सरदार पटेल की स्मृति और एकता की प्रेरणा पर कुछ बातें

31 अक्टूबर 2014
संपादकीय
देश भर में आज केन्द्र की मोदी सरकार के निर्देश पर राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया गया। आज ही इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि थी, और आज ही सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती भी है। अब तक हर बरस इस दिन इंदिरा गांधी को ही याद किया जाता था क्योंकि देश के अलगाववादी आतंकियों के हाथों उनकी शहादत हुई थी। दूसरी तरफ सरदार पटेल इतिहास में तो जरूर थे, लेकिन सरकारी समारोहों में उनका अधिक जिक्र नहीं होता था। नेहरू-गांधी परिवार से परे महात्मा गांधी ही सरकारी श्रद्धांजलियों में रहते थे, और अब सत्ता बदल गई है, इसलिए नई सत्ता की नई सोच को लोकतंत्र में प्रमुखताएं फिर से तय करने का हक है, और उसी का इस्तेमाल गुजरात में सरदार पटेल की तीन हजार करोड़ प्रतिमा से लेकर देश भर में आज सरदार जयंती तक हो रहा है। 
भारत की आजादी के इतिहास में सरदार पटेल के योगदान का मूल्यांकन कांग्रेस सत्ता से परे का वक्त आने पर एक बार फिर किया जा सकता है, और बहुत से लोगों का यह मानना हो सकता है कि उनका योगदान नेहरू से अधिक था। और बहुत से नेहरूवादी इतिहासकारों का भी इंदिरा के योगदान को लेकर एक संदेह बना रहता है, और कुछ लोग उनको भारत के सबसे महान नेताओं में मानने से इंकार भी करते हैं। लेकिन हम ऐसे किसी मूल्यांकन की दौड़ में हिस्सा लेना नहीं चाहते, क्योंकि हम इतिहास की वैसी कोई तुलना इस जगह पर नहीं करना चाहते, लेकिन आज देश में जो तुलना जनता के बीच हो रही है, उस बारे में जरूर यहां चर्चा होनी चाहिए। 
इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि के परंपरागत दिन को आज एकदम से सरदार जयंती में तब्दील करना एक नजर में ठीक नहीं लगता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिस पार्टी के हैं, उसने आपातकाल में भी इंदिरा का विरोध किया था, और 1977 के चुनाव में भी जनता पार्टी में अपने आपको विलीन करके इंदिरा-संजय के खिलाफ चुनाव लड़ा था। और प्रधानमंत्री बनने के खासे पहले से नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए भी सरदार पटेल की रिकॉर्ड ऊंचाई की प्रतिमा बनाने का बीड़ा उठाया था, और देश भर से उसके लिए मदद भी मांगी थी। लेकिन आज इस मौके पर गुजरात सरकार का दिया हुआ ठेका भी सामने है जिसमें जनता के खजाने से तीन हजार करोड़ रूपए खर्च करके सरदार पटेल की प्रतिमा बनाई जा रही है। 
तीन हजार करोड़ की रकम भारत जैसे देश में बहुत बड़ी होती है, जहां कि खुद प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में देश में शौचालयों की कमी है और लड़कियों का स्कूल छूटने के पीछे यह भी एक वजह रहती है। ऐसे देश में जहां कुपोषण से दसियों लाख बच्चे हर बरस मरते हों, जहां लोगों को पखाने नसीब न हों, वहां पर सरकार का, मतलब जनता का, इतना सारा पैसा एक प्रतिमा पर खर्च करना ठीक नहीं है। आज केन्द्र और गुजरात की सरकारों को सरदार पटेल की स्मृति को इस तरह स्थापित करना जरूरी लग रहा है, कल केन्द्र या किसी और राज्य में किसी दूसरी पार्टी की सरकार लोहिया, जयप्रकाश, आंबेडकर, नेहरू, इंदिरा, या राजीव की प्रतिमा पर अगर पांच हजार करोड़ खर्च करने पर उतारू हो जाएगी, तो उसे पटेल प्रतिमा के मुकाबले नाजायज कैसे कहा जा सकेगा? और ऊंचाई का, भव्यता का यह मुकाबला कहां जाकर खत्म होगा? नरेन्द्र मोदी ने सरदार पटेल की प्रतिमा को अमरीका की विश्वविख्यात लिबर्टी ऑफ स्टेच्यू से दो गुना ऊंचाई का बनवाना तय किया है, कल के दिन किसी दूसरी पार्टी की सरकार अपने प्रिय नेता की प्रतिमा की ऊंचाई इस स्टेच्यू ऑफ यूनिटी से दो गुना करने बैठ जाएगी। 
स्टेच्यू ऑफ यूनिटी की ऊंचाई से किसी नेता या देश-प्रदेश का सम्मान नहीं बढ़ सकता। यह सम्मान तो किसी देश या प्रदेश में यूनिटी (एकता) बढऩे से ही बढ़ सकता है। और एकता की सोच को पूरे देश में बढ़ावा देने में कोई खर्च भी नहीं होगा, बल्कि एकता मजबूत होने के बाद देश में दंगों से होने वाले नुकसान की बचत भी होगी, और राष्ट्रीय उत्पादकता भी बढ़ेगी। हम देश और प्रदेशों में ऐसी खर्चीली स्मृति के खिलाफ हैं। सरदार पटेल की याद में तीन हजार करोड़ नहीं, छह हजार करोड़ रूपए से अगर कोई अस्पताल बनाया जाता तो वह उनकी स्मृति का एक बेहतर सम्मान होता। ऐसे ठोस प्रतीक जनता के पैसों से ठीक नहीं हैं। देश में आज प्रतिमा की नहीं, एकता की प्रेरणा की जरूरत है, और वह चबूतरों पर खड़े रहकर नहीं, सरकार और संसद चलाते हुए, जनता से बात करते हुए, बिना खर्च आगे बढ़ाई जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस किफायती तरीके की एकता के बारे में सोचना चाहिए। 

काले धन पर जनता से खबर मिल तो सकती है, लेकिन...

30 अक्टूबर 2014
संपादकीय

केन्द्र सरकार ने तय किया है कि वह आम जनता से भी काले धन के बारे में जानकारी मांगेगी, और उसे जांचेगी-परखेगी। यह एक अच्छी पहल है, क्योंकि देश में आज आर्थिक अपराधों को रोकने के लिए कोई भी असरदार एजेंसी नहीं है। अधिकतर एजेंसियां, टैक्स विभाग ऐसे हैं, जो कि टैक्स चोरी या आर्थिक अपराध हो जाने के बाद उनकी खबर लगने पर उनकी जांच करते हैं, और तब तक वह काला धन या भ्रष्टाचार-बेईमानी से कमाया गया पैसा कहीं का कहीं जा चुका होता है। हमारे पाठकों को याद होगा कि हम कई बार इस बारे में लिख चुके हैं कि आर्थिक अपराधों पर निगरानी रखने के लिए एक ऐसी खुफिया एजेंसी बनाने की जरूरत है जो अपराधों के होते हुए भी उसकी जानकारी पा सके, और इसके पहले की रस्सी पूरी की पूरी हाथ से निकल जाए, वह एजेंसी सरकार के टैक्स विभागों, या जांच विभागों को अपनी जानकारी दे सके। देश में बड़े और व्यापक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अपराधों पर नजर रखने के लिए जिस तरह आईबी नाम की खुफिया एजेंसी है, उसी तरह की एजेंसी सरकारी भ्रष्टाचार, और सरकार से परे के आर्थिक अपराधों के लिए भी अलग से बननी चाहिए। 
आज अक्सर खबरों में यह आता है कि कौन सी चिटफंड कंपनी बनाकर किसने सैकड़ों और हजारों करोड़ जमा किए, और रफूचक्कर हो गए। महीनों या बरसों बाद ऐसा करने वाले मुजरिम पकड़ाते भी हैं, तो भी वह पैसा सरकार या देश की पहुंच से परे जा चुका होता है। सांप के निकल जाने के बाद लकीर को पीटने की तरह जांच कुछ हासिल नहीं कर पाती। इसलिए आज केन्द्र सरकार अगर आम लोगों से भी काले धन की जानकारी मांगने जा रही है, तो यह एक फायदे का काम हो सकता है। किसी भी जगह काले धन की जानकारी आसपास के कई लोगों को रहती है, और उनमें से कुछ लोग सरकार की मदद करने के लिए, कुछ लोग किसी ईनाम की चाह में, कुछ लोग काले धन वालों से किसी निजी दुश्मनी के चलते सरकार को जानकारी दे सकते हैं। अब इस पहल की कामयाबी इस बात में होगी कि लोगों से मिली हुई जानकारी उनकी शिनाख्त को किस तरह बचाकर इस्तेमाल की जा सकती है। अगर खबर देने  वालों के नाम उजागर होने लगेंगे, तो जितने बड़े काले धन की जानकारी होगी, उतना ही बड़ा खतरा इन लोगों पर मंडराने लगेगा। जिस तरह देश में कई जगह आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्याएं होती हैं, उसी तरह कल के दिन काले धन के खबरी लोगों की हत्याएं होने लगेंगी। और सरकार के पास गई हुई जानकारी के लीक होने का खतरा कभी भी कम नहीं आंकना चाहिए। जब अमरीकी सरकार के कूटनीतिक दस्तावेज हासिल करके विकीलीक्स या दूसरे लोग उजागर कर सकते हैं, तो भारत सरकार को काले धन की जानकारी देने वालों के नाम किसी भी दिन सड़कों पर बिखरे हुए दिखेंगे। इसलिए सरकार को अपनी क्षमता को अधिक, और साईबर-घुसपैठियों की क्षमता को कम नहीं आंकना चाहिए। एक ऐसा इंतजाम करना चाहिए जिसके तहत जानकारी भेजने वालों की शिनाख्त तुरंत ही रिकॉर्ड से मिट जाए। ऐसा भरोसा होने पर ही लोग सरकार की मदद को आगे आएंगे। इसके साथ-साथ अगर सूचना पर काला धन मिलता है, तो आज भी आयकर विभाग के नियमों के तहत ऐसी सूचना पर ईनाम का इंतजाम है। वैसा इंतजाम इस नई योजना के तहत भी किया जा सकता है, और वह आयकर-ईनाम के विस्तार की तरह होगा, और वह हर तरह के काले धन के भांडाफोड़ पर लोगों को ईनाम दिला सकेगा। इसका सरकार को फायदा जरूर होगा, अगर वह खबर देने वालों के नाम गोपनीय रखने के बजाय, उनको हमेशा के लिए मिटा देने का काम करे। सिर्फ ऐसे ही लोगों के नाम गोपनीय रिकॉर्ड में रखे जाएं, जो कि ईनाम की उम्मीद करते हैं, और यह काम बहुत ही मजबूत हिफाजत के साथ होना चाहिए। 
आज हमारा अंदाज है कि भारत में सरकार को जितने धन और कारोबार पर टैक्स मिलता है, उससे कई गुना अधिक समानांतर कारोबार होता है। और अगर यह पूरी तरह रूक सके, तो देश और प्रदेशों की सरकारों की टैक्स प्राप्ति कई गुना बढऩा तय है। मोदी सरकार के सामने आज नए-नए तरीकों को शुरू करने का एक अभूतपूर्व मौका है, और इससे देश की पूरी तस्वीर बदल सकती है। 

मोदी सरकार पर चोरों को बचाने का आरोप विपक्ष का नहीं, सुप्रीम कोर्ट का है

29 अक्टूबर 2014
संपादकीय
अभी एक पखवाड़ा पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत कड़ा रूख दिखाते हुए कोयला घोटाले में शामिल सारी खदानों को खारिज कर दिया, और सरकार के सामने इस काम को नियम-कायदे से करने की एक चुनौती खड़ी की। अब कल उसने विदेशों में जमा काले धन को लेकर मोदी सरकार को जो फटकार लगाई है, और जिस तरह से इस बारे में दुनिया भर से मिली जानकारी को अपने हाथ में लिया है, आगे की जांच का फैसला खुद तय करना तय किया है, वह भारतीय लोकतंत्र में एक असाधारण घटना है। यहां पर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच कामों का बंटवारा संविधान के भीतर शब्दों और भावना दोनों में ही काफी कुछ किया हुआ है। लेकिन जब-जब सरकार खुलकर कोई गलत काम करती है, तो अदालती दखल का इतिहास भी भारत में रहा है, और संचार घोटाले से लेकर कोयले की खदान तक होते हुए अब सुप्रीम कोर्ट विदेशी बैंकों में हिन्दुस्तानियों के पैसों तक के मामलों में सरकार पर से भरोसा खत्म करके अपनी निगरानी में सब कुछ करवा रहा है। पहली नजर में यह सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालती कार्रवाई दिखती है, लेकिन संविधान के तहत इन दोनों संस्थाओं की जिम्मेदारियों और अधिकारों के संतुलन में कुछ बिगड़ा हुआ दिख रहा है। 
यह नौबत खुशी की नहीं है कि सरकारी घपलों, भ्रष्टाचार और बेईमानी को सुप्रीम कोर्ट रोक रहा है। अदालत को अगर सरकार के कामकाज में इस हद तक दखल देनी पड़ रही है, तो यह यूपीए सरकार के बाद एनडीए सरकार की खामियां भी बताती है। वैसे भी कोयला घोटाले में 1993 के बाद की खदानों को रद्द करने से यह साफ हुआ है कि यूपीए के दो कार्यकाल के पहले भी एनडीए के कार्यकाल में भी गड़बडिय़ां हुई थीं, और लगातार कई सरकारें घपलों में डूबी रहीं। कल केन्द्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने जिस जुबान में फटकारा है, वह मोदी सरकार के रूख से न्यायपालिका की असहमति और नाराजगी का सुबूत है। हम अभी यहां इन दोनों में से किसी के सही या गलत होने का फैसला करने नहीं बैठे हैं, लेकिन यह अभूतपूर्व स्थिति हमें ऐसी भी दिखती है कि नई सरकार पुरानी सारी गलतियों और गलत कामों से सबक लेते हुए बेहतर और साफ-सुथरा काम करने की एक परंपरा शुरू कर सकती है। लेकिन इसके साथ-साथ देश की आम जनता इन मामलों को देखकर सरकारों से नफरत करने लगी है, और यह महज हिकारत तक सीमित नहीं है, यह नफरत से कम कुछ नहीं है। 
आम जनता को अब यह साफ लगने लगा है कि सरकारों में बैठे लोगों को जब जहां मौका मिलता है, वे कारोबारियों के साथ मिलकर देश को लूटने में लग जाते हैं। और इस लूटपाट के खिलाफ वे आदिवासी नक्सलियों के हमदर्द होते जाते हैं, जिन्हें खबरों से नासमझ, बिना पढ़ा-लिखा और जंगलों में बसा हुआ माना जाता है। दरअसल पढ़-लिख लेने के बाद, और शहरी सुविधाओं के आदी हो जाने के बाद लोगों में लडऩे का हौसला खत्म हो जाता है। और सरकारी भ्रष्टाचार और गड़बडिय़ों के खिलाफ वे ही आदिवासी हथियार उठाते हैं जिनको कुछ खोने का खतरा नहीं रहता। पता नहीं इस देश में राजधानियों के भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी दिन जंगलों में काम करने वाले नक्सलियों की तरह के कोई लोग उठ तो खड़े नहीं होंगे? लोगों में जितनी नफरत है, जितनी भड़ास है, जितनी निराशा है, और मौजूदा व्यवस्था को, सरकारी ढांचे को उखाड़ फेंकने की जितनी हसरत है, वह पिछले चुनाव में यूपीए को उखाड़ फेंककर कुछ हद तक घटी तो है लेकिन खत्म नहीं हुई है। अब अगर मोदी सरकार भी लोगों को पिछली सरकारों की तरह ही निराश करेगी, कोयले की खदानों से लेकर विदेशों के काले धन तक उसकी नीयत अगर शक से घिरी रहेगी, तो लोगों को सरकार उखाड़कर फेंकना आ चुका है। कल सुप्रीम कोर्ट का रूख केन्द्र सरकार के लिए एक बड़ी बेइज्जती से कम कुछ नहीं था और सरकार को यह नौबत सुधारनी चाहिए। मोदी के सत्ता में आने के पीछे विदेशों में जमा काले धन को वापिस लाना एक बड़ा मुद्दा था, और आज अगर सरकार उस धन को बचाते हुए दिख रही है, टैक्स चोरों को बचाते हुए दिख रही है, तो यह आरोप किसी विपक्षी पार्टी का नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के जजों का है। मोदी सरकार को तुरंत अपने रूख को भी सुधारना चाहिए।

