श्वेता कट्टी: लीक से हटकर एक और पहल की वजह

संपादकीय
13 सितंबर 2014 
मुंबई के लालबत्ती इलाके कमाठीपुरा में पली और ऐसी जगहों में रहने के खतरे झेलकर बढ़ी 18 बरस की श्वेता कट्टी को राष्ट्रसंघ ने युवा साहसिकता पुरस्कार के लिए चुना है। न्यूयॉर्क के बार्ड कॉलेज में वजीफा पाकर पढऩे के लिए चुनी गई श्वेता कट्टी को इसके पहले मशहूर अमरीकी पत्रिका न्यूज़वीक दुनिया की 25 अहम महिलाओं में, मलाला युसुफजई के साथ शुमार कर चुकी है। श्वेता, और उसके जैसे कमाठीपुरा, सोनागाछी या जीबी रोड जैसे इलाकों से उबरकर कहीं पहुंचने वाले बच्चे, यौन कर्मियों के अधिकारों के लिए बोलने, और काम करने वालों के लिए एक उम्मीद है, यह मुश्किलों में जीते, और आगे बढऩे की जद्दोजहद में लगे रहते लोगों को ढांढस बंधाते हैं। लेकिन इन्हें देखकर भारत जैसे देश के सामाजिक राजनीतिक और न्यायिक कर्ताधर्ताओं की आंखें भी खुलनी चाहिए, कि अगर वह चाहे, तो इन बच्चों की हालात से जंग कुछ आसान हो सकती है। एक सामाजिक संस्था का सहारा पाकर जिंदगी में आगे बढ़ रही श्वेता ने वह तमाम खतरे झेले हंै, और उन अनुभवों से गुजरी है, जिनका उसके जैसे बच्चों को खतरा रहता है। लेकिन उसे इन खतरों से उबरकर आगे बढ़ाने का काम, दान पर चलती एक संस्था की मेहनत, और उसके हौसलों ने किया है। उसके जैसे बच्चों के हौसले कितने कमजोर हो सकते हंै, यह सोच पाना कोई मुश्किल नहीं। नेता, सरकार, और न्यायपालिका की ताकत के आगे, ऐसे हौसले जीतने के मामले जितने गिने-चुने हो सकते हंै, उतना ही गिना-चुना श्वेता का मामला भी है। लेकिन महज इस बात से उसके, और उसकी मां जैसे लोगों के अधिकारों की दलीलें कमज़ोर नहीं की जा सकतीं।
यह कितनी अजीब बात है, कि वात्स्यायन के देश में,सभ्यता संस्कृति के  लिहाज से सबसे समृद्ध माने जाते दौर में वेश्यावृत्ति और देह व्यापार समाज में एक दर्जा रखता था। आज़ादी के बाद दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र बने इस देश में इस तबके की हालत बदतर होते चली गई। इनकी मौजूदगी की हकीकत से नजर चुराते हुए, एक बीमारी की तरह इस समाज से इन्हें तरह पूरी तरह से खत्म करने के इरादे का दंभ दिखाने में देश जुट गया। सीता(सप्रेशन ऑफ इमॉरल ट्रेफिक एक्ट), और पिता (प्रिवेंशन ऑफ इमॉरल ट्रेफिक एक्ट) जैसे कानून लाए गए कि देह व्यापार और उससे जुड़ी हर बात को जुर्म ठहराकर इसे खत्म कर दिया जाए। लेकिन क्या ऐसा हो सका? आंकड़े बताते हंै कि देश में यौन कर्मियों की संख्या लगातार बढ़ी है, और एड्स नियंत्रण पर काम कर रहे संगठन के मुताबिक देश में तकरीबन 30 लाख यौन कर्मियों का पता चला है। इसके अलावा इस व्यापार में धकेले गए 12 लाख से ज्यादा बच्चे भी हैं, हालांकि इस मुद्दे पर काम कर रहे संगठनों का दावा है कि इनकी तादाद इससे कहीं ज्यादा है। सरकार ने यौन कर्म को जुर्म घोषित करके जैसे इसमें लगे या इसमें धकेल दिए गए लोगों की तरफ से अपना पल्ला ही झाड़ लिया, जैसे यह इस देश के नागरिक नहीं, इस देश के सुख संसाधनों पर इनका कोई हक नहीं। न उनकी सेहत का इंतज़ाम किया, ना उनकी सुरक्षा की सोची। जैसे यह समाज में मौजूद है ही नहीं। जबकि यह तबका देश के सबसे ज्यादा सताए गए, और शोषित तबके में से एक है। सर्वे बताते हंै कि इस पेशे में आने वाले ज्यादातर किसी मजबूरी से यह पेशा अपनाते हैं, और इसमें आने वाले 80 फीसदी अपने जान पहचान वाले ऐसे लोगों के द्वारा इसमें धकेल दिए जाते हंै, जिन पर उन्होंने भरोसा किया था। यह तो एड्स और एचआईवी के फैलने पर, सामाजिक