शादियों के बाद धोखा उजागर होने से बेहतर पहले शपथपत्र

10 सितंबर 2014
संपादकीय
उत्तरप्रदेश में कल एक महिला की शिकायत पर उसके पति को गिरफ्तार किया गया क्योंकि उसने मुस्लिम होते हुए अपना धर्म छुपाकर अपने को हिंदू बताते हुए हिंदू लड़की से शादी की थी। बाद में इस लड़की को पति के धर्म का पता लगा और उसने यह रिपोर्ट लिखाई।
हम जानते हैं कि आज हम एक तनावपूर्ण माहौल के बीच इस मुद्दे पर लिख रहे हैं। उत्तरप्रदेश के चुनाव में इस किस्म की शादियों को एक बड़ा मुद्दा बनाकर, इनके लिए लव-जेहाद जैसा शब्द उछालकर भाजपा एक आक्रामक तरीके से चुनाव अभियान चला रही है। दूसरी तरफ कल ही गुजरात से यह खबर आई कि वहां मोदीराज में दबे-दबे चलने वाले आक्रामक हिंदुत्व वाले संगठन विश्व हिंदू परिषद ने भारी भड़काऊ पर्चे छपवाकर बंटवाए हैं। ऐसे माहौल में इस नाजुक मुद्दे पर लिखना एक खतरनाक बात है, लेकिन हम यहां से बात शुरू करके एक दूसरे तर्कसंगत सिरे की तरफ ले जाना चाहते हैं, और किसी भी तरह दो जातियों के बीच शादी, दो धर्मों के बीच शादी का विरोध नहीं कर रहे हैं। बल्कि इसी पखवाड़े हमने इसी जगह यह भी लिखा था कि ऐसी शादियों के बाद इनके कामयाब न होने पर दकियानूसी लोग इनको एक बड़ी मिसाल बताकर ऐसी और शादियों का विरोध करते हैं, इसलिए ऐसे जोड़ों को, उनके परिवारों को, और उनके समाज को अधिक सावधान रहना चाहिए। 
लेकिन अभी एक मुद्दा यह उठा रहा है कि धर्म छुपाकर कुछ लोगों ने शादियां कर लीं, एक मुद्दा दक्षिण भारत में उठा कि क्या शादी के पहले जोड़ों को दाम्पत्य जीवन की कुछ शारीरिक जरूरतों के लिए मेडिकल जांच करवाना जरूरी किया जाए? एक मुद्दा यह भी उठता है कि लोग अपने बारे में गलत जानकारी देकर, जीवनसाथी को धोखे में रखकर शादी कर लेते हैं, और पहले से अगर वे शादीशुदा हैं, तो भी वे अपने को अकेला बताकर दूसरी शादी कर लेते हैं। 
ऐसी बहुत सी दिक्कतों का एक इलाज यह हो सकता है कि भारत में अनिवार्य किए गए शादी के रजिस्ट्रेशन का काम शादी के पहले पूरा किया जाए, और उसमें दोनों पक्षों के लिए यह जरूरी किया जाए कि वे हलफनामा देकर अपनी उम्र, अपनी पढ़ाई, अपनी वैवाहिक स्थिति, अपने धर्म की जानकारी दें। इसके साथ-साथ हमारी राय तो यह भी है कि दूल्हा-दुल्हन दोनों की मेडिकल जांच भी अनिवार्य रूप से होनी चाहिए ताकि एचआईवी, सिकसेल एनीमिया जैसी कई बीमारियों और खतरों के बारे में शादी के पहले ही बात एक-दूसरे को पता लग सके। 
समाज में शादी के बाद तनाव बढऩा ठीक नहीं है। और बहुत से मामलों में तो बाद के तनाव को रोका भी नहीं जा सकता। लेकिन समझदार समाज में इतना तो हो सकता है कि जिन बातों की जांच-परख शादी के पहले होना मुमकिन है, उनको पहले जांच लिया जाए। ऐसा करना आगे तनाव के खतरों को कम करना होगा। पश्चिम के बहुत से विकसित देशों में लोग शादी के पहले एक कानूनी अनुबंध भी करते हैं, जिसमें शादीशुदा जिंदगी के बाद की बातों से लेकर, शादी के पहले की हकीकत तक, बहुत सी बातों को जोड़कर एक-दूसरे की जानकारी में रखा जाता है। ऐसा अनुबंध न सही, लेकिन सच्चाई को उजागर करने वाला शपथपत्र जरूरी करने में हमको कोई बुराई नहीं दिखती है और उससे समाज और अदालतों पर बाद में पडऩे वाले गैरजरूरी बोझ से बचा जा सकेगा।





कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें