धरती की गंदगी के साथ-साथ दिल-दिमाग की सफाई जरूरी

2 अक्टूबर 2014
संपादकीय

देश भर में इस वक्त चल रहे सफाई अभियान में लोग झाडू लेकर निकले हैं, और उनकी नीयत सचमुच सफाई की हो, या तस्वीरें खिंचवाने की, उस पर गए बिना अभी हम यह मान लेते हैं कि ये तमाम लोग गंदगी दूर करने के लिए कमर कसकर निकले हैं। इस बारे में हमने कल इसी जगह पर लिखा था, इसलिए सड़क किनारों, नालियों, घूरों, और इमारतों की गंदगी से परे के बारे में भी कुछ चर्चा आज होनी चाहिए। इसलिए भी होनी चाहिए कि आज महात्मा गांधी की जन्मतिथि है और उनके हवाले से बार-बार इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि वे कितने सफाईपसंद थे, और सफाई के लिए हर किसी के खुद काम करने पर वे कितना जोर देते थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह भी कहा कि गांधी ने तो इस देश को आजादी दी, लेकिन इस देश के लोगों ने गांधी को क्या दिया? लोगों ने तो गांधी को एक गंदगीमुक्त भारत भी नहीं दिया। 
यह बात सही है कि जब गांधी की बात होती है तो इस देश ने उनसे आजादी हासिल की, और उसके बाद उनकी जान भी ले ली, लेकिन उनको उनकी सोच के मुताबिक कुछ भी नहीं दिया। न सादगी दी, न किफायत दी, न ईमानदारी दी, और बोलचाल की जुबान में जिसे इंसानियत कहा जाता है, वह इंसानियत भी उनको नहीं दी। कुल मिलाकर गांधी की सोच के मुताबिक कोई चाल-चलन लोगों ने उनको नहीं दिया। इसलिए आज जब देश में गांधी के नाम पर एक बड़ा सफाई अभियान शुरू हुआ है, तो उसके बिखरे हुए कचरे वाले हिस्से पर कल की गई बात के बाद आज हम दिल और दिमाग के भीतर भरी हुई गंदगी के बारे में बात करना चाहेंगे। 
और ऐसा भी नहीं है कि इस बारे में आज हम पहली बार बात कर रहे हैं। भारत की राजनीति और यहां के सार्वजनिक जीवन में दिल और दिमाग की गंदगी जितनी तरह से निकलकर सामने आती है, वह मुकाबले में खड़े दूसरे लोगों के दिल और दिमाग से भी झाग पैदा करने लगती है। लोग हिंसक और साम्प्रदायिक बातों से उफनने लगते हैं, और देश की हवा, देश का अमनचैन, सबमें गंदगी फैल जाती है। यह बात अकेले प्रधानमंत्री के आसपास के लोगों के साथ हो, ऐसा भी नहीं है। कहीं उत्तरप्रदेश में कांगे्रस का एक नेता मोदी की बोटी-बोटी बिखेर देने की बात करता है, कहीं हैदराबाद में एक मुस्लिम नेता नफरत का सैलाब बिखेर देता है, और कहीं मोदी की पार्टी का एक नौजवान सितारा मुसलमानों के हाथ काटकर फेंक देने की बात कहता है, उनकी पार्टी के योगी और संत या ऐसे ही दूसरे विशेषणों से सजे लोग नफरत की बातों का नया रिकॉर्ड कायम करते हैं। नरेन्द्र मोदी का सड़कों से गंदगी साफ करने का अभियान अपने-आपमें ठीक तो है, लेकिन जब उन्होंने गांधी को कुछ देने की बात उठाई है, तो उसके लिए सिर्फ सार्वजनिक जगहों से गंदगी उठाना काफी नहीं होता, दिल और दिमाग से भी गंदगी को उठाना होगा, और जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर झाडू उठाने की पहल उन्होंने की है, उसी तरह उनको राष्ट्रीय स्तर पर विचारों की गंदगी पर भी झाडू उठाने की पहल करनी चाहिए। आज हमारा मानना है कि आम चुनावों में उनकी कामयाबी के बाद नरेन्द्र मोदी भारत में सबसे अधिक समर्थकों वाले हैं, और उनकी आवाज वजनदार है। उनको अपनी इस अनोखी और अभूतपूर्व स्थिति का इस्तेमाल विचारों की शुद्धता के गांधी के आग्रह की ओर बढऩे के लिए करना चाहिए। बहुत से लोगों को नरेन्द्र मोदी और उनके साथियों की कथनी और करनी में फर्क का शक है, लेकिन हम प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के मुताबिक हर किसी को संदेह का लाभ देने के हिमायती हैं, और हम नरेन्द्र मोदी को भी यह मौका देना चाहते हैं कि वे भारत की राजनीति में अहिंसक सोच और सद्भाव के लिए पहल करें, और उनकी इस पहल के मुकाबले बाकी लोगों को भी अपनी हिंसा कम करनी पड़ेगी, छोडऩी पड़ेगी।
धरती की गंदगी हटाने के साथ-साथ दिल-दिमाग की गंदगी को कम करना भी जरूरी है, और इसके लिए किसी अभियान की जरूरत नहीं है, महज एक मिसाल काफी होगी, अगर वह ईमानदारी से लगातार सामने रखी जाती रही।

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