हे मां, हेमा...

18 सितंबर 2014
संपादकीय
शास्त्रीय नृत्य से हिंदी फिल्मों तक का खूबसूरत सफर करने वाली अभिनेत्री हेमा मालिनी भाजपा की तरफ से संसद में हैं। वे पहले भी पढ़ी-लिखी थीं, और मुंबई जैसे महानगर में उन्होंने एक लंबी जिंदगी गुजारी है। इसके अलावा यह बात भी जाहिर है कि वे महिला और राजनीति के नाते वे सार्वजनिक जीवन में हैं। ऐसे में अगर वे खुद होकर कोई बात कहती हैं, तो वे उसे लेकर किसी रियायत की हकदार नहीं रहतीं, और उनके शब्द और उनकी भावना आलोचना के लिए खुले रहते हैं। ऐसे में उन्होंने अभी वृंदावन में बसी हुई ऐसी महिलाओं के बारे में बहुत ही ओछी और घटिया बात कही है जो कि अपने पति खोने के बाद भारतीय समाज-व्यवस्था में विधवा कहलाते हुए वृंदावन के आश्रमों में मौत का इंतजार करती हैं, और जिन्हें दुनिया के मीडिया में बहुत दर्द और तकलीफ के साथ वृंदावन-विडो कहा जाता है। 
खबरों के मुताबिक हेमा मालिनी ने अभी कहा कि बिहार और बंगाल की विधवाओं को अपने-अपने राज्यों में ही रहना चाहिए, और वृंदावन में आकर भीड़ नहीं लगानी चाहिए। मथुरा लोकसभा सीट से भाजपा सांसद हेमा मालिनी ने कहा, वृंदावन में बसी विधवाओं के पास बैंक बैलेंस, अच्छी आय और अन्य सुविधाएं हैं, लेकिन उन्हें भीख मांगने की आदत पड़ गई है। उत्तर प्रदेश के वृंदावन में हजारों विधवाएं बसी हुई हैं। पैंसठ वर्षीय हेमा मालिनी ने यह टिप्पणी अपने संसदीय क्षेत्र मथुरा के दौरे में कही, और वृंदावन भी मथुरा जिले का ही हिस्सा है। हेमा मालिनी के कैमरों पर कहे गए बयान में उन्होंने कहा था, वृंदावन में 40,000 विधवाएं हैं... मुझे लगता है, शहर में और जगह नहीं है... एक बड़ी तादाद बंगाल से आ रही है... यह सही नहीं है... वे बंगाल में ही क्यों नहीं रुकी रहतीं...? वहां भी अच्छे मंदिर हैं... यही बात बिहार पर भी लागू होती है। बुरी हालत में मौजूद एक आश्रय स्थल का दौरा करने के बाद हेमा मालिनी ने कहा कि वह इस बारे में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बात करेंगी।
हेमा मालिनी अपनी तमाम खूबसूरती के बावजूद उम्रदराज हैं, और हिंदू समाज में इतनी लंबी जिंदगी गुजारने के बाद उनको इस धर्म के तहत महिलाओं की हालत के बारे में जरूर अंदाज होगा। कोई महिला अपनी मर्जी से पति नहीं खोती, और कोई महिला विधवा कहलाना नहीं चाहती। यह तो भारत की पुरूषप्रधान हिंसक समाज-व्यवस्था है कि मर्द अपने से खासी कम उम्र की लड़कियों से शादी करते हैं, और जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय महिला की औसत उम्र भारतीय पुरूष से तीन-चार बरस अधिक है। नतीजा यह होता है कि आंकड़ों के मुताबिक किसी महिला को ही जिंदगी के आखिरी बरस अकेले रहना पड़ता है। और भारतीय समाज में चाहे हिंदू औरत हो, चाहे मुस्लिम शाहबानो, किसी को कोई इंसानी हक तो मिलते नहीं हैं, और हालत यह रहती है कि पति खो चुकी महिला अमूमन सफेद कपड़ों में, किसी भी तरह की साज-सज्जा से दूर, साधारण खान-पान से भी दूर, घर और समाज के खुशी के मौकों से दूर, जायदाद पर हक से दूर, दबी-कुचली और बिना हक के रह जाती है। नतीजा यह होता है कि उसे घर से निकालकर बाकी परिवार राहत की सांस लेता है, या ऐसी महिलाएं दूसरी अपने जैसी महिलाओं के बीच अधिक बराबरी का इंसानी हक पाती हैं। विधवा कही जाने वाली दूसरी महिलाओं के बीच रहकर वे सामाजिक उपेक्षा और प्रताडऩा से परे बची जिंदगी अपने उस तबके में बराबरी के दर्जे के साथ गुजारती हैं। 
ऐसे में भाजपा की सांसद एक महिला अपने चुनाव क्षेत्र में धार्मिक और सामाजिक वजहों से शरण पाकर मौत का इंतजार करने वाली ऐसी तकलीफजदा महिलाओं के खिलाफ ऐसी हिंसक बात करती है, तो ऐसी हेमा मालिनी की इंसानी समझ पर भी हमें तरस आता है, और उनकी पार्टी को भी यह सोचना चाहिए कि क्या वह कल तक राजस्थान में जिस सती प्रथा का समर्थन करती थी, क्या आज 21वीं सदी में भी वह महिलाओं के खिलाफ वैसी ही हिंसक बनी रहना चाहती है? और अगर वह ऐसा चाहती है, तो फिर कल्पना चावला के अंतरिक्ष में जाने पर उसे फख्र करने का क्या हक रहेगा? 
राजनीतिक दलों को अपने साक्षर और पढ़े-लिखे नेताओं को इंसानियत सिखाने का एक ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाना चाहिए, ताकि हेमा मालिनी जैसी स्वप्नसुंदरी का चांद सा चेहरा दांत बाहर निकले हुए ड्रैकुला के खून सने चेहरे जैसा न लगे। हम ऐसी समाज-व्यवस्था और ऐसी सोच दोनों को लेकर शर्मिंदा हैं, कि यह उसी देश में है, जहां पर कि हम बसे हुए हैं। आखिरी में हम यह भी याद दिलाना चाहेंगे कि जिस इलाके से हेमा मालिनी चुनाव लड़कर जीती हैं, और उसके बाद ऐसी हिंसक बात कह रही हैं, उसी इलाके से ऐसी अनगिनत खबरें और तस्वीरें पिछले एक-दो बरस में निकलकर सामने आई हैं कि सुलभ शौचालयों के संस्थापक बिंदेश्वरी पाठक ने किस तरह इन महिलाओं के लिए होली का आयोजन किया, और उन्हें अपने घर एक बार जाने-आने के लिए हवाई टिकटों का इंतजाम भी किया। राजनीति से परे का एक सामाजिक मुखिया इस तरह के समाज सुधार की पहल कर रहा है, और अरबपति महिला सांसद इस किस्म की दकियानूसी, और हिंसक बातें कर रही है।

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