ट) जैसे कानून लाए गए कि देह व्यापार और उससे जुड़ी हर बात को जुर्म ठहराकर इसे खत्म कर दिया जाए। लेकिन क्या ऐसा हो सका? आंकड़े बताते हंै कि देश में यौन कर्मियों की संख्या लगातार बढ़ी है, और एड्स नियंत्रण पर काम कर रहे संगठन के मुताबिक देश में तकरीबन 30 लाख यौन कर्मियों का पता चला है। इसके अलावा इस व्यापार में धकेले गए 12 लाख से ज्यादा बच्चे भी हैं, हालांकि इस मुद्दे पर काम कर रहे संगठनों का दावा है कि इनकी तादाद इससे कहीं ज्यादा है। सरकार ने यौन कर्म को जुर्म घोषित करके जैसे इसमें लगे या इसमें धकेल दिए गए लोगों की तरफ से अपना पल्ला ही झाड़ लिया, जैसे यह इस देश के नागरिक नहीं, इस देश के सुख संसाधनों पर इनका कोई हक नहीं। न उनकी सेहत का इंतज़ाम किया, ना उनकी सुरक्षा की सोची। जैसे यह समाज में मौजूद है ही नहीं। जबकि यह तबका देश के सबसे ज्यादा सताए गए, और शोषित तबके में से एक है। सर्वे बताते हंै कि इस पेशे में आने वाले ज्यादातर किसी मजबूरी से यह पेशा अपनाते हैं, और इसमें आने वाले 80 फीसदी अपने जान पहचान वाले ऐसे लोगों के द्वारा इसमें धकेल दिए जाते हंै, जिन पर उन्होंने भरोसा किया था। यह तो एड्स और एचआईवी के फैलने पर, सामाजिक संगठनों के दबाव में सरकार इनकी सेहत की फिक्र करने जब मजबूर हुई, और उसने इन्हें इनका काम सुरक्षित तरीके से करने देने के थोड़े बहुत कदम उठाए। लेकिन इस दौरान देश की न्यायपालिका, और खासकर सुप्रीम कोर्ट, निहायत ही दंभी रवैया दिखाते रहा। ट्रेफिक, अवैध खनन, पर्यावरण, भ्रष्टाचार के स्थानीय मुद्दों तक पर पहल लेकर सरकारों को रास्ते पर आने को मजबूर करके वाहवाही लूटने वाले सुप्रीम कोर्ट ने, समाज के इस वर्ग पर कभी कोई ऐतिहासिक हुक्म नहीं दिया। देश की सबसे बड़ी अदालत, सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करके मकान बनाने वालों का पक्ष लेती रही, भयंकर अपराध करने वालों के अधिकारों का ख्याल करके उनकी सजा कम करती रही, लेकिन उसने यौन कर्मियों के हक में कभी कोई ऐतिहासिक पहल नहीं की।
भारत के  कानून का हाल यह है कि यह  वेश्यावृत्ति को तो कानूनी मानती है, लेकिन संगठित देह व्यापार को गैर कानूनी। यानि वेश्या समाज की जरूरतों के लिए तो मौजूद रहे, लेकिन अपने अधिकारों की मांग न करने लायक संगठित न हो। सुप्रीम कोर्ट ने जब  पिछले साल अपने फैसले में केंद्र सरकार  से यह  कहा कि वह यौन कर्मियों को उनके अनुकूल परिस्थितियों में गरिमा के साथ उनका काम करने दे, तो केंद्र सरकार ने हलफनामा दायर कर कह दिया कि उसका यह  हुक्म "सीता" के खिलाफ है। सोनिया गांधी भले समलैंगिकों के प्रति सहानुभूति दिखाती रही,उनकी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने अदालत से यह तक कहा कि वह अपनी बनाई हुई समिति से वेश्याओं के हक में काम करने वाली संस्थाओं के  नुमाइंदों को भी हटा दे, क्योंकि इससे वेश्यावृत्ति विरोधी कानून कमजोर पड़ेगा। यानि यौन कर्मी सिर्फ वोट बटोरने का सामान है, जब अपनी विरोधी पार्टी को नीचा दिखाना हो तो उनका समर्थन कर दो, जब नैतिकता झाडऩी हो तो उन्हें नीचा दिखा दो। नैतिकता झाडऩे में सुप्रीम कोर्ट पीछे क्यों रहता? दिल्ली हाई कोर्ट  के एक जज ने जब समलैंगिकता को अपराध मुक्त करने का फैसला दिया भी, तो उसे उसने उलट दिया। जबकि अध्ययन बताते हंै कि जब तक यौन कर्म को अपराध माना जाएगा, यौन कर्मी संगठित नहीं हो पाएंगे, देश के लाखों लोग व्यवस्था, दलालों, ग्राहकों के हाथों लुटते रहेंगे, और लोगों के लिए सरकार चलाने का दावा करने वाले दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का उन्हें कोई फायदा नहीं मिलेगा।
