अजित सिंह जनता के पैसों से जिंदगी भर का श्राद्ध चाहते हैं

19 सितंबर 2014
संपादकीय

दिल्ली में एक पिछले केंद्रीय मंत्री अजित सिंह के सरकारी बंगले को खाली कराने को लेकर उनके प्रभाव क्षेत्र वाले इलाके में सड़कों पर हिंसक प्रदर्शन हुआ है। उत्तरप्रदेश के जिस हिस्से से चौधरी चरण सिंह केंद्र सरकार में पहुंचे थे, वहां से उनके बाद उनके बेटे अजित सिंह केंद्रीय मंत्री बने, और अब उनके बेटे जयंत भी राजनीति में आ चुके हैं। कुर्सी पर न रहने पर बंगला खाली कराने के लिए तमाम नोटिसों के बाद अब जाकर केंद्र सरकार ने दिल्ली में बंगले का बिजली-पानी काटा, तो उत्तरप्रदेश में अजित सिंह समर्थकों ने दिल्ली की तरफ आने वाले पानी की नहर काट दी। अब अजित सिंह, उनके बेटे, और उनके समर्थक इस बात को एक मुद्दा बना रहे हैं कि इस बंगले को चौधरी चरण सिंह की याद में एक स्मारक बनाया जाए। 
लोकतंत्र और सभ्य सार्वजनिक जीवन में यह एक शर्मनाक नौबत होती है जब किसी गुजर चुके नेता या प्रमुख व्यक्ति के नाम का झंडा-डंडा लेकर चलने वाले महज उनके कुनबे के लोग रह जाते हैं। आज परिवार के लोगों के अलावा चौधरी चरण सिंह का कहां पर कोई नाम लेवा रह गया है? परिवार के लोगों के जो राजनीतिक साथी और कार्यकर्ता हैं, उनको चौधरी चरण सिंह की भावनाओं से जुड़ा हुआ बताकर उनके हिंसक प्रदर्शन को बंगले पर कब्जे के लिए इस्तेमाल करने का यह शर्मनाक रूख भारतीय राजनीति में ही देखने मिलता है। और अजित सिंह के पास यह मिसाल भी है कि दिल्ली में एक सरकारी बंगला बाबू जगजीवन राम के स्मारक के लिए दे दिया गया है, और एक सरकारी बंगला कांशीराम की याद में दे दिया गया है, तो फिर चौधरी चरण सिंह की याद में क्यों नहीं? 
यह बहुत ही घटिया सोच है कि किसी की याद को जिंदा रखने के लिए उसका कुनबा सरकारी अनुदान मांगे, सार्वजनिक दान मांगे, और गुजर चुके इंसान की सोच को आगे बढ़ाने के बजाय जनता की संपत्ति पर कब्जे को आगे बढ़ाए। सार्वजनिक जीवन में बहुत से लोग ऐसे रहते हैं जो अपने कुनबे की यादों को महान साबित करने के फेर में अपनी पूरी जिंदगी निकाल देते हैं। हकीकत यह है कि ऐसी हरकतों से महानता कीजायज बुनियाद भी अगर रहती है, तो वह खत्म हो जाती है। लोकतंत्र में जिंदा और मुर्दा कुनबापरस्ती, हिंदुओं में श्राद्धपक्ष और बाकी धर्मों में उनके रिवाज के मुताबिक ही होनी चाहिए, जनता के पैसों से ऐसी हरकत बहुत ही नाजायज है।
आज एक और जगह पर कुछ इसी तरह की मांग उठ रही है कि डॉ. बी.आर. अंबेडकर लंदन में जिस घर में रहे उसे भारत सरकार खरीदकर उनका स्मारक बनाए। हो सकता है कि महाराष्ट्र के सामने खड़े हुए चुनावों को देखते हुए महाराष्ट्र के राजनीति दल ऐसे किसी दबाव में भी आ जाएं, और चुनावी घोषणापत्र में ऐसा कोई वायदा कर दें। लेकिन मुंबई की ही एक तस्वीर चार दिन पहले आई है कि वहां पर जिस मकान में अंबेडकर बरसों रहे, और जिस दौर में उन्होंने रहते हुए ऐतिहासिक काम किए, वह मकान आज बुरी बदहाली झेल रहा है, और उसे स्मारक बनाने की बात के बजाय, लंदन के मकान को खरीदकर स्मारक बनाने की मांग की जा रही है।
किसी भी सरकारी मकान को ऐसा कोई भी स्मारक बनाने के लिए देने के खिलाफ जनता में से किसी को सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए, और इस सिलसिले पर रोक लगाने के लिए एक स्पष्ट आदेश मांगना चाहिए। अजित सिंह और उनके समर्थकों को शर्म आनी चाहिए कि जनता की संपत्ति पर उनकी इस तरह की नीयत है, और उसे पूरा करने के लिए वे सड़कों पर हिंसा करवा रहे हैं। भारत की राजनीति में कुनबापरस्ती का यह भी एक नुकसान है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग जिंदा रहने तक संसद और विधानसभाओं की सीटों पर काबिज रहते हैं, और अब मर जाने पर भी उनकी स्मृतियां सरकारी बंगलों पर अवैध कब्जा बनाए रहती हैं। इस सोच को धिक्कारना चाहिए, सार्वजनिक मीडिया में इसके खिलाफ लिखना चाहिए। अजित सिंह जनता के पैसों से जिंदगी भर का श्राद्ध चाहते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें