ईश्वर के नाम पर दान के बजाए इंसानों के लिए दान देना सीखना चाहिए

12 सितंबर 2014
संपादकीय
बाढ़ और अंधेरे में डूबे हुए जम्मू-कश्मीर की मदद को देश के कई प्रदेश आगे आए हैं, और एक छोटे राज्य छत्तीसगढ़ ने भी 10 करोड़ रूपयों का चावल भेजने का फैसला लिया है और इसके साथ-साथ 10 हजार सोलर लैंप भी भेजे जा रहे हैं। जब देश का एक हिस्सा इतनी भयानक कुदरती मार झेलता है, तो जो राज्य बेहतर हालत में हैं, उनको आगे बढ़कर मदद करनी चाहिए। लेकिन हम सरकारी मदद से परे भी इंसानी मदद की बात करना चाहते हैं कि लोगों को एक-दूसरे की मदद का आदत पडऩी चाहिए। 
भारत में अंग्रेजों के समय से यह बात चली आ रही है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में जो ईसाई चर्च भारत में आए वे वहां से कई तरह की मदद लेकर आए, और उन्होंने भारत में स्कूलें खोलीं, अस्पताल खोले,और कुष्ठ रोगियों के लिए आश्रम खोले। देश में कई जगह उन्होंने टीबी सेनेटोरियम शुरू किए। वह सिलसिला चलते रहा और ऐसे आरोप भी लगे कि चर्च से लेकर मदर टेरेसा तक तमाम लोग धर्मांतरण की नीयत से समाजसेवा करते थे, करते हैं। लेकिन नीयत चाहे जो हो, चर्च के पास दुनियाभर के देशों से जो दान आता है, वह दान दुनियाभर के ईसाई देते हैं, और उनकी दान की आदत पड़ी हुई है। ऐसे में भारत में दूसरे धर्मों के लोगों को यह देखना चाहिए कि वे अपने धर्म स्थलों को जो दान देते हैं, वह दान किस काम आता है? मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारों को जाने वाला दान अगर सबसे गरीब, सबसे जरूरतमंद के काम नहीं आता, तो फिर उनसे जुड़े हुए धर्मों की तरफ लोगों के खिंचने की वजह भी शायद नहीं बन पाती। 
लोगों को यह सोचना चाहिए कि उनका दिया हुआ दान धर्म के अपने आडंबर और अपने ढांचे पर कितना खर्च होता है, और जरूरतमंदों पर कितना। भारत में अगर समाजसेवा के लिए दान की मजबूत परंपरा होती, तो आज कश्मीर, या बीते हुए कल में असम और बिहार, इन जगहों पर मुसीबत के मारे लोगों की मदद के लिए सरकार को फिक्र नहीं करनी पड़ती, जनता से आई हुई मदद से भी बहुत सी राहत हो जाती। लेकिन भारत में अधिकतर लोगों की आदत किसी ईश्वर के नाम पर, किसी गुरू के नाम पर, किसी धर्म के काम पर दान देने की है। यह सिलसिला बदलना चाहिए। किसी धर्म से उसके मानने वालों का नाम नहीं बढ़ता। किसी धर्म के मानने वालों के काम से उस धर्म का नाम बढ़ता है। लोगों को ईश्वर के नाम पर दान देने के बजाए इंसानों के लिए दान देना सीखना चाहिए। 

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