लक्ष्मी पूजा के दिन तस्वीरों, प्रतिमाओं से परे की बात

22 अक्टूबर 2014 
संपादकीय 

भारत का एक बड़ा हिस्सा कल लक्ष्मी पूजा की तैयारी में लगा हुआ है। देश की सांस्कृतिक परंपरा के मुताबिक सरकारी दफ्तरों की तिजोरियों की और बैंकों में रखी नगदी की भी पूजा होगी, और भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के भीतर कभी कोई इस बात पर सवाल नहीं करते कि सरकारी खजानों की किसी एक धर्म के मुताबिक पूजा क्यों होनी चाहिए। इसलिए देश की संस्कृति धर्म पर हावी है, और दूसरे धर्मों के कारोबारी भी इस दिन लक्ष्मी की पूजा करते हैं। इस पूजा को संपन्नता से जोड़कर देखा जाता है, कमाई से जोड़कर देखा जाता है, और धन की देवी लक्ष्मी का सम्मान इतना होता है कि जब किसी के घर लड़की का जन्म होता है, तो कुछ लोग खुशी में, और कुछ लोग हमदर्दी जताने के लिए यह कहते हैं कि लक्ष्मी आई है। कोई भी यह नहीं कहते कि सरस्वती आई है, या दुर्गा आई है। 
लेकिन लक्ष्मी पूजा करने वाला भारतीय समाज चाहत के बिना आ गई लक्ष्मी का क्या हाल करता है, यह भी इस मौके पर सोचना चाहिए। लक्ष्मी के मुकाबले सरस्वती का महत्व कम रहता है, इसलिए लोग लड़की को लक्ष्मी से जोड़कर देखते हैं, और इसीलिए हम आज इस मौके पर भारत की जीती-जागती लक्ष्मियों के बारे में बात करना चाहते हैं। जो लोग इस दिन पूजा की तैयारी में कई दिन से साज-सज्जा कर रहे होंगे, वे भी अपने घर की अजन्मी लक्ष्मी से लेकर पैदा हो चुकी लक्ष्मी तक, गृहलक्ष्मी से लेकर घर आई बहू तक, और घर में बुजुर्ग बच गई बूढ़ी लक्ष्मी मां तक से कैसा बर्ताव करते हैं, यह सोचने की बात है। समाज में सामाजिक स्तर पर सोचने की बात है कि लड़कियों के लिए लोगों का नजरिया कैसा है। फिक्र की बात इसलिए भी है कि एक बुजुर्ग नेता जो कि हरियाणा के मुख्यमंत्री होने जा रहे हैं, उन्होंने पिछले दिनों अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही लड़कियों के लिए भारी भेदभाव की अपमानजनक बातें कही थीं। अब ऐसे लोग अगर ताकत की और कानून की ऊंची कुर्सियों पर पहुंचते हैं, तो उनकी सार्वजनिक जगहों पर कही गई बातें, उनके मातहत लोगों की सोच बन जाना अनिवार्य सा हो जाता है। देश के संविधान में महिला को बराबरी का दर्जा दिया गया है, लेकिन संविधान की शपथ लेने वाले लोग इस भावना के खिलाफ खुल कर बातें करते हैं, और भारतीय लोकतंत्र में इसका कोई इलाज भी नहीं दिखता। 
लक्ष्मी पूजा के दिन हम जिंदा लक्ष्मियों की चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि एक तस्वीर या एक प्रतिमा की पूजा करने के बजाए अधिक जरूरी यह है कि समाज के भीतर महिलाओं को बराबरी का दर्जा दिया जाए। जीवित महिलाओं को पांव की जूती माना जाए, और तस्वीरों की पूजा की जाए, यह सिवाय बेइंसाफी कुछ नहीं हो सकता। आज के दिन लोगों को गृहलक्ष्मी, समाजलक्ष्मी, और पड़ोसलक्ष्मी के बारे में सोचना चाहिए।

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