श्वेता कट्टी, और उसके जैसे गिने चुने बच्चों को देखकर,  देश को यह सोचना चाहिए कि अपना भविष्य संवारने का जितना हक देश के दूसरे बच्चों को  है, सलामती और सेहत की जो जरूरतें देश के बाकी लोगों की है, रोजगार और  गरिमा से जीने का हक जितना देश के बाकी लोगों का है, उतना ही हक यौन कर्मियों को भी है। वह भी देश की जीडीपी में कुछ तो योगदान करते हंै, समाज की कोई तो जरूरत पूरी करते हंै। नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में पूरी दुनिया के सुनते, लाल किले से महिलाओं के खुले में शौच जाने की मजबूरी पर बोलकर एक बड़ी पहल की है। उन्होंने उस भाषण में समाज में मौजूद कई कड़वी सच्चाइयों को स्वीकारा। उनकी सरकार अब यौन कर्म में लगे या धकेल दिए गए देश के लाखों महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के बारे में भी  सच्चाई को कुबूलने, और लीक से हटकर फैसले लेने हौसला दिखाए। सरकार चाहे तो लाल बत्ती इलाकों के लाखों बच्चे सैकड़ों श्वेता कट्टी जैसा बनने का सपना बुन सकते हैं।

ईश्वर के नाम पर दान के बजाए इंसानों के लिए दान देना सीखना चाहिए

12 सितंबर 2014
संपादकीय
बाढ़ और अंधेरे में डूबे हुए जम्मू-कश्मीर की मदद को देश के कई प्रदेश आगे आए हैं, और एक छोटे राज्य छत्तीसगढ़ ने भी 10 करोड़ रूपयों का चावल भेजने का फैसला लिया है और इसके साथ-साथ 10 हजार सोलर लैंप भी भेजे जा रहे हैं। जब देश का एक हिस्सा इतनी भयानक कुदरती मार झेलता है, तो जो राज्य बेहतर हालत में हैं, उनको आगे बढ़कर मदद करनी चाहिए। लेकिन हम सरकारी मदद से परे भी इंसानी मदद की बात करना चाहते हैं कि लोगों को एक-दूसरे की मदद का आदत पडऩी चाहिए। 
भारत में अंग्रेजों के समय से यह बात चली आ रही है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में जो ईसाई चर्च भारत में आए वे वहां से कई तरह की मदद लेकर आए, और उन्होंने भारत में स्कूलें खोलीं, अस्पताल खोले,और कुष्ठ रोगियों के लिए आश्रम खोले। देश में कई जगह उन्होंने टीबी सेनेटोरियम शुरू किए। वह सिलसिला चलते रहा और ऐसे आरोप भी लगे कि चर्च से लेकर मदर टेरेसा तक तमाम लोग धर्मांतरण की नीयत से समाजसेवा करते थे, करते हैं। लेकिन नीयत चाहे जो हो, चर्च के पास दुनियाभर के देशों से जो दान आता है, वह दान दुनियाभर के ईसाई देते हैं, और उनकी दान की आदत पड़ी हुई है। ऐसे में भारत में दूसरे धर्मों के लोगों को यह देखना चाहिए कि वे अपने धर्म स्थलों को जो दान देते हैं, वह दान किस काम आता है? मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों को जाने वाला दान अगर सबसे गरीब, सबसे जरूरतमंद के काम नहीं आता, तो फिर उनसे जुड़े हुए धर्मों की तरफ लोगों के खिंचने की वजह भी शायद नहीं बन पाती। 
लोगों को यह सोचना चाहिए कि उनका दिया हुआ दान धर्म के अपने आडंबर और अपने ढांचे पर कितना खर्च होता है, और जरूरतमंदों पर कितना। भारत में अगर समाजसेवा के लिए दान की मजबूत परंपरा होती, तो आज कश्मीर, या बीते हुए कल में असम और बिहार, इन जगहों पर मुसीबत के मारे लोगों की मदद के लिए सरकार को फिक्र नहीं करनी पड़ती, जनता से आई हुई मदद से भी बहुत सी राहत हो जाती। लेकिन भारत में अधिकतर लोगों की आदत किसी ईश्वर के नाम पर, किसी गुरू के नाम पर, किसी धर्म के काम पर दान देने की है। यह सिलसिला बदलना चाहिए। किसी धर्म से उसके मानने वालों का नाम नहीं बढ़ता। किसी धर्म के मानने वालों के काम से उस धर्म का नाम बढ़ता है। लोगों को ईश्वर के नाम पर दान देने के बजाए इंसानों के लिए दान देना सीखना चाहिए। 

हर निजी बात के पोस्टर के लिए लोगों को तैयार रहना चाहिए...