बात की बात, Bat ke bat,

28 oct 2014

खरीद-फरोख्त का बाजार, गुलाम की तरह लोकतंत्र

28 अक्टूबर 2014
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने अभी कुछ देर पहले इस बात पर नाराजगी जाहिर की है कि दिल्ली में सरकार बनाने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है, और दिल्ली इस तरह कब तक चलाई जाएगी। किसी एक पार्टी को सरकार बनाने लायक बहुमत न मिलने पर, और तीनों बड़ी पार्टियों के बीच बुनियादी मतभेद होने की वजह से कोई भी दो पार्टियां एक साथ नहीं आ पाईं, और महीनों से दिल्ली की विधानसभा निलंबित पड़ी हुई है और राज्यपाल प्रदेश को चला रहे हैं। इसी वक्त देश के एक दूसरे बड़े राज्य महाराष्ट्र में सरकार बनाने की तैयारी चल रही है, और वहां कल तक की भागीदार दो पार्टियों के बीच तनातनी के चलते हुए एक अजीब सी नौबत खड़ी हुई है। भाजपा और शिवसेना के बीच अगर मामला नहीं सुलझता है, तो वहां पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के स्वघोषित बाहरी समर्थन के साथ भाजपा अल्पमत की एक सरकार बना सकती है। लेकिन बाहरी समर्थनों पर बनने वाली सरकारों का आम तौर पर बहुत अच्छा हाल नहीं रहता, और संसद या विधानसभा का कार्यकाल पूरा होने तक ऐसा समर्थन जारी रहते भी कम दिखता है। इसलिए यह दिक्कत भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक व्यवस्था के तहत कभी-कभी सामने आती है, और आज सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली का मामला ऐसा ही है। 
दरअसल लोकतंत्र की संवैधानिक व्यवस्था के भीतर हर तरह की तकलीफ का ईलाज हो भी नहीं सकता है। बहुत सी ऐसी नौबतें आती ही हैं, जिनमें संविधान के शब्द काम के नहीं रह जाते, और संविधान की भावना की पार्टियों और नेताओं को अधिक परवाह नहीं रहतीं। भारत में आज नेताओं और पार्टियों के बीच रिश्तों की कड़वाहट इतनी बढ़ गई है कि वह लोकतांत्रिक सहनशक्ति से परे हो गई है। लोगों की आपस में बातचीत बंद हो गई है, देश की रक्षा या देश की विदेश नीति को लेकर भी राष्ट्रीय हितों से परे पार्टियों की आपसी टकराहट हावी हो जाती हैं, राज्यों में जनता के हितों और उसकी जरूरतों से ऊपर जाकर पार्टियों और नेताओं के टकराव, उनके निजी अहंकार हावी हो जाते हैं। दरअसल लोकतंत्र सिरों के इस तरह बेवजह टकराने के साथ-साथ चलने वाली व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र में सर्वसम्मति, बहुमति, या फिर आपसी तालमेल से काम चलाने की उम्मीद की जाती है। और किसी भी सभ्य और समझदार समाज में न्यायप्रिय और तर्कपूर्ण तरीके से राजनीति की उम्मीद की जाती है। लेकिन हिन्दुस्तान में केन्द्र से लेकर राज्यों तक लोग सतही मुद्दों को लेकर इतना जलता-सुलगता टकराव लेकर चलते हैं, कि देश पीछे रह जाता है, राजनीतिक अहंकार आगे-आगे चलता है। 
जो लोग भारत के लोकतंत्र की निरंतरता को, चुनावों में मतदान की कामयाबी को यहां की परिपक्वता मानते हैं, हमारा मानना है कि वे कड़वी हकीकत को अनदेखा करके महज आंकड़ों की बुनियाद पर अपनी कल्पना खड़ी करते हैं। भारत के लोकतंत्र की हालत इतनी अच्छी नहीं है। राजनीति गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबी हुई है, और कम ही पार्टियां या नेता ऐसे हैं जिन्हें कि वोटों और नोटों से ऊपर जाकर देश की फिक्र हो, साम्प्रदायिक सद्भाव की फिक्र हो, गरीबों की फिक्र हो, और कमजोर तबकों की फिक्र हो। आज जब भारतीय राजनीति का पहला मकसद वोट और नोट रह गया है, तो यह लोकतंत्र नाकामयाब हो गया है। इसे एक कामयाब मतदान वाला देश कहना बेहतर होगा, कामयाब लोकतंत्र वाला नहीं। यह तस्वीर हौसला पस्त करती है, और जब तक राजनीति में बुनियादी ईमानदारी नहीं आएगी, खरीद-फरोख्त के बाजार में लोकतंत्र को गुलाम की तरह खड़ा किया जाता रहेगा। 

जांच से बचने का कांग्रेस का तर्क बहुत ही शर्मनाक

27 अक्टूबर 2014
संपादकीय
हरियाणा में कल भाजपा की सरकार बनी, और जैसी कि उससे उम्मीद की जा रही थी, उसकी पहली घोषणा में जमीन के घोटालों की जांच शामिल है। कांग्रेस ने वहां पर इस चुनाव में अपनी सरकार गंवाते हुए भी राबर्ट वाड्रा की जमीनों को बचाने की सरकारी कार्रवाई जारी रखी थी, और किस तरह अरबों का फायदा वाड्रा को पहुंचाया गया, यह बात खबरों में तैर ही रही है। ऐसे में इस बात को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने वाली भाजपा से यह तो उम्मीद की ही जाती थी कि वह अपनी सरकार आने पर जमीनों के धंधे पर सरकारी मेहरबानी की जांच करवाएगी। लेकिन जांच की ऐसी अनौपचारिक घोषणा पर ही कांग्रेस ने जिस तरह हड़बड़ी में एक अधकचरी प्रतिक्रिया दी है, वह देखने लायक है। 
दूसरी ओर हरियाणा के नए मंत्रियों के बयान पर कांग्रेस के नेता-प्रवक्ता राशिद अल्वी ने एक समाचार चैनल से कहा- यह बयान हरियाणा सरकार के घमंड को दर्शाता है। किसी भी सरकार को बदले की भावना से कोई निर्णय नहीं करना चाहिए। लगता है कि वे बदले की भावना से यह निर्णय करना चाहते हैं। अल्वी ने कहा कि उन्हें (भाजपा) याद रखना चाहिए कि लोकतांत्रिक प्रणाली में कोई स्थायी सरकार नहीं होती। कभी वे सत्ता में होते हैं तो कभी विपक्ष में, उन्हें हमारे देश को पाकिस्तान की तरह नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब हमारी सरकार थी तो हमने तत्कालीन प्रधानमंत्री के दामाद की जांच नहीं की। हम कोई ऐसी परंपरा नहीं बनाना चाहते थे कि लोग कहें कि हम बदले की भावना से काम कर रहे हैं। अल्वी ने कहा कि इसलिए मेरी मांग है कि अगर वे वाड्रा (कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद) की जांच कर रहे हैं और कानून का सम्मान करते हैं तो उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री के दामाद की भी जांच करनी चाहिए। उधर राबर्ट वाड्रा के  जमीन सौदों पर पूछे जाने पर जेटली ने कहा इस मामले में कार्रवाई करना नई राज्य सरकार पर निर्भर करता है। वित्त मंत्री ने कहा कि प्रथम दृष्टया जांच का मामला (वाड्रा के खिलाफ) बनता है, क्योंकि ऐसा नहीं होता कि आपके पास कोई पूंजी नहीं हो, फिर कुछ लाख रुपयों के साथ आप काम शुरू करें और एक-दो साल में वह करोड़ों रुपये में बदल जाए। आम सौदों में यह नहीं होता। 
हम कांग्रेस और भाजपा की कही इन बातों को यहां इतने खुलासे से इसलिए रख रहे हैं क्योंकि इन बयानों पर ही हम आगे लिखने जा रहे हैं। लोकतंत्र में सरकारें आती-जाती रहती हैं, और अगर एक पार्टी की सरकार जाने के बाद किसी दूसरी पार्टी की सरकार आकर अगर ऐसा कोई शिष्टाचार निभाने लगे कि पिछली सरकार के रिश्तेदारों की जांच न कराई जाए, तो भारतीय लोकतंत्र का मतलब पांच बरस के लिए लूट और डकैती का ठेका मिल जाना होगा। हम लंबे समय से इस बारे में यह लिखते रहे हैं कि किसी भी सरकार को अपनी पिछली सरकार के कामकाज की पूरी जांच करवानी चाहिए, ऐसा करना न सिर्फ उसका अधिकार है, बल्कि उसकी जिम्मेदारी भी है। जिस तरह आपातकाल के बाद आई जनता पार्टी सरकार ने इंदिरा सरकार की ज्यादतियों के लिए शाह आयोग बनाया था, जिस तरह इस देश में सरकारी कामकाज के अनिवार्य ऑडिट के लिए सीएजी का प्रावधान है, उसी तरह हर सरकार के कार्यकाल खत्म होने के बाद एक जांच आयोग का संवैधानिक प्रावधान लिया जाना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक राजनीतिक शिष्टाचार के जिस तकाजे को कांग्रेस प्रवक्ता ने गिनाया है, वह भ्रष्टाचार को स्थायी व्यवस्था बना देने के अलावा और कुछ नहीं होगा। शिष्टाचार के नाम पर कांग्रेस पार्टी आज भ्रष्टाचार की वकालत कर रही है।
और आज ही एक दूसरे बयान में काले धन को विदेशों में रखने की खबरों पर कांग्रेस प्रवक्ता ने पूरी लंबी-चौड़ी जांच की मांग की है। तो फिर ऐसी ही जांच हरियाणा के जमीनों के धंधों पर लगे आरोपों की क्यों नहीं होनी चाहिए? कल अगर अटल बिहारी वाजपेयी के दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्य पर अगर धंधेबाजी के आरोप लगते थे, तो यह यूपीए सरकार की दस बरसों की जिम्मेदारी थी कि वह उनकी जांच करवाती। यह बात बहुत ही शर्मनाक है कि दामाद को रियायत देने के एवज में दामाद के लिए रियायत मांगी जाए। कांग्रेस जिस नेहरू और गांधी की बात करती है, आजादी की लड़ाई के इतिहास में जिस हिस्सेदारी की बात करती है, क्या ये दावे अपने कुछ लोगों को जांच से भी बचाने के साथ ठीक लगते हैं?
हरियाणा सरकार को, और देश की किसी भी सरकार को, हर किस्म के गंभीर मामलों की जांच करवानी चाहिए, लोकतंत्र में ऐसी किसी जांच को विच-हंटिंग (चुड़ैल का शिकार) नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र न सिर्फ अधिकारों का नाम है, बल्कि जिम्मेदारी का नाम भी है। और सरकारों को एक-दूसरे के साथ रियायत का हक नहीं है, बल्कि एक-दूसरे पर लगे गंभीर आरोपों की जांच का उनका जिम्मा है।  और हरियाणा में जमीन कारोबारियों पर सरकार की रियायत के आरोप किसी रिश्तेदार पर नहीं है, सरकार पर हैं, इसलिए यह नई सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। आज अगर यह सरकार जांच नहीं करवाएगी, तो कोई आम व्यक्ति भी अदालत तक जाकर वहां से जांच का आदेश ला सकते हैं। 

इंसानी जरूरतों के वक्त को कुचलने की सरकारी कामयाबी!

26 अक्टूबर 2014
विशेष संपादकीय

सुनील कुमार

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पर सरकार का अनुपातहीन खर्च उसी तरह से हो रहा है जिस तरह की देश की किसी भी राजधानी पर वहां की सरकार कर सकती हैं। यह अलग बात है कि पूरा शहर घूरा बना हुआ है, लेकिन दूसरी तरफ सैकड़ों करोड़ खर्च करके घूरों के आसपास बाकी तमाम पहलुओं पर खर्च ही खर्च हो रहा है। इसमें कोई अनहोनी नहीं है, लेकिन आज एक दूसरी बात सामने आई जो कि सोच की कमी को बताती है। जहां खर्च करने को रकम बहुत हो, उत्साह बहुत हो, हड़बड़ी बहुत हो, वहां तालाब के किनारे लोगों के घूमने और बैठने के लिए एक खूबसूरत घेरा बना है, चबूतरे बने हैं, और रोज दसियों हजार लोग वहां आने लगे हैं, परिवार सहित बैठने लगे हैं। अब म्युनिसिपल या सरकार वहां पर एक बड़ा खर्च करके उस पूरे इलाके को मुफ्त वाई-फाई से लैस करने जा रही है। यह बात सुनने में अच्छी लग सकती है कि किसी जगह सरकार की तरफ से यह मुफ्त सहूलियत मिलने लगेगी, लेकिन ऐसा करने वाली सरकार में सामाजिक समझ का एक दीवालियापन भी नजर आता है। 
पिछले कुछ बरसों से इंटरनेट पर दुनिया के अलग-अलग शहरों के ऐसे कैफे तस्वीरों में दिखने लगे हैं जहां ब्लैकबोर्ड पर चॉक से लिखकर यह नोटिस लगा दिए गए हैं कि वहां वाई-फाई नहीं है, और लोग आपस में बात करें। मतलब यह कि टेक्नालॉजी ने लोगों को एक-दूसरे से इतना दूर कर दिया है कि लोग मेले में अकेले जैसे हो गए हैं, और उनको देखकर कितने पास-कितने दूर जैसी बातें भी याद आने लगती हैं। अगर शहरी जिंदगी की भागदौड़ से आजाद होकर शाम आधे-एक घंटे के लिए लोग अगर तालाब किनारे सैर के लिए या परिवार के साथ बैठने के लिए जाने लगे हैं, तो वहां पर मुफ्त वाई-फाई जुटाकर देना समझदारी नहीं है, एक संपन्न और शहरी नासमझी है। शाम के घंटों में किसी को तालाब किनारे इंटरनेट की जरूरत नहीं होती, सामाजिक अंतरसंबंधों और पारिवारिक संबंधों की जरूरत होती है। 
कुछ समय पहले इसी शहर में एक श्मशान की तरफ से वहां की मैनेजमेंट कमेटी की भेजी खबर आई थी कि वहां कैमरे और इंटरनेट तैनात किए जा रहे हैं, ताकि लोग घर बैठे भी अपने मरने वाले का अंतिम संस्कार देख सकें। हो सकता है कि कुछ लोगों को ऐसी हसरत हो, हो सकता है यह बात आगे चलकर शोहरत पाने लगे, और बाकी मरघट भी इसके पीछे चलने लगें, लेकिन इस खबर पर कुछ हफ्ते सोचने के बाद आज भी हमको यह लगता है कि घर से अर्थी उठ जाने के बाद परिवार के लोगों को उस गम से उबरने की जो जरूरत रहती है, ऐसे इंटरनेट-प्रसारण से वह गम खत्म होने में और कई घंटे लगने लगेंगे। और फिर दूर-दूर के रिश्तेदार ऐसे प्रसारण देखने लगेंगे, लोग घर पर अंतिम संस्कार रिकॉर्ड करके रखने लगेंगे, और मरने वाले से कभी पीछा ही नहीं छूटेगा। 
टेक्नालॉजी की जिंदगी में दखल बड़ी आसान हो गई है, वह जब चाहती है तब जहां चाहती है वहां घुस जाती है। लेकिन इस औजार का जिंदगी में कहां तक कितना दखल रखना है, यह इंसानों को खुद तय करना होगा। वाई-फाई का अपना एक इस्तेमाल है। किसी विश्वविद्यालय में या कॉलेज, या लाइब्रेरी में इसका काम है। लेकिन अगर कश्मीर की डल झील में तैरते हुए शिकारे पर अगर तेज रफ्तार वाई-फाई की सहूलियत को कोई कामयाबी माने, तो वैसे लोग नासमझ छोड़ कुछ नहीं होंगे। आज कुछ लोग पखाने में स्मार्ट फोन और लैपटॉप लेकर जाने लगे हैं, आगे चलकर इस जीवन शैली से होने वाले नुकसान सामने आने लगेंगे, वैसे भी इन डिजिटल और ऑनलाईन औजारों ने एक परिवार के लोगों के बीच भी खाई खोदने का काम तो कर ही दिया है, और इसी काम को सरकार किसी तालाब या बगीचे में इंटरनेट मुफ्त देकर आगे बढ़ा रही है। 
आज भारत के प्रदेशों और शहरों में सरकारों से परे किसी दूसरे तबके की कोई दखल नहीं रह गई है। लोगों की असहमति, उनका विरोध, उनकी भड़ास अब सरकार पर निकलने के बजाय सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों पर निकल जाती है। और वहां पर असहमति दर्ज करके लोग यह मान लेते हैं कि उनके सामाजिक सरोकार पूरे हो गए हैं। सरकारों के लिए इससे अधिक सहूलियत की और कोई बात नहीं हो सकतीं कि लोगों का विरोध सड़कों पर एकजुट होने के बजाय ऐसी वेबसाईटों पर बिखर जाता है जिनको पढऩा भी सरकार की मजबूरी नहीं होती। दुनिया की जिंदगी के सरकारीकरण को अगर कम नहीं किया गया तो सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक, और निजी जीवन मूल्य सरकारें ही तय करेंगी, क्योंकि सरकार जो तय करती है, उसमें खासे कमीशन की एक गुंजाइश होती है। जिन लोगों से शाम के सैर-सपाटे की जगह पर वाई-फाई के विरोध की उम्मीद की जानी चाहिए, वे अपने ऑनलाईन औजारों को लेकर तालाब किनारे पहुंचने लगेंगे, और इंसानी रिश्तों की जरूरतें उस तालाब में डूब मरेंगी। 

मोदी और मीडिया के बीच मिलने की शुरूआत हुई...

