मेक इन इंडिया की सोच और हकीकत

25 सितंबर 2014
संपादकीय
अमरीका रवाना होने के ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ हफ्ते पहले अपने ही उछाले अपने नारे पर बने एक राष्ट्रीय अभियान की शुरूआत की, और कहा कि भारत में चीजों को बनाने का मेक इन अभियान चलाने की जरूरत है। उनकी यह बात इस हिसाब से ठीक है कि भारत में इतनी बड़ी आबादी है कि अगर वह हुनरमंद हो, और छोटे-बड़े कारखाने लगें, उनमें क्वालिटी का ध्यान रखा जाए, तो भारत दुनिया के बाजार में मुकाबले में खड़ा हो सकता है। लेकिन आज हकीकत यह है कि भारत में सामानों और इंसानों द्वारा दी जाने वाली सेवा, इन दोनों में क्वालिटी का कोई ठिकाना नहीं है, और देश के बाहर तो दूर रहा, देश के भीतर भी बहुत कम ब्रांड ऐसे हैं जिन पर कि लोग पूरा भरोसा करते हैं। 
लेकिन हम अक्सर यह बात लिखते हैं कि जिंदगी में उत्कृष्टता की तरफ बढ़े बिना और कोई रास्ता नहीं है। अभी इसरो की कामयाबी पर लिखे संपादकीय में भी इसी जगह दो दिन पहले हमने इसरो को उसकी तकनीकी उत्कृष्टता के लिए बधाई दी थी, और यह उम्मीद भी जताई थी कि हिंदुस्तान में हर कोई उससे पे्ररणा लेंगे। अब दो-तीन दिनों के भीतर ही नरेन्द्र मोदी ने मेक इन इंडिया नाम की अंतरिक्ष छूती हुई एक दूसरी उम्मीद सामने रखी है, और इसे हासिल करना कारखानों के अलावा राष्ट्रीय सोच पर भी निर्भर करेगा, और हिंदुस्तानियों की महत्वाकांक्षा पर भी। आज देश में स्कूल-कॉलेज के बच्चों से लेकर, बेरोजगारों और कामगारों तक एक अजीब सी निराशा दिखती है, और भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ लोगों के मन में भड़ास दिखती है। 
इस देश में सरकारी खरीद एक बुरा नाम है, और घटिया सामान के लिए आम जुबान में यह कहा जाता है कि यह गवर्नमेंट सप्लाई के लिए बना दिखता है। देश की सबसे बड़ी अकेली खरीददार, सरकार जब भ्रष्टाचार के चलते घटिया सामानों के बनाने के मुकाबले को बढ़ावा देती है, तो वह घटियापन गैरसरकारी खरीददारों तक भी पहुंच जाता है। दूसरी तरफ ग्राहकों के हक की हिफाजत के लिए बने कानूनों पर कोई अमल इस देश में नहीं होता, और लोग कम्पनियों और दुकानदारों पर मुश्किल से भरोसा कर पाते हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम के तहत भी लोगों को तरह-तरह के हुनर सिखाने का काम बहुत फर्जी तरीके से चल रहा है, और कागजी खानापूरी अधिक हो रही है। इसके अलावा आईटीआई या पॉलिटेकनिक जैसे प्रशिक्षण संस्थानों से निकले हुए लोगों के पास भी हुनर नहीं दिखता। 
ऐसे माहौल में भारत में बने हुए कामगार भी दुनिया भर में जाकर काम के बाजार में मुकाबला नहीं कर सकते, और देश के भीतर सामान बनाने में यहां के कारोबार-कारखाने दुनिया की उम्मीद की क्वालिटी नहीं पा रहे हैं। ऐसे में जो गिने-चुने ब्रांड अच्छे हैं, उनकी पूरी दुनिया में साख है और मांग है। हम नरेन्द्र मोदी के उछाले हुए इस नारे को आज की जरूरत पाते हैं, लेकिन एक भाषण से परे देश भर में उत्कृष्टता के लिए जागरूकता, और जिम्मेदारी की भावना लाना खासा मुश्किल काम होगा। लेकिन यह बात भी अपनी जगह सही है कि इसके बिना आने वाली दुनिया में न भारत की, न भारतीयों की कोई जगह बचेगी। इसलिए मेक इन इंडिया को कैसे एक हकीकत बनाया जा सकता है, इस पर केंद्र, राज्य, कारोबार, और लोगों को खुद भी सोचना होगा।

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