11 सितंबर 2014
संपादकीय
दुनिया में सबसे अधिक प्रचलित ई-मेल सेवा जी-मेल के पचास लाख पासवर्ड चुराकर इंटरनेट पर सार्वजनिक कर देने का दावा रूसी हैकरों ने किया है। रूस के लोग साइबर अपराधों में बाकी देशों के मुकाबले आगे रहते हैं, या कम से कम खबरों में अधिक रहते हैं। अमरीका और चीन की सरकारें अपने देश के साइबर मुजरिमों को मौका ही नहीं देतीं, और खुद ही पूरी दुनिया की जानकारी चुराते रहती हैं। अमरीकी खुफिया एजेंसियों की नजर इंटरनेट, कम्प्यूटर, फोन, और हर किस्म की डिजिटल जानकारी पर रहती है, और वहां की सरकार पूरी बेशर्मी से अपने दोस्त देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक की साइबर जासूसी करती है। चीन के बारे में खबर है कि वहां की सरकार ने दसियों हजार साइबर हैकरों को नौकरी पर रखा हुआ है, और वे दुनिया भर से सरकार और कारोबार की जानकारी चुराते रहते हैं। 
हम हर कुछ महीनों में लोगों को चौकन्ना करने के लिए इस मुद्दे पर यहां पर इसलिए लिखते हैं कि आम लोगों का पासवर्ड पर एक अंधविश्वास सा रहता है कि उनके ई-मेल खाते, फेसबुक या ट्विटर के अकाउंट का पासवर्ड अगर सिर्फ उनके पास है, तो उसमें वे जैसी चाहें वैसी जानकारी रख सकते हैं, और वह हिफाजत से रहती है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, और पश्चिम की फिल्मी दुनिया के नामी-गिरामी सितारों की बहुत ही अंतरंग और नग्न तस्वीरें पिछले दिनों उनके ई-मेल बॉक्स से चुराकर इंटरनेट पर फैला दी गईं, और उसे कोई रोक नहीं सका। इसे लेकर यहां तक चर्चा हुई कि नामी-गिरामी कंपनी एप्पल की किसी गड़बड़ी से ये तस्वीरें बाहर आईं, और इस कंपनी को सामने आकर अपना बचाव करना पड़ा। 
चाहे चीन हो, या रूस, या अमरीका, या फिर खबरों में कम रहने वाली इजराइल की सबसे घातक और शातिर खुफिया एजेंसी, इनमें से किसी पर भी यह भरोसा नहीं करना चाहिए कि वे दुनिया में कोई भी बात खुफिया रहने देंगी। आज जो लोग अपने आपको महत्वहीन मानते हैं, और यह सोचते हैं कि उनकी जानकारी पाकर सीआईएफ क्या कर लेगी, उन लोगों को भी यह याद रखना चाहिए कि एक दिन तो नरेन्द्र मोदी भी चाय बेचा करते थे, और उस दिन तो अगर ई-मेल होता, तो वे भी यही सोचते कि उनकी निजी जानकारी को दुनिया की कोई सरकार क्यों देखना चाहेगी। इसलिए आज जो लोग आम लोग हैं, जिंदगी कब उनको खास बना देगी, इसका कोई ठिकाना तो है नहीं। और चाय वाले के प्रधानमंत्री बनने के बाद तो और भी नहीं है। इसलिए लोगों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। 
एक तो यह कि अपने किसी भी डिजिटल खाते, किसी भी डिजिटल उपकरण के पासवर्ड लगातार बदलते रहना चाहिए, और उनको बहुत आसान भी नहीं रखना चाहिए। दूसरी बात यह कि अपनी किसी भी निजी या गोपनीय बात को यह मानकर ही रखना चाहिए कि किसी दिन सुबह उसके पोस्टर छपे हुए दीवारों पर दिख सकते हैं। ऐसे खतरे को देखते हुए जिन बातों को, तस्वीरों और दस्तावेजों को खत्म करना ठीक लगे उनको खत्म कर देना चाहिए। और ऐसी बातों को किसी कम्प्यूटर, फोन, या इंटरनेट सर्वर पर रखने के पहले यह समझ लेना चाहिए कि उनके मिटा देने पर