25 अक्टूबर 2014
संपादकीय
दिल्ली में आज सुबह भाजपा के दीवाली-मिलन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पत्रकारों से रूबरू हुए। बरसों से उनके मीडिया के साथ रिश्ते बड़े असहज चले आ रहे थे, और उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद भी बात कुछ सुधरी नहीं थी। उन्होंने अब तक की परंपराओं को छोड़कर मीडिया के चुनिंदा लोगों को सरकारी खर्च पर प्रधानमंत्री के विदेश प्रवास पर ले जाना बंद कर दिया, और अपनी सरकार के लोगों से कहा कि वे मीडिया से बातचीत के लिए सरकारी रेडियो-टीवी को प्राथमिकता दें। उनकी सरकार से खबरों का रिस-रिसकर बाहर आना भी बंद हो गया, क्योंकि मोदी के कड़क मिजाज के चलते मंत्रियों और अफसरों में हमेशा से चले आ रहा मनमानी का एक रूख अब खत्म हो चुका है। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री के मीडिया-सलाहकार की परंपरा भी खत्म कर दी, और गुजरात के अपने एक पुराने भरोसेमंद आम अफसर को लाकर सिर्फ प्रेस अधिकारी बनाया, जिनका काम प्रधानमंत्री के बयान या उनके कार्यक्रम के कागज जारी करना है। 
कुल मिलाकर पिछले तीन-चार महीनों में नरेन्द्र मोदी और भारत के मीडिया के बीच अधिक बातचीत नहीं हुई, और उन्होंने देश के लोगों के साथ अपनी सोच बांटने के लिए सीधे सरकारी मीडिया का इस्तेमाल किया, या फिर न्यूयॉर्क के कार्यक्रम की तरह उन्होंने सार्वजनिक मंच से लोगों से सीधे बात की, और भारत के मीडिया की यह मजबूरी रही कि अपने खर्च पर उसे अपने दर्जन-दर्जन भर लोगों को अमरीका भेजना पड़ा, और मोदी के पल-पल को अपने चैनलों पर दिखाना पड़ा। यह सब कुछ एक बहुत नए अंदाज का मीडिया संबंध था, और है। अंग्रेजी में जिसे जमी हुई बर्फ को तोडऩा कहते हैं, वैसी ही इस असहज स्थिति को आज भाजपा के दीवाली मिलन पर तोडऩे का एक मौका दोनों तरफ के लोगों को मिला, और आने वाले दिन ही बताएंगे कि मोदी की मीडिया नीति, उनकी मीडिया शैली कैसी होगी। 
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में पिछले दस बरसों में हमने एक ऐसे प्रधानमंत्री को देखा था जो कि साल में एक बार मीडिया से बात करता था, और जनता से बात करने का कोई सिलसिला भी नहीं था। वह ऐसा वक्त था जब सत्तारूढ़ गठबंधन यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी भी न के बराबर बोलती थीं, और सरकार या पार्टी, या गठबंधन की सोच के लिए मीडिया और लोगों को सत्ता के लोगों द्वारा अच्छी या बुरी नीयत से फैलाई गई बातों पर निर्भर रहना पड़ता था। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सीधे जनता से इतना अधिक बोलते हैं, कि उनकी सोच को लेकर लोगों को अटकलबाजी नहीं करनी पड़ती। यह भारत में प्रधानमंत्री के स्तर पर कामकाज के तौर-तरीके में एक बड़ा फर्क है। जाहिर तौर पर यह लगता है कि गुजरात दंगों के बाद से जिस मीडिया ने मोदी को बुरी तरह घेरा था, उस मोदी ने हिसाब चुकता करने के अंदाज में मीडिया को यह बता दिया है कि उनको मीडिया की वैसी कोई जरूरत नहीं है, जैसी कि मीडिया को उनकी है। फिर भी ऐसे रूख के बावजूद अपने शब्दों को लेकर वे विनम्र बने रहे हैं, और आज भी कुछ मिनटों की अपनी बात में उन्होंने मीडिया पर कोई ताने नहीं कसे। 
हमारा मानना है कि जिस तरह लोकतंत्र में बहुत से बुरे तजुर्बे भुलाकर ही आगे बढ़ा जा सकता है, उसी तरह नरेन्द्र मोदी और मीडिया को एक-दूसरे के साथ लोकतांत्रिक जरूरतों के मुताबिक रिश्ते रखने चाहिए। इनमें ऐसी किसी मिठास की जरूरत नहीं है जो कि मीडिया को भ्रष्ट करने के स्तर तक देश में कई सरकारों और पार्टियों द्वारा लगभग हमेशा ही फैलाई जाती रही है।  दूसरी तरफ भारत जैसे लोकतंत्र में प्रधानमंत्री को मीडिया की पहुंच और क्षमता को ध्यान में रखते हुए उसके साथ ऐसे रिश्ते जरूर रखने चाहिए जो कि जनता तक पहुंचने के लिए जरूरी हों, या जनता की बातों को सुनने के लिए जरूरी हों। भारत और दुनिया में आज मोदी का समाचार-महत्व इतना है कि हिन्दुस्तानी मीडिया में कोई भी न उनको अनदेखा कर सकता है, और न ही उनको कम आंक सकता है। बहुत से मामलों में तो ऐसा लगता है कि गलाकाट मुकाबले में लगा हुआ मीडिया का एक तबका अपनी खुद की हस्ती के लिए मोदी पर निर्भर करता है, क्योंकि लोग उनको देखना चाहते हैं, पढऩा और सुनना चाहते हैं। यह भारतीय प्रधानमंत्री के लिए एक बहुत ताकत की बात है कि लोगों के बीच उनको लेकर ऐसी उत्सुकता है। ऐसे में वे मीडिया से परहेज के बजाय, उससे जरूरत के लायक ऐसे रिश्ते रख सकते हैं जैसे कि लोकतंत्र में उसके दो स्तंभों को एक-दूसरे से रखने चाहिए। किसी मेज के दो पाये आपस में लिपटकर भी उसका संतुलन बनाकर नहीं रख सकते, यह याद रखते हुए ही दोनों पक्षों को एक-दूसरे से उम्मीदें रखनी चाहिए। बीते बरसों को लेकर कोई शिकायत न करके नरेन्द्र मोदी ने आज अपने पद की गरिमा के मुताबिक बड़प्पन दिखाया है, और प्रधानमंत्री को ऐसा ही करना भी चाहिए था। 

लक्ष्मी पूजा के दिन तस्वीरों, प्रतिमाओं से परे की बात

22 अक्टूबर 2014 
संपादकीय 

भारत का एक बड़ा हिस्सा कल लक्ष्मी पूजा की तैयारी में लगा हुआ है। देश की सांस्कृतिक परंपरा के मुताबिक सरकारी दफ्तरों की तिजोरियों की और बैंकों में रखी नगदी की भी पूजा होगी, और भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के भीतर कभी कोई इस बात पर सवाल नहीं करते कि सरकारी खजानों की किसी एक धर्म के मुताबिक पूजा क्यों होनी चाहिए। इसलिए देश की संस्कृति धर्म पर हावी है, और दूसरे धर्मों के कारोबारी भी इस दिन लक्ष्मी की पूजा करते हैं। इस पूजा को संपन्नता से जोड़कर देखा जाता है, कमाई से जोड़कर देखा जाता है, और धन की देवी लक्ष्मी का सम्मान इतना होता है कि जब किसी के घर लड़की का जन्म होता है, तो कुछ लोग खुशी में, और कुछ लोग हमदर्दी जताने के लिए यह कहते हैं कि लक्ष्मी आई है। कोई भी यह नहीं कहते कि सरस्वती आई है, या दुर्गा आई है। 
लेकिन लक्ष्मी पूजा करने वाला भारतीय समाज चाहत के बिना आ गई लक्ष्मी का क्या हाल करता है, यह भी इस मौके पर सोचना चाहिए। लक्ष्मी के मुकाबले सरस्वती का महत्व कम रहता है, इसलिए लोग लड़की को लक्ष्मी से जोड़कर देखते हैं, और इसीलिए हम आज इस मौके पर भारत की जीती-जागती लक्ष्मियों के बारे में बात करना चाहते हैं। जो लोग इस दिन पूजा की तैयारी में कई दिन से साज-सज्जा कर रहे होंगे, वे भी अपने घर की अजन्मी लक्ष्मी से लेकर पैदा हो चुकी लक्ष्मी तक, गृहलक्ष्मी से लेकर घर आई बहू तक, और घर में बुजुर्ग बच गई बूढ़ी लक्ष्मी मां तक से कैसा बर्ताव करते हैं, यह सोचने की बात है। समाज में सामाजिक स्तर पर सोचने की बात है कि लड़कियों के लिए लोगों का नजरिया कैसा है। फिक्र की बात इसलिए भी है कि एक बुजुर्ग नेता जो कि हरियाणा के मुख्यमंत्री होने जा रहे हैं, उन्होंने पिछले दिनों अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही लड़कियों के लिए भारी भेदभाव की अपमानजनक बातें कही थीं। अब ऐसे लोग अगर ताकत की और कानून की ऊंची कुर्सियों पर पहुंचते हैं, तो उनकी सार्वजनिक जगहों पर कही गई बातें, उनके मातहत लोगों की सोच बन जाना अनिवार्य सा हो जाता है। देश के संविधान में महिला को बराबरी का दर्जा दिया गया है, लेकिन संविधान की शपथ लेने वाले लोग इस भावना के खिलाफ खुल कर बातें करते हैं, और भारतीय लोकतंत्र में इसका कोई इलाज भी नहीं दिखता। 
लक्ष्मी पूजा के दिन हम जिंदा लक्ष्मियों की चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि एक तस्वीर या एक प्रतिमा की पूजा करने के बजाए अधिक जरूरी यह है कि समाज के भीतर महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया जाए। जीवित महिलाओं को पांव की जूती माना जाए, और तस्वीरों की पूजा की जाए, यह सिवाय बेइंसाफी कुछ नहीं हो सकता। आज के दिन लोगों को गृहलक्ष्मी, समाजलक्ष्मी, और पड़ोसलक्ष्मी के बारे में सोचना चाहिए।

देश में नेताओं और पार्टियों के लिए अपने आपको को सुधारने का वक्त

21 अक्टूबर 2014
संपादकीय

देश के आम चुनावों के बाद से अब तक जगह-जगह भारतीय जनता पार्टी आगे बढ़ी है, और कांग्रेस के हाथ से दो राज्य तो सीधे-सीधे निकल गए हैं। कुछ लोगों कांग्रेस अब खत्म लग रही है, और कुछ हद तक आज की तारीख में यह बात सही भी है। लेकिन लोगों को याद रखना चाहिए कि अभी कुछ दशक पहले की ही बात है कि भाजपा के पास लोकसभा में कुल दो सीटें थीं, और आज कांग्रेस के पास उससे 22 गुना अधिक सीटें हैं। इसलिए गणित का कोई सिद्धांत कुछ बरसों बाद कांग्रेस की बहुमत पर वापसी को नहीं नकार सकता। अब यह एक अलग बात है कि भाजपा और कांग्रेस के बीच महज आंकड़ों को लेकर कोई तुलना करना राजनीतिक समझदारी नहीं होगी। दोनों पार्टियों के बीच अपने मिजाज को लेकर, अपनी परंपराओं को लेकर एक बड़ा फर्क है, और यही बात कांग्रेस के पक्ष में किसी अंकगणित की संभावना के खिलाफ जाती है। 
यह समझने की जरूरत है कि भारतीय जनता पार्टी ने पिछले इन दशकों में दो से लेकर साढ़े तीन सौ से अधिक सीटों तक का सफर दर्जनभर पार्टी अध्यक्षों के मार्फत तय किया था, और कांग्रेस पार्टी न सिर्फ इस पूरे दौर में, बल्कि इसके दशकों पहले से महज एक कुनबे के मातहत काम कर रही थी। बीच के कुछ बरसों में कांग्रेस के सफाई कर्मचारी गिना सकते हैं कि वे नेहरू-गांधी परिवार की लीडरशिप के बाहर भी रहे, लेकिन हकीकत में इस परिवार के कब्जे या छाया से कांग्रेस कभी परे नहीं रही। अब यही परिवार इस पार्टी की सबसे बड़ी ताकत भी है, और अगर चुनावी नतीजों को देखें, तो यही परिवार इस पार्टी का सबसे बड़ा बोझ भी दिखता है। बहुत से लोगों का यह मानना है कि कांग्रेस को एक बार तो राहुल गांधी की संभावनाओं से परे होकर देखना पड़ेगा, उसके बिना इसका कोई भविष्य नहीं है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी बहुत से अध्यक्षों, और बहुत से फेरबदलों से गुजरते हुए यहां तक पहुंची है। 
लेकिन हम कांग्रेस को एकदम गहरे, अंधेरे, गड्ढे में गिरा हुआ नहीं देखते। उसकी संभावनाओं को हम पूरी तरह खत्म नहीं देखते, क्योंकि पिछले 10 बरसों में उसने केंद्र सरकार चलाते हुए, हरियाणा और महाराष्ट्र चलाते हुए जितना व्यापक  भ्रष्टाचार किया, उसका नतीजा भी है कि भाजपा एक बेहतर ईमानदारी के वायदे के साथ सत्ता पर आई। अब आने वाले बरसों में भाजपा के सामने खतरे अधिक रहेंगे, और कांग्रेस के पास मेहनत करने का मौका अधिक रहेगा। लेकिन हम आज इस मुद्दे पर ही लिखने के बजाए बात को इस तरफ मोडऩा चाहते हैं कि भ्रष्टाचार का अंत किस तरह होता है। एक राष्ट्रीय पार्टी, एक राष्ट्रीय शर्म बनकर रह सकती है, और दो सांसदों वाली पार्टी पूरे देश में सबसे कामयाब हो सकती है। इस नौबत को देखकर देशभर में राज्य सरकारों से लेकर नगर निगमों तक और पंचायतों तक लोगों को सोचना चाहिए कि उनके काम तभी तक खप सकते हैं जब तक वे भी भ्रष्ट हों, और उनके मुकाबले दूसरे लोग भी उतने ही भ्रष्ट हों। ऐसा जब नहीं होगा, तब कुछ कम भ्रष्ट विकल्प को लोग लपक लेंगे। मोदी के साथ यही हुआ है। उनकी निजी जिंदगी को लेकर, उनके परिवार को लेकर, उनकी जायदाद को लेकर, या उनकी कमाई को लेकर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं हैं। दूसरी तरफ देश में कांग्रेस पार्टी केंद्र से लेकर राज्यों तक इन्हीं तमाम बातों से लदे हुए चल रही थी, और ऐसे बोझ की बोरियों को ढोते हुए कोई भी पार्टी या नेता चुनावी मुकाबले में जीत नहीं सकते। 
पूरे देश में लोगों को यह सबक लेना चाहिए कि उनका भ्रष्टाचार लंबे समय तक नहीं चल सकता। आने वाले दिन हो सकता है कि देश में एक अलग राजनीतिक संस्कृति लेकर आएं, क्योंकि नरेन्द्र मोदी कई किस्म के बोझों से परे के ऐसे इंसान हैं, जो कि महज पानी पीकर नौ दिन अमरीका और हिन्दुस्तान को लगातार रौंद सकते हैं। ऐसे माहौल में हर पार्टी और हर नेता को अपने आपको सुधार लेना चाहिए। 
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महाराष्ट्र की राजनीति से निकले सबक आम-खास सब लोगों के काम के हैं...

