घूरे पर चकाचौंध

17 सितंबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर इन दिनों बड़े अजीब से दौर से गुजर रही है। दुनिया के शायद दर्जन भर देशों के क्रिकेट खिलाड़ी यहां पर एक टूर्नामेंट के लिए आए हुए हैं, और प्रदेश का सबसे बड़ा स्टेडियम जगमग है। दूसरी तरफ शहर का एक दूसरा स्टेडियम कौन बनेगा करोड़पति की तैयारी में लगा हुआ है, और राजधानी के लोग क्रिकेट सितारों को देखकर हटे भी नहीं होंगे, कि यहां से केबीसी का जीवंत प्रसारण होगा। शहर के अलग-अलग हिस्से बाहर से आए हुए ऐसे सितारा मेहमानों की खातिरदारी में सजे हुए हैं, और बड़ी होटलों, यहां के मॉल्स, और यहां के स्टेडियम बड़ी मेहनत और खर्च से इस मौके पर अपने को अच्छा दिखा रहे हैं। 
लेकिन दूसरी तरफ पिछले कई महीनों से छत्तीसगढ़ की यह राजधानी कचरे से लदती चली जा रही है, और यहां के म्युनिसिपल ने राज्य सरकार के मातहत जिस तरह का एक ठेका एक निजी कंपनी को दिया था, उसके खिलाफ आज कांग्रेस और भाजपा दोनों के निर्वाचित पार्षद खड़े हैं, मंत्री खड़े हैं, विधायक खड़े हैं, और सांसद भी खड़े हैं। अब यह समझ नहीं आ रहा है कि म्युनिसिपल की निर्वाचित कांग्रेसी महापौर से लेकर, वहां पर भाजपा के पार्षदों के बहुमत तक, और राज्य सरकार के अफसरों और मंत्रियों तक, इनमें से किस पर इस ठेके की जिम्मेदारी जा रही है, और शहर किस तरह इस कचरे से उबर सकता है? सैकड़ों करोड़ खर्च करके भी अगर इस एक शहर का कचरा न म्युनिसिपल खुद के कर्मचारियों से उठा पाया, और न ही ठेका देकर इसकी सफाई हो पाई, तो आखिर इस घूरे के लिए जिम्मेदार कौन है? पूरे शहर में गंदगी का आलम ऐसा है कि मेहमानों के लिए होने वाली साज-सज्जा और बहुत बुरी तरह खटक रही है, और लोगों को लग रहा है कि क्या सिर्फ बड़े आयोजनों के लिए ही, सिर्फ उन्हीं जगहों पर, सिर्फ उन्हीं मौकों पर यह शहर साफ हो सकेगा? पिछले महीनों में कई तरह की बीमारियां शहर में फैलीं, पिछला एक बरस बहुत सी पीलिया मौतों का गवाह रहा, और मौतों से नीचे के दर्जे की बीमारियों से यहां के दसियों हजार लोग अस्पताल पहुंचे। 
अब राजधानी के सरकारी अस्पतालों की बदहाली के किस्से अखबारों में उसी तादाद में भरे हुए हैं, जिस तादाद में शहर में कचरा लदा हुआ है। सफाई के लिए जिम्मेदार जो नेता और अफसर हैं, उनकी गाडिय़ों में शीशे चढ़े रहते हैं, और गंदगी की बदबू वहां तक नहीं जाती। लेकिन जिन आम लोगों को ऐसी गंदगी के आसपास जीना पड़ता है, उसी के करीब से गुजरना पड़ता है, वे लोग जानते हैं कि हालत कितनी भयानक है, और सेहत के लिए किस कदर खतरनाक है। दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों में हालत इतनी खराब है कि मन में यह सवाल उठता है कि अगर राजधानी के सरकारी मेडिकल कॉलेज के सबसे बड़े अस्पताल का हाल इतना खराब है, तो गांव-जंगल में सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों का क्या हाल होगा? 
इस प्रदेश में बड़े जलसों की चकाचौंध, और अखबारी सुर्खियों के साथ-साथ जमीनी हकीकत पर भी सरकार को ध्यान देने की जरूरत है, और सत्तारूढ़ पार्टी को यह समझकर भी चौकन्ना हो जाना चाहिए कि कुछ महीनों के भीतर पंचायत और म्युनिसिपलों के चुनाव होने जा रहे हैं। एक तरफ तो पूरा प्रदेश ऐसे गरीबों को सड़कों पर देख रहा है, जिनके राशन कार्ड खारिज कर दिए गए हैं। और इसके अलावा रायपुर जैसा पूरे का पूरा शहर घूरा बना हुआ है। ऐसी गंदगी के लिए म्युनिसिपल और राज्य शासन में बैठे हुए नेताओं और अफसरों को नींद कैसे आती है, यह सोच पाना भी मुश्किल है। राज्य के जिम्मेदार लोगों के लिए यह नौबत तुरंत जागकर काम करने की है, वरना दीवारों पर लिखी एक बात सबको याद रखनी चाहिए- चिट्टी को तार समझना, नहीं तो बीमार को पार समझना। 

1 टिप्पणी:

  1. सुनील जी रायपुर में सफाई व्यवस्था की बदहाली अब बर्दाश्त के बाहर हो रही है सफाई के पैसों में कमीशन खोरी घोटाले और मनमानी करने वाले भ्रष्ट नेता और नौकरशाहों ने आम जनता का जीना दूभर कर दिया है

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