भी वैसी जानकारी हमेशा के लिए मिट नहीं जाती। एक बार जो बात कम्प्यूटर या इंटरनेट पर चली गई, फोन पर टाईप हो गई, वह बात दुनिया की एजेंसियां शायद सौ बरस बाद भी ढूंढकर निकाल सकती हैं। अब अगर गुजरात के एक चाय वाले बच्चे के पास उस वक्त मोबाइल होता, उसका ई-मेल बॉक्स होता, तो आज अमरीका कम्प्यूटर की डस्टबिन से भी उन बातों को निकाल चुका होता। लोगों को याद रखना चाहिए कि ओसामा-बिन-लादेन तभी तक सुरक्षित था, जब तक उसे इंटरनेट और फोन का इस्तेमाल नहीं किया था। एक बार वह साइबर दुनिया में पहुंचा, तो अमरीका के सरकारी हत्यारे उसके दरवाजे तक पहुंच गए। और ये तमाम बातें दुनिया के कारोबार पर भी लागू होती हैं, जिन पर एकाधिकार के लिए अमरीका और चीन, इजराइल और पश्चिम के कई दूसरे देश रात-दिन लगे हुए हैं। इसलिए यह वक्त आज ही इतना नाजुक है, कि लोगों का कुछ भी सुरक्षित नहीं है, आने वाला वक्त और भी नाजुक रहेगा, और लोगों को ही अपनी आदतें, अपने शौक, अपने चाल-चलन, और अपने कामकाज को ठीक रखना पड़ेगा, वरना हर निजी बात के पोस्टर के लिए लोगों को तैयार रहना चाहिए। 

शादियों के बाद धोखा उजागर होने से बेहतर पहले शपथपत्र

10 सितंबर 2014
संपादकीय
उत्तरप्रदेश में कल एक महिला की शिकायत पर उसके पति को गिरफ्तार किया गया क्योंकि उसने मुस्लिम होते हुए अपना धर्म छुपाकर अपने को हिंदू बताते हुए हिंदू लड़की से शादी की थी। बाद में इस लड़की को पति के धर्म का पता लगा और उसने यह रिपोर्ट लिखाई।
हम जानते हैं कि आज हम एक तनावपूर्ण माहौल के बीच इस मुद्दे पर लिख रहे हैं। उत्तरप्रदेश के चुनाव में इस किस्म की शादियों को एक बड़ा मुद्दा बनाकर, इनके लिए लव-जेहाद जैसा शब्द उछालकर भाजपा एक आक्रामक तरीके से चुनाव अभियान चला रही है। दूसरी तरफ कल ही गुजरात से यह खबर आई कि वहां मोदीराज में दबे-दबे चलने वाले आक्रामक हिंदुत्व वाले संगठन विश्व हिंदू परिषद ने भारी भड़काऊ पर्चे छपवाकर बंटवाए हैं। ऐसे माहौल में इस नाजुक मुद्दे पर लिखना एक खतरनाक बात है, लेकिन हम यहां से बात शुरू करके एक दूसरे तर्कसंगत सिरे की तरफ ले जाना चाहते हैं, और किसी भी तरह दो जातियों के बीच शादी, दो धर्मों के बीच शादी का विरोध नहीं कर रहे हैं। बल्कि इसी पखवाड़े हमने इसी जगह यह भी लिखा था कि ऐसी शादियों के बाद इनके कामयाब न होने पर दकियानूसी लोग इनको एक बड़ी मिसाल बताकर ऐसी और शादियों का विरोध करते हैं, इसलिए ऐसे जोड़ों को, उनके परिवारों को, और उनके समाज को अधिक सावधान रहना चाहिए। 
लेकिन अभी एक मुद्दा यह उठा रहा है कि धर्म छुपाकर कुछ लोगों ने शादियां कर लीं, एक मुद्दा दक्षिण भारत में उठा कि क्या शादी के पहले जोड़ों को दाम्पत्य जीवन की कुछ शारीरिक जरूरतों के लिए मेडिकल जांच करवाना जरूरी किया जाए? एक मुद्दा यह भी उठता है कि लोग अपने बारे में गलत जानकारी देकर, जीवनसाथी को धोखे में रखकर शादी कर लेते हैं, और पहले से अगर वे शादीशुदा हैं, तो भी वे अपने को अकेला बताकर दूसरी शादी कर लेते हैं। 