20 अक्टूबर 2014
संपादकीय

मुंबई में आज इस वक्त भाजपा और शिवसेना के बीच एक तालमेल की चर्चा और संभावना चल रही है। दूसरी तरफ देश और प्रदेश में बेघर हो चुके राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार अपने कुनबे के खिलाफ खड़ी बड़ी-बड़ी जांचों के चलते अपने समर्थन को चांदी की तश्तरी पर रखकर कल से भाजपा के दरवाजे पर खड़े हैं। कल शाम ही शिवसेना के उद्धव ठाकरे ने मीडिया से बात करते हुए समझौते का रूख भी दिखाया, लेकिन यह रूख उनकी जानी-पहचानी, तीखी जुबान से ही निकलकर आया, और दही का यह खट्टा छींटा, दूध को फाड़ देने का खतरा रखता है। 
भाजपा और शिवसेना के गठबंधन पर लिखने की आज हमारी कोई नीयत नहीं है क्योंकि कल ही हमने इस बारे में लिखा है। लेकिन इन दोनों के बीच पचीस बरसों के रिश्ते किस तरह पिछले पचीस दिनों में खटास का शिकार हो गए, उससे मिलने वाले सबक पर हम जरूर लिखना चाहते हैं। जिंदगी में न सिर्फ राजनीतिक दलों में, बल्कि इंसानों के बीच भी, एक घर के लोगों के बीच भी तनातनी होती है, और वैसे में जुबान से कई ऐसी तीखी बातें निकल जाती हैं, जो न तो जायज होतीं, और न ही किसी के फायदे की होतीं। दरअसल कुदरत ने बत्तीस तीखे दांतों के बीच में बिना हड्डी वाली एक नर्म जुबान बनाकर इंसानों को एक नसीहत दी है, यह एक अलग बात है कि सबसे समझदार इंसान भी लिखे हुए शब्दों को ही पढऩा जानते हैं, कुदरत की नसीहत, और लोगों के तजुर्बे से कुछ सीखना कम ही चाहते हैं। 
शिवसेना और भाजपा के बीच जितनी कड़वाहट चुनावी मतभेद और मनभेद के चलते हुई, उससे कहीं अधिक कड़वाहट जुबानी जंग में हुई। और इस मामले में अपनी पारिवारिक परंपरा के मुताबिक शिवसेना के उद्धव ठाकरे बढ़-चढ़कर आगे रहे और उन्होंने शिवाजी की पीठ में छुरा भोंकने वाले दगाबाज अफजल खान से भाजपा की तुलना करते हुए तकरीबन रोज ही भाजपा पर हमला किया। दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी ने पहले दिन की आमसभा से लेकर आखिरी दिन के प्रचार तक अपनी इस बात को निभाया कि बाला साहब ठाकरे को श्रद्धांजलि के रूप में वे चुनावी सभाओं में शिवसेना के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे। आज की शिवसेना की नौबत को देखते हुए हर आम और खास इंसान को यह सबक लेना चाहिए कि बिना जरूरत इतना कड़वा न उगलें, कि उसे निगलने में दिक्कत हो। 
कभी-कभी जुगाली करती हुई भैंस को देखकर भी लगता है कि उससे भी एक बात सीखी जा सकती है कि किसी चीज को निगलने के पहले उसे खासा चबाना चाहिए, यह बात चिकित्सा विज्ञान के हिसाब से भी ठीक है, और इंसान की जिंदगी के लिए भी ठीक है कि कुछ निगलने या उगलने के पहले उसे चबाकर उसका ठीक-ठीक स्वाद ले लेना चाहिए, और कम से कम उतनी देर मुंह किसी बकवास से बचता भी है। लेकिन इंसान हैं कि वे अपनी बददिमागी और बदमिजाजी के सामने किसी और से कोई सबक लेना मानो चाहते ही नहीं हैं। महाराष्ट्र में बात इतनी बिगड़ी न होती, अगर चुनावी जंग में, और उसके भी पहले गठबंधन के लेन-देन के मोलभाव में, शिवसेना ने इतना कड़वा न उगला होता। 
आने वाले वक्त का अंदाज हर किसी को नहीं लग पाता, और कई बार सारी उम्मीदें धरी रह जाती हैं, और कब किसकी जरूरत पड़ जाए, उसका ठिकाना नहीं रहता। आज मुंबई में शिवसेना की हालत यह हो गई है कि अगर भाजपा के दरबार में उसे जगह नहीं मिलती, तो शायद मुंबई महानगरपालिका भी अगले चुनाव में उसके हाथ से निकल जाएगी। और उसके बाद उसके पास अपने अस्तित्व का खतरा खड़ा हो जाएगा। वक्त अच्छा हो, या बुरा, जुबान अच्छी रखनी चाहिए। और जैसा कि राजनीति के बारे में पूरी दुनिया में कहा जाता है कि कब किसके  साथ हमबिस्तर होना पड़े, इसका कुछ पता नहीं होता, इसलिए लोगों को एक-दूसरे से रिश्ते उतने ही बिगाडऩे चाहिए कि जरूरत आने पर साथ सोने में दिक्कत न हो। 

कांग्रेस की फिक्र खत्म

19 अक्टूबर 2014
संपादकीय

महाराष्ट्र और हरियाणा के नतीजे भाजपा के लिए ढेर सी खुशी, और थोड़ी सी फिक्र लेकर आए हैं, लेकिन इन दोनों राज्यों पर काबिज कांग्रेस पार्टी के लिए अब फिक्र खत्म हो गई है। देश में कांग्रेस का हाल अब फिक्र के लायक नहीं रह गया, और अपने को लेकर उसे फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं रह गई। दोनों राज्यों में भाजपा के स्पष्ट बहुमत की भविष्यवाणी की जा रही थी, हरियाणा में तो वह सही साबित हुई, लेकिन महाराष्ट्र में भाजपा अपने बूते पर सरकार बनाने से कुछ कोस दूर रह गई है। वह सबसे बड़ी पार्टी तो है, लेकिन हाल ही में जिस शिवसेना से उसका बड़ा कड़वा तलाक हुआ, या तो भाजपा को उसी के साथ फिर घर बसाना होगा, या फिर आंकड़ों के मुताबिक भाजपा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर भी सरकार बना सकती है। हमारे इस जिक्र का यह मतलब नहीं है कि हम ऐसी कोई संभावना देख रहे हैं, क्योंकि गठबंधन टूटने के पहले भी हमने इसी जगह भाजपा और शिवसेना के बारे में लिखा था कि यह एक बड़ा प्राकृतिक और स्वाभाविक गठबंधन था। आज भी ऐसा लगता है कि महाराष्ट्र के भाजपा के नेता शिवसेना को साथ लेकर प्रदेश सरकार बनाने के हिमायती हैं। 
लेकिन इस अटकलबाजी में आज हम यहां की जगह खराब करना नहीं चाहते, आज हमारी फिक्र कुछ अलग है, और वह कांग्रेस पार्टी है। कांग्रेस यूपीए गठबंधन की मुखिया के रूप में खत्म हो चुकी है, और एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में कांग्रेस का अस्तित्व फिलहाल हाशिए पर चला गया है। लोकसभा के भीतर जिस तरह कांग्रेस को विपक्ष का दर्जा पाने का हक नहीं रह गया, उसी तरह देश में भी अब कांग्रेस विपक्ष नहीं रह गई है। किसी एक राज्य में कांग्रेस की अपनी सरकार शायद अब सिर्फ कर्नाटक में बची है, और ऐसी नौबत से कांग्रेस के उबरने की न कोई वजह दिखती, न कोई आसार दिखते। कांग्रेस की हालत अंधविश्वासियों की जुबान में साढ़े सती के शिकार एक ऐसे गरीब-फटेहाल की हो गई है, जिसका कि शनि भी और अधिक कुछ नहीं बिगाड़ सकता। 
यह बात भारतीय राजनीति में पिछले चार महीनों के भीतर एकदम से बदल चुकी तस्वीर है। एक तरफ तो देश पर जीतकर आई भाजपा अकेले अपने दम पर केन्द्र की सरकार बना चुकी है, और गठबंधन के साथी उसकी मजबूरी नहीं थे। दूसरी तरफ राज्यों में वह एक-एक करके गठबंधन से परे चुनाव लडऩा शुरू कर चुकी है, और आने वाले दिन बाकी राज्यों में भी कहीं-कहीं उसका ऐसा रूख देख सकते हैं। पुराने वोटरों को याद होगा कि आजादी के बाद लंबे समय तक भारतीय चुनावी राजनीति में कांग्रेस के मुकाबले बाकी सब रहते थे, इनमें कुछ राष्ट्रीय पार्टियां रहती थीं, और कुछ प्रादेशिक पार्टियां रहती थीं। लेकिन पूरा खेल कांग्रेस के विरोध में ही बंटा रहता था। आज देश की तस्वीर भाजपा के विरोध में जगह-जगह बंटे हुए खेल की है। भाजपा के खिलाफ किसी प्रदेश में कोई है, किसी प्रदेश में कोई और है, लेकिन पूरे देश में सबसे बड़ी, सबसे अधिक राज्यों पर राज करने वाली, सबसे अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली वह अकेली पार्टी बन चुकी है। 
यह तस्वीर एक तरफ तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, और उनके दाएं हाथ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की कामयाबी बताती है, और भाजपा को इस तस्वीर पर फख्र करने की ठोस वजहें हैं, लेकिन दूसरी तरफ अगर अलग-अलग राज्यों को देखें, तो अधिकतर राज्यों में अपने स्थानीय खराब राज के चलते वोटरों को भाजपा की तरफ धकेला है। हरियाणा को देखें, तो कांग्रेस की सरकार किस्म-किस्म की बदनामियों से घिरी हुई थी, और इससे कुछ अधिक बुरा हाल महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार के भ्रष्टाचार का था। वोटरों के पास कांग्रेस-एनसीपी ने, या यूपीए ने, या कहें कि कांग्रेस ने कोई विकल्प छोड़ा नहीं था। आज पूरे देश में भाजपा की बढ़ती सीटें, उसके बढ़ते प्रदेश, उसके बढ़ते वोट के पीछे एक बात जो हमको नजर आती है, वह यह कि अलग-अलग प्रदेशों में एक टीना-फैक्टर रहा है। देयर इज नो ऑल्टरनेटिव, इसका कोई विकल्प नहीं है, यह नौबत वोटरों को भाजपा की तरफ धकेलते रही। अभी हम इस मुद्दे पर और अधिक नहीं लिख रहे हैं, क्योंकि कल तक शायद महाराष्ट्र में होने वाले गठबंधन के बाद बात को आगे बढ़ाने का मौका मिलेगा। और दूसरी तरफ कांग्रेस की फिक्र अब खत्म हो चुकी है।

जयललिताओं के हाथों में खेलते लोकतंत्र की कहानी

18 अक्टूबर 2014
संपादकीय

तमिलनाडू की पिछली मुख्यमंत्री और अन्नाद्रमुक पार्टी की मालकिन जयललिता को कल सुप्रीम कोर्ट से बहुत सी शर्तों के साथ जमानत मिली, तो उनके राज्य में समर्थकों का एक बड़ा तबका खुशी से झूम उठा। उनको एक निचली अदालत से सजा मिलने के बाद कुछ लोगों के खुदकुशी करने की खबरें भी आई थीं, उनके पीछे की सच्चाई एक अलग जांच का मुद्दा है। लोगों को याद होगा कि जब आन्ध्र में मुख्यमंत्री वाई.एस.आर. रेड्डी गुजरे थे, तो वहां भी बहुत से लोगों के आत्महत्या की खबरें आई थीं, और कई लोगों के इसी गम में सदमे से गुजर जाने के किस्से भी सामने आए थे। फिर यह भी सामने आया था कि इनमें से कुछ मामले साधारण मौतों को भुगतान करके सदमा-मौतों में तब्दील करवाने के थे। तमिलनाडू में दोनों किस्म की बातें हो सकती हैं, और वहां पर जनता के बीच जो गम का सैलाब मीडिया के मार्फत बाहर आता है, उसका इंतजाम करना भी ऐसे नेता के लोगों के लिए मुश्किल नहीं है जिसे कि अदालत ने भ्रष्ट कमाई में से सौ करोड़ का जुर्माना सुनाया है। 
लेकिन अभी हम कैमरों की भूख मिटाने के लिए पेश किए गए नजारों से परे की यह बात करना चाहते हैं कि चुनावों में भ्रष्ट लोग किस तरह जीतकर आ जाते हैं? अब तमिलनाडू की ही बात करें, तो वहां पर एक तरफ तो अन्नाद्रमुख की मुखिया जयललिता सजायाफ्ता मुजरिम हैं, और उनकी दौलत जाहिर है कि सरकार के चलते ही जुटी थी। लेकिन यह मामला चलते हुए भी वे और उनकी पार्टी चुनाव जीतते रहे, और वोटरों के एक बड़े तबके में उनकी शोहरत बनी रही। वे लोगों को सस्ती इडली देती रहीं, सस्ता पानी, सस्ता आटा, सस्ता सीमेंट, मुफ्त का मंगलसूत्र, और भी न जाने क्या-क्या। नतीजा यह हुआ कि जब चुनाव हुए तो किसी को जयललिता के भ्रष्टाचार से खास दिक्कत नहीं दिखी, और वे भारी बहुमत से अपने लोगों को जिताकर ले आईं। यही हाल देश के दूसरे बहुत से प्रदेशों का है, जहां पर कि भ्रष्ट नेता अपने कुनबों सहित बार-बार जीत जाते हैं, सरकार चलाते हैं, और अगली कुछ और पीढिय़ों के लिए काली कमाई जुटा जाते हैं। 
भारत के लोकतंत्र में लगातार चुनाव होने, और मतदान में गड़बड़ी करीब-करीब खत्म हो जाने को लोकतंत्र की बड़ी कामयाबी माना जाता है। हमारा मानना है कि साफ-सुथरा मतदान किसी इंसानी बदन पर सिर के बालों जितना ही वजन रखता है। बाकी की पूरी की पूरी देह की हालत लोकतंत्र की बाकी हालत बताती है। जब कोई नेता पूरे पांच बरस अपने इलाके के वोटरों पर काली कमाई खर्च करता है, एक हाथ लूटता है, और दूसरे हाथ रॉबिन हुड की तरह गरीबों को बांटता है, तो यह कैसा लोकतंत्र है? क्या लूट का कुछ हिस्सा जनता को बांट देना जनतंत्र हो सकता है? दूसरी बात यह कि चुनाव के वक्त जितने बड़े पैमाने पर वोटों की खरीदी होती है, जाति और धर्म के आधार पर, मिलते-जुलते नाम के आधार पर धोखा देने के लिए फर्जी उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं, वोटरों को तोहफे बांटे जाते हैं, शराब बांटी जाती है, नगदी बांटी जाती है, और विपक्षी उम्मीदवार के कार्यकर्ताओं को खरीदा जाता है, तो उसके बाद चुनाव कितना ईमानदार रह जाता है? और बात यहीं खत्म नहीं होती, ऐसे जीतकर आए हुए सांसदों और विधायकों को सरकार बनाने के लिए एक बार फिर खरीदा और बेचा जाता है। 
भ्रष्टाचार, खरीद-बिक्री, जाति और धर्म की नफरत, जोड़तोड़, कानूनी सीमा से पचीस-पचास गुना अधिक खर्च करने के बाद जो राजनीति चलती है, वह आने वाले बरसों में फिर सौ कमाने और दस बांटने का सिलसिला जारी रखती है। अब ऐसे लोकतंत्र को क्या माना जाए? भारत के चुनावों में जयललिताओं के सत्ता पर आने को यही कहा जा सकता है कि यहां लोकतंत्र, चुनावों को भ्रष्टाचार से सबसे अधिक प्रभावित करके जीतने का नाम है। और ऐसा लोकतंत्र अपने आपको जनता के फैसले का तमगा लगाकर भी घूमता है, अपने आपके निर्वाचित होने का झांसा फैलाते हुए घूमता है। खरीदने और जोडऩे-तोडऩे की सबसे अधिक ताकत का नाम भारतीय लोकतंत्र हो गया है, और यह झांसा खत्म होने का कोई आसार नहीं दिखता। जिसके पास नोट हैं, उसे उन लोगों का डर दिखाएं जिनके पास कि वोट हैं, और जिनके पास वोट हैं उनको उन लोगों का डर दिखाएं, जिनके पास कि नोट हैं, और फिर दोनों से वसूली-उगाही करें, पैसे कमाएं-सत्ता में आएं, यही सिलसिला देश भर में चल रहा है। ऐसे में साफ-सुथरा मतदान लोकतंत्र के सिर पर बालों की तरह है, जिससे कि बदन की सेहत का कोई लेना-देना नहीं रह जाता। 

