बच्चों के बीच मोदी एक कामयाब पहल

6 सितंबर 2014
संपादकीय
देश में कल पहली बार एक प्रधानमंत्री ने करोड़ों बच्चों से रूबरू बात की। टीवी पर नरेन्द्र मोदी जिस बेतकल्लुफी से बच्चों से बात कर रहे थे, वह देखने लायक था। और यह पूरा कार्यक्रम निपट जाने के बाद लगा कि इसके साथ जुड़ी हुई दो बातों से जो असहमति सामने आई है, उनसे बचा जा सकता था, और बचा जाना चाहिए था। अपनी कामयाबी के सैलाब पर सफर करते हुए नरेन्द्र मोदी से जो चूक हुई उसकी बात पहले कर लें, तो फिर आगे कल बच्चों से बातचीत के बारे में आगे लिखना आसान रहेगा। कड़वी बात यह है कि देश के संघीय ढांचे को अनदेखा करते हुए केंद्र सरकार ने देश की तमाम सरकारी और निजी स्कूलों के लिए यह आदेश निकाला था कि हर हाल में मोदी के बच्चों से बातचीत के इस प्रसारण के लिए टीवी का इंतजाम किया जाए। ऐसा करते हुए समझदारी बिल्कुल नहीं दिखाई गई, और दोपहर के बाद शाम तक यह कार्यक्रम रखा गया, जिसे कि दिन के शुरू के घंटों में रखा जाना चाहिए था। दूसरी बात यह कि ऐसी कोई भी बात राज्यों और स्कूलों के लिए अनिवार्य नहीं करनी थी, और मीडिया से बुरी तरह घिर जाने पर मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने यह गलतबयानी भी की कि यह राज्यों और स्कूलों की मर्जी पर है न कि किसी के लिए अनिवार्य। जबकि इस प्रसारण में हिस्सेदारी अनिवार्य करने के लिए लिखित आदेश स्मृति ईरानी के मंत्रालय ने ही जारी किए थे। दूसरी अटपटी बात यह रही कि इस बातचीत के लिए शिक्षक दिवस को चुना गया, बजाय बालदिवस के, या किसी और दिन के। देश में शिक्षकों से जुड़े हुए मुद्दे बहुत भयानक हैं, और कल हमने इसी जगह उनमें से कुछ मुद्दों पर लिखा भी है। ऐसे में प्रधानमंत्री के पास अगर शिक्षक दिवस पर कुछ घंटे का वक्त था, तो इसी तैयारी के तहत वे देश के शिक्षकों से बात कर सकते थे, जो कि अधिक प्रासंगिक होती, और शिक्षक दिवस का अधिक सम्मान भी हुआ होता।
लेकिन इन दो बातों से परे अब हम कल की बातचीत पर आते हैं, जो कि हर मायने में अभूतपूर्व थी, और मीडिया या विपक्षी दल चाहे इसे एक राजनीतिक काम कहें, हम नरेन्द्र मोदी को राजनीति करने की किसी भी तोहमत से बरी करते हैं। मोदी ने जितनी भी बातें कीं, उनमें से कोई भी बात न तो भाजपा का एजेंडा थी, न ही उनकी बातों में पिछली सरकारों की कोई आलोचना थी, और न ही मोदी ने कोई भी अवांछित, अप्रिय, या विवादास्पद बात कही। अगर उन्होंने बच्चों को गीता पर लिखी गई किताब इस मौके पर दी, तो वह किताब भी डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की लिखी हुई थी, जिनके नाम पर शिक्षक दिवस इस दिन मनाया जाता है। इसलिए उस किताब को भी हिंदू एजेंडा करार देना गलत होगा।
कल के इस पूरे प्रसारण को देखना एक सुखद अनुभव था कि प्रधानमंत्री किस तरह बच्चों के सरल या सहज सवालों के जवाब देते हुए उन्हें छोटी-छोटी नसीहतें भी दे सकता है, और प्रधानमंत्री बच्चों के लिए इस तरह इतना समय निकाल सकता है। नरेन्द्र मोदी अगर देश भर के दसियों करोड़ बच्चों के बीच सफाई, बिजली बचाने, कुदरत का सम्मान करने, अपने हुनर को बढ़ाने के लिए बच्चों के ही अंदाज में कई नसीहतें देते हैं, तो वह स्कूलों के एक दिन का उत्पादक उपयोग ही रहा।  प्रधानमंत्रियों से इस देश के बच्चे ऐसी कोई उम्मीद नहीं करते थे कि वे उनके बीच आकर इस तरह की बातें करने का समय निकाल सकते हैं, और ऐसी बातें कर सकते हैं। हम इसे एक अच्छा सिलसिला मानते हैं, और मोदी को देश भर के अलग-अलग तबकों से इस तरह की बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहिए, और प्रधानमंत्री की बातचीत को सिर्फ लालकिले तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
हम इस बात को अधिक अहमियत नहीं देते कि स्कूलों में दौड़-भाग करके इंतजाम करने पड़े। ऐसी सभी दौड़-भाग असल जिंदगी में सीखने के मौके लेकर आती है, और अगर लोग कहीं से टीवी मांगकर भी लेकर आए, तो उसमें कोई बुराई नहीं है। केंद्र सरकार में जब यह योजना बनी, तो उसमें कुछ बातों का ध्यान रख लिया जाता, तो कल आलोचना की कोई गुंजाइश नहीं बचती। लेकिन उस चूक के साथ भी हम कल की इस बातचीत को सकारात्मक और उत्पादक मानते हैं। इस एक चूक की वजह से मोदी को तानाशाह कहना, और राज्यों या स्कूलों के लोकतांत्रिक अधिकारों का कुचला जाना कहना सही नहीं है। ऐसी आलोचना अनुपातहीन और अन्यायपूर्ण रहेगी, खासकर कल के इस गैरराजनीतिक और सहज प्रसारण को देखने के बाद।

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