ऐसी बहुत सी दिक्कतों का एक इलाज यह हो सकता है कि भारत में अनिवार्य किए गए शादी के रजिस्ट्रेशन का काम शादी के पहले पूरा किया जाए, और उसमें दोनों पक्षों के लिए यह जरूरी किया जाए कि वे हलफनामा देकर अपनी उम्र, अपनी पढ़ाई, अपनी वैवाहिक स्थिति, अपने धर्म की जानकारी दें। इसके साथ-साथ हमारी राय तो यह भी है कि दूल्हा-दुल्हन दोनों की मेडिकल जांच भी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए ताकि एचआईवी, सिकसेल एनीमिया जैसी कई बीमारियों और खतरों के बारे में शादी के पहले ही बात एक-दूसरे को पता लग सके। 
समाज में शादी के बाद तनाव बढऩा ठीक नहीं है। और बहुत से मामलों में तो बाद के तनाव को रोका भी नहीं जा सकता। लेकिन समझदार समाज में इतना तो हो सकता है कि जिन बातों की जांच-परख शादी के पहले होना मुमकिन है, उनको पहले जांच लिया जाए। ऐसा करना आगे तनाव के खतरों को कम करना होगा। पश्चिम के बहुत से विकसित देशों में लोग शादी के पहले एक कानूनी अनुबंध भी करते हैं, जिसमें शादीशुदा जिंदगी के बाद की बातों से लेकर, शादी के पहले की हकीकत तक, बहुत सी बातों को जोड़कर एक-दूसरे की जानकारी में रखा जाता है। ऐसा अनुबंध न सही, लेकिन सच्चाई को उजागर करने वाला शपथपत्र जरूरी करने में हमको कोई बुराई नहीं दिखती है और उससे समाज और अदालतों पर बाद में पडऩे वाले गैरजरूरी बोझ से बचा जा सकेगा।





जहां कुदरत की मार नहीं है, उनकी भी तैयारी की जरूरत

9 सितंबर 2014
संपादकीय
कश्मीर की बाढ़ में जितनी मौतें हुई हैं, उतनी देश के कई दूसरे इलाकों में भी बाढ़ या बादल फटने से हो चुकी है, लेकिन कश्मीर खबरों में कुछ अधिक इसलिए है कि कश्मीर से जुड़ी खबरों की कई मायनों में अधिक अहमियत होती है। पूरी दुनिया और पूरे भारत से सैलानी कश्मीर जाते-आते हैं, और लोगों की वहां की यादें लोगों को इन खबरों से जोड़ती हैं। ऐसा असम की बाढ़ के साथ नहीं हो पाता, क्योंकि हिन्दुस्तान का बहुत ही छोटा हिस्सा उत्तर-पूर्व की तरफ जाता है। बिहार की बाढ़ भी खबरों में उस तरह नहीं आती, क्योंकि बिहार में भी सैलानी कश्मीर की तरह नहीं पहुंचते। और फिर कश्मीर इस नाते भी खबरों में अधिक रहता है कि वह पाकिस्तान की सरहद पर बसा हुआ है, आतंकी घुसपैठ, और हमलों का शिकार रहता है, वहां एक तबका अलगाववादी आंदोलन का समर्थन करता है, और भारत के लिए उसकी फौजी अहमियत बहुत बड़ी है। इसके साथ-साथ कश्मीर को धरती की जन्नत जैसा खूबसूरत माना जाता है, और ऐसा कश्मीर जब डूबता है, तो लोगों के मन में कुछ अधिक विचलित होते हैं। 
लेकिन यह ऐसा मौका भी है, जब कश्मीर की खूबसूरती और यहां की मेहमाननवाजी का सुख उठाए हुए लोग आज वहां के लोगों की मदद के लिए आगे आ सकते हैं, और अपने-अपने इलाके से कश्मीरी लोगों को मदद भेज सकते हैं। इसके बिना आज ताजा-ताजा बेदखली में तो केन्द्र और राज्य सरकारें लोगों का साथ देंगी, लेकिन पानी उतरने के साथ-साथ कश्मीर, या और भी कोई इलाका, लोगों के दिमाग से भी उतर जाता है, और वैसे में बाद की राहत के लिए दुनिया की कोई मदद भी नहीं आती। दूसरी बात हम यहां पर लगे हाथों यह कहना चाहते हैं कि कश्मीर में आधी सदी से तैनात भारतीय फौज सरहद पार के आतंकियों के हमले भी झेलती है, और कश्मीर में अलगाववादियों में से जो लोग हथियार उठाते हैं, उनके हमले भी झेलती है। लेकिन आज इस बचाव में सबसे बड़ा बोझ फौजी वर्दियों के कंधों पर है, जो खुद पानी में डूबे हुए भी आम लोगों को डूबने से बचा रहे हैं। हम यह उम्मीद भी करते हैं कि इस खतरे से उबर जाने के बाद भारतीय फौज पर से कश्मीर की स्थानीय जनता के उग्र तबके का अविश्वास घटेगा, और एक बेहतर रिश्ता कायम होगा। 