लक्ष्मी पूजा के इस मौके पर लक्ष्मीपुत्रों को सोचना चाहिए

17 अक्टूबर 2014
संपादकीय
दुनिया में एक तरफ अफ्रीका के देश इबोला जैसी जानलेवा और संक्रामक बीमारी के शिकार होकर हजारों जिंदगियां खोने के करीब हैं और दूसरी तरफ सउदी अरब के शाही परिवार की तस्वीरें छपी हैं कि किस तरह वहां के राजा ने अपनी बेटी को उसकी शादी पर सोने का बना हुआ अरबों रूपए लागत वाला पखाना दिया है, और उसके शादी के जोड़े को सोने से एक पिरामिड की शक्ल का बनाया गया है। सउदी अरब का यह राजा दुनिया के सबसे दौलतमंद लोगों में से एक है, और मुस्लिम दुनिया का यह सबसे ताकतवर इंसान भी माना जाता है। अपने तेल के कुओं और अपनी दौलत के चलते यह आदमी अमरीका का पसंदीदा भी है। 
लेकिन राजनीतिक बातों से परे यह सोचें कि दुनिया में एक तरफ तो बच्चे कुपोषण का शिकार होकर मर रहे हैं, लोगों के पास खाने को नहीं है, और दूसरी तरफ किसी के पखाने के लिए ठोस सोने का इंतजाम किया जा रहा है। इन दो बातों को जोड़कर देखें तो यह साफ दिखता है कि किसी ईश्वर की या तो कोई मौजूदगी नहीं है, और अगर है, तो उस ईश्वर की ऐसी किसी इंसानियत में कोई दिलचस्पी नहीं है जिसे कि लोगों के बीच एक भली भावना माना जाता है। इंसानियत अपने आपमें बड़ा दगाबाज शब्द है, और लोग इंसानों की सिर्फ अच्छी-अच्छी बातों को इंसानियत मान लेते हैं, और बुरी-बुरी बातों के लिए इंसान से परे एक हैवान नाम की तस्वीर गढ़कर सारी तोहमत उस पर मढ़ देते हैं। हकीकत यह है कि इंसान के भीतर ही उसका एक हिस्सा हैवान है, और किसी वक्त इंसान के भीतर अच्छी बातें जीतती हैं, और कई बार बुरी बातें जीतती हैं। अब आज जब दुनिया में पहली पीढ़ी के कामयाब लोग, बिल गेट्स और मार्क जुबरबर्ग, जैसे लोग अपनी खुद की कमाई हुई दौलत का एक बड़ा हिस्सा समाजसेवा के लिए दे रहे हैं, तब सउदी अरब के इस राजा को विरासत में मिली खानदानी दौलत, और कुदरत के दिए हुए तेल के कुओं का इस्तेमाल सोने से बनाए गए पखाने में बेहतर लग रहा है। और दुनिया में इबोला और गरीबी से मरते हुए लोगों की खबरें छाई हुई हैं। जाहिर है कि इस राजा के भीतर का हैवान उस पर हावी है, जो कि अपनी दौलत को अपनी औलादों के लिए इस तरह सहेजकर रख रहा है कि बाकी पूरी दुनिया चाहे मर जाए।
इस मुद्दे पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि भारत में कुछ ही उद्योगपति ऐसे हैं जिनके भीतर कमाई के बाद उनका इंसान जिंदा रहता है, और कमाई का एक हिस्सा सीधे गरीबों को देने को सोचता है। दूसरी तरफ अधिकतर खरबपति ऐसे हैं, जिनके हाथ से जब कुछ निकलता भी है, तो वह ईश्वर के नाम पर निकलता है, और मशहूर मंदिरों में जाकर वे करोड़ों के मुकुट चढ़ा आते हैं। लेकिन हिन्दुस्तान के भीतर कुपोषण और गरीबी की खबरों को पढ़ते हुए भी उनके हाथ से अपनी दौलत का एक हिस्सा भी नहीं निकलता है। यह बात सही है कि हिन्दुस्तान और बाकी दुनिया के कानून लोगों को अपनी दौलत पर इसी किस्म का हिंसक हक देते हैं कि दूसरे चाहे भूखे मर जाएं, वे खुद सोने पर पखाना करें। और यह बात दुनिया के सबसे दौलतमंद लोगों पर ही लागू नहीं होती, जरूरत से अधिक दौलत बहुत लोगों को हिंसक बना देती है, इसलिए कम दौलतमंद लोगों से भी हम यह उम्मीद करते हैं कि वे आसपास के लोगों की तकलीफों को कम करने के लिए अपनी क्षमता के भीतर कुछ न कुछ करें।
दीवाली का यह त्यौहार संपन्नता और दौलत की पूजा का त्यौहार है, और इस मौके पर भी लोगों को अपनी संपन्नता और बाकी समाज की जरूरत के बारे में कुछ पल सोचना चाहिए। इस मौके पर हम हिन्दुस्तान के अजीम प्रेमजी जैसे लोगों का नाम लेना चाहेंगे जिन्होंने बच्चों की पढ़ाई के लिए अपनी दौलत का एक बड़ा हिस्सा दे दिया है, और खरबपति रहते हुए भी विमान में वे इकॉनामी क्लास में सफर करते हैं, जबकि उनकी ताकत अपने खुद के विमान खरीदकर उनमें सफर करने की है। दूसरी तरफ कुछ ऐसे कारखानेदार भी हैं, जो कि मंदिर तो ईश्वर का बनवाते हैं, लेकिन उनका नाम अपने कुनबे पर बिड़ला मंदिर रखते हैं, मानो मिल्कियत बिड़ला की हो, और ईश्वर उसमें किरायेदार हो। लक्ष्मी पूजा के मौके पर लक्ष्मीपुत्रों को कुछ सोचना चाहिए, क्योंकि ईश्वर की अगर सोचने की ताकत होती, तो दुनिया में इतना बेइंसाफ बंटवारा नहीं हुआ होता। आज जो लोग अपने से परे दूसरों के बारे में सोचते और करते हैं वे ही ईश्वर की धारणा पर खरे उतरते हैं।

दीवाली के बहाने, इस मौके पर हमारी वही पुरानी सलाह फिर से

16 अक्टूबर 2014
संपादकीय
आज जब हिन्दुस्तान का तकरीबन पूरा ही हिस्सा एक बड़े त्योहार दीवाली की तैयारियों में लगा है, उस वक्त देश में हर तरफ एक सफाई अभियान की चर्चा भी चल रही है। सड़कों के किनारे झाड़ू लिए हुए नेता और अफसर तस्वीरें खिंचवाकर छपवा भी चुके हैं, और उसके बाद अब शहरी इलाके फिर से घूरे जैसे दिखने लगे हैं। ऐसे में सार्वजनिक जगहों से परे, निजी जिंदगी में भी एक सफाई की गुंजाइश बनती है और इसके बारे में लोगों को सोचना चाहिए। हम हर बरस इन्हीं दिनों इस मुद्दे पर लिखते हैं, और हो सकता है कि कुछ लोगों पर उसका असर भी होता है। 
मध्यम वर्ग और उससे ऊपर के तबकों में, घरों में बहुत से सामान ऐसे रहते हैं जो कि कचरा नहीं रहते, खराब नहीं रहते, लेकिन वे बेकार पड़े रहते हैं, या बेकाम रहते हैं। चीजों का मोह ऐसा रहता है कि लोग कई बार बच्चों के झूले, उनको घुमाने की गाडिय़ां, अगली पीढ़ी तक सम्हालकर रख लेते हैं। यही हाल कपड़ों और जूतों का रहता है, नए सामान आते जाते हैं, और पुरानों की बिदाई कभी नहीं हो पाती। संपन्नता जितनी अधिक रहती है, घरों में कबाड़ उसी अनुपात में बढ़ते चलता है। घर पर कोई साइकिल चलाने वाले नहीं रह जाते, लेकिन जंग खाती साइकिल रह जाती है। लेकिन बड़े सामानों से परे, बहुत से छोटे सामान भी रहते हैं। दवाइयां बची रह जाती हैं, बदले हुए नंबरों के नए चश्मे आ जाते हैं, और पुराने चश्मे पड़े रहते हैं। ऐसे अनगिनत सामान रहते हैं जिनको कि दूसरे जरूरतमंद लोग इस्तेमाल कर सकते हैं। 
कई बरस पहले हमने इसी जगह पर 'दस का दमÓ नाम का एक ऐसा अभियान सुझाया था कि जिसके तहत उत्साही लोग दस-दस के समूह बनाएं, और अपने आसपास के लोगों के घरों से फालतू सामान इक_ा करके उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाने का काम करें। हमने यह भी सुझाया था कि जिस तरह नेटवर्क मार्केटिंग के नाम पर झांसा देने वाली कंपनियां अपनी चेन बढ़ाती चलती हैं, उसी तरह नेक काम का सिलसिला भी फैलते चल सकता है, और उत्साही लोगों में से हर कोई अपने साथ ऐसे दस लोगों को जोड़ सकते हैं, जो कि आगे वैसे ही दस-दस उत्साही लोगों को जोडऩे के लिए तैयार हों। हमने यह बात कई बरस पहले लिखी थी, और अभी सफाई अभियान के समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ठीक इसी तरह का काम किया, और उन्होंने देश के नौ प्रमुख लोगों के नाम लिए, और उन्हें सफाई अभियान को आगे बढ़ाने के लिए जिम्मा दिया। इसके बाद ये प्रमुख लोग अपने आसपास के और लोगों के नाम ले रहे हैं, और यह सिलसिला उसी तरह आगे बढ़ रहा है। 
सालाना सफाई के त्यौहार दीवाली के मौके पर हम इस सोच को फिर याद दिला रहे हैं कि धरती पर नए सामानों का बोझ घटाने के लिए, घरों से कबाड़ का बोझ कम करने के लिए, और जरूरतमंद तबके की मदद करने के लिए इस तरह का 'दस का दमÓ अभियान लोगों को आगे बढ़ाना चाहिए, और यह याद रखना चाहिए कि जिंदगी में जब हम अच्छे काम करते हैं, तो उससे एक ऐसी ताकत भी मिलती है कि तन और मन बाकी कामों को भी बेहतर कर सकते हैं। अमरीका जैसे पूंजीवादी देश में भी किसी कंपनी का मुखिया बनाने के पहले इस बात को देखा जाता है कि ऐसे लोग सामाजिक सरोकारों के काम कर चुके हैं या नहीं। वहां के सबसे कामयाब लोगों में से एक, बिल गेट्स अभी पूरी दुनिया में घूम-घूमकर खरबपतियों का हौसला बढ़ा रहे हैं कि वे अपनी पूंजी का कम से कम आधा हिस्सा समाज सेवा के लिए दें। 
हम अपने आसपास ऐसे बहुत से लोगों को देखते हैं जो कि बिना किसी मतलबपरस्ती के, दूसरों के भले के लिए कुछ न कुछ करते रहते हैं। यह एक अलग बात है कि भले लोग खबरों में कम आते हैं, और मीडिया जुर्म की खबरों से भरे रहता है। लेकिन अच्छा काम करने के लिए खबरों में जगह पाने की कोई जरूरत नहीं रहती। लोग घरों से कबाड़ निकालकर समाज के कमजोर तबके तक बांटने का सिलसिला शुरू करें, तो उन्हें देखकर हर किसी को यह याद पडऩे लगेगा कि वे अपने घर से कौन सा कबाड़ कम कर सकते हैं। और सामानों के इस तरह दो-चार बार इस्तेमाल से ही धरती के साधनों का बचाव होगा, और धरती बच सकेगी। 

लोकतंत्र में गब्बर को बिस्किट की मॉडलिंग की रियायत नहीं

15 अक्टूबर 2014
संपादकीय
महाराष्ट्र और हरियाणा में अभी मतदान चल रहा है, और इस बीच ही कोलकाता के एक अंग्रेजी अखबार में महाराष्ट्र के पिछले कांग्रेसी मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण का एक इंटरव्यू छपा है जिसमें उन्होंने एक से अधिक बार यह खुलासा किया है कि आदर्श घोटाले से लेकर सिंचाई घोटाले तक, बहुत से सरकारी भ्रष्टाचार के मामलों में वे मुख्यमंत्री के रूप में कार्रवाई इसलिए नहीं कर पाए क्योंकि सरकार गठबंधन की थी, और वह गिर जाती। अपनी ही कांग्रेस पार्टी के पिछले दो-तीन मुख्यमंत्रियों के आदर्श घोटाले पर कार्रवाई के बारे में उन्होंने कहा कि अगर उन्होंने कार्रवाई की होती तो पूरी पार्टी खत्म हो जाती और चुनाव में कांग्रेस दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाती। 
पृथ्वीराज चव्हाण को कांग्रेस में एक बेहतर मुख्यमंत्री माना जाता है, और उनके बारे में कहा जाता है कि वे भ्रष्ट नहीं है। लेकिन ऐसी ही बात प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह के बारे में उनके कार्यकाल में कही जाती थी और लोगों ने यह देखा है कि उनके मातहत हर किस्म का भ्रष्टाचार हुआ, कई मंत्री जेल गए, और देश का लाखों करोड़ का तो जाहिर नुकसान हुआ, और कोयला घोटाला वगैरह देखें, तो देश की अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ी दिखती है। ऐसे में महाराष्ट्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे, साफगोई की बात करने वाले पृथ्वीराज चव्हाण की इस बात पर सोचने की जरूरत है कि निजी ईमानदारी किसी मुखिया की खूबी होती है, या लोकतंत्र में उसका कोई महत्व नहीं होता? निजी ईमानदारी तो सरकार और लोकतंत्र से परे भी हर किसी के लिए एक बुनियादी जरूरत होनी चाहिए, लेकिन जब कोई मुखिया बनते हैं, तो उनके लिए यह भी जरूरी होता है, कि वे अपने मातहत जुर्म होते हुए देखते न बैठे रहें। जहां कहीं भी ऐसा होता है, और हम सिर्फ कांग्रेस के बारे में यह बात नहीं कह रहे हैं, दूसरी पार्टियों का हाल इससे बेहतर हो ऐसा भी नहीं है। लोकतंत्र में ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि  गब्बर तो हाथ में पारले ग्लूकोज बिस्किट लेकर उसकी मॉडलिंग करे, अपने आपको शाकाहारी और ईमानदार बताए, और उसके मातहत सांभा और कालिया लूटपाट करते रहें। 
ऐसा लगता है कि इस इन्टरव्यू के आधार पर ही पृथ्वीराज चव्हाण को कटघरे में लाया जा सकता है, कि उन्होंने सरकार बचाने के लिए अपने मातहत भ्रष्टाचार को जारी रहने दिया। किसी मुखिया को अनदेखी करने की रियायत नहीं मिल सकती है, और देश में ऐसी कुछ मिसालें कायम होने जरूरी हैं, ताकि लोग आगे अपनी जिम्मेदारी को समझ सकें, और काम कर सकें। फिलहाल देश की राजनीति में कांग्रेस की जो बदहाली हुई है, उसमें इस पार्टी को पांच-दस बरस के लिए घर बैठकर आत्ममंथन, आत्मग्लानि, और आत्मसुधार का काम करना चाहिए, ताकि वह पांच-दस बरस के बाद के किसी चुनाव में जनता को मुंह दिखाने के लायक बन सके। अब हम इंतजार कर रहे हैं कि पृथ्वीराज चव्हाण के इस इन्टरव्यू को आधार बनाकर कोई अदालत तक जाए, और जुर्म को अनदेखा करने के जुर्म में उनको घेरे। 

