भारत और पाकिस्तान एक खाई सा फर्क

1 सितंबर 14
संपादकीय
आधी-पौन सदी पहले अलग हुए और दो देश बने भारत और पाकिस्तान की हालत आज देखने लायक है। भारत में जहां लगातार चुनावों से सरकारें बनती आईं, और इमरजेंसी के कुछ महीनों को छोड़कर लोकतंत्र लगातार जारी है, वहीं पाकिस्तान एक बार फिर तबाही की कगार पर पहुंचे दिख रहा है। पाकिस्तान का लोकतंत्र इतना अधिक तनाव झेल रहा है, कि कुछ लोगों को लग रहा है कि एक बार फिर यह देश फौज के हवाले हो सकता है, या हो जाना चाहिए। 
हम अभी पाकिस्तान की राजनीति की बारीकियों में नहीं जा रहे, लेकिन जो हालात वहां की राजधानी की सड़कों पर हैं, वे पूरी दुनिया में लोकतंत्र के हिमायती लोगों के बीच बड़ी फिक्र खड़ी कर रहे हैं। यह इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है कि पाकिस्तान के लोकतंत्र में फौज की दखल, वहां के संविधान में उसकी जिम्मेदारी, और उसके अधिकारों से कहीं अधिक रहते आई है, और इसीलिए कई बार लंबे-लंबे दौर तक फौजी तानाशाही वहां पर लोकतंत्र को खत्म करके आई है। आज पाकिस्तान में फौज अकेले ही सत्ता पाने के लिए बेसब्र नहीं है, वहां पर पिछले चुनावों को फर्जी करार देते हुए विपक्ष के दो बड़े नेता उठ खड़े हुए हैं कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को हटाने के बाद ही वे राजधानी की सड़कें छोड़ेंगे। वहां सरकार विरोधी प्रदर्शन लगातार उग्र होते जाने की वजह से सरकार को फौज को बुलाना पड़ा है, और फौज के लिए भी यह एक मुनासिब मौका आते जा रहा है कि वह लोकतंत्र नाकामयाब होने की बात कहते हुए देश को बचाने के लिए खुद सरकार सम्हाल ले। हालांकि आज की हालत में हम इस बात के लिए कोई अटकल लगाना नहीं चाहते, और हम यह चाहते हैं कि ऐसी नौबत न आए। लेकिन पाकिस्तान में पिछले दशकों में जिस तरह सत्ता का भ्रष्टाचार देखा है, जिस तरह सत्ता में कुनबापरस्ती देखी है, उसके चलते वहां लोकतंत्र कमजोर हुआ है। लेकिन हिन्दुस्तान के साथ पाकिस्तान के आज के हालात का मुकाबला करके देखें, तो लगता है कि पिछले दस बरसों में हिन्दुस्तान में सरकार ने जिस तरह की साख खोई थी, उसके खिलाफ लड़कर मोदी की सरकार इसलिए बनी कि भारत मेंं लोकतंत्र की जड़ें मजबूत थीं, लोगों के पास चुनाव में किसी को चुनने का मौका हासिल था, और हिन्दुस्तान में अरविंद केजरीवाल नाम का आदमी भी ऐसा कोई आंदोलन नहीं छेड़ सकता, जो कि चुनी हुई सरकार को हटने के लिए बेबस करना चाहता हो, जैसा कि आज पाकिस्तान में हो रहा है। 
जब किसी देश में लोकतंत्र का सिलसिला ही कमजोर हो जाता है, जब लोगों के पास साफ-सुथरे चुनाव में मर्जी से वोट देने की गुंजाइश नहीं रहती है, जब किसी देश में फौज की राजनीतिक हसरतों की लंबी परंपरा रहती है, जब किसी देश में कट्टरपंथी आतंकियों का दखल बहुत बढ़ा हुआ रहता है, जब किसी देश में अमरीका के रहमोकरम पर जिंदा रहने की बेबसी रहती है, तब उस देश में वही नौबत आने का खतरा रहता है, जो कि आज वहां पर है। हमने बात की शुरुआत भारत और पाकिस्तान की तुलना से की थी। भारत में प्रधानमंत्री मोदी आज सौ दिन पूरे करते हुए जापान के दौरे पर हैं, और ऐसी खबरें हैं कि उन्हें बहुत अहमियत मिल रही है। दूसरी तरफ पाकिस्तान से अपना घर सम्हाले नहीं सम्हल रहा है। लेकिन यह बात हिन्दुस्तान के लिए कम फिक्र की नहीं है, क्योंकि पाकिस्तान में जब-जब अस्थिरता आती है, जब-जब वहां लोकतंत्र कमजोर होता है, तब-तब भारत के पास वहां बातचीत करने के लिए लोकतांत्रिक ताकतें कम रह जाती हैं। पाकिस्तान की अंदरुनी राजनीति में कोई आए, या जाए, हिन्दुस्तान के लिए यही अच्छा होगा कि वहां की ताकतें मजबूत लोकतांत्रिक हों, और सरकारें कार्यकाल पूरा करें। 

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