लोकतंत्र में गब्बर को बिस्किट की मॉडलिंग की रियायत नहीं

15 अक्टूबर 2014
संपादकीय
महाराष्ट्र और हरियाणा में अभी मतदान चल रहा है, और इस बीच ही कोलकाता के एक अंग्रेजी अखबार में महाराष्ट्र के पिछले कांग्रेसी मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण का एक इंटरव्यू छपा है जिसमें उन्होंने एक से अधिक बार यह खुलासा किया है कि आदर्श घोटाले से लेकर सिंचाई घोटाले तक, बहुत से सरकारी भ्रष्टाचार के मामलों में वे मुख्यमंत्री के रूप में कार्रवाई इसलिए नहीं कर पाए क्योंकि सरकार गठबंधन की थी, और वह गिर जाती। अपनी ही कांग्रेस पार्टी के पिछले दो-तीन मुख्यमंत्रियों के आदर्श घोटाले पर कार्रवाई के बारे में उन्होंने कहा कि अगर उन्होंने कार्रवाई की होती तो पूरी पार्टी खत्म हो जाती और चुनाव में कांग्रेस दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाती। 
पृथ्वीराज चव्हाण को कांग्रेस में एक बेहतर मुख्यमंत्री माना जाता है, और उनके बारे में कहा जाता है कि वे भ्रष्ट नहीं है। लेकिन ऐसी ही बात प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह के बारे में उनके कार्यकाल में कही जाती थी और लोगों ने यह देखा है कि उनके मातहत हर किस्म का भ्रष्टाचार हुआ, कई मंत्री जेल गए, और देश का लाखों करोड़ का तो जाहिर नुकसान हुआ, और कोयला घोटाला वगैरह देखें, तो देश की अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ी दिखती है। ऐसे में महाराष्ट्र के कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे, साफगोई की बात करने वाले पृथ्वीराज चव्हाण की इस बात पर सोचने की जरूरत है कि निजी ईमानदारी किसी मुखिया की खूबी होती है, या लोकतंत्र में उसका कोई महत्व नहीं होता? निजी ईमानदारी तो सरकार और लोकतंत्र से परे भी हर किसी के लिए एक बुनियादी जरूरत होनी चाहिए, लेकिन जब कोई मुखिया बनते हैं, तो उनके लिए यह भी जरूरी होता है, कि वे अपने मातहत जुर्म होते हुए देखते न बैठे रहें। जहां कहीं भी ऐसा होता है, और हम सिर्फ कांग्रेस के बारे में यह बात नहीं कह रहे हैं, दूसरी पार्टियों का हाल इससे बेहतर हो ऐसा भी नहीं है। लोकतंत्र में ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि  गब्बर तो हाथ में पारले ग्लूकोज बिस्किट लेकर उसकी मॉडलिंग करे, अपने आपको शाकाहारी और ईमानदार बताए, और उसके मातहत सांभा और कालिया लूटपाट करते रहें। 
ऐसा लगता है कि इस इन्टरव्यू के आधार पर ही पृथ्वीराज चव्हाण को कटघरे में लाया जा सकता है, कि उन्होंने सरकार बचाने के लिए अपने मातहत भ्रष्टाचार को जारी रहने दिया। किसी मुखिया को अनदेखी करने की रियायत नहीं मिल सकती है, और देश में ऐसी कुछ मिसालें कायम होने जरूरी हैं, ताकि लोग आगे अपनी जिम्मेदारी को समझ सकें, और काम कर सकें। फिलहाल देश की राजनीति में कांग्रेस की जो बदहाली हुई है, उसमें इस पार्टी को पांच-दस बरस के लिए घर बैठकर आत्ममंथन, आत्मग्लानि, और आत्मसुधार का काम करना चाहिए, ताकि वह पांच-दस बरस के बाद के किसी चुनाव में जनता को मुंह दिखाने के लायक बन सके। अब हम इंतजार कर रहे हैं कि पृथ्वीराज चव्हाण के इस इन्टरव्यू को आधार बनाकर कोई अदालत तक जाए, और जुर्म को अनदेखा करने के जुर्म में उनको घेरे। 

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