आतंक के तार सरहद पार और अडिय़ल ममता बैनर्जी

14 अक्टूबर 2014
संपादकीय

बांग्लादेश स्थित कुछ आतंकी संगठनों के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल में भारत के स्थानीय लोगों ने विस्फोटक बनाने और आतंकी साजिश करने का काम किया है, ऐसी खबरें हैं। और साथ-साथ ये खबरें भी हैं कि तृणमूल कांग्रेस की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी अपने प्रदेश में सामने आए विस्फोट और आतंकी हलचलों की राष्ट्रीय जांच एजेंसी से जांच करवाने में कुछ आनाकानी कर रही हैं। केन्द्र सरकार के साथ ममता बैनर्जी का यह टकराव नया नहीं है। जब वे केन्द्र में रेलमंत्री थीं, तब वे पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार के साथ लगातार टकराव खड़ा रखती थीं, और राज्य के भीतर भी अपनी सुरक्षा के लिए वामपंथी सरकार के सुरक्षा इंतजाम से परे अपनी खुद की रेलवे सुरक्षा साथ लेकर चलती थीं। बाद में वे बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं, तो तरह-तरह से केन्द्र सरकार से उन्होंने टकराव जारी रखा।
भारत के संघीय ढांचे में केन्द्र और राज्य के संबंधों पर बहुत बारीकी से व्यवस्था की गई है। और अगर इन दोनों में से कोई एक पक्ष टकराव पर उतारू या आमादा हो जाए, तो उसमें बड़ा नुकसान राज्य का होता है, और ममता बैनर्जी को इस बात की समझ नहीं है ऐसा तो हम नहीं कहेंगे, लेकिन उनको इसकी फिक्र नहीं है ऐसा वे हर बार साबित करती हैं। दूसरे कुछ मामलों में तो वे अपने राज्य बंगाल का नुकसान करके अगले चुनाव में अपना नुकसान कर सकती हैं, लेकिन जब सीमा पार से आतंकी साजिशों का मामला आता है, और जैसा कि पहली खबरों में सामने आया है, बंगाल की जमीन पर उसके पनपने के सुबूत मिले हैं, तो उसके बाद भी ममता बैनर्जी का घरेलू जांच पर अड़े रहना अलोकतांत्रिक है, और बेवकूफी की बात है। जब एक से अधिक राज्यों में आतंकी वारदातें हों, और वे आपस में जुड़ी हुई हों, या उनके तार सरहद के पार से आए हुए हों, तो भारत की व्यवस्था में राष्ट्रीय जांच एजेंसी एक सही संगठन है जिसके हवाले ऐसे मामले बिना देर किए हो जाने चाहिए।
अमरीका जैसा विकसित देश को देखें, तो वहां भी कुछ किस्म के मामले राज्यों की जांच एजेंसियों से परे के रहते हैं, और केन्द्र सरकार की जांच एजेंसी सीधे ही उन मामलों की जांच शुरू कर देती है। भारत में भी हमारा मानना है कि एक से अधिक राज्यों से जुड़े हुए आतंकी मामलों को केन्द्र की जांच एजेंसी को ही देखना चाहिए, और संविधान में ऐसी व्यवस्था करने को हम राज्यों के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं मानते। आतंकी हिंसा और तोडफ़ोड़ को लेकर किसी राज्य को छुपाने का क्यों कुछ रहना चाहिए यह हमारी समझ से परे है। यह राज्य के सामान्य अपराधों को लेकर होने वाली जांच को केन्द्र सरकार की सीबीआई को देने जैसा मामला नहीं है। देश के बाहर से पहले भी मुम्बई जैसे आतंकी हमले सामने आए हैं, और ऐसे मामले राज्य की जांच क्षमता से परे के रहते हैं। ममता बैनर्जी की राजनीति एक कुएं में जीते हुए प्राणी की राजनीति जैसी दिखती है जिसे अपनी सीमित दुनिया से परे कुछ नहीं दिखता। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में अलग-अलग राज्यों ऐसी नाजायज जिद नहीं चल सकती। हम केन्द्र सरकार के हाथ में इस किस्म की आतंकी कार्रवाई की सीधी जांच का अधिकार ठीक समझते हैं, और इसके लिए कानून में बदलाव करना चाहिए।

मामले झूठे साबित होने के पहले फैसले और सजा वाला लोकतंत्र

13 अक्टूबर 14
संपादकीय
मेरठ में कुछ महीने पहले उत्तरप्रदेश और बाकी देश के उपचुनावों के मौके पर एक मामला बहुत जोरों से खबरों में आया था कि किस तरह एक हिन्दू लड़की का अपहरण करके, उसके साथ बलात्कार करके, उसके साथ शादी करके, उसका धर्मांतरण किया गया था। अखबारों और टीवी पर इसकी अनगिनत खबरें आई थीं, और इस पूरे सिलसिले को लव जिहाद का नाम दिया गया था। चुनाव प्रचार से इस शब्द को बाहर रखने के लिए चुनाव आयोग और अदालत तक लोगों ने पहल की थी, और पूछे जाने पर देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इस शब्द, लव जिहाद, से अपने आपको अनजान बताया था। अब खबरों वाली यही लड़की अपने मां-बाप के घर से अदालत पहुंची है, और उसने वहां बयान दर्ज कराया है कि उसके अपहरण, बलात्कार, धर्मांतरण की शिकायत झूठी थी, और उसके मां-बाप के परिवार में कई तरह दबाव और लालच में उससे वैसी रिपोर्ट लिखवाई थी। उसने अपने मां-बाप से अपनी जान को खतरा भी बताया है, और उसकी अर्जी पर अदालत ने उसे सरकारी महिला आश्रम भेज दिया है। अपनी बात आगे बढ़ाने के पहले हम एक दूसरी घटना याद दिलाना चाहेंगे कि किस तरह कुछ महीने पहले उत्तरप्रदेश में एक पेड़ से टंगी हुई दो नाबालिग बहनों की तस्वीरों और बलात्कार के बाद हत्या की खबरों ने देश और दुनिया को हिलाकर रख दिया था, और बाद में सीबीआई की लंबी जांच, अपराध प्रयोगशाला में लंबी-चौड़ी जांच के बाद उस मामले में गिरफ्तार दस लोगों को बेकसूर पाते हुए इस मामले से ही सीबीआई ने बाहर किया, और महीनों की तोहमत के बाद वे जेल से बाहर आए। 
आज भारत में मीडिया जिस तरह अतिसक्रिय है, उसके चलते आसानी से किसी मामले की जांच होना मुमकिन नहीं है। लगातार दबाव, लगातार सवाल, लगातार कैमरों और जनचर्चाओं के बीच जब जांच एजेंसी काम करती है, तो उस पर तोहमत लगाने के लिए राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के विरोधियों से लेकर दूसरी कई राजनीतिक ताकतें शामिल हो जाती हैं। धर्म और जाति के संगठन झंडे-डंडे उठा लेते हैं क्योंकि उनको भड़काने और उकसाने के ऐसे मौके अपने अस्तित्व को साबित करने और बचाए रखने के लिए जरूरी लगते हैं। बहती गंगा में हाथ धोने का मौका कोई नहीं चूकता, और खासकर ऐसे लोग, ऐसे तबके, और ऐसे संगठन जिनके हाथों में कालिख से लेकर लहू तक लगे होते हैं, वे तो हादसों और जुर्मों के मौके अपने हाथ साफ करने के लिए देखते ही रहते हैं। 
अब सवाल यह है कि लोकतंत्र में अगर हर मिनट पर जांच एजेंसियों की गंभीरता और उनकी नीयत पर सवाल उठाने के साथ-साथ उन एजेंसियों को नियंत्रित करने वाली सरकारों, नेताओं, और उनके धर्म, उनकी जातियों, उनके वोटरों को लेकर विश्लेषण होते चलेगा, तो ईमानदार जांच कैसे हो पाएगी? फिर यह भी है कि अखबारों में सुर्खियों के शब्द बचाने के लिए, और टीवी पर कुछ सेकेंड बचाने के लिए भारत के मीडिया में अब किसी संदिग्ध को आरोपी की तरह और किसी आरोपी को किसी अपराधी की तरह दिखाने का आसान रास्ता निकाल लिया गया है। बलात्कार और हत्या के मामले में ही नहीं, नक्सली होने के शक में मुठभेड़ में मारने से लेकर, गिरफ्तारी तक, और आत्मसमर्पण तक के मामलों में अब संदिग्ध या आरोपी जैसे शब्द खत्म कर दिए गए हैं, और हर किसी को नक्सली लिखा जा रहा है, क्योंकि इतनी बारीकी को लेकर इनमें से कोई मीडिया के खिलाफ अदालत तक जाने की ताकत नहीं रखते। 
लोकतंत्र में मीडिया की मौजूदगी और उसकी सक्रियता दोनों ही जरूरी हैं, लेकिन किसी जांच के चलते हुए मीडिया को संदेह से घिरे लोगों को संदेह का जितना लाभ देना चाहिए, लोगों के अलग-अलग कानूनी दर्जे में फर्क करना चाहिए, वह सिलसिला अब खत्म हो गया है। उत्तरप्रदेश के इन कुछ मामलों से परे, कई और ऐसे मामले हर बरस देश में सामने आ रहे हैं जिनमें महीनों तक की मीडिया-सुनवाई के बाद लोग बेकसूर पाए जाते हैं, लेकिन तब तक उनकी एक जिंदगी तो खत्म हो चुकी रहती है, और उनका परिवार, कारोबार, रोजगार, सब तबाह हो चुके रहते हैं। मीडिया का यह रूख गैरजिम्मेदारी का है, और सजा का हकदार भी है। यह एक अलग बात है कि जो लोग बड़े-बड़े शक और बड़े-बड़े आरोपों से घिर जाते हैं, वे लोग मीडिया के हमले के मुकाबले मुंह खोलने की ताकत भी नहीं रखते। ऐसे मामलों पर मीडिया के संगठनों के बीच चर्चा होनी चाहिए, और अपने पेशे के भीतर भी खामियों को पहचानकर, मानकर उनको दूर करने की कोशिश होनी चाहिए। लगे हाथों हम आखिर में राजनीतिक ताकतों को भी याद दिलाना चाहते हैं कि लव जिहाद नाम का उनका राजनीतिक जिहाद फर्जी साबित होने के बाद अब उनका क्या कहना है?

कुदरती मार से दूर के राज्यों का भी एक राष्ट्रीय जिम्मा है

12 अक्टूबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के पड़ोस के दो राज्य ओडिशा और आन्ध्रप्रदेश एक और बड़े तूफान के खतरे में खड़े हैं। इसका असर शुरू हो चुका है, और नुकसान कितना होगा इसका ठीक-ठीक अंदाज अभी नहीं है। छत्तीसगढ़ चूंकि समंदर से दूर है, पहाड़ों से दूर है, बाढ़ वाली तूफानी पहाड़ी नदियों से दूर है, भूकंप के खतरे से भी लगभग दूर ही है, और किसी पड़ोसी देश की सरहद यहां नहीं छूती है। नतीजा यह है कि हिन्दुस्तान के दूसरे बहुत से प्रदेश जिन खतरों को झेलते हैं, छत्तीसगढ़ उन खतरों से, और उनसे होने वाले अंतहीन नुकसान से भी बचा हुआ प्रदेश है। लेकिन हिन्दुस्तान का हिस्सा होने के नाते बाकी प्रदेशों की मुसीबत के वक्त यह प्रदेश, और ऐसे दूसरे प्रदेश क्या कर सकते हैं? 
एक तो ऐसे प्रदेशों की सरकारें नुकसान झेलने वाले दूसरे प्रदेशों के लिए नगद मदद भेज सकती हैं, और सामान भी भेज सकती हैं। फिर यह भी है कि सरकार, राजनीतिक दल, और समाज के अलग-अलग तबके मिलकर, और अलग-अलग भी, मदद जुटाने का काम कर सकते हैं, और नुकसान झेल रहे लोगों के लिए भेज सकते हैं। एक बात यह भी है कि हिन्दुस्तान में हर बरस बहुत से राज्य बहुत बड़ी बर्बादी झेलते हैं, और वहां पर सेना से लेकर दूसरे सिपाहियों तक को तैनात किया जाता है, और जब बर्बादी का मंजर काबू में दिखता है, तो लोग वहां से लौट आते हैं। लेकिन हमने बिहार, असम सहित उत्तर-पूर्व, और जम्मू-कश्मीर की बाढ़ को देखा है, जहां से पानी तो वक्त के साथ उतर गया, लेकिन उन प्रदेशों को बाढ़ एक पीढ़ी पीछे कर गई। इतनी बर्बादी, इतनी बर्बादी कि देखते न बने। मरम्मत और दुबारा बनाने की जरूरत इतनी कि कोई सरकारें भी उन्हें पूरा न कर सकें। 
ऐसे में हम सोचते हैं कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य जिन पर खुद पर कुदरत की ऐसी और इतनी मार नहीं पड़ती है, वे बाकी देश का हाथ बंटाने के लिए प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की एक ऐसी फौज तैयार कर सकते हैं कि जिसके उत्साही लोग देश में कहीं भी जरूरत पडऩे पर अपने घर-बार और कारोबार को छोड़कर वहां जाएं, और कुछ हफ्ते काम करके लौटें। सुरक्षित राज्यों को चाहिए कि वे अपनी आबादी में से नौजवान, मजबूत, उत्साही लोगों को छांटकर उनको ऐसी ट्रेनिंग देने का ऐसा स्थायी इंतजाम करें, ताकि वे लोग किसी भी मुसीबत में जाकर मददगार हो सकें। ऐसे नौजवानों को छांटकर उन्हें किस्तों में सौ-दो सौ दिनों की ऐसी ट्रेनिंग दी जा सकती है जिससे कि वे भूकंप के मलबे में, बाढ़ में डूबे या डूब से उबरे इलाकों में, तूफान से तबाह इलाकों में जाकर अपना खून देने से लेकर, लोगों की मलहम-पट्टी करने का काम कर सकें, लोगोंं को प्राकृतिक विपदा के बाद घर सुधारने में मदद कर सकें, अस्पतालों में मददगार हो सकें, और जरूरत के हर किस्म के दूसरे काम कर सकें। 
देश की सरहद पर इसी देश की आबादी का एक हिस्सा गोलियों और धमाकों को झेलते हुए शहादत के लिए तैयार रहता है। देश के बहुत से प्रदेशों में नक्सल मोर्चों पर तैनात लोगों में से सैकड़ों की जान हर बरस जाती है। ऐसे में इस देश के बाकी करोड़ों नौजवानों में से कुछ लाख लोग भी इस तरह से अगर प्रशिक्षित किए जा सकते हैं, तो वे न सिर्फ मुसीबत के वक्त काम आएंगे, बल्कि मुसीबत न रहने पर भी वे एक बेहतर नागरिक साबित होंगे। ऐसे लोग अपने सीखे हुए हुनर को भी आसपास के दूसरे लोगों में, बच्चों में बांटकर उनको भी तैयार कर सकेंगे। हमारा मानना है कि अगर सरकार एक ईमानदार पहल करे, ट्रेनिंग का गंभीरता से इंतजाम करे, तो आबादी का पांच-दस फीसदी हिस्सा इसमें दिलचस्पी ले सकता है। और ऐसा काम इस देश की एकता को मजबूत करने के काम भी आएगा, क्योंकि दूर-दूर से आए मददगारों को लोग कभी भूल नहीं पाएंगे। राज्य सरकारों को चाहिए कि प्राकृतिक विपदाओं में किसी भी प्रदेश में पडऩे वाली जरूरतों के मुताबिक अपने प्रदेश में डॉक्टरों, तैराकों, चिकित्सा सहायकों में से ऐसे वालंटियर दर्ज करके भी रखे जिनमें मदद के लिए दूर तक जाने का हौसला हो। ऐसी पहल बहुत महंगी भी नहीं होगी, और यह प्रदेश के भीतर अपने नागरिकों को  बेहतर, अधिक जिम्मेदार, अधिक फिट, अधिक सेहतमंद बनाने में भी मदद करेगी।