इसी मौके पर हम यह दूसरी बात भी कहना चाहते हैं कि भारत के जो प्रदेश सरहद से परे हैं, हिमालय पर्वतमाला से परे हैं, समंदर से परे हैं, और जहां पर कुदरत की मार का खतरा कम है, वहां पर भी कश्मीर, असम, बिहार की बाढ़, उत्तराखंड के भूस्खलन, तमिलनाडु की सुनामी, कच्छ के भूकंप, ओडिशा के समुद्री तूफान, जैसी प्राकृतिक विपदाओं के बाद बिखरी रह जाने वाली दिक्कतों को देखकर उनसे सबक लेना चाहिए, और अपने-अपने इलाकों में आपदा प्रबंधन के स्थानीय इंतजामों के साथ-साथ यह भी सोचना चाहिए कि दूसरे राज्यों की मुसीबत के मौके पर वे अपने यहां से कौन सी मदद वहां भेज सकते हैं। आपदा प्रबंधन की एक जरूरत तो स्थानीय रहती है, लेकिन दूसरी जरूरत राष्ट्रीय नुकसान को देखते हुए भी तैयार रखनी चाहिए, ताकि सुरक्षित राज्य नगद रकम के साथ-साथ जरूरी सामान भी मुसीबतजदा राज्यों को भेज सकें। मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ जैसे जमीन से घिरे हुए, गैरपहाड़ी, बाढ़ से लगभग मुक्त, भूकंप से मुक्त, राज्य को भी अपने लोगों के बीच से राहत सामग्री जुटाने का एक आपदा प्रबंधन विकसित करना चाहिए, ताकि यहां के लोग बाकी देश के काम आ सकें। आज जब कुछ राज्यों में वहां की दसियों लाख आबादी अपना सब कुछ खो चुकी है, तो दूसरे राज्यों के लोग अगर वहां मदद भेजते हैं, तो इससे देश की राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है, और एक-दूसरे के लिए इज्जत भी बढ़ती है। 
हम आपदा प्रबंधन को स्थानीय जरूरतों के तंग नजरिए, और तंग दिल से बाहर ले जाकर राष्ट्रीय सोच की तरफ बढ़ाना चाहते हैं, और यह देश कुदरत की भयानक मार से ऐसी सोच की मदद से ही उबर सकेगा। दूसरा फायदा ऐसी सोच का यह होगा कि किसी दिन आशंका से परे का कोई बड़ा नुकसान अगर किसी राज्य में होगा, तो वहां की सरकार, और वहां की जनता अपनी आदत की वजह से बचाव और राहत के लिए बेहतर तैयार रहेंगी। 

अकेले सुप्रीम कोर्ट से लोकतंत्र की गंगा साफ नहीं हो सकेगी

8 सितंबर 2014
संपादकीय
एक तरफ कश्मीर बाढ़ में डूबा है, और दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों में डूबा हुआ है जिनमें सरकार में बैठे हुए लोगों के किए हुए गलत काम जिम्मेदार हैं। एक तरफ कोयला घोटाले की आग अभी सुप्रीम कोर्ट में धधक ही रही है, और दूसरी तरफ सीबीआई के मुखिया इस पूरी तरह गैरजरूरी, अवांछित, और संदिग्ध मामले में घिर गए हैं, कि सीबीआई जांच के घेरे वाले बड़े-बड़े लोग उनसे उनके घर पर जाकर मिलते रहे हंै। अभी यह साफ नहीं है कि एक सामाजिक आंदोलनकारी और सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील प्रशांत भूषण द्वारा सुप्रीम कोर्ट में ऐसी मुलाकातों की जो डायरी दाखिल की गई है, वह सच है या नहीं, लेकिन यह अपने आपमें बहुत गंभीर बात है कि सीबीआई का मुखिया आरोपियों से अगर इतनी बार घर पर मिल रहा था, तो दिग्गजों को ऐसी रियायत क्यों मिल रही थी। