आतंक के तार सरहद पार और अडिय़ल ममता बैनर्जी

14 अक्टूबर 2014
संपादकीय

बांग्लादेश स्थित कुछ आतंकी संगठनों के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल में भारत के स्थानीय लोगों ने विस्फोटक बनाने और आतंकी साजिश करने का काम किया है, ऐसी खबरें हैं। और साथ-साथ ये खबरें भी हैं कि तृणमूल कांग्रेस की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी अपने प्रदेश में सामने आए विस्फोट और आतंकी हलचलों की राष्ट्रीय जांच एजेंसी से जांच करवाने में कुछ आनाकानी कर रही हैं। केन्द्र सरकार के साथ ममता बैनर्जी का यह टकराव नया नहीं है। जब वे केन्द्र में रेलमंत्री थीं, तब वे पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार के साथ लगातार टकराव खड़ा रखती थीं, और राज्य के भीतर भी अपनी सुरक्षा के लिए वामपंथी सरकार के सुरक्षा इंतजाम से परे अपनी खुद की रेलवे सुरक्षा साथ लेकर चलती थीं। बाद में वे बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं, तो तरह-तरह से केन्द्र सरकार से उन्होंने टकराव जारी रखा।
भारत के संघीय ढांचे में केन्द्र और राज्य के संबंधों पर बहुत बारीकी से व्यवस्था की गई है। और अगर इन दोनों में से कोई एक पक्ष टकराव पर उतारू या आमादा हो जाए, तो उसमें बड़ा नुकसान राज्य का होता है, और ममता बैनर्जी को इस बात की समझ नहीं है ऐसा तो हम नहीं कहेंगे, लेकिन उनको इसकी फिक्र नहीं है ऐसा वे हर बार साबित करती हैं। दूसरे कुछ मामलों में तो वे अपने राज्य बंगाल का नुकसान करके अगले चुनाव में अपना नुकसान कर सकती हैं, लेकिन जब सीमा पार से आतंकी साजिशों का मामला आता है, और जैसा कि पहली खबरों में सामने आया है, बंगाल की जमीन पर उसके पनपने के सुबूत मिले हैं, तो उसके बाद भी ममता बैनर्जी का घरेलू जांच पर अड़े रहना अलोकतांत्रिक है, और बेवकूफी की बात है। जब एक से अधिक राज्यों में आतंकी वारदातें हों, और वे आपस में जुड़ी हुई हों, या उनके तार सरहद के पार से आए हुए हों, तो भारत की व्यवस्था में राष्ट्रीय जांच एजेंसी एक सही संगठन है जिसके हवाले ऐसे मामले बिना देर किए हो जाने चाहिए।
अमरीका जैसा विकसित देश को देखें, तो वहां भी कुछ किस्म के मामले राज्यों की जांच एजेंसियों से परे के रहते हैं, और केन्द्र सरकार की जांच एजेंसी सीधे ही उन मामलों की जांच शुरू कर देती है। भारत में भी हमारा मानना है कि एक से अधिक राज्यों से जुड़े हुए आतंकी मामलों को केन्द्र की जांच एजेंसी को ही देखना चाहिए, और संविधान में ऐसी व्यवस्था करने को हम राज्यों के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं मानते। आतंकी हिंसा और तोडफ़ोड़ को लेकर किसी राज्य को छुपाने का क्यों कुछ रहना चाहिए यह हमारी समझ से परे है। यह राज्य के सामान्य अपराधों को लेकर होने वाली जांच को केन्द्र सरकार की सीबीआई को देने जैसा मामला नहीं है। देश के बाहर से पहले भी मुम्बई जैसे आतंकी हमले सामने आए हैं, और ऐसे मामले राज्य की जांच क्षमता से परे के रहते हैं। ममता बैनर्जी की राजनीति एक कुएं में जीते हुए प्राणी की राजनीति जैसी दिखती है जिसे अपनी सीमित दुनिया से परे कुछ नहीं दिखता। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में अलग-अलग राज्यों ऐसी नाजायज जिद नहीं चल सकती। हम केन्द्र सरकार के हाथ में इस किस्म की आतंकी कार्रवाई की सीधी जांच का अधिकार ठीक समझते हैं, और इसके लिए कानून में बदलाव करना चाहिए।

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