बात की बात, Bat ke bat,

11 oct 2014

बात की बात, Bat ke bat,

10 oct 2014

कैलाश सत्यार्थी और मलाला को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के आगे-पीछे कुछ बातें, कुछ सोच

11 अक्टूबर 2014
संपादकीय

भारत में बाल मजदूरी के खिलाफ लंबे समय से सामाजिक आंदोलन चला रहे कैलाश सत्यार्थी, और पाकिस्तान में लड़कियों के पढऩे के हक की वकालत करते हुए तालिबानी गोलियां खाने वाली छोटी सी लड़की मलाला यूसुफजई को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने पर सभी आम लोग खुशियां मना रहे हैं, लेकिन कुछ बड़बोले लोग ऐसे भी हैं जो इसे पश्चिमी साजिश कह रहे हैं कि हिन्दुस्तान को बंधुआ बाल मजदूरों का देश करार दिया जा सके, और पाकिस्तान-अफगानिस्तान के तालिबानों को एक बार फिर उनके जुर्म के लिए बुरा दिखाया जा सके। पाकिस्तान में मलाला को मिलने इस सम्मान को लेकर मतभेद चल रहे हैं, और इसे पश्चिमी साजिश भी बताया जा रहा है। साथ ही भारत में हो सकता है कि अंग्रेजीभाषी, शहरी, शिक्षित, संपन्न मीडिया इस बात पर कुछ उदास हो कि कैलाश सत्यार्थी के नाम को पिछले बरसों में भारतीय अंग्रेजी मीडिया ने अधिक छापा-दिखाया भी नहीं था, उन्हें नोबेल मिलने की भविष्यवाणी भी नहीं की थी, और नोबेल कमेटी ने इसके बिना ही यह पुरस्कार दे दिया। अंग्रेजी तो अंग्रेजी, भारत का हिन्दी मीडिया भी इस बात को लेकर  अभी तक झटके से उबर नहीं पाया है, और आज बहुत से अखबारों के पहले पन्ने इस बात के गवाह हैं कि मानो कैलाश सत्यार्थी को नोबेल शांति पुरस्कार न मिला हो, पद्मश्री मिली हो। 
एक देश के रूप में भारत को तबसे देखें जबसे नोबेल पुरस्कार शुरू हुए हैं, तो अब तक भारत में जन्मे हुए, यहीं पर काम करने वाले, यहीं पर किए गए काम के लिए जिन लोगों को नोबेल पुरस्कार मिला है, उनमें रविन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था। बाकी जिन लोगों को किसी भी तरह का नोबेल पुरस्कार मिला, वे या तो दूसरे देशों में जन्मे थे, और भारत में उन्होंने काम किया था, या भारत में जन्मे थे और दूसरे देशों में काम किया था। ऐसे में कैलाश सत्यार्थी के साथ इस बात का जिक्र जरूरी है कि वे भारतवंशी, भारत में काम करने वाले, भारत में किए गए काम के लिए नोबल शांति पुरस्कार पाने वाले दूसरे भारतीय हैं। अभी कुछ बरस पहले भारत के एक पर्यावरण वैज्ञानिक आर.के. पचौरी को भी संयुक्त राष्ट्र की एक जलवायु कमेटी के साथ संयुक्त रूप से नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था, और उनका काम वैज्ञानिक अधिक था, इसलिए खबरों में कुछ कम था। लेकिन उस वक्त भी लोगों को यह याद आई थी कि  यह पुरस्कार भारत के किसी व्यक्ति को आधी सदी से भी अधिक देर से दिया गया था, और गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार मिलते-मिलते कई बार रह गया, और नोबेल पुरस्कार को यह सम्मान नहीं मिल पाया। इस बार इस पुरस्कार की कमेटी ने, उसके लोगों ने इतिहास की अपनी इस चूक या गलती को माना है, लेकिन यह मान लेना कि कैलाश सत्यार्थी को गांधी के मुआवजे की शक्ल में यह पुरस्कार दिया गया है, उनके काम और उनके मकसद के साथ बेइंसाफी होगी। 
नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा के साथ ही यह खुलासा किया गया कि एक हिन्दू और एक मुस्लिम को, एक हिन्दुस्तानी और एक पाकिस्तानी को यह पुरस्कार दिया जा रहा है क्योंकि ये दोनों ही बच्चों के हक के लिए और कट्टरपंथ के खिलाफ काम कर रहे हैं। यह बात बहुत से लोगों को कुछ अटपटी लग रही है कि कमेटी ने  पुरस्कार के लिए छांटने के तर्कों के पीछे धर्म का भी पैमाने की तरह जिक्र किया है, और राष्ट्रीयता का भी। लेकिन हम इसमें कुछ अधिक अटपटा नहीं देखते और कमेटी की सोच के पीछे के मुद्दों के इस खुलासे को ईमानदार मानते हैं। यह बात जाहिर है कि भारत और पाकिस्तान के बीच आज जिस तरह का तनाव चल रहा है, वह दुनिया में परमाणु हथियारों वाले दो देशों के बीच का सबसे बुरा तनाव है। दूसरी तरफ इन दो देशों के बीच, और अपने-अपने देशों में भी हिन्दू और मुस्लिम मुद्दा हैं, और इस बात को नकारना हकीकत को नकारना होगा। और आखिर की बात तो बहुत जाहिर है कि कट्टरपंथ के खिलाफ, और बच्चों के हक के लिए काम करना एक सम्मान के लायक बात तो है ही। 
नोबेल शांति पुरस्कार दुनिया के लिए एक संदेश भी रहते हैं कि इसके लिए नाम तय करने वाले लोग दुनिया में पिछले कुछ बरसों में किन मुद्दों को विश्व शांति के लिए सबसे अधिक अहमियत वाले पाते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि इस मोर्चे पर जिन लोगों का योगदान सबसे अधिक होता है, उनको छोड़कर मुजरिमों सरीखे दिखते कुछ राष्ट्रप्रमुखों को भी ये पुरस्कार दिए गए, और बिना किसी काम के बराक ओबामा को भी यह पुरस्कार दिया गया। 
हम पुरस्कार के लिए छांटे गए इन दो नामों से पूरी तरह सहमत हैं। जब कभी दुनिया के किसी एक हिस्से में कट्टरपंथ के खिलाफ काम करने के लिए किसी को सम्मान दिया जाएगा, तो कट्टरपंथ के हिमायती उसे किसी दूसरे देश की साजिश जरूर बताएंगे। और आज पाकिस्तान में एक तबका मलाला के सम्मान को पश्चिमी साजिश बता रहा है, और भारत में एक तबका इसे भारत को बाल मजदूरों के लिए बदनाम करने की पश्चिमी साजिश कह रहा है। दुनिया का कोई भी काम अगर कोई अहमियत रखता है, तो उसे बदनाम करने का काम तो होगा ही। इसके बीच आज जब फौजी टकराव झेल रही सरहद के दोनों तरफ के दो मजहबों के, दो पीढिय़ों के, दो देशों के लोगों को यह पुरस्कार दिया गया है, तो यह उनके काम, उनके सामाजिक योगदान के साथ-साथ उनके मुद्दों की अहमियत, और आज की दुनिया की जरूरत, इन सबको देखकर ही दिया गया लगता है। दुनिया की शांति को खतरे के मुद्दे, उन मुद्दों को टालने के तरीके, उन मुद्दों पर काम करने वाले लोग, और उनकी कोशिशों का सम्मान, इसे हम किसी पुरस्कार को तय करने के लिए सही पैमाना मानते हैं, और हम इन दोनों देशों को बधाई देते हैं कि उनके यहां की इन अच्छी कोशिशों का सम्मान हुआ है, और इस पुरस्कार को इन देशों की खामियों को बदनाम करने की कोशिश नहीं समझना चाहिए। 
भारत के बारे में लिखने को एक हल्की-फुल्की लेकिन दिलचस्प बात यह भी है कि चाय बेचने वाला एक बच्चा आज इस देश का प्रधानमंत्री है, और बाल मजदूरी के खिलाफ संघर्ष करने वाले को नोबेल शांति पुरस्कार मिला है। कैलाश सत्यार्थी ने बनारस में अपने आंदोलन का खासा काम किया था, और उसी बनारस से आज नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। इसलिए माना जाना चाहिए कि इन दोनों की कोशिशों से भारत में अब बाल मजदूरी के खिलाफ एक बड़ी जागरूकता पैदा हो सकती है, और बच्चों की पीढ़ी को एक बेहतर कल मिल सकता है। दुनिया को अगर शांति की जरूरत है, तो वह पाकिस्तान की बच्चियों की पढ़ाई के बाद ही आ पाएगी, और भारत के बच्चों को मजदूरी से आजाद कराने के बाद ही आएगी। 
दुनिया में आज इस पुरस्कार के साथ ही भारत और पाकिस्तान जैसे देशों में बच्चों की हालत पर एक बार सबका ध्यान जा रहा है, और इसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। भारत और पाकिस्तान के दो गैरसरकारी, आम लोगों एक साथ नोबेल शांति पुरस्कार मिलने से इन दो पड़ोसी देशों को सिर टकराने से रोकने का एक संदेश भी मिला है, और एक छोटी बच्ची मलाला की इस बात का सम्मान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों को करना चाहिए कि वे इस पुरस्कार समारोह के मौके पर पहुंचे, मिलें, और अमन की कोशिश करें। दुनिया में कूटनीति के जानकार और ठेकेदार इस बात को एक फिजूल का जज्बात कह सकते हैं, लेकिन दुनिया के महान फैसले कूटनीति के पहलवानों की तंग सोच से परे ही हो सकते हैं, और दोनों देशों को दरियादिली दिखाने का एक मौका हाथ लगा है, इसे इस्तेमाल करके नरेन्द्र मोदी और नवाज शरीफ को अपने-अपने देशों के भूखे बच्चों को खाना और पढ़ाना चाहिए, न कि सरहद पर फौजी बददिमागी दिखानी चाहिए। कूटनीति से अनजान एक छोटी बच्ची ही इतनी बड़ी बात कर सकती थी, और इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दोनों देशों को चला रहे नेताओं की है। 

भारतीय संस्कृति के ठेकेदारों से घायल नौजवान पीढ़ी

10 अक्टूबर 2014
संपादकीय
एक फिल्म के पोस्टर को लेकर लोग अदालत तक पहुंचे हैं कि उसमें एक महिला के बदन को देखते हुए कम उम्र का एक बच्चा किस तरह आकर्षित हो रहा है। यह महिला पूरे कपड़ों में है, लेकिन बदन का जितना हिस्सा भी दिख रहा है, तेरह-चौदह बरस का एक किशोर उसी पर फिदा हुए जा रहा है। यह बात कई लोगों को बच्चों के यौन-उपयोग जैसी लगी, कि ऐसे वयस्क मुद्दे पर बनी फिल्म में एक नाबालिग लड़के से अभिनय करवाया गया है। भारत में अश्लीलता के खिलाफ कानून जिस तरह का है, उसमें किसी भी बात को अश्लील कहकर एक जुर्म दर्ज किया जा सकता है, और यह तो वात्सायन की किस्मत अच्छी थी कि अंग्रेजों का कानून लागू होने सैकड़ों बरस पहले वे चल बसे, वरना आज पूरे देश में जगह-जगह अदालती पेशी पर जाते-जाते वे जीते-जी मर जाते। 
एक तरफ यह फिल्म है जिसकी कहानी ही यह है कि कम उम्र का एक लड़का अपनी किशोरावस्था में किस तरह अधिक उम्र की एक महिला की तरफ आकर्षित होता है। और दूसरी तरफ भारत में बिना बात के बखेड़ा खड़ा करने वाले संस्कृति के ठेकेदारों का एक हमलावर तबका है जो यह जाहिर करना चाहता है कि किशोरावस्था में भी भारत के लड़के-लड़कियों के दिल-दिमाग में बदन और सेक्स को लेकर कोई सोच नहीं आती। इस मुद्दे पर लिखते हुए हमको चौथाई सदी पहले की एक फिल्म याद आती है कि किस तरह राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर में इसी तरह एक स्कूली लड़का अपनी शिक्षिका की तरफ आकर्षित हो जाता है। और इन दो फिल्मों के बीच में हिन्दुस्तान में ऐसे करोड़ों लड़के-लड़कियां होंगे जो कि अपने से बहुत अधिक उम्र के आसपास के किसी आदमी या औरत की तरफ आकर्षित होते होंगे। ऐसे में इस बहुत ही स्वाभाविक मानवीय स्वभाव वाले मुद्दे पर बनी फिल्म और उसके बहुत आम पोस्टर को लेकर मुकदमेबाजी शुरू हुई है, और ऐसे पाखंडी ठेकेदारों के आसपास दीवारों पर बलात्कार, नग्नता, अश्लीलता, और हिंसा के पोस्टरों से दीवारें पटी हुई होंगी। लेकिन इस देश के लड़के-लड़कियों की प्राकृतिक और स्वाभाविक जरूरतों पर कोई बात भी न कर ले, कोई सोच-विचार न हो, और इस उम्र की पूरी पीढ़ी को सिर्फ अश्लील किताबों, फिल्मों, और नासमझी की बालिग बातों के भरोसे छोड़ देने के हिमायती डंडे लिए हुए हर चौक-चौराहे पर खड़े मिल जाते हैं।
एक तरफ देश में बेदिमाग हमलावर लोगों का ऐसा बकवासी तबका है, दूसरी तरफ रोज पूरे हिन्दुस्तान से ऐसी सैकड़ों खबरें आती हैं, कि किस तरह किसी पड़ोसी ने, किस तरह परिवार के ही किसी सदस्य ने बच्चों का यौन शोषण किया, परिवार की ही लड़की या महिला से बलात्कार किया। यह देश ऐसी सैकड़ों खबरों को रोज देखते हुए भी नाबालिग से बालिग के बीच के दौर को अनदेखा करना चाहता है, और एक तबका इस अनदेखी को ही भारतीय संस्कृति मानता है। जहां पर प्राकृतिक जरूरतों वाले मनोविज्ञान को विदेशी संस्कृति कहते हुए एक साम्प्रदायिक नफरत थोपने की कोशिश होती है, वहां पर देश की एक स्वाभाविक संस्कृति भी घायल होती है। भारत में इस ढकोसले को खत्म करने की जरूरत है, दिक्कत यही है कि जो लोग इस पाखंड को समझते हैं, वे इस उम्र को पार कर चुके हैं, और अब वे आगे कुछ बोलकर अपनी फजीहत करवाना नहीं चाहते। दूसरा पहलू यह है कि जिस पीढ़ी को तन-मन की समझ की जरूरत है, उसकी कोई भूमिका देश के मुद्दों को तय करने में नहीं है। ऐसे में यह देश मानसिक रूप से कुंठाग्रस्त नौजवान पीढ़ी का एक देश बनते चले आ रहा है, और इससे पूरे देश का भारी नुकसान हो रहा है। इससे फायदा हो रहा है तो कुछ गिने-चुने गुंडा-संगठनों का, जो कि किसी भी अक्ल की बात को भारतीय संस्कृति के खिलाफ करार देते हुए झंडे-डंडे उठाकर अपने अस्तित्व को बचाने का एक रास्ता इसमें पा लेते हैं।

