हिन्दुस्तान की नई पीढ़ी को कोंचने के लिए दो बातें...

5 अक्टूबर 2014
संपादकीय
हांगकांग में वहां नियंत्रण करने वाली चीन सरकार के खिलाफ एक बड़ा लोकतांत्रिक आंदोलन चल रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बहुत खबरों में है। चूंकि यह चीन सरकार के खिलाफ है, इसलिए यह जाहिर है कि पश्चिम में केन्द्रित अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इसे खासी जगह मिलना है। लेकिन हम अभी न तो पश्चिमी मीडिया के इस रूख पर लिख रहे हैं, और न ही इस आंदोलन के पीछे की वजहों को लेकर इसे सही या गलत ठहराने का काम कर रहे। यह सब एक अलग बहस का मुद्दा है, और आज हमें इस आंदोलन को लेकर एक ऐसे पहलू पर लिखना अधिक महत्वपूर्ण लग रहा है, जो कि इन पूरी खबरों में बड़े हाशिए की बात है। 
हांगकांग की सड़कों पर जमे हुए दसियों हजार आंदोलनकारियों का मुखिया 17 बरस का एक लड़का है। अब अगर हम हिन्दुस्तान के इस उम्र के लड़के-लड़कियों के बारे में सोचें, और किसी राजनीतिक या सामाजिक आंदोलन में उनकी हिस्सेदारी के बारे में सोचें, तो यह कल्पना भी मुश्किल है कि बालिग होने के पहले किसी किशोर-किशोरी को किसी आंदोलन में हिस्सेदारी की इजाजत उनके मां-बाप देंगे, और इस उम्र के लोगों को सामाजिक और राजनीतिक हकीकत की कोई समझ होगी, और कोई दिलचस्पी होगी। भारत में इस पीढ़ी के लोग किसी असल मुद्दे को पढ़ते भी  कम ही दिखते हैं, उस पर चर्चा करते, या किसी तरह की हिस्सेदारी का तो सवाल ही नहीं है। इस देश में राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों की परंपरा और उनका सिलसिला खत्म हो चुके हैं। उनकी जगह धार्मिक, साम्प्रदायिक, जातिवादी, और क्षेत्रवादी आंदोलन ही रह गए हैं, और इनके लिए समझ की जरूरत बिल्कुल नहीं होती, लोगों का कमसमझ होना जरूरी होता है। हिन्दुस्तान की ताजा पीढ़ी ऐसे आंदोलनों को ढोने के लिए एकदम तैयार हैं। 
हम भारत की आजादी के आंदोलन और हांगकांग के अभी के आंदोलन की किसी तुलना के बिना दो अलग-अलग बातों को यहां पर एक साथ रखना चाहते हैं। हिन्दुस्तान की आजादी की लड़ाई में भगत सिंह ने 23 बरस की उम्र में फांसी पाई थी और उसके पहले उस नौजवान ने उस दौर में दुनिया के इतिहास को, आर्थिक और सामाजिक हकीकत को, वामपंथ को, धर्म के पाखंड को, और भारत पर काबिज अंग्रेजी हुकूमत को इतना समझा था, जितना कि उस उम्र में शायद ही किसी और ने समझा हो। अपने अनगिनत लेखों में, बयानों में, चि_ियों में भगत सिंह ने जितना लिखा था, उतना आज हिन्दुस्तान में उनकी उम्र के नौजवान पढ़ भी नहीं पाते हैं। आज इस मुद्दे पर हम इसलिए लिख रहे हैं कि मोबाइक और मोबाइल वाली हिन्दुस्तानी नौजवान पीढ़ी को अपनी समझ और अपनी अक्ल पर कुछ तरस आना चाहिए, उनको कुछ शर्म आनी चाहिए। दुनिया में जब कम उम्र के लोग बड़े-बड़े लोकतांत्रिक आंदोलनों में हिस्सा लेते हैं, तो हिन्दुस्तान में उनकी पीढ़ी के लोग चे गुएरा की तस्वीरों वाले टी-शर्ट यह जाने बिना पहनकर घूमते हैं कि यह तस्वीर किसकी है। ऐसे देश में  आने वाला वक्त ऐसा ही होगा जैसा कि ग्राहकों से भरे किसी बाजार का होता है। जिस देश की नौजवान पीढ़ी कुछ भी गंभीर नहीं पढ़ती, किसी भी गंभीर मुद्दे पर बातचीत में हिस्सा नहीं लेती, और जिसकी सारी समझ मोबाइल फोन के नए मॉडल तक सीमित है, उस पीढ़ी से यह देश आगे बढऩे से रहा, और अगर कोई मुसीबत आई, तो बचने से रहा। आज हम इसी पीढ़ी को कोंचने के लिए लिख रहे हैं। 

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