गांधी के नाम के हिज्जे और गांधी की सोच पर अमल

30 सितंबर 2014
संपादकीय
अमरीका में अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुंह से मोहनदास करमचंद गांधी के बजाय मोहनलाल करमचंद गांधी निकल गया, तो भारत में कांगे्रस पार्टी सहित बहुत से मोदी-आलोचक उनके पीछे लग गए कि जिसे राष्ट्रपिता का नाम भी ठीक से याद न हो, वह प्रधानमंत्री बनने के लायक नहीं है। खासकर कांगे्रस पार्टी के बारे में ऐसी चूक के सिलसिले में हमको याद पड़ता है कि इसी अमरीका में संयुक्त राष्ट्र की एक बैठक में यूपीए के विदेश मंत्री कृष्णा किसी दूसरे देश के विदेश मंत्री का भाषण पढऩे लग गए थे, और कुछ मिनट पढऩे के बाद उनके अफसर ने उन्हें पीछे से खींचकर गलती याद दिलाई थी। लेकिन किसी एक की गलती न तो किसी दूसरे के लिए गलती को सही ठहराने का आधार बनता, और न ही किसी कि ऐसी गलती उसे गलत इंसान ठहराती है।
चीजों को एक अनुपात और महत्व के हिसाब से ही देखना चाहिए। नरेन्द्र मोदी के भाषणों में, और उनके कार्यक्रमों में आलोचना के लायक दर्जनभर से अधिक गंभीर बातें रही होंगी, और अगर इस प्रवास के महत्व को अनदेखा करके आलोचना ही करना है, तो हम यहां पर उनकी गलतियों की एक लिस्ट बना सकते हैं। लेकिन किसी व्यक्ति, किसी मुद्दे, किसी मौके, या किसी संगठन के काम को संपूर्णता में देखा जाना चाहिए, और मोदी के इस अमरीका प्रवास की संपूर्णता नकारात्मक या निराशाजनक नहीं है। इसलिए किसी एक चूक को लेकर बड़ा मुद्दा बनाना यह भी साबित करता है कि आलोचकों के पास उससे बड़ा कोई मुद्दा नहीं है, या उनको बड़ी खामियां निकालने की समझ नहीं है।
अब हम गांधी के हिज्जे पर ही लौटें, तो मोदी ने नाम गलत ले लिया, लेकिन इसी खबर के साथ-साथ यह भी देखने की जरूरत है कि उन्होंने देश की धरती पर और विदेश की धरती पर भी गांधी के सबसे पसंदीदा मुद्दों में से एक सफाई का मुद्दा उठाया है, और अभी जब हम यह लिख रहे हैं, पूरे देश में सफाई को एक अभियान के रूप में चलाने की बात हो रही है। जो लोग मोदी के इतिहास को गिनाते हुए उन्हें आज भी कोसते चलना चाहते हैं, उनको अपने इस हक के साथ-साथ यह भी देखना होगा कि मोदी ने घंटे भर के अपने भाषण में कम से कम दर्जनभर बार गांधी का नाम लिया, और बालिकाओं के लिए शौचालयों को, देश में सफाई को उन्होंने लालकिले से लेकर न्यूयॉर्क तक महत्वपूर्ण माना और बताया। एक देश के रूप में भारत की सोच को एक बहुत मामूली लगने वाली सफाई की जरूरत की तरफ ले जाने की यह कोशिश इसलिए छोटी नहीं है कि गंदगी से लोगों की जिंदगी बीमारियों से घिरती है, और पर्यटकों का आना-जाना भी इस वजह से घटता है, जिससे कि देश का बड़ा नुकसान भी होता है। साफ-सफाई को लेकर आज हम यहां इस बात को इसलिए भी आगे बढ़ा रहे हैं कि अगले दो-तीन दिन स्कूलों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक, और गली-मुहल्लों तक सफाई का एक अभियान देखने मिलेगा, और हिंदुस्तानी लोगों को अपने घर के भीतर भी, अपने बदन पर भी सफाई की एक आदत डालने की जरूरत है, और अगर प्रधानमंत्री ने इसे एक राष्ट्रीय मुद्दा बनाया है, और अपनी इस सोच के लिए पूरा का पूरा श्रेय गांधी को दिया है, तो मोदी की आलोचना करने के पहले कांगे्रस को यह सोचना चाहिए कि उसने खुद ने अपने भीतर, अपनी पार्टी और अपनी सरकारों में गांधी को कितना जिंदा रखा है? क्या कांगे्रस के आज की यह दुर्गत इसलिए ही नहीं हुई है कि वह गांधी की ईमानदारी की सोच से कोसों दूर चली गई थी, और सोच-समझकर चली गई थी।
मोदी की आलोचना के लिए ठोस मुद्दों की कोई कमी नहीं रहेगी, और उनके विरोधियों और आलोचकों को अपनी ताकत और अपने शब्द वैसे मुद्दों के लिए बचाकर रखना चाहिए, वरना बिन बात अगर वे आलोचना करते रहेंगे, तो किसी दिन आलोचना के लायक बात रहने पर भी उनको कोई नहीं सुनेगा। 

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