भारत-पाक के बीच सिर के बदले सिर का मुकाबला बंद हो

संपादकीय 
9 अक्टूबर 2014
भारत-पाकिस्तान की सरहद पर चल रहा तनाव एक बड़ी फिक्र पैदा करता है। सरहद पर तनाव हर उस वक्त अधिक खतरनाक हो जाता है जब कोई एक देश अस्थिरता से गुजर रहा हो। इस सरहद के एक तरफ अस्थिरता है, और दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी नाम की एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक स्थिरता है। पाकिस्तान की फौज की जो खुफिया एजेंसी, आईएसआई, वहां सरकार में भी दखल रखती बताई जाती है, उसका एक नया मुखिया अभी-अभी आया है। हो सकता है कि उसके सामने अपनी हैसियत को साबित करने की एक घरेलू चुनौती हो। दूसरी तरफ पाकिस्तान की सरकार वहां के विपक्ष का बड़ा कड़ा विरोध झेल रही है, और उसके सामने अपने अस्तित्व को साबित करने का एक मोर्चा है। दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कुछ महीने पहले के आम चुनाव में पाकिस्तान के खिलाफ खासी कड़ी बातें कहते आए हैं, और उनकी अपनी पार्टी पाकिस्तान के खिलाफ लंबे समय से एक हमलावर रूख रखते आई है। आज मोदी को हिन्दुस्तानी जनता के बीच अपनी ही कल तक कही गई बातों पर भी खरा उतरना है, और अपनी पार्टी की उम्मीदों को भी पूरा करना है। इस तरह सरहद के दोनों तरफ अपने-अपने घरेलू दबाव भी काम कर रहे हैं। 
और इसके साथ-साथ इसी सांस में हम यह भी कहना चाहेंगे कि हम किसी भी जगह फौजी मोर्चों को सिर्फ लीडरों और फौजी अफसरों का खड़ा किया हुआ नहीं मानते, हमारा यह मानना रहता है कि फौजी सामान और हथियार बनाने वाले कारखानेदारों और कारोबारियों का पापी पेट जंग से जुड़ा होता है, और किसी भी सरहद का कोई भी तनाव इनके लिए खुशियां लेकर आता है, और मुल्कों की राजधानियों में अगर इन कारोबारियों के पैसों से तनाव खड़ा किया जाता हो, तो भी हमको हैरानी नहीं होगी। इसके साथ-साथ यह तो हमारा देखा हुआ है ही कि किस तरह कुछ कागजी संगठनों के लोग जंग की बातों के बिना जी नहीं पाते, मीडिया के कुछ बड़े-बड़े मुंह किस तरह जंग के लिए भड़काते और उकसाते रहते हैं। जंग की इनकी चाह यह शक पैदा करती है कि ये लोग फौजी कारखानेदारों के भाड़े के भोंपू की तरह काम करते हैं। 
भारत में आज एक दिक्कत और है। एक तरफ उस महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव होने हैं जहां पर पाकिस्तान से आए हुए आतंकियों ने बड़ी तबाही की थी, और आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वहां चुनाव अभियान के दौरान दो दूसरी हिन्दूवादी पार्टियों  की तेजाबी जुबान झेल रहे हैं कि जब सरहद पर हिन्दुस्तानी मारे जा रहे हैं, तो प्रधानमंत्री गाल बजा रहे हैं। आज वहां प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी की सबसे कटु आलोचक कल तक की उनकी दशकों की भागीदार शिवसेना है, और पाकिस्तान विरोधी रहती आई इस पार्टी के जुबानी हमले भाजपा को वहां भारी भी पड़ रहे हैं। इससे दूर हरियाणा में भी विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, और हरियाणा के लोग पड़ोसी पंजाब के साथ फौज में जाने का इतिहास भी रखते हैं, और सरहद पर कमजोर प्रधानमंत्री चुनाव में परेशानी झेल सकता है। ऐसे में यह भी सोचने लायक एक बात है कि कुछ ही हफ्ते पहले नरेन्द्र मोदी उत्तरप्रदेश सहित उपचुनावों में नाकामयाब साबित हो चुके हैं, और ऐसे में इन दो राज्यों के चुनावों में उनसे आम चुनावों की कामयाबी दुहराने की उम्मीद की जा रही है। ऐसे मोदी-मैजिक के वक्त पर इन दोनों ही राज्यों में भाजपा के भागीदार अलग हो चुके हैं, और भाजपा के लिए दिक्कत भी बने हुए हैं। ऐसे में घरेलू प्रादेशिक चुनाव के मोर्चे भी देश के प्रधानमंत्री से सरहद पर बहादुरी की उम्मीद कर सकते हैं, और राष्ट्रवाद के सैलाब के बीच फौजी बहादुरी दिखाने का मोह रोक पाना मुश्किल होता है। 
भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत के सिलसिले का थमना, और गोलीबारी का शुरू होना, दोनों देशों के लिए बहुत बुरा है। एक तरफ सरकार, नेताओं, पार्टियों, और फौजों से परे आम लोग लगातार दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्तों की कोशिश कर रहे हैं, ऐसे में गोलियों का थमना जरूरी है। जंग की बातें सरहद से परे की राजधानियों में लोगों को अच्छी लग सकती हैं, लेकिन जो लोग सरहद के गांवों में धमाकों के बीच जीते और मरते हैं, उनसे कोई पूछे कि क्या जंग से कभी कोई रास्ता निकला है? दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों को, और इनसे दोस्ती रखने वाले बाकी देशों को भी अमन की पहल करनी चाहिए। सिर के बदले सिर के जंगी नारे कामयाब हुए, तो ऐसे सिर बेकसूर जनता के ही होंगे। इसलिए जिन सिरों पर ताज है, उनको अपनी दीवानगी पर नाज करने के बजाय, दोनों देशों की गरीबी को दूर करने वाला राज करना चाहिए।

देश में कट्टरपंथी सोच लादने की कोशिश, मोदी कुछ सोचें

8 अक्टूबर 2014
संपादकीय
दिल्ली विश्वविद्यालय में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने एक अभियान शुरू किया है और साथ रहने वाले जोड़ों के खिलाफ प्रदर्शन किया। भाजपा के इस छात्र संगठन का कहना है कि नौजवान जोड़ों का साथ रहना एक सामाजिक बुराई है। विद्यार्थी परिषद के नेताओं ने कहा है कि लिव इन रिलेशनशिप भारतीय संस्कृति के खिलाफ है और परिवार नाम की संस्था के भी। उनका कहना है कि ऐसे संबंध शायद ही कभी कामयाब होते हैं और विद्यार्थी परिषद ऐसे मामलों का अध्ययन करके छात्राओं को यह जानकारी देगा ऐसे संबंध किस तरह बुरा असर डालते हैं। 
यहां पर बात को आगे बढ़ाने के पहले यह याद कर लेना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी लिव इन रिलेशनशिप को कई अलग-अलग मामलों में संवैधानिक मान्यता दी है। उसने लोगों का शादी के बिना भी साथ रहना जायज माना है, और एक मामले में तो सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि शादी से परे भी जोड़ों के जो बच्चे होते हैं, उनका भी कानूनी अधिकार संतानों जितना ही है। इस बात से जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ जोड़ों का बिना शादी साथ रहना कानूनी माना है, बल्कि ऐसे संबंधों में होने वाली संतान के हक भी शादी की संतानों जितने ही माने हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा कि लिव इन रिलेशनशिप में रहना ना तो अपराध है ना ही पाप। कोई किसी के साथ शादी करके रहे या बिना शादी के... ये उसका निजी फैसला है।
ऐसे में देश में सत्तारूढ़ भाजपा का छात्र संगठन अगर लोगों के मर्जी के रिश्तों के खिलाफ इस तरह का अभियान छेड़ता है, तो इससे एक सामाजिक तनाव तो बढ़ता ही है, भारत की एक पाखंडी और दकियानूसी तस्वीर पूरी दुनिया के सामने जाती है। हमने कई प्रदेशों में भाजपा के समविचारक संगठनों के हिंसक हमले नौजवान जोड़ों पर देखे हैं, और कहीं पर पहनावे को लेकर, तो कहीं लड़के-लड़कियों के साथ रहने को लेकर भारतीय संस्कृति का नाम लेकर हिंसा की गई। हालत यह है कि भाजपा के राज में कर्नाटक में जिस श्रीराम सेना ने भयानक कट्टरपंथी हमले किए थे, उसी श्रीराम सेना को भाजपा के ही एक दूसरे राज्य गोवा में सरकार ने दुकान भी नहीं खोलने दी। 
आज न सिर्फ दिल्ली में शुरू इस अभियान में, बल्कि देश में जगह-जगह हिन्दू संगठन, और मुस्लिम संगठन भी, देश की संस्कृति का नाम लेकर, या धार्मिक तौर-तरीकों का नाम लेकर तरह-तरह का कट्टरपंथ बढ़ाते चल रहे हैं। कहीं लड़कियों के जींस पहनने पर रोक लगाने की बात हो रही है, तो कहीं पर लड़कियों के मोबाइल फोन के इस्तेमाल के खिलाफ फतवे जारी हो रहे हैं। देश में एक उदार और वैज्ञानिक नजरिया लाने की जरूरत है, क्योंकि खाप पंचायतों के अंदाज में जब पत्थर युग की सोच को कोई एक समाज बढ़ावा देता है, तो दूसरे धर्मों और दूसरी जातियों के संगठनों को ऐसा लगता है कि वे अपना अस्तित्व खो बैठेंगे। और ऐसे में वे बढ़-चढ़कर कट्टरता के मुकाबले में उतर जाते हैं, और नौजवान पीढ़ी जगह-जगह पटरियों पर जान देते दिखती है। 
भारत को अगर दुनिया के मुकाबले आगे बढऩा है, या कम से कम साथ चलना है, तो अपनी पूरी नौजवान पीढ़ी पर भड़ास को लादते हुए, उसे कुंठा में जीने पर मजबूर करते हुए यह देश कुछ हासिल नहीं कर सकता। जिस नौजवान पीढ़ी को नरेन्द्र मोदी दुनिया की सबसे बड़ी ताकत कह रहे हैं, उसी नौजवान पीढ़ी के बुनियादी हक के खिलाफ एक कट्टरपंथी सोच देश में बढ़ाई जा रही है, और प्रधानमंत्री इसे देखकर अनदेखा करते चलें, तो वे अपनी तय की हुई मंजिल पर शायद ही पहुंच पाएं।

गडकरी ने जाकर सड़क किनारे बैठे सांड को कोंचा कि मुझे मार

7 अक्टूबर 14
संपादकीय
दुनिया में हर सच कहने लायक नहीं होता, और कहने लायक हर बात लोगों की बर्दाश्त के बाहर कहना ठीक नहीं होता, बिना मौके के कोई बात करना भी गलत होता है, और नियम-कानून के खिलाफ कुछ कहना तकलीफदेह हो सकता है। ये तमाम बातें भाजपा के केन्द्रीय मंत्री, कल तक के उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष, और एक वक्त महाराष्ट्र भाजपा के ताकतवर नेता नितिन गडकरी पर लागू होती हैं। उन्होंने कल कहा कि चुनाव का वक्त मीडिया मालिकों के लिए, संपादकों के लिए, और संवाददाताओं के लिए पार्टियों और उम्मीदवारों की तरफ से पैकेज लेकर आता है, और जिसे जो मिलता है, उसे जरूर ले लेना चाहिए। जिसे जो लेने की इच्छा हो, वह भी ले लेना चाहिए। जितना जो खाने की इच्छा हो, वह भी खा लेना चाहिए। मंच से माईक पर और कैमरे के सामने कही गई इन बातों को लेकर टीवी की खबरों के बाद चुनाव आयोग ने गडकरी को नोटिस दिया है, और उन्होंने इस नोटिस के बाद फिर अपनी बात पर कायम रहते हुए यह कहा है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया। 
अब हम जिन बातों से आज की बात शुरू कर चुके हैं, उनमें से पहली बात पर जाएं, तो क्या गडकरी ने गलत कहा है? और गलत कहा है तो कितना गलत कहा है? यह बात जगजाहिर है कि चुनाव के वक्त मीडिया के मालिकों में से कुछ या अधिक, संपादकों में से कुछ या अधिक, और इन दो के बाद अगर जरूरत बच जाए, और चुनावी बजट भी, तो संवाददाताओं में से भी कुछ या अधिक के लिए पार्टियों और उम्मीदवारों की तरफ से पैकेज का रिवाज बन गया है। कुछ लोग मांग लेते हैं, कुछ लोग मना कर देते हैं, कुछ लोग इश्तहारों की शक्ल में फायदा ले लेते हैं। लेकिन अगर पैकेज हकीकत नहीं होते तो कुछ बरस पहले इसी महाराष्ट्र में तमाम बड़े-बड़े अखबार अशोक पर्व (उस वक्त के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण का चुनावी पर्व) के नाम पर एक सरीखी रिपोर्ट क्यों छापते? उस वक्त प्रेस कौंसिल से लेकर अदालत तक ने कई-कई पन्नों पर बिखरी, कई-कई अखबारों में छपीं इन रिपोर्ट्स को पेड न्यूज माना था, और भारत के इतिहास का पेड न्यूज का यह सबसे बड़ा मामला उसी महाराष्ट्र में हुआ था जहां पर कि कल गडकरी ने बिना जरूरत, बिना मौके, महज चटपटे भाषण के लिए मधुमक्खी के छत्ते में गैरकानूनी कट्टा डाल दिया, और चुनाव आयोग की नजरों में आ गए। 
सार्वजनिक जीवन, खासकर राजनीति में जहां पर कि एक नेता या पार्टी को लोगों से वोटों का भी तकाजा रहता है, वहां पर बेमौके, बेजरूरत, ऐसी बेदिमागी बयानबाजी कितनी नुकसानदेह हो सकती है, उसकी खास फिक्र गडकरी नहीं दिख रही है। कल ही उन्होंने एक इंटरव्यू में यह साफ कर दिया है कि केन्द्र को छोड़कर महाराष्ट्र की राजनीति में वापिसी का उनका कोई इरादा नहीं है। वैसे भी जब वे भाजपा अध्यक्ष थे, तब भी वे महाराष्ट्र का चुनाव बुरी तरह खो चुके थे। और आज तो महाराष्ट्र में जिस तरह चौकोन लड़ाई है, उसमें किसी भी हार का कोई बात रहने वाला नहीं है, जीत की मां बनने के लिए लोग जरूर सामने आ जाएंगे। ऐसे में गडकरी की ये बातें भाजपा के लिए असुविधा के साथ-साथ शर्मिंदगी वाली भी हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मीडिया के साथ एक दशक से चले आ रहे अपने खराब संबंधों के बाद अब मीडिया में खासी जगह पा रहे हैं, और प्रधानमंत्री से मीडिया के संबंध अभी स्थिर हो नहीं पाए हैं। ऐसे में एक तबके के रूप में मीडिया को बेइज्जत करने वाला यह बयान समझदारी नहीं है, और उस पर अड़े रहकर, उसे सही बताकर गडकरी बात को जरूरत से अधिक दूर तक ले जा रहे हैं, जरूरत से अधिक बिगाड़ रहे हैं। 
लोकतंत्र में लोगों की भावनाओं को देखते हुए, मौके की अपनी जरूरत को देखते हुए लोगों को शातिर न सही समझदार तो रहना ही चाहिए। गडकरी की समझदारी में वैसे कोई कमी नहीं है, लेकिन वे वक्त-वक्त पर बेतुकी और बेगैरत बातें बोलने के आदी रहे हैं। कल तक जो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे, उनकी जुबान को भाजपा आज कितना काबू कर पाती है, यह अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की परेशानी है, गडकरी ने कुल मिलाकर एक यह नौबत खड़ी कर दी है कि कोई सड़क किनारे बैठे सांड को जाकर कोंचे कि उठ और मुझे मार।