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने जवाब देने को एक हफ्ता दिया है, और हमारा भी उस जवाब के सामने आने के बाद उस पर और लिखना ठीक होगा। लेकिन पहली नजर में यह मामला ठीक नहीं लग रहा है। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने आज यह आरोप लगाया है कि दिल्ली में सरकार बनाने के लिए भाजपा के एक नेता ने आप विधायक को खरीदने की कोशिश की, और इस बातचीत से जुड़ा एक खुफिया वीडियो अरविंद केजरीवाल कल सुप्रीम कोर्ट को देने जा रहे हैं। 
वैसे तो अदालतों का काम जुर्म से जूझना ही है, लेकिन फिर भी पिछले बरसों में भारत की अदालतों ने सरकारी कुर्सियों पर बैठे हुए बड़े-बड़े ताकतवर लोगों के जुर्म से निपटने में जितना वक्त बर्बाद किया है, वह शर्मनाक है। बड़ी सरकारी कुर्सियों पर बैठे लोगों से बड़ी जिम्मेदारी की उम्मीद लोकतंत्र में की जाती है, लेकिन भारत में ऐसे लोगों ने बड़े अधिकारों के बेजा इस्तेमाल के रिकॉर्ड कायम किए हैं। और सुप्रीम कोर्ट की नाक तले, सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामलों को लेकर अगर सरकार, जांच एजेंसी, और राजनीतिक दल कानून तोडऩे में लगे हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए बहुत ही शर्मनाक और घातक बात है। 
कोयला घोटाले का पूरा सिलसिला शुरू से ही ताकतवर लोगों द्वारा सत्ता के बेजा इस्तेमाल का मामला रहा, और जनता की दौलत की इस लूटपाट में मानो सभी लोग अपने हाथ काले करने के मुकाबले में लगे हुए थे। पिछले दशकों में बांटी गई कोयला खदानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के पहले जो पाया है, उससे पता लगता है कि पूरी मनमानी से कई सरकारों ने जनता की दौलत को निजी कारोबारियों को बांटा था, और यह बात जाहिर है कि ऐसा मुफ्त में तो होता नहीं है। केन्द्र से लेकर राज्यों तक, और सरकारों से लेकर अदालतों तक, संसद और विधानसभाओं तक, ताकत की कुर्सियों पर बैठे हुए लोग लोकतंत्र को खत्म करते जब दिखते हैं, तो अकेली अदालत उनसे कहां तक निपट सकती है? और आज जाकर जब सारी कोयला खदानें रद्द होने का एक खतरा खड़ा हुआ है, तो लोग देश की अर्थव्यवस्था की दुहाई देकर सुप्रीम कोर्ट से जुर्म पर रहम की उम्मीद कर रहे हैं। लोकतंत्र इस तरह नहीं चल सकता, और यही वजह है कि देश के सबसे गरीब और शोषित आदिवासी इलाकों में लोकतंत्र के खिलाफ एक हिंसक नक्सल आंदोलन कुछ या अधिक हद तक जनसमर्थन पाता है। 
मोदी सरकार को देश में पारदर्शिता और ईमानदारी की एक नई परंपरा कायम करना चाहिए, क्योंकि उन्हीं की पार्टी का राज देश के कई राज्यों में है, और कई दूसरे राज्यों तक वह कायम हो सकता है। ऐसे में अगर दिल्ली से साफ-सुथरी सरकार का काम मिसाल बनता है, तो मजबूरी में देश की दूसरी पार्टियों को भी अपनी लूट-डकैती छोडऩी पड़ेगी। आज हिन्दुस्तानी लोकतंत्र की गंदगी को दूर करना अकेले सुप्रीम कोर्ट के बस का नहीं है, यह कुछ वैसा ही होगा कि एक फिल्टर प्लांट लगाकर पूरी गंगा की पूरी गंदगी को साफ करने की उम्मीद करना। यह सिलसिला बंद होना चाहिए, और इसके लिए फिर चाहे सत्ता पर काबिज भ्रष्ट लोगों को चीन की तरह  कड़ी सजा लागू क्यों न करनी पड़े। 

