मोदी के विभाजित व्यक्तित्व से उबरने की जरूरत...

15 सितंबर 2014
संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कामकाज के सौ दिन हो चुके हैं, और आए दिन उनके काम के तौर-तरीकों को लेकर खबरें आती हैं, कि वे कितनी मेहनत करते हैं, और अपने साथियों से कितनी मेहनत की उम्मीद भी करते हैं। अपने खुद के शब्दों में वे एक हेडमास्टर की तरह लोगों से खूब काम लेते भी हैं। उनकी सरकार मीडिया के साथ भारतीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के रिश्तों की परंपरा को ताक पर रखकर काम पर ध्यान दे रही है, और मीडिया हाशिए पर बैठा हुआ सोच रहा है कि उसकी यह बदहाली कब तक रहेगी। कल तक देश के जो चुनिंदा अखबारनवीस और मीडिया मालिक प्रधानमंत्री के विदेश प्रवास पर उनके विशेष विमान में कुछ मिनटों के सवाल-जवाब, और बाकी वक्त के शराब-कबाब का मजा लेते आए थे, उनके आज प्रधानमंत्री के विमान में कोई जगह नहीं रह गई है। लेकिन इन बातों को लेकर हम आज यहां चर्चा नहीं कर रहे, चर्चा का मुद्दा एक दूसरे किस्म का फर्क है, जो कि प्रधानमंत्री मोदी, और भाजपा के सबसे ताकतवर नेता मोदी के बीच के फर्क का है, और यह फर्क खाई सा दिख रहा है। 
मनोविज्ञान में एक स्थिति रहती है जिसे कि विभाजित-व्यक्तित्व (स्पिलिट पर्सनेलिटी) कहा जाता है, नरेन्द्र मोदी के भीतर आज वैसे ही दो व्यक्तित्व दिख रहे हैं। एक है, जो कि लालकिले से आजादी की सालगिरह पर खुद होकर कहता है कि देश के लोग दस बरस के लिए साम्प्रदायिकता की बात न करें, और देश को आगे बढ़ाने में लग जाएं। साम्प्रदायिकता पर दस बरस का युद्धविराम मांगने वाला प्रधानमंत्री पिछले सौ से अधिक दिनों में अपनी पार्टी और अपने विचारधारा वाले संगठनों के नेताओं के भड़काऊ, हिंसक, और साम्प्रदायिक बयानों पर अगर मुंह भी नहीं खोल रहा, तो यह दो बिल्कुल अलग-अलग भूमिकाएं हैं। एक तरफ प्रधानमंत्री की हैसियत से नरेन्द्र मोदी साख कमाने में लगे हैं, और दूसरी तरफ उनकी पार्टी के मंत्री-नेता, उनके हमख्याल संगठनों के नेता देश की एकता को खाक में मिलाने में लगे हैं। ऐसा तो हो नहीं सकता कि प्रधानमंत्री देश और दुनिया के सरकारी कामकाज में इस कदर मशगूल हैं कि वे अपने साथियों की फैलाई जा रही जुबानी हिंसा को देख भी नहीं पा रहे, सुन भी नहीं पा रहे। 
एक के बाद एक भाजपा मंत्री, भाजपा सांसद, भाजपा के बड़े-बड़े नेता जिस तरह के सार्वजनिक बयान दे रहे हैं, भड़काऊ शब्दावली को गढ़ रहे हैं, और चुनाव में पार्टी के नारों में उनका इस्तेमाल कर रहे हैं, वह भयानक है। मोदी के मंत्रियों की कही बातें देश की एकता को चूर-चूर करने की ओर बढ़ रही हैं, कई मंत्री अवैज्ञानिक और तर्कहीन निष्कर्ष सामने रख रहे हैं, मेनका गांधी यह कह रही है कि जानवरों के गोश्त के कारोबार की कमाई देश के खिलाफ आतंकियों को दी जा रही है। देश की महिला और बाल विकास मंत्री बिना किसी खुफिया रिपोर्ट, बिना किसी सरकारी रिपोर्ट के ऐसी बात कह रही हैं, और देश से मांस के निर्यात पर रोक लगाने की मांग कर रही हैं। खुद मोदी सरकार के ढांचे में ऐसी कोई बात अगर कही भी जानी है तो यह बात महिला बाल विकास मंत्री के दायरे से परे की है। 
महीनों से चली आ रही इस तरह की सार्वजनिक बयानबाजी से देश के अल्पसंख्यक तबकों, और धर्मनिरपेक्ष लोगों के बीच भारी फिक्र है कि यह देश को किस तरफ ले जाया जा रहा है। और ऐसे में तनाव फैलाने वाले नेताओं के सबसे बड़े मुखिया, नरेन्द्र मोदी इस पर कुछ उसी तरह चुप हैं, जिस तरह पिछली सरकार में भ्रष्टाचार पर मनमोहन सिंह चुप थे, तो उसके क्या मतलब निकाले जाएं? नरेन्द्र मोदी क्या अपनी खुद की एक शानदार तस्वीर बनवाते हुए बाकी कामों के लिए अपनी पार्टी और सरकार के बाकी लोगों को खुला छोड़कर चल रहे हैं? उनको यह बात याद रखनी होगी कि जिस तरह मनमोहन सिंह को अनदेखी और चुप्पी का हक नहीं दिया गया, और आज इतिहास से लेकर अदालत तक, सीएजी की रिपोर्ट, किताब, और इंटरव्यू तक यह चुप्पी कटघरे में है, उसी तरह अपने साथियों के हिंसक बयानों पर मोदी की चुप्पी कल के इतिहास के कटघरे में रहेगी।
हम नरेन्द्र मोदी की एक व्यक्ति के रूप में फिक्र नहीं कर रहे, अपनी फिक्र के लिए वे पर्याप्त सक्षम और समझदार हैं। हमें फिक्र है भारतीय लोकतंत्र की, जिसमें लंबे अरसे बाद कोई प्रधानमंत्री इतना अधिक काम करता और करवाता दिख रहा है, लेकिन वह अपने मंत्रियों, साथियों, और संगठनों के आक्रामक रूख को पूरी तरह अनदेखा भी कर रहा है। यह एक खतरनाक नौबत है, और अगर यह नरेन्द्र मोदी की सोची-समझी रणनीति है, तो भी यह लोकतंत्र के लिए घातक है। और अगर यह उनकी सोची-समझी नीति नहीं है, तो लोकतंत्र में ऐसी अनदेखी का हक प्रधानमंत्री को नहीं मिल सकता। उनके भीतर के इन दो व्यक्तित्वों को यह तय करना होगा कि उनमें से असली कौन है, और कौन सरकार और सत्ता के प्रति जवाबदेह है, और कौन अपने साथियों के प्रति।

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