कश्मीर से निकले सबक

14 सितंबर 2014
संपादकीय
भारत के जम्मू-कश्मीर में बाढ़ के बाद राहत और बचाव को लेकर राज्य सरकार देश और दुनिया के निशाने पर है। हर कोई यही कह और लिख रहा है कि वहां जो मदद हो पाई, वह सेना ने की है, या केन्द्र सरकार के भेजे हुए दूसरे राष्ट्रीय बचाव दलों ने की है। लोग इस नौबत को लेकर वहां के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का मखौल उड़ा रहे हैं, वहां की जनता मुख्यमंत्री को कोस रही है, और मीडिया का भी मोटे तौर पर यही रूख है। लेकिन ऐसी नौबत में केन्द्र और राज्य सरकारों की जिम्मेदारियों और उनके काम को लेकर बारीकी से कुछ समझने की जरूरत है। 
कश्मीर में बाढ़ से इतना बड़ा नुकसान हो सकता है, इसका अंदाज कुछ पर्यावरणवादियों को तो था, राज्य सरकार को भी इसका कुछ अंदाज था, और उसने 22 हजार करोड़ की एक योजना बरसों पहले केन्द्र सरकार को भेजी थी कि किस तरह कश्मीर की नदियों में पट चुकी गाद को हटाने की जरूरत है। लगातार पेड़ कटने, या निर्माण होने की वजह से पहाड़ों की मिट्टी कट-कटकर बहकर नदियों में पहुंचती है, और उन नदियों की पानी बहाकर ले जाने, या ढोने की क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में किसी भी प्रदेश की यह ताकत नहीं होती कि इतनी बड़ी लागत वाली योजना वह केन्द्र की मदद के बिना खुद लागू कर सके। लेकिन कश्मीर में आज के हालात सिर्फ राज्य सरकार की इस योजना से जुड़े हुए नहीं हैं। यह जाहिर है कि किसी मुसीबत के वक्त के लिए राज्य सरकार की बचाव की तैयारी में कमी भी थी। कश्मीर हिमालय पर्वतमाला के पास का ऐसा राज्य है जहां कई किस्म की प्राकृतिक विपदाएं पहले भी आती रही हैं, और ऐसी नौबत में बचाव और राहत के लिए बेहतर तैयारी रहनी चाहिए। इस बारे में कुछ हफ्तों बाद ही बात करना बेहतर होगा क्योंकि आज तो वहां सरकार का अमला खुद ही बाढ़ से घिरा हुआ छतों पर बैठा हुआ था, मुख्यमंत्री अपने ही 90 फीसदी मंत्रियों से फोन पर बात नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि फोन और बिजली, सड़क और रास्ते सभी बंद थे। 
लेकिन जो लोग यह सोच रहे हैं कि कश्मीर में जो कुछ मदद पहुंची है, और जितनी जिंदगियां भी बचाई जा सकी हैं, वे सिर्फ केन्द्र की मोदी सरकार के किए हुए हुई हैं, वह सोचना सही नहीं है। भारत के संघीय ढांचे में केन्द्र सरकार के अधिकार राज्यों से मिले हुए ही रहते हैं, और राज्यों की कई किस्म की जिम्मेदारियां भी केन्द्र की ही रहती हैं। कहीं पर हिंसा फैली हो, या बाढ़-भूकंप हो, पूरे देश में भारतीय सेना जाकर पहले भी काम करते आई है, और युद्ध से परे सेना की ऐसी कुछ जिम्मेदारियां रखी भी गई हैं। भारत की सेना का खर्च राज्यों की कमाई से ही होकर आता है, क्योंकि राज्यों से परे केन्द्र का अपने आपमें कोई अस्तित्व नहीं है। इसलिए सेना ने कश्मीर में जो शानदार काम किया है, वह सेना की जिम्मेदारियों में शामिल है, केन्द्र सरकार की जिम्मेदारियों में शामिल है। भारत के संघीय ढांचे की यह एक बुनियादी बात है कि केन्द्र सरकार के हाथ में जो साधन और सुविधाएं हैं, उनका इस्तेमाल अलग-अलग वक्त पर राज्यों की अलग-अलग जरूरतों को पूरा करने के लिए किया जाता है। अगर हर राज्य के लिए हर मुसीबत के वक्त बचाव का ऐसा ढांचा स्थायी रूप से बनाकर रखा जाएगा, तो वह राज्यों या केन्द्र की जेब से ही बनेगा, और वह लागत लोगों को भूखा मारकर ही जुटाई जा सकेगी। 
कश्मीर की यह बाढ़ भारत को कुछ किस्म के सबक दे रही है। एक तो यह कि राज्यों को बचाव का अपना ढांचा खड़ा करना चाहिए, जो कम लागत का हो, लेकिन मुसीबत के वक्त काम आ सके। दूसरी बात यह कि केन्द्र सरकार को भी राज्यों के ऐसे आपदा प्रबंधन को जांचना-परखना चाहिए, क्योंकि आखिर में जाकर बोझ या जिम्मेदारी केन्द्र सरकार पर ही आती है। तीसरी बात यह कि पर्यावरण के जिन खतरों की तरफ से लोग आगाह करते हैं, उन चेतावनियों को भी परखना चाहिए, तौलना चाहिए। हम यह कहना नहीं चाहते कि 22 हजार करोड़ की लागत से कश्मीर की नदियों से गाद निकालने का काम कर लिया जाना चाहिए था, क्योंकि पर्यावरण की आशंकाओं और खतरों से निपटने के लिए देश-प्रदेश की क्षमताओं को भी देखना होता है। हर खतरे की हर आशंका से बचाव की पूरी तैयारी शायद दुनिया के सबसे संपन्न देशों के लिए भी मुमकिन नहीं होती। लेकिन फिर भी पर्यावरणवादी जो कहते हैं, उन्हें समय के पहले मिली हुई एक चेतावनी मानकर उसे जांचना जरूर चाहिए। आज की इस नौबत में हम एक अकेली राज्य सरकार को कोसना नहीं चाहते, और केन्द्र सरकार जो कर रही है, वह उसकी जिम्मेदारी है। लेकिन इस बीच भी बाकी राज्यों को अपने-अपने घर सम्हालने चाहिए।

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