यह कामयाबी सिर्फ पुरूषार्थ की नहीं, महिला वैज्ञानिक भी हैं...

24 सितंबर 2014
संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज सुबह से इसरो में मंगलयान की कामयाबी को देखते हुए वैज्ञानिकों को बधाई दी और कहा कि यह इसरो का पुरूषार्थ है जिसने इस यान को मंगल तक पहुंचा दिया। वहां मौजूद अधिकतर वैज्ञानिक दक्षिण भारतीय थे, और उनमें से बहुतों को हिन्दी वाला हिस्सा कम समझ आया होगा, और खुशी और उत्तेजना के उस मौके पर लोगों का ध्यान भाषा पर गया भी नहीं होगा। इसरो की जो तस्वीरें अभी हमारे कम्प्यूटर पर दिख रही हैं उनमें दर्जन भर से अधिक महिला वैज्ञानिक भी शामिल हैं, जो रंग-बिरंगी सिल्क साडिय़ों में वहां पर खुशियां मना रही हैं। जाहिर है कि उस नियंत्रण कक्ष के भीतर कोई छोटे-मोटे कर्मचारी तो रहे भी नहीं होंगे, और इसरो की फेहरिस्त में बहुत सी महिला वैज्ञानिकों के नाम हैं। चूंकि इसरो की कामयाबी पर हम कल ही इस जगह लिख चुके हैं, इसलिए आज उस कामयाबी से परे के मुद्दे पर लिख रहे हैं, और यह सफाई देना इसलिए जरूरी है कि कोई यह न समझे कि कामयाबी के बजाय भाषा पर क्यों लिखा जा रहा है। 
भारत में बोलचाल में बहादुरी और कामयाबी के किसी भी काम को पुरूषार्थ कहने का चलन है। हिन्दी के शब्दकोष देखें तो उनमें भी पुरूषार्थ को ही मानव की सफलता करार दे दिया गया है, और जो हिन्दी भाषा एक पुरूषप्रधान समाज के दबदबे तले उपजी है, फली-फूली है, उससे लैंगिक समानता की उम्मीद की भी नहीं जा सकती। हम प्रधानमंत्री मोदी के एक शब्द को लेकर इसलिए लिख रहे हैं, क्योंकि आज का उनका पूरा भाषण हमने ध्यान से सुना है। और शिक्षक दिवस के मौके पर देश भर के बच्चों से उनकी बातचीत को भी हमने ध्यान से सुना था। उस दिन उन्होंने बच्चों के विकल्प के रूप में लगातार बालकों का इस्तेमाल किया था, और एक बार भी उन्होंने बच्चों के विकल्प के रूप में बालिका शब्द नहीं कहा था। बालिकाओं का जिक्र उन्होंने सिर्फ शौचालय के संदर्भ में शायद किया था। वे अकेले ऐसे नहीं हैं, और भारत में प्रमुख महिलाओं में भी अधिकतर का यही हाल है कि उनकी भाषा में लड़की या महिला की जगह आमतौर पर गायब रहती है। राजनीतिक दलों की महिलाएं प्रदर्शन करने जाती हैं, तो किसी को कमजोर और नालायक साबित करने के लिए उसे चूडिय़ां भेंट करती हैं, मानो कि चूड़ी पहनने वाली महिलाएं कमजोर और नालायक ही होती हैं। 
प्रधानमंत्री मोदी को अपनी भाषा में लड़कियों और महिलाओं को जगह देनी होगी, वरना उनके नीचे के तमाम अफसर-कर्मचारी, मंत्री-नेता बराबरी की भाषा न बोल पाएंगे, और न ही बराबरी का बर्ताव कर पाएंगे। भाषा की राजनीति किसी चूक से पैदा नहीं हुई है, सदियों से चली आ रही बेइंसाफी से इस भाषा को सोच-समझकर ऐसा बनाया गया कि बचपन से ही बच्चों को लड़कियों और महिलाओं को लड़कों और आदमियों से कमजोर समझाया गया। भारत की हिन्दी में शादी के कार्ड में दूल्हे के नाम के साथ तो चिरंजीवी लिखा रहता है, ताकि वह चिरकाल तक जीवित रहे, लेकिन दुल्हन के नाम के साथ सौभाग्यकांक्षिणी लिखा जाता है, मतलब यह कि वह सौभाग्य की आकांक्षा करती रहे, अपने सुहाग की आकांक्षा करती रहे, और पति से पहले गुजर जाए। 
भारत में अदालतों से लेकर आयोगों तक, और संसद से लेकर मीडिया तक, हर कहीं भाषा की गैरबराबरी को खत्म करने की जरूरत है। हम प्रधानमंत्री की भाषा को लेकर इसलिए लिख रहे हैं कि वे काफी मौकों पर काफी बोलते हैं, उन्हें काफी लोग सुनते हैं, और उनकी कही बातों पर खासी चर्चा और बहस होती है। हमने उनकी भाषा में इस गैरबराबरी के बारे में कहीं सुना नहीं है, कहीं पढ़ा नहीं है, और ऐसा इसलिए है कि सार्वजनिक जीवन के प्रमुख लोगों से लेकर मीडिया की महिलाओं तक को भाषा में गैरबराबरी में कोई बेइंसाफी नहीं दिखती। सदियों से दबी हुई सोच बराबरी की कल्पना भी नहीं कर पाती। लेकिन अब लोगों को इस बेइंसाफी को खत्म करना चाहिए, और प्रधानमंत्री को यह चर्चा छेड़कर भाषा को न्यायसंगत, बराबरी वाली बनाना चाहिए।

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