कुदरती मार से दूर के राज्यों का भी एक राष्ट्रीय जिम्मा है

12 अक्टूबर 2014
संपादकीय
छत्तीसगढ़ के पड़ोस के दो राज्य ओडिशा और आन्ध्रप्रदेश एक और बड़े तूफान के खतरे में खड़े हैं। इसका असर शुरू हो चुका है, और नुकसान कितना होगा इसका ठीक-ठीक अंदाज अभी नहीं है। छत्तीसगढ़ चूंकि समंदर से दूर है, पहाड़ों से दूर है, बाढ़ वाली तूफानी पहाड़ी नदियों से दूर है, भूकंप के खतरे से भी लगभग दूर ही है, और किसी पड़ोसी देश की सरहद यहां नहीं छूती है। नतीजा यह है कि हिन्दुस्तान के दूसरे बहुत से प्रदेश जिन खतरों को झेलते हैं, छत्तीसगढ़ उन खतरों से, और उनसे होने वाले अंतहीन नुकसान से भी बचा हुआ प्रदेश है। लेकिन हिन्दुस्तान का हिस्सा होने के नाते बाकी प्रदेशों की मुसीबत के वक्त यह प्रदेश, और ऐसे दूसरे प्रदेश क्या कर सकते हैं? 
एक तो ऐसे प्रदेशों की सरकारें नुकसान झेलने वाले दूसरे प्रदेशों के लिए नगद मदद भेज सकती हैं, और सामान भी भेज सकती हैं। फिर यह भी है कि सरकार, राजनीतिक दल, और समाज के अलग-अलग तबके मिलकर, और अलग-अलग भी, मदद जुटाने का काम कर सकते हैं, और नुकसान झेल रहे लोगों के लिए भेज सकते हैं। एक बात यह भी है कि हिन्दुस्तान में हर बरस बहुत से राज्य बहुत बड़ी बर्बादी झेलते हैं, और वहां पर सेना से लेकर दूसरे सिपाहियों तक को तैनात किया जाता है, और जब बर्बादी का मंजर काबू में दिखता है, तो लोग वहां से लौट आते हैं। लेकिन हमने बिहार, असम सहित उत्तर-पूर्व, और जम्मू-कश्मीर की बाढ़ को देखा है, जहां से पानी तो वक्त के साथ उतर गया, लेकिन उन प्रदेशों को बाढ़ एक पीढ़ी पीछे कर गई। इतनी बर्बादी, इतनी बर्बादी कि देखते न बने। मरम्मत और दुबारा बनाने की जरूरत इतनी कि कोई सरकारें भी उन्हें पूरा न कर सकें। 
ऐसे में हम सोचते हैं कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य जिन पर खुद पर कुदरत की ऐसी और इतनी मार नहीं पड़ती है, वे बाकी देश का हाथ बंटाने के लिए प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की एक ऐसी फौज तैयार कर सकते हैं कि जिसके उत्साही लोग देश में कहीं भी जरूरत पडऩे पर अपने घर-बार और कारोबार को छोड़कर वहां जाएं, और कुछ हफ्ते काम करके लौटें। सुरक्षित राज्यों को चाहिए कि वे अपनी आबादी में से नौजवान, मजबूत, उत्साही लोगों को छांटकर उनको ऐसी ट्रेनिंग देने का ऐसा स्थायी इंतजाम करें, ताकि वे लोग किसी भी मुसीबत में जाकर मददगार हो सकें। ऐसे नौजवानों को छांटकर उन्हें किस्तों में सौ-दो सौ दिनों की ऐसी ट्रेनिंग दी जा सकती है जिससे कि वे भूकंप के मलबे में, बाढ़ में डूबे या डूब से उबरे इलाकों में, तूफान से तबाह इलाकों में जाकर अपना खून देने से लेकर, लोगों की मलहम-पट्टी करने का काम कर सकें, लोगोंं को प्राकृतिक विपदा के बाद घर सुधारने में मदद कर सकें, अस्पतालों में मददगार हो सकें, और जरूरत के हर किस्म के दूसरे काम कर सकें। 
देश की सरहद पर इसी देश की आबादी का एक हिस्सा गोलियों और धमाकों को झेलते हुए शहादत के लिए तैयार रहता है। देश के बहुत से प्रदेशों में नक्सल मोर्चों पर तैनात लोगों में से सैकड़ों की जान हर बरस जाती है। ऐसे में इस देश के बाकी करोड़ों नौजवानों में से कुछ लाख लोग भी इस तरह से अगर प्रशिक्षित किए जा सकते हैं, तो वे न सिर्फ मुसीबत के वक्त काम आएंगे, बल्कि मुसीबत न रहने पर भी वे एक बेहतर नागरिक साबित होंगे। ऐसे लोग अपने सीखे हुए हुनर को भी आसपास के दूसरे लोगों में, बच्चों में बांटकर उनको भी तैयार कर सकेंगे। हमारा मानना है कि अगर सरकार एक ईमानदार पहल करे, ट्रेनिंग का गंभीरता से इंतजाम करे, तो आबादी का पांच-दस फीसदी हिस्सा इसमें दिलचस्पी ले सकता है। और ऐसा काम इस देश की एकता को मजबूत करने के काम भी आएगा, क्योंकि दूर-दूर से आए मददगारों को लोग कभी भूल नहीं पाएंगे। राज्य सरकारों को चाहिए कि प्राकृतिक विपदाओं में किसी भी प्रदेश में पडऩे वाली जरूरतों के मुताबिक अपने प्रदेश में डॉक्टरों, तैराकों, चिकित्सा सहायकों में से ऐसे वालंटियर दर्ज करके भी रखे जिनमें मदद के लिए दूर तक जाने का हौसला हो। ऐसी पहल बहुत महंगी भी नहीं होगी, और यह प्रदेश के भीतर अपने नागरिकों को  बेहतर, अधिक जिम्मेदार, अधिक फिट, अधिक सेहतमंद बनाने में भी मदद करेगी।

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