अल कायदा के खतरे से निपटना मुश्किल रहेगा

4 सितंबर 2014
संपादकीय
अल कायदा की धमकी का ताजा वीडियो भारत के लिए एक बड़ी फिक्र, और एक बड़ा खतरा लेकर आया साबित हो सकता है। इस आतंकी संगठन के सबसे बड़े मुखिया ने इंटरनेट पर डाले गए, और असली करार दिए गए, वीडियो में कहा है कि यह संगठन भारत, बांग्लादेश, और म्यांमार में अपने पैर फैलाने जा रहा है, और एक वक्त इस पूरे इलाके में आज की सरहदों के बिना जो मुस्लिम राज्य था, उसे फिर कायम करने के लिए मेहनत करेगा। बगल के पाकिस्तान में अल कायदा से जुड़े हुए दूसरे तालिबानी संगठनों का खासा कब्जा है, और वहां पर फौज को उनके खिलाफ एक बड़ा अभियान चलाना पड़ रहा है। 
हाल के बरसों की खबरों को देखें तो खाड़ी के देशों में मुस्लिम आतंकी संगठन जिस तरह थोक में जनता को मार रहे हैं, और इन आतंकी संगठनों को मारने के नाम पर जिस तरह अमरीकी फौजें बचे हुए लोगों को मार रही है, उससे ऐसा लगता है कि हिटलर ने जितने लोगों को मारा था, उससे अधिक लोग इन देशों में मारे जा चुके हैं। और जिस तरह पश्चिमी देश मुस्लिम देशों में फौजी मोर्चे बढ़ाते जा रहे हैं, और जिस तरह मुस्लिम देशों की सरकारें अपने ही बागियों के सामने कमजोर साबित हो रही हैं, उससे पूरी दुनिया में इस्लामी आतंक का एक भयानक मोर्चा खुला है। यह भारत में अब तक तो कुछ गिनी-चुनी आतंकी घटनाओं तक सीमित था, लेकिन इस देश में जिस तरह की सरहदें हैं, और अलग-अलग कई समुदायों में जिस तरह धर्मांधता बढ़ती जा रही है, उसके चलते हुए भारत में आतंकी वारदातें बढऩे लगें तो उसमें हैरानी नहीं होगी। और ऐसी नौबत में सरकार की पूरी ताकत भी तमाम घरेलू हमलों को रोक पाने के लिए शायद काफी नहीं होगी। 
अभी पश्चिम के देशों से लेकर भारत तक में यह देखने में आया है कि किस तरह नौजवान धर्म के नाम पर गृहयुद्ध से गुजर रहे देशों में जाकर वहां लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसा लगता है कि सारी पढ़ाई-लिखाई, शहरी जिंदगी, और विज्ञान की बातें मिलकर भी लोगों को कट्टरता से दूर नहीं रख पा रही हैं, और लोग धर्मयुद्ध लडऩे के नाम पर कहीं आतंक कर रहे हैं, तो कहीं सीधे हथियारबंद मोर्चे पर आमने-सामने की लड़ाई में शहादत के लिए जा रहे हैं।
भारत में जिस तरह का मिला-जुला समाज है, और हाल के महीनों में जिस तरह साम्प्रदायिकता की बातें बढ़ती जा रही हैं, उनसे केंद्र सरकार के लिए खासी बड़ी दिक्कत आने वाली है। भारत में एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लालकिले से यह कहा कि देश में दस बरस के लिए धर्म और जाति के तनाव की बातें बंद कर दी जाएं, और देश को आगे बढ़ाने का काम किया जाए। लेकिन दूसरी तरफ उनकी पार्टी के कई लोग बहुत ही गैरजिम्मेदारी के साथ साम्प्रदायिकता की बातों को बढ़ावा दे रहे हैं। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी, और पार्टी के नेताओं की कुर्सियों के बीच अधिक तालमेल नहीं है, या फिर पता नहीं क्या बात है? अल कायदा की ताजा धमकी और उससे जुड़े हुए खतरों से निपटना किसी भी सरकार के लिए आसान बात नहीं होगी, जब तक कि देश एक समाज के रूप में उसके लिए तैयार नहीं होगा। और इसके लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बहुत से लोगों को बिठाकर नसीहत देनी चाहिए।

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