संगठनों के दबाव में सरकार इनकी सेहत की फिक्र करने जब मजबूर हुई, और उसने इन्हें इनका काम सुरक्षित तरीके से करने देने के थोड़े बहुत कदम उठाए। लेकिन इस दौरान देश की न्यायपालिका, और खासकर सुप्रीम कोर्ट, निहायत ही दंभी रवैया दिखाते रहा। ट्रेफिक, अवैध खनन, पर्यावरण, भ्रष्टाचार के स्थानीय मुद्दों तक पर पहल लेकर सरकारों को रास्ते पर आने को मजबूर करके वाहवाही लूटने वाले सुप्रीम कोर्ट ने, समाज के इस वर्ग पर कभी कोई ऐतिहासिक हुक्म नहीं दिया। देश की सबसे बड़ी अदालत, सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करके मकान बनाने वालों का पक्ष लेती रही, भयंकर अपराध करने वालों के अधिकारों का ख्याल करके उनकी सजा कम करती रही, लेकिन उसने यौन कर्मियों के हक में कभी कोई ऐतिहासिक पहल नहीं की।
भारत के  कानून का हाल यह है कि यह  वेश्यावृत्ति को तो कानूनी मानती है, लेकिन संगठित देह व्यापार को गैर कानूनी। यानि वेश्या समाज की जरूरतों के लिए तो मौजूद रहे, लेकिन अपने अधिकारों की मांग न करने लायक संगठित न हो। सुप्रीम कोर्ट ने जब  पिछले साल अपने फैसले में केंद्र सरकार  से यह  कहा कि वह यौन कर्मियों को उनके अनुकूल परिस्थितियों में गरिमा के साथ उनका काम करने दे, तो केंद्र सरकार ने हलफनामा दायर कर कह दिया कि उसका यह  हुक्म "सीता" के खिलाफ है। सोनिया गांधी भले समलैंगिकों के प्रति सहानुभूति दिखाती रही,उनकी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने अदालत से यह तक कहा कि वह अपनी बनाई हुई समिति से वेश्याओं के हक में काम करने वाली संस्थाओं के  नुमाइंदों को भी हटा दे, क्योंकि इससे वेश्यावृत्ति विरोधी कानून कमजोर पड़ेगा। यानि यौन कर्मी सिर्फ वोट बटोरने का सामान है, जब अपनी विरोधी पार्टी को नीचा दिखाना हो तो उनका समर्थन कर दो, जब नैतिकता झाडऩी हो तो उन्हें नीचा दिखा दो। नैतिकता झाडऩे में सुप्रीम कोर्ट पीछे क्यों रहता? दिल्ली हाई कोर्ट  के एक जज ने जब समलैंगिकता को अपराध मुक्त करने का फैसला दिया भी, तो उसे उसने उलट दिया। जबकि अध्ययन बताते हंै कि जब तक यौन कर्म को अपराध माना जाएगा, यौन कर्मी संगठित नहीं हो पाएंगे, देश के लाखों लोग व्यवस्था, दलालों, ग्राहकों के हाथों लुटते रहेंगे, और लोगों के लिए सरकार चलाने का दावा करने वाले दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का उन्हें कोई फायदा नहीं मिलेगा।
श्वेता कट्टी, और उसके जैसे गिने चुने बच्चों को देखकर,  देश को यह सोचना चाहिए कि अपना भविष्य संवारने का जितना हक देश के दूसरे बच्चों को  है, सलामती और सेहत की जो जरूरतें देश के बाकी लोगों की है, रोजगार और  गरिमा से जीने का हक जितना देश के बाकी लोगों का है, उतना ही हक यौन कर्मियों को भी है। वह भी देश की जीडीपी में कुछ तो योगदान करते हंै, समाज की कोई तो जरूरत पूरी करते हंै। नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में पूरी दुनिया के सुनते, लाल किले से महिलाओं के खुले में शौच जाने की मजबूरी पर बोलकर एक बड़ी पहल की है। उन्होंने उस भाषण में समाज में मौजूद कई कड़वी सच्चाइयों को स्वीकारा। उनकी सरकार अब यौन कर्म में लगे या धकेल दिए गए देश के लाखों महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के बारे में भी  सच्चाई को कुबूलने, और लीक से हटकर फैसले लेने हौसला दिखाए। सरकार चाहे तो लाल बत्ती इलाकों के लाखों बच्चे सैकड़ों श्वेता कट्टी जैसा बनने का सपना बुन सकते हैं।

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