जयललिताओं के हाथों में खेलते लोकतंत्र की कहानी

18 अक्टूबर 2014
संपादकीय

तमिलनाडू की पिछली मुख्यमंत्री और अन्नाद्रमुक पार्टी की मालकिन जयललिता को कल सुप्रीम कोर्ट से बहुत सी शर्तों के साथ जमानत मिली, तो उनके राज्य में समर्थकों का एक बड़ा तबका खुशी से झूम उठा। उनको एक निचली अदालत से सजा मिलने के बाद कुछ लोगों के खुदकुशी करने की खबरें भी आई थीं, उनके पीछे की सच्चाई एक अलग जांच का मुद्दा है। लोगों को याद होगा कि जब आन्ध्र में मुख्यमंत्री वाई.एस.आर. रेड्डी गुजरे थे, तो वहां भी बहुत से लोगों के आत्महत्या की खबरें आई थीं, और कई लोगों के इसी गम में सदमे से गुजर जाने के किस्से भी सामने आए थे। फिर यह भी सामने आया था कि इनमें से कुछ मामले साधारण मौतों को भुगतान करके सदमा-मौतों में तब्दील करवाने के थे। तमिलनाडू में दोनों किस्म की बातें हो सकती हैं, और वहां पर जनता के बीच जो गम का सैलाब मीडिया के मार्फत बाहर आता है, उसका इंतजाम करना भी ऐसे नेता के लोगों के लिए मुश्किल नहीं है जिसे कि अदालत ने भ्रष्ट कमाई में से सौ करोड़ का जुर्माना सुनाया है। 
लेकिन अभी हम कैमरों की भूख मिटाने के लिए पेश किए गए नजारों से परे की यह बात करना चाहते हैं कि चुनावों में भ्रष्ट लोग किस तरह जीतकर आ जाते हैं? अब तमिलनाडू की ही बात करें, तो वहां पर एक तरफ तो अन्नाद्रमुख की मुखिया जयललिता सजायाफ्ता मुजरिम हैं, और उनकी दौलत जाहिर है कि सरकार के चलते ही जुटी थी। लेकिन यह मामला चलते हुए भी वे और उनकी पार्टी चुनाव जीतते रहे, और वोटरों के एक बड़े तबके में उनकी शोहरत बनी रही। वे लोगों को सस्ती इडली देती रहीं, सस्ता पानी, सस्ता आटा, सस्ता सीमेंट, मुफ्त का मंगलसूत्र, और भी न जाने क्या-क्या। नतीजा यह हुआ कि जब चुनाव हुए तो किसी को जयललिता के भ्रष्टाचार से खास दिक्कत नहीं दिखी, और वे भारी बहुमत से अपने लोगों को जिताकर ले आईं। यही हाल देश के दूसरे बहुत से प्रदेशों का है, जहां पर कि भ्रष्ट नेता अपने कुनबों सहित बार-बार जीत जाते हैं, सरकार चलाते हैं, और अगली कुछ और पीढिय़ों के लिए काली कमाई जुटा जाते हैं। 
भारत के लोकतंत्र में लगातार चुनाव होने, और मतदान में गड़बड़ी करीब-करीब खत्म हो जाने को लोकतंत्र की बड़ी कामयाबी माना जाता है। हमारा मानना है कि साफ-सुथरा मतदान किसी इंसानी बदन पर सिर के बालों जितना ही वजन रखता है। बाकी की पूरी की पूरी देह की हालत लोकतंत्र की बाकी हालत बताती है। जब कोई नेता पूरे पांच बरस अपने इलाके के वोटरों पर काली कमाई खर्च करता है, एक हाथ लूटता है, और दूसरे हाथ रॉबिन हुड की तरह गरीबों को बांटता है, तो यह कैसा लोकतंत्र है? क्या लूट का कुछ हिस्सा जनता को बांट देना जनतंत्र हो सकता है? दूसरी बात यह कि चुनाव के वक्त जितने बड़े पैमाने पर वोटों की खरीदी होती है, जाति और धर्म के आधार पर, मिलते-जुलते नाम के आधार पर धोखा देने के लिए फर्जी उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं, वोटरों को तोहफे बांटे जाते हैं, शराब बांटी जाती है, नगदी बांटी जाती है, और विपक्षी उम्मीदवार के कार्यकर्ताओं को खरीदा जाता है, तो उसके बाद चुनाव कितना ईमानदार रह जाता है? और बात यहीं खत्म नहीं होती, ऐसे जीतकर आए हुए सांसदों और विधायकों को सरकार बनाने के लिए एक बार फिर खरीदा और बेचा जाता है। 
भ्रष्टाचार, खरीद-बिक्री, जाति और धर्म की नफरत, जोड़तोड़, कानूनी सीमा से पचीस-पचास गुना अधिक खर्च करने के बाद जो राजनीति चलती है, वह आने वाले बरसों में फिर सौ कमाने और दस बांटने का सिलसिला जारी रखती है। अब ऐसे लोकतंत्र को क्या माना जाए? भारत के चुनावों में जयललिताओं के सत्ता पर आने को यही कहा जा सकता है कि यहां लोकतंत्र, चुनावों को भ्रष्टाचार से सबसे अधिक प्रभावित करके जीतने का नाम है। और ऐसा लोकतंत्र अपने आपको जनता के फैसले का तमगा लगाकर भी घूमता है, अपने आपके निर्वाचित होने का झांसा फैलाते हुए घूमता है। खरीदने और जोडऩे-तोडऩे की सबसे अधिक ताकत का नाम भारतीय लोकतंत्र हो गया है, और यह झांसा खत्म होने का कोई आसार नहीं दिखता। जिसके पास नोट हैं, उसे उन लोगों का डर दिखाएं जिनके पास कि वोट हैं, और जिनके पास वोट हैं उनको उन लोगों का डर दिखाएं, जिनके पास कि नोट हैं, और फिर दोनों से वसूली-उगाही करें, पैसे कमाएं-सत्ता में आएं, यही सिलसिला देश भर में चल रहा है। ऐसे में साफ-सुथरा मतदान लोकतंत्र के सिर पर बालों की तरह है, जिससे कि बदन की सेहत का कोई लेना-देना नहीं रह जाता। 

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