इसरो को सलाम

23 सितंबर 2014
संपादकीय

भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो की कामयाबी देखने लायक है। वैसे तो यह बात हमको कल सुबह मंगलयान की कामयाबी दर्ज हो जाने के बाद लिखनी चाहिए, लेकिन हम अब तक मंगलयान के सफर को अपने-आपमें एक बड़ी कामयाबी मानते हुए उस पर लिख रहे हैं, बिना यह राह देखे कि कल सुबह वह मंगल की जमीन पर ठीक से उतरकर अपना काम कर पाएगा या नहीं। पिछले करीब एक बरस का लगातार का सफर इस मंगलयान ने जितनी बारीकी से कामयाब किया है, वह कामयाबी अपने-आपमें आज ही बधाई देने के लायक है।
दो-तीन बरसों की मेहनत में जिस तरह इसरो ने कुल मिलाकर साढ़े चार सौ करोड़ रूपयों से यह पूरा अभियान तैयार किया, और धरती से लाखों मील दूर तक यह यान पूरी कामयाबी से सफर कर चुका है, वह देखने लायक है। खासकर एक ऐसे देश में जो कि सरहदों के लिए तोप से ताबूत तक की खरीदी में भ्रष्टाचार से घिरा हुआ हो, जहां पर उत्कृष्टता की सोच हिंदुस्तानियों के दिल-दिमाग में आमतौर पर हो ही नहीं, वहां पर एक पूरी तरह से सरकारी संस्थान, पूरी तरह से सरकारी अभियान को इतनी बारीक बखूबी से पूरा कर रहा है, यह अपने-आपमें हैरतअंगेज है। लोगों को याद होगा कि इसी इसरो ने पिछले बरसों में लगातार दुनिया के सबसे विकसित देशों के उपग्रह भी कामयाबी के साथ अपने रॉकेट पर ढोकर अंतरिक्ष में पहुंचाए हैं, और उनसे कमाई भी की है। ऐसे में आज जब यह देश फिजूल की फूहड़ बातों, और भड़काऊ-उकसाऊ साम्प्रदायिक बातों में घिरा हुआ है, तो एक संस्थान जाकर उस मंगल ग्रह पर अपने पैर रख रहा है, जिस मंगल ग्रह का असर गिनाकर भारत में ज्योतिषी लड़के-लड़कियों की शादी में अडंगा खड़ा करते हैं। अब मंगलयान के पांवतले आने के बाद इस ग्रह का असर लोगों की कुंडलियों पर कैसा होगा, यह देखना मजेदार होगा।
इस मुद्दे पर आज हम इसलिए लिख रहे हैं कि हिंदुस्तानियों को, जो जहां जिस काम को कर रहे हैं, उस काम में उत्कृष्टता की तरफ बढऩे की बहुत जरूरत है। जब लोगों को अपने काम में क्वालिटी की परवाह नहीं रह जाती, तब दुनिया में उनकी जरूरत घटती जाती है, और सामानों से लेकर सेवा तक, उससे कमाई की गुंजाइश भी खत्म होती जाती है। आज जब एक-एक सामान के अलग-अलग हिस्से दर्जन भर देशों में बनते हैं, और कोई तेरहवां देश उसकी मार्केटिंग करता है, तो ऐसे में जो देश, जहां के लोग क्वालिटी के लिए लापरवाह रहेंगे, वैसे देश और लोग मंगल ग्रह तो दूर रहा, खुद अपने शहर के बाजार में भी नहीं पहुंच पाएंगे, वहां भी दूसरे देश से आया सामान बिकेगा, दूसरे देश-प्रदेश से आए कारीगर काम करेंगे।
सौ फीसदी हिंदुस्तानी हाथों और हुनर से काम करते इसरो की मिसाल से देश के हर किसी को कुछ न कुछ सीखने और नसीहत लेने की जरूरत है। न हिंदुस्तानी कामगार कमजोर हैं, न यहां के सामान कमजोर हैं। यहां कि कल्पना कुछ घंटों में मंगल पर पांव धरने वाली है, और दुनिया के सबसे अव्वल आधा दर्जन देशों में से भारत को एक बनाने का यह काम इस एक संस्थान ने किया है। लेकिन इससे सीखकर देश के हर पढऩे-लिखने वाले, हर काम करने वाले अपने-आप को बेहतर बना सकते हैं, अपने काम में सुधार ला सकते हैं, और आसमान को छू सकते हैं, उसे चीरकर दूसरे ग्रहों तक जा सकते हैं। 

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