मोदी की तूफानी विदेश नीति तीस दिन, तीन महाशक्तियां

26 सितंबर 2014
संपादकीय
भारत का मीडिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अमरीका प्रवास को लेकर एक किस्म से झाग उगल रहा है। वह इतनी सारी जानकारी, इतने-इतने खुलासे से बता रहा है, कि मानो वह किसी क्रिकेट मैच में चीयरलीडर बन गया है, और मोदी के हर चौके-छक्के पर नाच रहा है। मोदी के कपड़े-लत्ते से लेकर, अमरीका में उनको लेकर भारतवंशियों की तैयारियों की छोटी-छोटी बातों तक, मीडिया हर बात को शायद इसलिए भी अतिरिक्त उत्साह से बता रहा है कि पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने विदेश प्रवास पर भारतीय मीडिया को साथ ले जाना बंद कर दिया है, और सिर्फ सरकारी मीडिया को प्रधानमंत्री के शाकाहारी, बिना शराब वाले विमान में जगह मिल रही है। फिर भी भारतीय मीडिया ने अपने खर्च से अपने लोगों को अमरीका भेजा है और वे मोदी के सौ घंटों के अमरीका प्रवास पर सौ-सौ घंटे का प्रसारण तो हर चैनल पर कर ही लेंगे। लेकिन भारतीय मीडिया की सबसे बड़ी ज्यादती एक किसी टीवी चैनल का गढ़ा हुआ यह नारा है- नरेन्द्र से नरेन्द्र तक। जिन लोगों को यह बात समझ न आ रही हो उन्हें शिकागो की धर्मसभा में स्वामी विवेकानंद (नरेन्द्र) के दिए हुए ऐतिहासिक भाषण को याद करना होगा। नरेन्द्र से नरेन्द्र तक! शब्दों में यह बात मोदी की तारीफ जरूर करती है, लेकिन एक ऐसा पैमाना मोदी के सामने खड़ा करती है, जिसे कि मोदी खुद भी पसंद नहीं करेंगे। 
अब भारतीय मीडिया के उत्साह से परे अगर कुछ बात की जाए, तो यह हैरान करने वाली बात है कि केंद्र सरकार में एक भी दिन काम का जिसका अनुभव न रहा हो, वह आदमी तीस दिनों के भीतर दुनिया की तीन महाशक्तियों से बात करने जा रहा है। जापान और चीन के बाद अब अमरीका से नरेन्द्र मोदी की बातचीत, हिंदुस्तान के इतिहास की शायद सबसे तेज रफ्तार विदेश नीति होगी। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के वक्त यह बात खटकती थी कि आज के जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मोदी बिना तजुर्बे के इस देश को दुनिया के बीच कहां खड़ा कर पाएंगे। लेकिन उन्होंने अपने शपथग्रहण में सार्क के सारे देशों को बुलाकर, और उसके बाद लगातार पड़ोसी देशों से लेकर जापान और चीन जैसे दो परस्पर विरोधियों से लंबी बातें कीं, और अब अमरीका की बारी है। 
इन तमाम अंतरराष्ट्रीय दौरों और वार्ताओं को लेकर हम अभी कामयाबी और नाकामयाबी के पैमाने नहीं निकाल रहे, लेकिन विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी ने जिस रफ्तार से, जिस गर्मजोशी और आत्मविश्वास से काम शुरू किया है, वह गुजरात के कल के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के आज के व्यक्तित्व का एक बिल्कुल नया पहलू है, और दुनिया इसे बड़ी उत्सुकता से, और गौर से देख रही है। मोदी का अमरीका प्रवास अभी शुरू हो ही रहा है, और वहां की सरकार से बातचीत के अलावा मोदी वहां बसे हुए भारतवंशियों से भी लंबी बात करने जा रहे हैं, और वहां बड़ी उत्सुकता से उनका इंतजार हो रहा है। प्रवासी भारतीयों के बीच वे, और भारतीय जनता पार्टी पहले से सबसे लोकप्रिय पार्टी रहे हैं, और अपनी पार्टी और खुद के उदार कारोबार के नजरिए के चलते वे ऐसे भारतवंशियों के बीच लोकप्रियता के हकदार भी हैं। 
मोदी की अमरीका के राष्ट्रपति से, और वहां की सरकार से बातचीत सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगी, और भारत की दिलचस्पी के, खासकर उसकी फिक्र के, बाकी देशों तक यह बातचीत बिखरेगी। ऐसे में अमरीकी सरकार से मोदी किस तरह कुछ हासिल करके आते हैं, यह बात मायने रखेगी। आज की भारत की बहुत जटिल अंतरराष्ट्रीय स्थिति यह है कि अमरीका अरब दुनिया में मुस्लिम आतंकी संगठनों के खिलाफ बरसों से फौजी कार्रवाई कर रहा है, और वह भारत से इसमें समर्थन चाहेगा। दूसरी तरफ भारत के कामगारों के हित, भारत के पेट्रोलियम-हित, तो अरब देशों से जुड़े हुए हैं ही, भारत दुनिया में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला देश भी है। ऐसे में भारत की अमरीका से आर्थिक उम्मीदें, और अमरीका की भारत से सैनिक उम्मीदें, किस तरह और कहां तक साथ-साथ चल सकेंगी, यह आने वाले बरस बताएंगे। फिलहाल यह पिछली आधी सदी में भारत के किसी प्रधानमंत्री की सबसे चर्चित अमरीका यात्रा है।

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