जहां कुदरत की मार नहीं है, उनकी भी तैयारी की जरूरत

9 सितंबर 2014
संपादकीय
कश्मीर की बाढ़ में जितनी मौतें हुई हैं, उतनी देश के कई दूसरे इलाकों में भी बाढ़ या बादल फटने से हो चुकी है, लेकिन कश्मीर खबरों में कुछ अधिक इसलिए है कि कश्मीर से जुड़ी खबरों की कई मायनों में अधिक अहमियत होती है। पूरी दुनिया और पूरे भारत से सैलानी कश्मीर जाते-आते हैं, और लोगों की वहां की यादें लोगों को इन खबरों से जोड़ती हैं। ऐसा असम की बाढ़ के साथ नहीं हो पाता, क्योंकि हिन्दुस्तान का बहुत ही छोटा हिस्सा उत्तर-पूर्व की तरफ जाता है। बिहार की बाढ़ भी खबरों में उस तरह नहीं आती, क्योंकि बिहार में भी सैलानी कश्मीर की तरह नहीं पहुंचते। और फिर कश्मीर इस नाते भी खबरों में अधिक रहता है कि वह पाकिस्तान की सरहद पर बसा हुआ है, आतंकी घुसपैठ, और हमलों का शिकार रहता है, वहां एक तबका अलगाववादी आंदोलन का समर्थन करता है, और भारत के लिए उसकी फौजी अहमियत बहुत बड़ी है। इसके साथ-साथ कश्मीर को धरती की जन्नत जैसा खूबसूरत माना जाता है, और ऐसा कश्मीर जब डूबता है, तो लोगों के मन में कुछ अधिक विचलित होते हैं। 
लेकिन यह ऐसा मौका भी है, जब कश्मीर की खूबसूरती और यहां की मेहमाननवाजी का सुख उठाए हुए लोग आज वहां के लोगों की मदद के लिए आगे आ सकते हैं, और अपने-अपने इलाके से कश्मीरी लोगों को मदद भेज सकते हैं। इसके बिना आज ताजा-ताजा बेदखली में तो केन्द्र और राज्य सरकारें लोगों का साथ देंगी, लेकिन पानी उतरने के साथ-साथ कश्मीर, या और भी कोई इलाका, लोगों के दिमाग से भी उतर जाता है, और वैसे में बाद की राहत के लिए दुनिया की कोई मदद भी नहीं आती। दूसरी बात हम यहां पर लगे हाथों यह कहना चाहते हैं कि कश्मीर में आधी सदी से तैनात भारतीय फौज सरहद पार के आतंकियों के हमले भी झेलती है, और कश्मीर में अलगाववादियों में से जो लोग हथियार उठाते हैं, उनके हमले भी झेलती है। लेकिन आज इस बचाव में सबसे बड़ा बोझ फौजी वर्दियों के कंधों पर है, जो खुद पानी में डूबे हुए भी आम लोगों को डूबने से बचा रहे हैं। हम यह उम्मीद भी करते हैं कि इस खतरे से उबर जाने के बाद भारतीय फौज पर से कश्मीर की स्थानीय जनता के उग्र तबके का अविश्वास घटेगा, और एक बेहतर रिश्ता कायम होगा। 
इसी मौके पर हम यह दूसरी बात भी कहना चाहते हैं कि भारत के जो प्रदेश सरहद से परे हैं, हिमालय पर्वतमाला से परे हैं, समंदर से परे हैं, और जहां पर कुदरत की मार का खतरा कम है, वहां पर भी कश्मीर, असम, बिहार की बाढ़, उत्तराखंड के भूस्खलन, तमिलनाडु की सुनामी, कच्छ के भूकंप, ओडिशा के समुद्री तूफान, जैसी प्राकृतिक विपदाओं के बाद बिखरी रह जाने वाली दिक्कतों को देखकर उनसे सबक लेना चाहिए, और अपने-अपने इलाकों में आपदा प्रबंधन के स्थानीय इंतजामों के साथ-साथ यह भी सोचना चाहिए कि दूसरे राज्यों की मुसीबत के मौके पर वे अपने यहां से कौन सी मदद वहां भेज सकते हैं। आपदा प्रबंधन की एक जरूरत तो स्थानीय रहती है, लेकिन दूसरी जरूरत राष्ट्रीय नुकसान को देखते हुए भी तैयार रखनी चाहिए, ताकि सुरक्षित राज्य नगद रकम के साथ-साथ जरूरी सामान भी मुसीबतजदा राज्यों को भेज सकें। मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ जैसे जमीन से घिरे हुए, गैरपहाड़ी, बाढ़ से लगभग मुक्त, भूकंप से मुक्त, राज्य को भी अपने लोगों के बीच से राहत सामग्री जुटाने का एक आपदा प्रबंधन विकसित करना चाहिए, ताकि यहां के लोग बाकी देश के काम आ सकें। आज जब कुछ राज्यों में वहां की दसियों लाख आबादी अपना सब कुछ खो चुकी है, तो दूसरे राज्यों के लोग अगर वहां मदद भेजते हैं, तो इससे देश की राष्ट्रीय एकता मजबूत होती है, और एक-दूसरे के लिए इज्जत भी बढ़ती है। 
हम आपदा प्रबंधन को स्थानीय जरूरतों के तंग नजरिए, और तंग दिल से बाहर ले जाकर राष्ट्रीय सोच की तरफ बढ़ाना चाहते हैं, और यह देश कुदरत की भयानक मार से ऐसी सोच की मदद से ही उबर सकेगा। दूसरा फायदा ऐसी सोच का यह होगा कि किसी दिन आशंका से परे का कोई बड़ा नुकसान अगर किसी राज्य में होगा, तो वहां की सरकार, और वहां की जनता अपनी आदत की वजह से बचाव और राहत के लिए बेहतर तैयार रहेंगी। 

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