गंदगी के खिलाफ सौ मील के सफर का पहला कदम

1 अक्टूबर 2014
संपादकीय
गांधी जयंती पर दो अक्टूबर को देश भर में स्वच्छता अभियान शुरू हो रहा है। केन्द्र और राज्य सरकारों के दफ्तर पहले अपना घर सुधारने में लग गए हैं, और हो सकता है कि जनता को इस अभियान में हिस्सेदारी में कुछ समय लगे, और यह भी हो सकता है कि लोग अपना घर भी साफ रखना न सीख पाएं, लेकिन यह मुद्दा देश के लिए, या किसी भी दूसरे देश के लिए बहुत अहमियत रखता है। 
भारत जैसे देश में जहां पर कि शहरीकरण इतना बेतरतीब हुआ है, कि न तो गंदा पानी बाहर निकलने का पूरा शहरी ढांचा है, और न ही ठोस कचरे के निपटारे में शहरी म्युनिसिपल कामयाब हो पाए हैं। ऐसे ढांचे वाले देश में जब जनता एकदम ही गैरजिम्मेदार हो जाती है, तो वह घर के सामने की नाली को घूरे की तरह इस्तेमाल करती है, और अपने घर के कचरे को कोशिश करके सड़़क के दूसरी तरफ फेंकती है। हम अपने आसपास के रोज के तजुर्बे को देखें, तो शहरों में लोग मकानों को तोडऩे से निकला हुआ मलबा भी घूरों पर फेंकते हैं, और इतना ठोस कचरा-मलबा उठा पाना किसी भी म्युनिसिपल के बस का नहीं रह जाता है। 
आज सरकारी दफ्तरों की खुद की सफाई बहुत अधिक मायने नहीं रखती, और यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शुरू किया हुआ एक प्रतीकात्मक कार्यक्रम अधिक है कि पहले अपना घर साफ करें, फिर शहर को साफ करने निकलें। लेकिन असल गंदगी शहरों के सार्वजनिक हिस्सों में है, जो कि अनुपात में इतनी अधिक है कि उसका निपटारा लोगों की आदतें सुधरने के साथ-साथ ठोस इंतजाम से ही हो सकेगा। हम सरकार की क्षमता और सीमा को समझते हैं, किसी भी देश या शहर की सरकार गंदे लोगों की गंदगी फैलाने की क्षमता का मुकाबला नहीं कर सकती। ऐसे में महात्मा गांधी को याद करना जरूरी है जिन्होंने पौन सदी पहले इस देश में सफाई को जिंदगी की एक शैली बनाने को अच्छी तरह स्थापित किया था, और अपने आश्रमों के पखानों की सफाई खुद करना, अपने परिवार से करवाना भी शुरू किया था। यह सिलसिला भी जरूरी है, इसलिए कि जब लोग किसी जगह को खुद साफ करेंगे, तो लोग उसे गंदा करने से हिचकेंगे भी। 
लेकिन शहरीकरण के साथ-साथ कचरा इतना अधिक पैदा होता है, और बदमिजाज लोगों की आबादी के बीच में वह इस कदर फैला और बिखरा रहता है, कि उसे उठाना और ठिकाने लगाना खासा महंगा पड़ता है। और हाल के बरसों में हमने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के म्युनिसिपल का बदलता हुआ मिजाज देखा है, उनको नाली, पानी, सफाई, रौशनी की बुनियादी शहरी जरूरतों को पूरा करने के बजाय सैकड़ों करोड़ के निर्माण के ठेके-टेंडर में दिलचस्पी अधिक होने लगी है, बड़े-बड़े कॉम्पलेक्स बनाना अच्छा लगने लगा है, और ऐसा क्यों होता है, यह सबको मालूम है। इस देश के शहरों में म्युनिसिपलों के तौर-तरीकों को, उनकी सोच को, और उनके काम के दायरे को बाजारू सोच से बाहर लाने की जरूरत है, उसके बिना कचरे का निपटारा वैसा ही ढीला पड़े रहेगा, जैसा कि पिछले एक बरस से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में देखने मिल रहा है। 
गांधी जयंती के दिन पर सरकारी कार्यक्रमों में झाड़ू लगाते हुए बड़े-बड़े लोग तस्वीरें तो खिंचवा लेंगे, लेकिन यह अभियान, और इसका नारा, किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती रहेगी कि उस पर अमल किस तरह से हो पाएगा, किस हद तक हो पाएगा। लेकिन अपनी तमाम आशंकाओं के साथ हम इस पहल का स्वागत करते हैं कि सौ मील का सफर भी शुरू तो पहले कदम से ही होता है। प्रधानमंत्री ने जो पहल की है, वह अगर इस देश के लोग आगे बढ़ाते हैं तो यह देश बाकी सभ्य और साफ-सुथरे देशों की हिकारत से बच सकेगा। आज तो हाल यह है कि प्रवासी भारतीय भी अपनी जन्मभूमि की गंदगी को देखते हुए यहां लौटकर बसना ठीक नहीं समझते।

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