अम्मा और अम्मा

27 सितंबर 2014
संपादकीय
दक्षिण भारत से अभी दो खबरें आ रही हैं, कर्नाटक की एक जेल में बनाई गई एक विशेष अदालत किसी भी पल यह फैसला सुनाने जा रही है कि तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता के खिलाफ 18 बरस पहले शुरू हुए अनुपातहीन सम्पत्ति के भ्रष्ट आचरण वाले मामले में वे कुसूरवार हैं, या बेकसूर हैं। दूसरी खबर जो खबरों में कम आएगी वह यह है कि दक्षिण की एक आध्यात्मिक महिला, माता अमृतानंदमयी ने कश्मीर के बाढ़ पीडि़तों के लिए अपने आश्रम की तरफ से 25 करोड़ रूपए की सहायता राशि दी है। आज उनका 61वां जन्मदिन भी था, और इस समारोह में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी पहुंचे हुए थे। 
ये दो खबरें दक्षिण की ही दो महिलाओं को लेकर है। और पुरानी खबरों में झांकने पर यह पता लगता है कि माता अमृतानंदमयी ने उत्तराखंड में पिछले बरस हुई तबाही के बाद 50 करोड़ रूपए दान दिए थे। साथ-साथ यह भी पढऩा दिलचस्प है कि किस तरह जयललिता के ऊपर मुख्यमंत्री रहते हुए सौ-पचास करोड़ रूपए के भ्रष्टाचार का मामला अभी अदालत में तय हो रहा है, और किस तरह वे पिछले 18 बरसों से चल रहे इस मुकदमे के दौरान सत्ता की राजनीति में हैं, बरसों से सत्ता में हैं। यह भी देखने की बात है कि तमिलनाडू में जयललिता के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई नहीं हो सकती थी, इसलिए उनके असर और दबदबे को देखते हुए पड़ोस के कर्नाटक में एक जेल में विशेष अदालत बनाई गई, और उस पर इसी सुनवाई पर करोड़ों रूपए खर्च हुए। 
इन्हीं दो महिलाओं को लेकर यह बात भी एक जैसी है कि दोनों को उनके भक्तजन अम्मा कहते हैं, और जयललिता को किसी ने किसी को गले लिपटाते नहीं देखा, उनकी पार्टी के बुजुर्ग भी उनके पैरों पर दंडवत ही दिखते हैं, दूसरी तरफ माता अमृतानंदमयी हर किसी को गले लगाकर, लिपटाकर उनको अपना प्रेम और आशीर्वाद देती हैं। कुछ लोगों को यह बात अटपटी भी लग सकती है कि हम दो बिल्कुल ही अलग-अलग किस्म की महिलाओं को एक साथ यहां पर लिख रहे हैं, और यह बात  इन दोनों में से जो महिला विवादहीन और भली है, उसके लिए अपमान की है। लेकिन हमारा मानना है कि दो अलग-अलग किस्म के लोगों को एक साथ देखने पर ही अच्छे लोग और अधिक अच्छे दिखते हैं, और बुरे लोग और अधिक बुरे दिखते हैं। और यह मामला आज एक साथ एक दिन, एक ही वक्त आने से हम इस सामाजिक विरोधाभास को अनदेखा भी नहीं कर पा रहे हैं। 
जयललिता के बारे में लिखना अधिक आसान है, क्योंकि भ्रष्टाचार के मामले अनगिनत नेताओं पर चलते आए हैं, और ऐसे मामलों के चलते हुए भी वे अपनी कुर्सियों पर जमे हुए शायद और अधिक भ्रष्टाचार करते भी रहे हैं। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र रबर के एक ऐसे सामान जैसा है जिसे जितना चाहें खींचा जा सकता है। ऐसे में इस देश में लालू यादव से लेकर जयललिता तक, और येद्दियुरप्पा से लेकर चौटालाओं तक, हर किसी को देश की आखिरी अदालत से फैसला आने तक जनता की अदालत में जाने का हक, और उस हक का इस्तेमाल कैसा होता है, यह आज की एक तीसरी खबर में है। हरियाणा के भूतपूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला भ्रष्टाचार के मामले में जेल में सजा काट रहे हैं, और इलाज के नाम पर जेल से बाहर निकलकर अस्पताल में हैं। अभी अदालत यह देखकर हक्का-बक्का रह गई कि अस्पताल के नाम पर जमानत पाने वाले चौटाला हरियाणा में आमसभा के मंच पर हैं। और उनकी जगह कोई गरीब होता तो जेल के अस्पताल में, या बाहर सरकारी अस्पताल मेें मर चुका होता। 
ऐसे देश में नेताओं के खिलाफ हिकारत और नफरत इतनी बढ़ चुकी है कि सरकार को साफ-सुथरा चलाने की नरेन्द्र मोदी से उम्मीद के चलते देश की जनता ने उन्हें एक ऐतिहासिक बहुमत दिया। आने वाला वक्त बताएगा कि मोदी की सरकार ईमानदार रहती है, या बेईमान हो जाती है, लेकिन आज जयललिता का मामला देश की जनता को राजनीतिक भ्रष्टाचार के विकराल आकार के बारे में सोचने को बेबस कर रहा है। 

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