तन और मन की सेहत बनाए रखने के मायने

7 सितंबर 2014
संपादकीय

ब्रिटेन और फ्रांस के बीच इंग्लिश चैनल नाम की समुद्री खाड़ी को तैरकर पार करने का रिकॉर्ड बनाना दुनिया के तैराकों का जुनून रहा है। लेकिन कल एक नया रिकॉर्ड बना जब दक्षिण अफ्रीका के 73 बरस के एक हार्ट सर्जन ने इसे पार किया, और वे ऐसा करने वाले सबसे उम्रदराज तैराक थे। इस बात को लेकर विचारों के इस कॉलम में लिखना कुछ लोगों को अटपटा लग सकता है, लेकिन राजनीति और आतंक के मुद्दों से परे भी कई बातें जिंदगी में अहमियत रखती हैं, और इसीलिए हम इस घटना को महत्वपूर्ण मानते हुए इसे लेकर कुछ लिख रहे हैं। 
भारत दुनिया के सबसे संपन्न या सबसे विकसित देशों में से नहीं है, लेकिन यहां भी शहरी और संपन्न जिंदगी से उपजने वाली बीमारियों से करोड़ों लोग तकलीफ में हैं। बहुत से लोगों को डायबिटीज बढ़ते चल रहा है, कुर्सियां तोडऩे वाले काम लोगों को रीढ़ की हड्डी और गर्दन की तकलीफ दे रहे हैं, कारोबार और निजी जिंदगी के तनाव लोगों को उच्च रक्तचाप दे रहे हैं, और खानपान की गड़बड़ी से लोगों के दिल की धमनियां तंग होते चल रही हैं, और एंजियोप्लास्टी या बाईपास के मामले बढ़ते चल रहे हैं। वजन बढऩे से घुटनों पर जोर बढ़ रहा है, और लोगों को घुटने बदलवाने के महंगे ऑपरेशन करवाने पड़ रहे हैं। और यह सब उस देश में हो रहा है जहां इलाज की हजारों बरस पुरानी आयुर्वेदिक शैली लोगों के इलाज के बजाय उनकी सेहत के बचाव पर अधिक ध्यान देती थी, जिस देश में योग से तन, और प्राणायाम से मन के सेहतमंद रहने का काम होता था। 
आज लोग अपनी सेहत के लिए वक्त नहीं निकालते हैं, और यह कहते और सोचते हैं कि वे वक्त नहीं निकाल पा रहे हैं। दरअसल सेहत को बचाए रखने के लिए जो वक्त निकाला जाता है, अपने तन-मन पर जितना वक्त खर्च किया जाता है, वह बुढ़ापे या बीमारी में तन-मन पर बर्बाद होने वाले वक्त के मुकाबले बहुत कम होता है। लोगों को अपने आपको सेहतमंद रखकर न सिर्फ बीमारियों के खतरों को टालना चाहिए, बल्कि सेहतमंद इंसान भी रोज की जिंदगी में अधिक उत्पादक भी होते हैं। और तन या मन से बीमार या कमजोर इंसान अपने आसपास के लोगों पर भी नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। इसलिए इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि तन-मन की सेहत के लिए चौकन्ना लोग अपने आसपास के लोगों को भी प्रेरणा देते हैं, और उनका पूरा परिवार, उनके आसपास के लोग भी फायदा पाते हैं। जिस तरह दुनिया में लोग एक-दूसरे से बुरी आदतें सीखते हैं, उसी तरह लोग एक-दूसरे से अच्छी बातें भी सीखते हैं। 
अधिक उम्र में भी लोग इस तरह सेहतमंद रहते हैं कि 73 बरस की उम्र में ऐसे रिकॉर्ड कायम करते हैं। इस बात से हिन्दुस्तान की शहरी और संपन्न नौजवान पीढ़ी को भी नसीहत लेनी चाहिए।