जयललिता की सजा से लोकतंत्र को नसीहत

28 सितंबर 2014
संपादकीय
तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता को कल एक विशेष अदालत द्वारा अठारह बरस चली कार्रवाई के बाद सुनाई गई सजा को अगर कोई भारतीय लोकतंत्र की जीत माने, तो यह बहुत बड़ी चूक होगी। एक पूरी पीढ़ी तो इस केस के चलते निकल गई, और उसके पहले एक पीढ़ी तक जयललिता का भ्रष्टाचार चला होगा। ऐसे में अगर भारत का लोकतंत्र किसी भ्रष्ट नेता को पहली अदालत से सजा दिलवाने में एक पीढ़ी लगाता है तो अभी तो जयललिता के सामने आगे के कानूनी विकल्प खुले हुए हैं और जाहिर है कि जिसकी इतनी बड़ी काली दौलत अदालत में साबित हुई है, उसके पास आगे कानूनी लड़ाई लडऩे के लिए और जाने कितनी ही दौलत बची हुई होगी। और यह लगता है कि जयललिता के महंगे वकील उनको शायद जेल से निकलवा भी लें, और शायद ऊपर की किसी अदालत से उनको राहत भी दिलवा दें। ऐसे में लोकतंत्र में इंसाफ का यह सिलसिला पूरी तरह पाखंड साबित होगा, और आज जो लोग पहली अदालत से जयललिता की सजा पर खुश हो रहे हैं उनको याद रखना चाहिए कि बड़े लोगों की सजा लंबे वक्त तक जारी रहने की भारत में कोई परंपरा नहीं रही है।
पिछले कुछ समय से केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट का रूख यह दिख रहा है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रहे मामलों को तेजी से निपटाया जाना चाहिए। अदालतों में इस बारे में तैयारी भी शुरू हो गई है, और जिन नेताओं को यह मालूम है कि वे मुजरिम हैं, वे बेचैन भी हैं। लेकिन यह देश तब तक नहीं सुधर पाएगा, जब तक भ्रष्ट नेताओं का कुर्सियों पर बने रहना जारी रहेगा। लोकतंत्र इस कदर लचीला है कि वह ऐसी तमाम रियायत, संदेह के आधार पर छूट हर किसी को देते चलता है, और ऐसे में जनता का खजाना इन लोगों के हाथ में रहता है, जांच करने वाली पुलिस ऐसे लोगों को सलाम करती है, और लोकतंत्र की भावना के साथ खुला सामूहिक बलात्कार होता है। इसलिए आज जब देश के कुछ और मुख्यमंत्री रहे हुए लोग अदालतों में भ्रष्टाचार के मामले झेल रहे हैं, कुछ और लोग केंद्रीय मंत्री रहते हुए भ्रष्टाचार के मामलों में कटघरों में खड़े हैं, तो राजनीतिक दलों को या तो खुद होकर ऐसी एक आचार संहिता बनानी होगी कि ऐसे लोग सरकार की किसी कुर्सी में न रहें, ये लोग संसद और विधानसभाओं में न रहें, और न ही पार्टी संगठनों के किसी पद पर रहें। जनता के वोटों से जो पार्टियां चलती हैं, उनको अपने-आप को सुधारना चाहिए, अपने मुजरिमों को किसी भी तरह की कुर्सियों से दूर रखना चाहिए, और अगर ऐसा नहीं होता है तो हम उम्मीद करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग लोकतंत्र के शब्दों और लोकतंत्र की भावना को देखते हुए ऐसा कोई रास्ता निकालें, जिस पर चलने से अभियुक्तों और आरोपियों को रोका जा सके। 
जयललिता भारतीय राजनीति में एक ऐसे परिवारवाद का प्रतीक भी हैं जो कि लालू यादव से लेकर मुलायम यादव तक, और गांधी-नेहरू से लेकर चौटाला-बादल तक, अब्दुल्ला से लेकर मायावती से होते हुए अनगिनत दूसरे कुनबों तक फैला हुआ है। एक तो कुनबापरस्ती, फिर भ्रष्टाचार, और फिर एक व्यक्ति की मनमानी वाले राज की पार्टियां। लोकतंत्र का कत्ल करने के लिए और क्या चाहिए? अगर अदालत और चुनाव आयोग भी कुछ नहीं सुधार सकते हैं, तो जनता को खुद होकर जगह-जगह इसे खारिज करना होगा। भ्रष्टाचार भ्रष्ट लोगों को मजबूत बनाता है, उन्हें दानवी ताकत देता है, और ईमानदार लोगों को खोखला बना देता है। लोकतंत्र ऐसी नौबत में कभी जिंदा नहीं रह सकता।

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